गली बनारस की -6

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की..-6

     पन्ना के बाबा भी हमसे खूब लाड लड़ाया करते थे अक्सर जब हम और पन्ना एक साथ खेलते तब वह आकर हम दोनों ही बच्चियों के सर पर हाथ रखकर हम दोनों के हाथ में चॉकलेट थमा दिया करते थे अब क्योंकि हम पन्ना से भी छोटे थे इसलिए कभी कबार वह हमे गोद में उठाकर दुलार लिया करते थे और यह बात पन्ना को पसंद नहीं आती थी….
    पन्ना का जन्मदिन बहुत शान शौकत ने  मनाया जाता था… लगभग शहर के हर अमीर घराने के लोग उसके जन्मदिन में शामिल होते थे। उस साल उसके जन्मदिन पर हमें भी पापा साथ लेकर गए थे। और हमने उसके लिए अपने जमा किए पैसों से एक प्यारी सी गुड़िया खरीदी थी। पन्ना अपने खास दोस्तों के साथ शामियाने में एक तरफ बैठी हुई खेल रही थी, उसके पास तरह-तरह के कीमती तोहफे सजे हुए थे। ढेर सारी विदेशी चॉकलेट, विदेशी गुड़िया और एक से बढ़कर एक रंगीन कपड़ों के बीच हम भी अपना तोहफा लिए मुस्कुराते हुए पन्ना के पास पहुंच गए…

” हैप्पी बर्थडे पन्ना!”

“थैंक्यू धानी!!दिखाओ जरा क्या लेकर आई हो हमारे लिए?”

और हमने बड़े प्यार से उसके हाथ में अपना तोहफा रख दिया। हमें नहीं मालूम था कि वह अपने उन सारे रईस दोस्तों के सामने इस कदर हमारी गरीबी का मजाक बना कर रख देगी। उसने सबके सामने हमारा तोहफा खोल दिया, और हमारी दी हुई छोटी सी प्यारी सी गुड़िया का मजाक बनाने लगी। हमें बुरा लगा बहुत बुरा और हम उठ कर वहां से जाने लगे कि उसने हाथ पकड़कर हमें रोक लिया…

  “अरे धानी, दोस्ती में इतनी छोटी छोटी बातों का कोई बुरा मानता है भला। आओ बैठो हम तुम्हें अपने दोस्तों से मिलवाते हैं..
और एक-एक कर उसने अपने सारे दोस्तों से हमें मिलवा दिया उसका परिचय करवाने का ढंग भी बड़ा अजीब था..”

” यह राहुल है शहर के कलेक्टर साहब का बेटा। और यह है अनुराधा कमिश्नर साहब की बेटी, और वह है डॉली सिविल जज साहब की पोती…
   अपने हर एक दोस्त के नाम के साथ उनके पिता या दादा के क्रैडेंशियल्स हमें थमाती वो जाने क्या साबित करना चाह रही थी? उस समय हम छोटे थे, आठवीं कक्षा में पढ़ते थे, लेकिन इतने भी नासमझ नहीं थे कि यह ना समझ पाए कि वह हर कदम पर हमें नीचा दिखाना चाहती है।  बस हमारी समझ से बाहर था कि वह हमें बार-बार इस कदर नीचा क्यों दिखाती है…
   कुछ देर रुकने के बाद हम अपने पापा के पास चले आए थे और उनसे बात करके घर लौट गए…

  घर पहुंच कर जाने क्यों हमें चैन नहीं मिल रहा था… अपने कमरे में बिस्तर में दुबक कर हम रोने लगे। और मम्मी आ कर हमारे पास बैठ गईं,  जैसे उन्होंने सब कुछ समझ लिया हो ,उन्होंने हमारे कंधे पर हाथ रखा और हम चौंक कर उठ गए..

” क्या हुआ बिटिया किसी ने कुछ कह दिया क्या? तुम इतना परेशान क्यों हो?”

मां के शब्दों ने हमारे जलते हुए जख्मों पर मरहम रख दिया और हम अपनी मां के सीने से लग गए…..सुबक – सुबक कर हमने उस पार्टी में बीती हर एक बात ब्योरेवार उन्हें सुना दी, हमारे बालों पर हाथ फेरते वह हमें चुप करवाती रही..

” ना मेरी लाडो ऐसे नहीं रोते बेटा.. सुंदरता की भी अपनी एक कीमत होती है बेटियां और उसे चुकाना ही पड़ता है। अब भगवान ने हमारी बिटिया को इतना मासूम बनाया तो इसमें तुम्हारा क्या कसूर? उस पन्ना को भी भगवान ने क्या कमी की है? उसे क्या नहीं दिया है, बाप दादा का इतना रुपया तो दे दिया है, फिर भी जाने क्यों वह लड़की तुमसे इतना कुढ़ती रहती है? तुम्हारे पास सहनशक्ति है, धैर्य है उसके पास धन है दौलत है संपदा है वह जो चाहे वह कर सकती है, इसके बावजूद हमारी प्यारी सी लाडो रानी से जलती रहती है। इसीलिए हम तुम्हारे पापा को भी मना करते हैं कि तुम्हें लेकर हवेली ना जाया करें।”

” इतनी सी बच्ची के दिमाग में क्या-क्या भर रही हो तुम?”

   “हम उसके दिमाग में कुछ नहीं भर रहे हैं, जो सच है वही बता रहे हैं। जिससे वह पन्ना से दूर रहे और तुम भी समझ जाओ आज के बाद हमारी लड़की को लेकर हवेली में ना जाना.. हमें वहां का माहौल ही पसंद नहीं। ना चौधरी जी के वह दोनों लड़के हमें फूटी आंख भाते हैं और ना उनकी वह लड़की..
  उस हवेली के लोग ही बड़े सिरफिरे और सनकी है..।

” यह जो अच्छा खाने और पहनने को मिल रहा है ना, यह उन्हीं सनकियों की बदौलत है। वरना हम अभी किसी और फर्म में मुनीमगिरी करते होते तो ना हमें इतना पैसा मिलता और ना यह शानदार घर!”

” हे महादेव!! हम कहां जाकर मरे? यह घर आपको शानदार घर लगता है? जितनी जी जान से आप उनका बही हिसाब देखा करते हैं, ना उतना काम किसी और फर्म के लिए किए रहते तो अब तक हम कहां से कहां पहुंच गए होते!
     उन चौधरियों ने कभी अपने नीचे काम करने वाले किसी को भी पनपने दिया ही नहीं, और उनकी माया ऐसी है कि उनके नीचे काम करने वाला हर इंसान उन्हें भगवान की तरह पूजता है, जैसे आप!”

   मां और भी बहुत कुछ पापा से कहती रही और वह अपनी आदत से मजबूर सुनी अनसुनी करते रहे ना उन्हें कुछ समझ आना था और ना उन्होंने समझा। लेकिन हमें सब कुछ समझ आ गया था, कि मां हमें क्या कहना चाहती थी और क्या समझाना चाहती थी।

    उस दिन के बाद से हमने अपनी मां का कहना मान कर हवेली जाना आना बंद कर दिया। कभी  किसी बड़े त्यौहार पर या जलसे पर ही हवेली जाना होता और वह भी तब जब हमारे साथ हमारी मां होती। उनका आंचल थामे हम उनके बगल में चुपचाप खड़े रहते और उन्हीं के साथ हवेली से वापस आ जाया करते।
   धीरे-धीरे समय बीतता गया और हम 12 वीं कक्षा पास करके कॉलेज में चले आए…
  पापा की इमानदारी इतने सालों में और भी ज्यादा बढ़ गई और मां के मन की कड़वाहट भी…
  इन कुछ सालों में चौधरियों का रुतबा भी बहुत ज्यादा बढ़ गया था…
   कुछ सालों पहले तक जो माणिक चौधरी शहर का एक सफल व्यापारी था वह अब राजनीति में उतरने की तैयारी कर रहा था। पैसों की उसके पास कोई कमी नहीं थी हमने पहले भी बताया है ना शहर के सारे दो नंबर के धंधे उसी के थे..
   अगर सिर्फ दो नंबर के धंधे से पैसा कमा कर ही वह चुप बैठ जाता तो भी गनीमत थी, लेकिन उसे पूरे शहर में अपना राज कायम करना था। लोगों के ऊपर अपना डर कायम करना था और इसलिए उसके गुर्गे इधर-उधर घूमते उसके नाम से लोगों को डराया करते थे। और अब उसके दोनों बेटे हीरक चौधरी और रत्न चौधरी पूरी तरह से उस बदमाश कंपनी के सरदार बन बैठे थे…
  और उस महल की इकलौती राजकुमारी पन्ना थी उन सब की सरदारनी…
 
          जिद्दी सनकी और गुस्सैल तो वह शुरू से थी लेकिन अब उसका गुस्सा संभालना सबके बस के बाहर की बात हो चुका था। चौधरी खानदान के तीनों बच्चे बुरी तरह से बिगड़े हुए थे लेकिन इन सब में कोई अगर ठीक-ठाक था तो वह था रत्न चौधरी..
     कम से कम वो थोड़ा दिमाग लगा कर सोचता तो था , बाकी के दोनों तो बिना दिमाग लगाए सिर्फ घोड़ा चलाने को ही अपना अधिकार माने बैठे थे …
 
    हमारी मां ने अब हमारा हवेली जाना बिल्कुल ही बंद करवा दिया था।  शायद उन्हें इस बात का डर था या ऐसा लगता था कि चौधरी परिवार के दोनों लड़के कहीं हम पर बुरी नजर ना डाल दें?  लेकिन वह क्या जानती थी कि उस घर के लड़के तो नहीं लेकिन लड़की जरूर हम पर बुरी नजर लगाए बैठी थी। तब हम क्या जानते थे कि माँ का डर एक दिन सच साबित होगा और एक दिन उसकी नजर हमें लग ही जायेगी…

   जैसे-जैसे चौधरी परिवार का रुतबा और कामकाज बढ़ता जा रहा था वैसे ही हमारे पापा की भी व्यस्तता बढ़ती जा रही थी।  चौधरी खानदान का टर्नओवर संभालने के लिए चौधरी साहब सिर्फ और सिर्फ हमारे पापा पर ही विश्वास करते थे और इसीलिए उनका सारा काला नीला धन हमारे पापा की निगरानी में ही यहां वहां होता था। अगर इमानदारी से कहा जाए तो हमारे पापा भी चौधरी की बेईमानियों में उसके बराबर के भागीदार थे, जैसे-जैसे चौधरी का पैसा बढ़ता गया हमारे पापा का रुतबा भी उनकी नजर में बढ़ता गया..

   लेकिन इस सब के बीच एक बात थी कि पन्ना हमसे कितनी भी जलन रखती हो पर उसके बाबा यानी चौधरी साहब हम पर हमेशा ममता लुटाया करते थे। उनके लिए हम उनके मुनीम की बेटी थी और इसलिए हमारा भी स्थान उनकी नजरों में आदर भरा ही था..
इसके बावजूद हमने हवेली जाना पूरी तरह से बंद कर दिया था..

   पापा की व्यस्तता इधर बहुत ही ज्यादा बढ़ गई थी। वैसे भी वह अब पहले से कहीं ज्यादा कमाने लगे थे और इसलिए उन्होंने घर भी बड़ा करवा लिया था। हम तीन लोगों के परिवार के लिए घर का निचला हिस्सा ही काफी था, हमारे कमरे के अलावा मां और पापा का एक कमरा था और एक कमरा मेहमानों का था… एक बड़े से हॉल एक बरामदे और अच्छी लंबी चौड़ी रसोई के साथ हमारा घर पर्याप्त था.. लेकिन हमारे पापा को भी सनक थी, पड़ोसियों के सामने अपना रूआब झाड़ने उन्होंने ऊपर भी दो कमरों का एक घर बनवा ही लिया था… और अब जब से वह घर बना था मां पापा के पीछे पड़ी थी कि किसी किराएदार को दे दिया जाए..
   पापा किसी भी परिवार को किराएदार रखने के पक्ष में कभी नहीं थे। उनका कहना था किराएदार हमेशा घर का सत्यानाश कर देते हैं, और खासकर परिवार वाले और इसीलिए मां की बहुत कहने पर उन्होंने इस बात की रजामंदी दे दी कि कोई अकेला लड़का या दो तीन लड़कियां ऊपर के कमरे में रह सकते हैं…
   मां को जाने किस बात की जल्दी थी, कि उन्होंने अपनी जान पहचान वालों में यह बात कह दी… कि उन्हें किराएदार चाहिए । शायद माँ मन ही मन  इस बात से घबराती थी कि पापा की व्यस्तता के कारण अक्सर हमें और उन्हें कई कई रातें अकेले घर पर गुजारनी पड़ती हैं, इसलिए शायद उन्हें लगता था कि अगर कोई जिम्मेदार लड़का ऊपरी हिस्से में रहने आ जाए तो वक्त जरूरत पर काम तो आ सकता है…
   आखिर एक दिन मां के पास सुम्मी मौसी का फोन आ गया।
   उनकी ननंद के लड़के की नौकरी इसी शहर में लग गई थी और वह यहां जॉइनिंग के लिए आने वाला था। सुमी मौसी ने मां से बात करके उस लड़के को हमारे घर का पता ठिकाना और मां का फोन नंबर दे दिया था….

   गंगा परियोजना में इंजीनियर था वो ….
उसका नाम था बिक्रम राज!!”

“तुम्हारा मतलब विक्रम राज?”

“नहीं उसका नाम बिक्रम ही था ..’व’ नहीं ‘ब’…  बिक्रम राज!”

क्रमशः

aparna…

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