
तू बन जा गली बनारस की…-8
…मम्मी से ऊपर जाने की इजाजत मांग कर वो दो दो सीढ़ियाँ एक बार में चढ़ कर ऊपर पहुंच गया…घर का ताला खोल वो अंदर चला गया और बाजू वाले छत पर खड़े हम और प्रतिमा उसे देख कर उसके बारे में बातेँ करते रहे …
” तो ये है वो हीरो..?”
” हीरो किस एंगल से लग रहा है तुम्हें? पूरा लगूँर है..!
” हाँ तो हमारे हवाले कर देना अपने इस लगूँर को..हमे तो आदित्य रॉय कपूर लग रहा है ..
” ओये हीरोइन !! ज्यादा सपने मत देखो, हद बदतमीज है..”
” तो हम कम है क्या ? बदतमीजी मे तो हमने डबल एम ए किया है । गाली-गलौज मे मास्टरी है हमारी…. देख लेंगे .
” चलो अभी फ़िलहाल फिल्म देख लें? “
और एक तरह से प्रतिमा को खिंच कर हम अंदर ले गए…
उसके पास ज्यादा सामान नहीं था, वो उसी शाम से हमारे घर पर रहने चला आया …..
फिल्म देखने मे पता नहीं क्यों उस दिन उतना मन नहीं लगा , हमे घर वापस जाने का मन कर रहा था , पर प्रतिमा की गप्पे खत्म होने को ना थी ..उसने फिल्म पूरी दिखा कर ही हमें भेजा ..
हम घर लौटे तो घर पर बड़ी अच्छी खुशबु आ रही थी , हम रसोई में चले गए …
मम्मी खाना बना रहीं थीं , हमें देखते ही वो खुश हो गईं..
” अच्छा हुआ तू आ गई..ले ये थाली, जा ऊपर पहुंचा के आ जा ..!”
” हम क्यों जाएं, उनके पैरों में मेहंदी लगी है क्या ?”
” कैसी बात कर रही है धनिया ? इतनी नाराजगी किस लिए ? सुम्मी का भांजा है ..कितना सलीके से बात करता है और तू ज़बरदस्ती छौंक लगा रही …
हमें खुद नहीं सूझा की हम उस पर क्यों नाराज बैठे थे , अभी माँ की बात पर हम कोई और जहर उगलते की दरवाजे पर वो प्रकट हो गया….
” आंटी जी मैं अंदर आ जाऊँ?”
” हाँ बेटा आओ ना , अभी हम धनिया से यही कह रहे थे कि तुम्हें खाना पहुंचा आए ..अच्छा हुआ तुम नीचे ही आ गए …
सत्यानाश!!! माँ को कितनी बार समझाना पड़ता है कि हमें कुछ भी ना बुलाया करें … पर माँ को मेहमानों के सामने लाड़ लड़ाने का कुछ ज्यादा ही शौक है ….
ठीक ठाक नाम है उसका कबाड़ा कर देती हो माँ..उसके चेहरे पर धनिया सुन कर हंसी आते और उसे उस हंसी को छिपाने की कोशिश करते हमने खुद देखा और ये देख हमारे तन बदन मे और आग लग गई..
हम पैर पटकते अपने कमरे में चले गए और हमारे जाते ही वो अपने साथ लाए पैकेट से एक एक कर सामान निकाल निकाल कर वापस हमारी माँ को मोहने लगा …
” ये सुमि भी ना , इतना सब भेजने की उसे क्या जरूरत थी..ये अचार तो हमारी धनिया की जान है…
हम साँस रोके दरवाजे से लग कर खड़े थे और हमारे कान बाहर ही लगे थे ….
मौसी ने कौन सा अचार भेजा अखिर…क्योंकि हमें तो हर एक अचार पसंद था ..बल्कि हम कह सकते थे कि हमें खाना कम और अचार ज्यादा पसंद था …..
खैर हम भी जिद्दी थे ,सोच कर बैठे थे कि जब तक ये जाएगा नहीं हम बाहर निकलेंगे नहीं… और वो बाहर अपने पिटारे से एक से बढ़कर एक चीजें निकालता जा रहा था …
..वैसे तो हम बहुत गुस्से वाले ,सनकी और अड़ियल टाइप के हैं पर बात इमली के लड्डू की हो तो कभी-कभार हम शांत मन से निर्णय ले लेते हैं…
इस बार भी ऐसा ही हुआ , मम्मी ने जैसे ही इमली के लड्डू कहा , हम तुरंत दरवाजा खोल कर बाहर आ गए …
उस अकडू के लिए हम अपने लड्डू क्यों कुर्बान करें?
” देख धनिया मासी ने तेरे फेवरेट इमली वाले लड्डू भेजे हैं…जाने हो बेटा हमारी धन्नो को इमली के लड्डू इतने पसंद थे कि बचपन में उसे सर्दी जुकाम भी होता था ना तब भी लाख बार मना करो पर ये बहती नाक को पोछंती नाक सूड़क कर भी खूब खट्टा खा लेती, और बाद बुखार में तपती पङी रहती..”
“आप मना नहीं करती थी?”
“अरे जिद्दी भतेरी थी, मजाल जो किसी की सुन ले ..”
” तब तो थप्पड़ लगाना चाहिए था “
बड़े आए हमे थप्पड़ लगवाने वाले…..
माँ भी हमारी पूरी बादाम है …उन्हें समझ ही नहीं आता कि हम उम्र लोगों के सामने क्या कैसे बोलना है …अरे वो कोई माँ की उम्र का लड़का थोड़े है जो उसे हमारे बचपन के किस्से सुना रही ..हमारी उम्र का लड़का है, उसके सामने हमारी सारी नमूनागिरी सुनाए पडी हैं…..
और ये विक्रमादित्य भी पूरे मजे ले रहा……
हम भी जानते थे कि इन कीमती इमलीयों को सिर्फ़ चख कर ही हम सारी दुनिया के गम भूल जाएंगे… हमने मां के बाजू में रखी प्लेट से तीन चार लड्डू उठाए और अपने कमरे में वापस आ गए…
हो सकता है देखो न,
समझो मिट्टी को सोना
पल भर का हँसना
हो जाए जीवन भर का रोना
देखो जल्दी में कभी दिल को न लगाना
कितना मुश्क़िल है…
ये लड़का हाय अल्ला कैसा है दीवाना ….
हम अपने कमरें में गाने चला कर मगन हो गए ..और जब तक हम निकले वो ऊपर जा चुका था ….
अगली सुबह उसकी जॉइनिंग थी वह जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरकर ऑफिस निकल रहा था, कि तभी हम भी कॉलेज के लिए निकले और अनजाने में सामने से तेजी से आते उस विक्रमादित्य से टकरा गये..
“सत्यानाश!! सुबह सुबह काली बिल्ली रास्ता काट गई.”.
“हम आपको बिल्ली नजर आ रहे हैं?”
“आप हर बात अपने ऊपर क्यों ले लेती है?, मैं तो रास्ते से गुजरती उस काली बिल्ली की बात कर रहा था.. आप इतनी काली कहां है?”
हमने देखा रास्ते के पार कहीं कोई काली बिल्ली नहीं थी … उसे घूर कर हम गेट खोल बाहर निकल गए ….
और हमें महसूस हुआ कि हमारा मज़ाक उडा कर हंसता हुआ वो हमारे घर के दरवाजे पर खड़ा माँ को बुलाने लगा ..
हमारे कान उसी की तरह लगे थे, कि माँ को अखिर क्यों बुला रहा है…तभी माँ चली आयी और उनके पैर छूकर वो अपने काम पर निकल गया …
पता नहीं क्यों हमारे चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी और हम भी प्रतिमा के साथ कॉलेज निकल गए…
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कितना सुकून मिलता है धानी तुम्हें सुनते हुए , बस यूँ लगता है तुम कहती रहो और हम सुनते रहें ..
.हालांकि यहां तक की कहानी सुन कर इतना तो समझ में आ गया है कि ये विक्रमादित्य यानी बिक्रम बहुत ज्यादा लंबे समय तक तुम्हारा दुश्मन नहीं रह पाया होगा और अब चूँकि हम भी जवान हैं और एक धड़कता दिल हमारे पास भी है तो हम समझ सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा …
…पर तुम्हारे मुहँ से सुनना अच्छा लग रहा है ….
तू बन जा गली….
एक बार फिर हमारे फोन की रिंग बजने लगी…. अनुराग का ही फोन था …
” हाँ बोलो अनुराग !”
” क्या हुआ भाई, अब जब तक रोज फोन नहीं करेंगे तब तक आओगे नहीं क्या ऑफिस?”
” आयेंगे यार, आज जरा देर हो गई…
” अबे रोज ही तो देर हो रही है तुम्हें…क्या गांजा मार के बैठे हो क्या ? आ जाओ फटाफट…हो सकता है आज तुम्हें और हमें बनारस जाना पड़े..
” बनारस क्यों..?”
” वहीं चौधरियो के घर …उनका सीए उनकी बैलेन्स शीट के बारे में कुछ बात करना चाहता है…”
” अनुराग आज नहीं आ पाएंगे, तबीयत सही नहीं लग रही…”
” क्यों ? क्या हो गया ?”
” पेट ठीक नहीं है यार ..?”
” हम तो पहले ही समझ गए थे कि बाबा जी की बुटी तुमने कुछ ज्यादा ही उड़ायी है…पेट तो खराब होना ही था ..अबे जब देसी पचती नहीं तो …खैर छोड़ो..हम भी अकेले जाकर क्या करेंगे , कह देते हैं कि या तो हम दोनों कल जाएंगे , या फिर आज किसी और को भेज दीजिए..”
” हाँ प्लीज सम्भाल लो यार! “
” अबे पगला गए हों क्या ? चौधरी गोली मार देगा वहां से ..”
” आज तो नहीं जा पाएंगे अनुराग ..पेट खराब है यार समझो प्लीज…कहाँ बस रुकवाते रहेंगे बार बार …”
” ठीक है ..हम बात कर के देखते हैं, और किसी को साथ लेकर निकलते हैं…
” हाँ प्लीज ! आज बस सम्भाल लो..फिर हम देख लेंगे…”
अनुराग से जब हमारी बात हो रही थी, धानी बालकनी के पास जा खड़ी हुई थी… शायद बाहर देख रही थी और हम उसे देख रहे थे …
कितना हंसती थी धानी स्कूल में …और फिर याद आ गई वो शाम जब …
जब हम आधी छुट्टी के समय अपनी उसी रेलिंग पर बैठे तुम्हें देखना चाह रहे थे और अंदर तुम अपनी सहेलियों के साथ बैठी अंताक्षरी खेल रही थी…
हमें उस समय नहीं मालूम था कि तुम सब हमारा मज़ाक बना रही हो…याद नहीं किसने ये गीत गाया था …
” ओ गोरे गोरे, ओ बांके छोरे
कभी मेरी गली आया करो…
तभी किसी दूसरे ने गाया था ….
” गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर
गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा..
और हमारे पास खड़े अमित ने हमारे कंधों पर हाथ रख दिया था ….
” ये सारी सुर सरग़म तुम्हारे लिए ही है खांडू..
” अरे हमें कौन इतना नोटिस करता है?”
” नोटिस तो तुम्हें कोई नहीं करता , पर तुम ल़डकियों को मात करते गोरे हो ना बस इसलिए वो कुछ लड़कियां जो फेयर एंड लवली लगाकर भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर पा रही, तुम्हारे रंग से जल भुन कर कोयला हुई जाती हैं और फिर वो लोग अपना दुख तुम्हें कोस कोस कर निकालती है…
” अब हम गोरे पैदा हुए इसमे हमारी क्या गलती..?”
” तुम्हारी अम्मा दूध के साथ मछली तो नहीं खा गई थी तुम्हारे पैदा होने से पहले…”
हम अभी कोई जवाब देते की चार पांच लड़कियां वहां से बिल्कुल क्रांतिकारी बनी हाथ उठा कर नारा लगाती निकल गई…..
पर तुम हमेशा न्यूट्रल बनी रहती थी, इसलिए कभी समझ ही नहीं आया कि तुम हमें पहचानती भी हो या नहीं …?
” अंग्रेजों भारत छोड़ो, अरे नहीं गोरों भारत छोड़ो…”
और कुछ आगे बढ़ कर उन सब के सम्मिलित ठहाके हमें भी हंसने को विवश कर गए थे….
कितना अजीब होता है ना ये प्यार धानी!! तुम हमारे सामने खड़ी हो और हम तुम्हें ही याद कर रहे हैं…
लोग सच कहते हैं इश्क में डूबा आशिक शायर बन जाता है… हमारी बात और है हम लॉयर बन गए…
” आपको ऑफिस जाना होगा ना?”
” नहीं हमने छुट्टी ले ली है। तुम्हारा केस भी तो जानना है ना?”
“एक दिन में कहां सुन पाएंगे आप हमारी जिंदगी की कहानी? कुछ ना कुछ तो बाकी रह जाएगा.. .”
“जितना सुन पाएंगे आज सुन लेंगे, बाकी बाद में सुना देना”
और धानी मुस्कुरा कर वापस हमारे सामने बैठ गयी…
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बिक्रम का ऑफिस में पहला दिन था। ऑफिस में जॉइनिंग देने के बाद वह एक सिविल ठेकेदार के साथ फील्ड की तरफ निकल गए …..
ठेकेदार ने उनसे कहा भी…
” अरे फील्ड में क्या देखोगे बाबु? जो भी है, यही है दफ्तर में ही सारा काम होता है और सब कुछ इन्हीं कागजों पर है।”
” मैं वह सब जानता हूं!! पर क्या आप जानते हैं 1985 में यह योजना लांच हुई थी…
और अब तक क्या काम हुआ है क्या नहीं, इसका ब्यौरा देखना है तो मुझे नदी पर जाकर ही देखना होगा… क्योंकि आपके कागज तो दिखा रहे हैं कि कार्य योजना बहुत भली चंगी चल रही है।”
” हां तो सब भला चंगा ही है…!”
” नदी में फैली गंदगी आपको भली चंगी लग रही है? आप लोग समझते क्यों नहीं है कि यह प्रदूषण का लेवल आगे जाकर कितना खतरनाक हो सकता है?
मेरे पैदा होने के भी पहले की योजना है और अब तक इतने सालों में उस पर कोई काम नहीं हुआ…?
” यह कैसी बात बोल रहे हैं आप इंजीनियर साहब? आप का मतलब सरकार ने कोई काम ही नहीं किया?
“मैंने सरकार को कोई दोष नहीं दिया। सरकार सिर्फ योजनाएं बना सकती है, पैसे पारित कर सकती है। लेकिन काम करना ना करना आप और मेरे जैसे लोगों पर निर्भर करता है। मैं तो यह जाना चाहता हूं, कि जब इतने सालों से बजट पास हो रहा था, तो कितना काम हुआ है? और किसने किया है यह काम? आप सबसे पहले मुझे यह बताइए कि टेंडर किसके नाम से पास हुआ था…?”
“अब तक तीन बार टेंडर निकल चुके हैं…”
“और क्या तीनों ही दफा टेंडर एक ही कंपनी को मिले..?”
” जी एक ही कंपनी को मिले?”
” किसे ?”
“चौधरी एंड संस।”
.” कहां की है यह फर्म?”
“यही कि है इंजीनियर साहब! लोकल है!”
“ओके ! तो श्रीवास्तव जी, पहले तो आप मुझे इंजीनियर साहब बोलना बंद कीजिए। आप चाहे तो मेरा नाम ले सकते हैं, बिक्रम या फिर सर भी बोल सकते हैं । दूसरी बात चलिए चल कर देखते हैं कि यह चौधरी है क्या चीज?”
ठेकेदार के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी…
“बिना उनके बुलाए कोई उनसे नहीं मिल सकता सर?”
“अच्छा!! तब तो उनसे मिलना और भी जरूरी हो गया। आप साथ में चल रहे हैं या मैं अकेला ही निकल जाऊं…”
“चलते हैं हम भी..आइए!”
क्रमशः
aparna
