गली बनारस की -9

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…- 9

         बिक्रम ठेकेदार के साथ वहां पहुंच गया जहां उसे शायद नहीं पहुंचना चाहिए था . ….
उसे भी नहीं मालूम था कि वहाँ जाकर वो खुद शनिदेव को अपनी कुंडली में आ बैठने का निमंत्रण देने वाला है …
   ठाकुर साहब की हवेली के आदमकद गेट के बाहर  हट्टा कट्टा सांड सा गार्ड खड़ा था , जिसने अपनी रायफल बिक्रम के सामने अड़ा कर उसे रोक दिया …

” साहब की इजाजत बिना कोई अंदर नहीं जा सकता”

” साहब को जाकर बोलना की गंगा योजना में कार्यरत इंजीनियर उनसे मिलने आया है..”

” अभी अंदर पूजा का कार्यक्रम चल रहा है …सहाब नहीं मिलेंगे !”

” आप जाकर एक बार पूछ के देखिए , अगर मना करते हैं तो मैं वापस चला जाऊँगा।”

  गार्ड ने बुरा सा मुहँ बनाया और धीमे से गेट खोल के अंदर घुस गया…कुछ देर गेट के पीछे खड़े रहने के बाद वो गेट खोल कर बाहर आ ही रहा था कि उसे बिक्रम की आवाज सुनाई दी…

” वाह भाई! शाबाश !! बिना साहब से मिले ही हमे टालने वाले हो …

गार्ड चौंक गया, इधर उधर नजरें मारते उसका ध्यान गया… बिक्रम गेट के बाजू वाली दीवार की मुंडेर पर चढ़ा बैठा था …गार्ड उसे कुछ बोल पता कि वो बाहर की तरह कूद गया …
   बाहरी दीवारो पर रंग-रोगन चल रहा था और पुताई करने वालों के पास की सीढी ले कर बिक्रम उस की सहायता से दीवार पर चढ़ बैठा था , उसे गार्ड की कारस्तानी का कुछ अंदाजा था , और बस ऊपर से उसने गार्ड की बदमाशी देख ली थी ….

बिक्रम की बात पर गार्ड झेपं  कर रह गया लेकिन वो कैसे किसी साधारण से आदमी के सामने झुक जाता इसलिए वापस बहस में लग गया…

” भाई बस एक बार चौधरी साहब से पूछ कर तो आओ..मैं सच्ची वापस चला जाऊँगा …!”

उसे घूर कर गार्ड ने अंदर जाने के लिए जैसे ही गेट खोला, उसे धक्का देकर बिक्रम ने अंदर की तरफ दौड़ लगा दी ….
  उसे भद्दी सी गाली देकर गार्ड उठा और बाकी सिक्योरिटी को आवाज लगाता उसके पीछे भागा..इस सब में बिक्रम के साथ आया ठेकेदार घबरा कर बाहर ही खड़ा रहा गया कि सिक्योरिटी का एक आदमी आकर उस पर गन तान कर उसे भी अंदर ले गया …

  बाहर बहुत बड़े से बगीचे के बीचों-बीच बड़ा सा कृत्रिम झरना बह रहा था , जिसमें अलग अलग रंगों का पानी बह रहा था ….
   बड़ी सी हवेली के सामने ठाकुर साहब का दरबार सजा था , जहां  एक लंबे चौड़े से सिहासन पर चौधरी साहब बैठे थे ..उनके पैर सामने रखी टेबल पर रखे थे … जिन्हें वहीं जमीन पर बैठा एक नौकर दबा रहा था।
    उनके एक तरफ हुक्का रखा था, जिसे बीच-बीच में वह गुलगुलाते जा रहे थे।  उनकी टेबल के दोनों तरफ सजी बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर कुछ लोग बैठे थे, और उनके टेबल के ठीक सामने जमीन पर एक लड़का पैर हाथ मुड़े जमीन पर पड़ा हुआ था… जिसकी गर्दन पर गन ताने चौधरी साहब का एक आदमी खड़ा था….

   चौधरी साहब उस लड़के से कुछ पूछ रहे थे, कि तभी बिक्रम भागता हुआ वहां पहुंच गया। चौधरी साहब के साथ साथ बाकी लोगों की आंखें भी बिक्रम की तरह पलट गई कि, तभी उसके पीछे गेट पर खड़ा वही गार्ड भी भागता हुआ वहां पहुंच गया…

” माफ कीजिएगा हुकुम यह हमें धक्का देकर अंदर चला आया…”

चौधरी ने घूर कर उस गार्ड को देखा और फिर बिक्रम की तरफ देखने लगे…

” क्या हुआ कौन हो तुम और हम से क्या काम है?”

” सर गंगा योजना में काम करने वाला सरकारी इंजीनियर हूं।  टेंडर जो पास हुआ था उस से रिलेटेड आपसे कुछ बातें करनी थी, और बस इसीलिए आपसे एक बार मिलना चाहता था। लेकिन आपका यह गार्ड मुझे आपसे मिले नहीं दे रहा था। इससे मैंने बहुत रिक्वेस्ट की थी, एक बार आप से पूछ कर तो आए लेकिन यह गेट खोल कर अंदर तो हुआ, 5 मिनट अंदर खड़े रहकर वापस बाहर आ गया और मुझसे कह दिया कि आप नहीं मिलना चाहते हो।
     सर !! इसीलिए आपसे मिलने के लिए मुझे इसे धक्का देकर अंदर घुसना पड़ा…”

चौधरी साहब वापस उस गार्ड को घूरने लगे, उन्होंने अपनी दाहिनी और बैठे अपने बड़े बेटे हीरक की तरफ देखा…..

” दीनदयाल बेईमान हो गया है, हम से आकर कहने की जगह वहीं से मेहमानों को रफा-दफा कर रहा है।  इसे इसकी बेईमानी की सजा दे दो…
   आप आइए मेहमान जी बैठिए…”

चौधरी ने बिक्रम की ओर देख कर मुस्कुरा कर कहा।  और विक्रम के चेहरे पर राहत के भाव आ गए… वह आगे बढ़कर चौधरी जी की बाई तरफ लगी कुर्सियों में से एक में  बैठ गया। वह जिस कुर्सी पर बैठा था उसके ठीक बाजू में एक लंबा चौड़ा सा गोरा चिट्टा लड़का बैठा था, जो बीच बीच में अपनी मूंछों पर उँगलियाँ फ़ेर लेता था ..
   विक्रम उसे देख रहा था कि तभी चौधरी जी बोल पड़े..

   “यह हमारा छोटा लड़का है रत्न चौधरी।  और यह हीरक चौधरी, हमारा बड़ा लड़का… हीरक बड़ा है लेकिन सिरफिरा है  इतना सनकी है कि इसे किसी भी काम को करने की आज्ञा दी जाए तो बिना सोचे समझे उस काम को कर जाता है..”

चौधरी साहब बोल रहे थे कि उसी बीच चौधरी के बेटे हीरक ने उस गार्ड को अपनी गन के निशाने पर लिया और उसे साथ लेकर आगे बढ़ने लगा।  वह जा ही रहा था कि चौधरी साहब ने बीच में ही चिल्लाकर उसे आवाज दी…

” अबे हीरा जान उन से मत मार देब, सिर्फ हाथ पैर तोड़ कर छोड़ देब ओका..”

बिक्रम उसी दिशा में देख रहा था, जिस तरफ हीरक उस गार्ड को लेकर चला गया था।  रास्ते से गुजरते समय ही हीरक ने  गार्ड को तीन चार जोरदार तमाचे लगा दिए थे। बिक्रम को खुद में शर्मिंदगी सी महसूस होने लगी थी कि, आखिर उसने गार्ड की शिकायत करने में इतनी जल्दबाजी क्यों की?उसे नहीं मालूम था कि चौधरी साहब इतने कठोर हैं, खैर उनका स्वभाव जो भी हो उसे उनसे बात तो करनी ही थी। क्योंकि वह अपनी नौकरी कर रहा था और उसे भी अपने ऊपर वालों को जवाब देना था…

” हां तो चौधरी साहब मैं यह पूछना चाहता था..

बिक्रम ने अपनी बात शुरू की ही थी कि चौधरी ने हाथ दिखाकर उसे रोक दिया…

” जब तक हम बोलते हैं, तब तक कोई दूजा नहीं बोलता, और अभी हमने आपसे पूछा ही कहा है कि आप क्या चाहते हैं..?”

बिक्रम ने हां में सिर हिलाया और चुप रह गया कि, तभी चौधरी ने अपने सामने बैठे उस लड़के की तरफ देखा। लड़का बहुत डरी हुई आंखों से हाथ जोड़े चौधरी साहब को ही देख रहा था। चौधरी साहब ने अपने बाई और रखा लठ उठाया और उससे उस लड़के की गर्दन पर रखकर उसका चेहरा ऊपर कर दिया वह लड़का बहुत ही ज्यादा डरा हुआ लग रहा था….

” माफ कर दीजिए हुकुम …अब ऐसा नहीं होगा। हमारी पहली और आखरी गलती समझ कर माफ कर दीजिए…

” वह क्या है ना बिट्टन कि हम और लोगन के समान नहीं है …हम चौधरी हैं। हमारा सोचना यह है कि जब पहली बार किसी से कोई गलती हो, तो उसे ऐसी सजा दो कि उसकी रूह कांप उठे और वह दोबारा कभी उस गलती को करने की सोची भी ना  लेकिन और लोग ऐसा नहीं करते… पहली गलती पर माफ कर देते हैं, जिससे सामने वाला दोबारा गलती करता है। तिबारा गलती करता है। जब तक पकड़ा नहीं जाता, तब तक गलती करता है। और जब तक सजा नहीं पाता तब तक नहीं सुधरता।
       हम उन लोगों में से नहीं है बचवा…

” माफ कर दीजिए हुजूर हम आपकी पाई पाई चुका देंगे…?

  “कैसे  चुकाओगे बोलो? पचास हजार गबन किए हो… अगर तुम्हारी झोपड़ी को तोड़ कर उसकी इंट बेचने जाएंगे ना तब भी हज़ार से ज्यादा हम कुछ नहीं पाएंगे और तो तुम्हारे घर में कुछ है नहीं..
  हम अपने आदमियों को भेजें रहे तलाशी के लिए, उस पूरे घर में तुम्हारी बहन के अलावा कोई काम की चीज नहीं दिखी….”

“हुजूर उसे बीच में मत लाइए। हम अपना गुर्दा बेच देंगे।  लेकिन आपका रुपया आपको देकर ही मरेंगे हमारी बहन को बीच में मत लाइए…”

“उसी के ब्याह के गबन  किए रहे ना?”

लड़का आंसू पोछते हुए चुपचाप नीचे देखने लगा उसके पूरे शरीर पर कोड़ों से मार के नीले हरे निशान पड़े थे.. पूरा चेहरा लहूलुहान था और उसके चेहरे का खून आंसुओं के साथ मिलकर वहां की जमीन को रंगते जा रहा था।  लेकिन चौधरी साहब के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी….

” ईमानदारी दुनिया से खत्म हो गई है, काहे इंजीनियर साहब? हम सही कह रहे हैं कि नहीं? अभी देखो हमारे यहां काम करता है यह लड़का जितेंद्र, क्यों भाई सही नाम बोले ना? हमारे यहां हज़ारों मजदूर काम करते हैं.. अब किसक किसका नाम याद रखें? नहीं रख पाते हैं भाई , अब बुढ़ापा आ गया है। दिमाग उतना हमारा काम नहीं करता। लेकिन जो बेईमानी करता है हम उसको नहीं भूल पाते हैं..”

:” जी!”

एक छोटे से “जी” के अलावा विक्रम को और कुछ नहीं सूझा…जाने क्यों वहां बैठे हुए उसकी साँस अटकने लगी थी , उसने अपनी एक तरफ चुपचाप खड़े ठेकेदार की तरफ देखा ..
   वह बेचारा जब से वहां आया था हाथ जोड़े,  साँस रोके खड़ा था। क्योंकि वह पहली बार चौधरी साहब की महफिल नहीं देख रहा था, उसका इस सबसे पुराना परिचय था और शायद इसीलिए वह बिक्रम को यहां आने से रोक रहा था…

  बिक्रम ने सोचा कि वह अपनी बात रखें कि वापस चौधरी साहब शुरू हो गये….

” रत्न अब तुम  कुछ बोलोगे या मुंह में बर्फी जमाए बैठे रहोगे ..?”

रत्न इतनी देर से चुपचाप बैठे मोबाइल पर कुछ देख रहा था…

चौधरी साहब की हुंकार पर रत्न ने मोबाइल पर से नजरें हटा ली और सामने बैठे उस कमजोर से लड़के को देखने लगा।  कुछ देर उसे देखने के बाद वह वापस अपने पिता की तरफ देखने लगा..

“बाबूजी  इसे मारकर हमें कुछ नहीं मिलेगा। बस आपका गुस्सा ही शांत होगा , और उससे क्या फायदा हो जाएगा? इससे तो कहीं ज्यादा हमें इसका गुर्दे बेचने वाला आईडिया सही लगा।  तो हम सोच रहे हैं, इसे लेकर डॉक्टर शिरोमणि के पास जाते हैं, और इसका एक गुर्दा निकालकर बिकवा देते हैं…”

  “अरे सोच समझकर बोला करो बचुआ? का गुर्दा निकाल देंगे तो जिएगा कैसे?  इससे अच्छा तो हम गोली से एक बार में मार दे… गुर्दा निकालने से तड़प तड़प कर नहीं मर जाएगा…?”

   “नहीं बाबू जी!! एक गुर्दे में इंसान आराम से दस बारह  साल निकाल सकता है।  अगर इसकी किस्मत ने साथ दिया तो हो सकता है बीस तीस साल भी जी ले..”

   “अच्छा भाई!!  हम तो ठहरे पुराने आदमी क्यों इंजीनियर साहब?  हमको आजकल का यह सब नहीं पता … हम तो सोचते थे दिल जिगर कलेजा गुर्दा यह सब निकाल दो तो शारीर खोखला हो जाता है और आदमी मर जाता है।  पर हमारा यह छुटका है ना , बहुत होशियार है। दिमाग बहुत तेज पाया हैं लड़के ने।
     वो तो हमने पढ़ाया लिखाया नहीं   नहीं तो आज कहीं का कलेक्टर होता।। हां तो रत्न का कह रहे थे तुम?  तो ले जाओ फिर डॉक्टर शिरोमणि के पास निकलवा कर बेच दो गुर्दा!
     कित्ते में बिकेगा?”

    “बाबूजी अभी हम मोबाइल पर देख रहे थे…. मोबाइल पर एक अलग दुनिया होता है,  जिसे डार्क वेब कहा जाता है…काली नीली दुनिया,  विचित्र दुनिया ।
    उसमें अभी करीबन छप्पन ग्राहक गुर्दे के लिए तैयार बैठे हैं….वहां पर बोलियां लग रही है,  और आपको मालूम है बोली दुइ लाख से शुरू हुई है , तो इसका गुर्दा हम बोली के लिए लगा देते हैं… जितना मिल जाएगा उसमें से कुछ थोड़ा बहुत इसे भी दे देंगे…

   ” बहुत सुंदर बात बोले हो बिटवा।  इसीलिए हम को तुम पर इतना नाज़ है …
    वह हमारा बड़ा लड़का हीरक एकदम ही चौपट है। बैल बुद्धि है गधा.. सिर्फ लाठी और कट्टे की भाषा ही जानता है।  और एक तुम हो की पाप भी करते हो तो पुण्य के साथ।
     ठीक है बेटा अगर पांच लाख मिल जाता है तो पचास हजार इसको दे देना… जिसको यह गबन किया रहा, और बाकी का हम रख लेंगे।
    ठीक है तो आज का सभा समाप्त किया जाता है..
हमारा अब नहाने धोने का समय हो गया हम चलते हैं..”

” चौधरी साहब मैं आपसे विनती करता हूं कि एक बार आप मेरी बात सुन लीजिए..”

बिक्रम ने हिम्मत करके चौधरी के सामने अपने मन की बात कह दी, और वहीं खड़े ठेकेदार ने अपना माथा पीट लिया…

   “बहुत दमदार लड़के हो।  इत्ता सब अपनी आंखों के सामने देखने के बाद भी तुम हमसे अब भी अपने दिल की बात कहना चाहते हो?”

  “जी कहना चाहता हूं..!”

  “ठीक है!! कल आना अभी जाओ..”

“मुझे सिर्फ 10 मिनट लगेंगे, आप मेरी बात सुन लीजिए..”

चौधरी हवेली की तरफ मुड़ चुके थे, जैसे ही बिक्रम ने उनसे रिक्वेस्ट कि वह गुस्से में मुड़े और वही खड़े उनके लठैतों ने अपनी-अपनी गन बिक्रम पर तान दी…

” यह क्या बात है बाबू जी?  घर पर कोई भी आएगा तो आप उस पर ऐसे गन तनवा देंगे? यह अच्छी बात नहीं है!”

  बिक्रम के साथ साथ बाकी लोगों ने भी आवाज की दिशा में पलट कर देखा.. रेगजीन की काली पैरों से चिपकी पैंट के ऊपर एक लंबा काला ओवरकोट डालें लंबी सी लड़की खड़ी थी जिसकी आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ा था…
     वह  अभी अभी बाहर से आई थी, और एक तरफ चुपचाप खड़ी  सारा तमाशा देख रही थी…
उसने बिक्रम की तरफ देखकर अपना धूप का चश्मा सिर पर चढ़ाया और उस की तरफ आगे बढ़ गई…

” हम पन्ना चौधरी हैं, बाबूजी के फाइनेंशियल एडवाइजर है… और ऑफिस का ढेर सारा काम हम भी देखते हैं..
  आइए हमारे ऑफिस में बैठकर बातें करते हैं…”

   पन्ना चौधरी की बिलौटी आंखें बिक्रम को देख एक पल को चमक उठीं….तेजी से पलट कर वो हवेली में एक और बने अपने ऑफिस की तरफ बढ़ गई…उसके पीछे बिक्रम भी चला गया…

क्रमशः

aparna

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments