
तू बन जा गली बनारस की….2
हमने उसके हाथ से चाबी ली और अपने फ्लैट में चले आये। फ्लैट सेमी फर्निश्ड था। कर्नल साहब का बहुत सारा सामान जस का तस पड़ा हुआ था उन्होंने सोफा, बेड रसोई का सामान कुछ भी वहां से नहीं हटाया था और हर एक समान के ऊपर बड़ी-बड़ी चादरें डाली हुई थी, जिससे सामान में धूल ना जमे।फ्लैट देख कर अच्छा लग रहा था , लेकिन उससे भी अच्छा लग रहा था यह सोच कर कि वह हमारी पड़ोसन बन गई थी।
हमारे दिल में कैसे लड्डू फूट रहे थे उस वक्त हम किसी को नहीं बता सकते थे। यूं लग रहा था हमारी लाटरी लग गयी थी..
बिल्कुल वैसा ही हम भी महसूस कर रहे थे जैसे कौन बनेगा करोड़पति खेलने वाले महसूस करते होंगे जब अमिताभ जी उनसे पूछते होंगे …” क्या करियेगा इन एक करोड़ रुपयों का?”
अपने फ्लैट में पहुंचकर नाचने का मन कर रहा था .. लगा रहा था जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर गाए…की हां वह हमारे सपनों की रानी ठीक हमारे बाजू वाले फ्लैट में रहती है…
जिस रोज़ से देखा है उसको
हम शमां जलाना भूल गए
दिल थाम के ऐसे बैठे हैं
कहीं आना-जाना भूल गए
अब आठ पहर इन आँखों में
वो चंचल मुखड़ा रहता है
मेरे सामने वाली खिड़की,
एक चांद का टुकड़ा रहता है ….
आज अपने पसंदीदा गाने में जरा फेरबदल कर सुन रहे थे हम…
मन तो कर रहा था कि चिल्ला चिल्ला कर यह खुशखबरी पूरी दुनिया को सुना दे ,अपने हर किसी करीबी को बता दें कि वह जो कल तक सिर्फ हमारे खयालों का एक हिस्सा थी, आज हमारी बिल्डिंग हमारे अपार्टमेंट का हिस्सा है। और हम उसके पड़ोसी बन गये हैं ।
लेकिन हम अपनी खुशी बांटते किसके साथ?
हमारे पास दोस्त भी तो बहुत ज्यादा नहीं थे..
लेकिन इस सब में इतनी सारी खुशी के बीच एक ऐसी बात थी जो हमारे मन को बीच-बीच में चुभ रही थी कि उसने हमे देखा ही नहीं…
जाने वह कहां खोई हुई थी कि उसने हमे नोटिस तक नहीं किया। खैर यह हमारे साथ होने वाली कोई नई बात तो थी नहीं। उसने साथ पढ़ते हुए भी ना कभी स्कूल में हमे नोटिस किया और ना उसके बाद कॉलेज में। एक आध बार कभी जब हम उसके सामने पड़ भी गये तो सिर्फ उसके मजाक का एक हिस्सा बनकर ही तो रह गये थे और वह हंसती खिलखिलाती हमारा मजाक उड़ाती हुई हमारे सामने से निकल गई थी।
कितना हंसती थी वह , एकदम खुलकर…
जैसे कोई झरना बह रहा हो, निर्झर बेधड़क निश्चिंत जैसे दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं था।
बहुत खूबसूरत थी उसकी हंसी, बल्कि हमे तो कहना चाहिए सिर्फ हंसी ही नहीं उसकी आंखें उसके बाल, उसका चेहरा क्या कुछ हसीन नहीं था। उसे बनाने वाले ने वाकई उसे बहुत फुर्सत से बनाया था….
और हमे कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी में बना दिया था। तभी तो स्कूल में भी हमें कोई नोटिस नहीं करता था, ना हमारे साथ पढ़ने वाले बच्चे और ना ही टीचर। लड़कियां तो छोड़ो लड़के तक हमें नहीं देखा करते थे…
मम्मी का पैक किया हुआ शानदार टिफिन भी हमारे दोस्तों की संख्या नहीं बढ़ा पाया था। होता है ना कोई कोई इंसान कुछ अलग ही मिट्टी का बना होता है जैसे हम बने थे।
एवरेज से भी गये बीते । ना हमारी शक्ल सूरत में कोई ऐसी बात थी, कि कोई याद रख सके और ना चाल ढाल और बातचीत करने के ढंग में…
हम जानते थे कि हम एक कतई साधारण से लड़के हैं उस पर हमारी असाधारण लंबाई हमें कक्षा में बैकबेंचर बनने के लिए मजबूर किए थी। हम अपनी उम्र के हिसाब से कुछ ज्यादा ही लंबे हो चुके थे और इसीलिए शायद लड़कियां हमारे चेहरे तक आंखें उठाने की जहमत नहीं करना चाहती थी और लड़के हमारे कंधों पर हाथ नहीं रख पाने के कारण शायद हमसे दोस्ती नहीं करना चाहते थे…
और इस पर सोने पर सुहागा हमारा नाम हमारे घर वालों ने साजन रख दिया था ।
पहले ही अपनी लंबाई के कारण शर्मिंदा रहते थे उस पर बची खुची कसर इस फिल्मी नाम ने पूरी कर दी थी…
सरनेम भी इतना लंबा चौड़ा था कि लड़कों ने खंडेलवाल को छोटा करके हमे खांडे बना दिया था और और अब कोई खांडवी तो कोई श्रीखंड बुलाकर चिढ़ाया करता था….
खैर बात जो भी रही हो हम हमारी क्लास के सबसे नेगलेक्टेड विद्यार्थी थे और वह थी क्लास की ब्यूटी क्वीन….
हमें आज भी याद है वह दिन, जब हमारा साइंस का पहला यूनिट टेस्ट हुआ था। 30 नंबर का पेपर था और पूरी क्लास में अकेले हमें पूरे नंबर मिले थे । सर ने पहली बार क्लास में कुछ अलग ढंग से हमारा नाम पुकारा था…
” कौन है भाई साजन खंडेलवाल? खड़े हो जाओ जरा शक्ल तो दिखाओ? नाम तो बड़ा चंपू सा रखे हो बेटा पर दिमाग कतई जहर है तुम्हारा!”
बाकी लोगों के साथ वह भी पहली बेंच में बैठी पीछे की तरफ मुड़ कर उस नाम को ढूंढने लगी थी जिस नाम को देखने की ललक बाकियों में भी थी ।
हम बहुत शर्माते हुए अपनी जगह पर खड़े हो गये थे। और हमे आज भी याद है कि हमारे खड़े होते ही क्लास के लड़कों में एक सुगबुगाहट से हुई और फिर धीमे-धीमे हंसने की आवाज पूरी क्लास में फैल गई थी। सर ने जोर से चीख करके सब को डांट लगाई थी…
” ज्यादा ची चा की ना तो एक एक को तबीयत से थपड़िया देंगे, सुधरेंगे नहीं साले, ये नहीं की खुद भी पढ़ लिख लें, कुछ अपने अम्मा बाबुजी का नाम रोशन कर लें बस जब देखो छपराते डलेंगे यहाँ वहाँ…!
और फिर हम से मुखातिब हो गए थे….
” हां तो भैया साइंटिस्ट, गजब नंबर लाए हो ।30 बटा 30 बहुत सही ! क्या डॉक्टर बनना है क्या?”
हम मुस्कुरा कर नीचे देखने लगे थे पर आंखों को सर के चेहरे पर से नीचे ले जाने के बीच में हमारी आंखों ने उसके चेहरे पर की मुस्कान को भी पढ़ लिया था। हम जानते थे कि बाकी बच्चे हम ही पर हंस रहे हैं , शायद हमारी हद से ज्यादा लंबाई पर या फिर हमारी ऊंची सी तोते जैसी नाक पर या हमारे अंग्रेजों को मात करते गोरे रंग पर!!
बचपन में अम्मा हमें मैदे की लोई कहा करती थी, उस समय शायद सुन्दर लगते रहे होंगे पर बड़े होते होते हमे ये समझ आ गया कि लड़कों पर हद गोरा रंग जंचता नहीं है …
सब हम पर हंस रहे थे ,लेकिन वह हम पर हंस नहीं रही थी सिर्फ हमे देख कर मुस्कुरा रही थी…
” क्यों भाई क्या बनना चाहते हो? यह तो बता दो! और जरा सामने आ जाओ जिससे सारे बच्चे तुम्हें देख ले। और भाई सारे बच्चों साजन को छोड़ो उसकी कॉपी को जरूर देख लो , कि इस तरह से कॉपी बनानी होती है…. आई बात भेजे में ।और तुम चारों चांडाल चौकड़ी तुम लोगों को तो हम क्लास से बाहर कर देंगे।”
क्लास के उन चारों शैतान लड़को को जो हर वक्त हर जगह अपने शैतानी से ही पहचाने जाते थे, सर ने कुछ अलग से डांट लगाई थी।
हम बहुत शर्माते हुए सामने की तरफ आ ही रहे थे कि कक्षा की छुट्टी की बेल बज गई और सर के उठकर बाहर जाने से पहले ही क्लास के लड़के बाहर भागने लगे…
उस दिन हम सेलेब्रिटी बनते बनते रह गये थे…
लेकिन उसने क्लास से बाहर जाते वक्त हल्की सी एक नजर हम पर डाल ही दी थी।
शायद वो पहली और आखिरी बार था जब बिना किसी कारण के उसने हमे देखा था , उसके बाद तो उसने कभी ये जहमत नहीं उठाई…
खूबसूरती की भी अपनी ताकत होती है , ये उसे देख कर ही पता चलता था , वो जो चाहती वो कर सकती थी । हम जानते थे कि वो कोई बहुत बड़े घर की लड़की नहीं थी , उसके पापा किसी बड़े आदमी के यहाँ मुनीम थे और माँ घर पर ही रहती थीं , लेकिन अपने घर की सामान्य परिस्थितियों के बावजूद वो कहीं की शहजादी लगती थी…
पूरी कक्षा यूँ लगता जैसे उसके खुमार में रहती थी.. क्लास की हर लड़की उसकी दोस्ती चाहती थी और हर लड़का बस एक बार ही सहीं पर उसका निगाह ए करम…
और वो इस बात को अच्छे से जानती थी कि क्लास के लड़कों पर उसका कैसा प्रभाव था .. सिर्फ हमारी क्लास ही नहीं , बल्कि बड़े क्लास के बच्चों में भी वो प्रसिद्ध थी..
अक्सर हमारे क्लास के बाहर ग्यारहवें दर्जे के भैया लोगों का खड़ा रहना कुछ ज्यादा ही होता था … और वो सारे ही लोग उसे चुपके चुपके ताड़ा करते थे …
हमारी दस की कक्षा ऊपर लगा करती थी और हमारे ठीक नीचे ग्यारह और बारह वालों की ..
आधी छुट्टी के समय वो अक्सर क्लास के बाहर के कॉरिडोर पर रेलिंग के पास अपनी सखियों के साथ खड़ी गप्पे मारा करती और नीचे खड़े लड़के उसे देख ठंडी आह भरा करते, वो सब करते भी क्या ? वो हर किसी से तो दोस्ती नहीं कर सकती थी ना ….
कभी नीचे के कॉरिडोर पर सीढ़ियों के पास कोई अनाथ सा फूल पड़ा दिखता , कभी उसकी बस की सीट पर रखी चॉकलेट…
वो ही क्या हमारी पूरी क्लास जानती थी कि ये सारी अनाथ वस्तुओ की सर्वेसर्वा मालिक वो ही है, लेकिन ना वो कभी उन चीजों को उठा कर अपने पास रखती और ना ही उनके बारे में कभी स्कूल में शिकायत किया करती …
लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई थी , और उस दिन हमने उसे पहली बार गुस्से में देखा था ..
सारी क्लास को उस दिन रिसेस के बाद विज्ञान के प्रैक्टिकल लैब जाना था.. उसके और उसकी सखियों के पहले ही जाने कौन लैब में पहुंच कर ठीक उसकी टेबल पर परखनली और बीकर को जोड़ कर दिल बना गया था..
और साथ ही कास्टिक सोडा के नीचे किसी ने हल्दी मिला कर छोड़ रखी थी …
परखनली और बीकर को सही कर उसने जैसे ही कास्टिक सोडा को ब्रोमीन और एसीटामाईड मिला कर गर्म करना शुरू किया ,कास्टिक सोडा का रंग बदल कर लाल होने लगा ..
और वो कितनी घबरा गई थी …
” जया ये हाफमैंन ब्रोमामैड में लाल रंग होता है क्या ?”
” हमें क्या पता ? अरे ये तो और गहराता जा रहा है , उसे फेंक धानी कहीं ये तेजाब ना बन जाए… “
और घबराहट में उसके हाथ से वो परखनली छूट गई थी , और पहली बार हमने उसकी आंखों में बेबसी के आंसू देखे थे..
जब विज्ञान वाले सर उससे सवाल जवाब करने में लगे थे तब पहली बार उसने सुबकते हुए शिकायत की थी कि….
” सर विद्या कसम हम नही जानते कि ये किस ने किया है ? किसी ने हमारे आने से पहले ही उन रसायनों में कुछ मिला रखा था और परख नली से ….”
परखनली की सहायता से दिल बना रखा था यह वह नहीं कह पाई थी और चुप रह गई थी लेकिन हम दूसरी पंक्ति में खड़े अपने रैक के बीच कि खाली जगह से उसके चेहरे पर टिकी मोती की बूंदे ही देखने में खोए हुए थे …
उसके गालों पर टिके आंसू भी कितने सुन्दर लग रहे थे!
सर ने भी उसकी भोली सी बात सुनकर उसे उस दिन की छुट्टी दे दी थी और वो अपनी सहेली के साथ क्लास में चली गई थी…
उसके जाने के बाद हमारा वहाँ मन कैसे लगता लेकिन हमारे कहने से कुछ होना जाना तो था नहीं.. इसलिए प्रैक्टिकल करने में लग गए ..
” अबे जल्दी जल्दी हाथ चला लो, लड़कियाँ तुम लोगों से जल्दी कर निकलती जा रही , तुम लोग पता नहीं दादी अम्मा का कौन सा अचार बना रहे जो अब तक तुम लोगों से सादे टेस्ट नहीं हो पा रहे..जिसका होता जाएगा वो हमारे पास अटेंडेंस लिखा कर क्लास को निकल लो ..
उनकी कहीं आखिरी पंक्ति ने जान फूंक दी थी हममे, और फिर तो क्या हाफमैंन ब्रोमामैड और क्या विलियमसन हम फटाफट सारे यौगिक को धुंआ लगा कर निकल पड़े थे क्लास की ओर…
उस दिन क्लास की तरफ़ जाते हुए लग रहा था… जैसे राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर हो रहा है और हम पृथ्वीराज चव्हाण सबसे सामने अपने घोड़े पर सवार चले जा रहे हैं..
हम क्लास में पहुंचे तो वो अकेली अपनी सहेली के साथ बैठी टिफिन खा रही थी..क्लास में घुसते ही हमारी आंखें चार हुई पर उससे नहीं उसकी सहेली जया से…
और उसने जैसे घूर कर हमे देखा लगा वहीं से बैठे बैठे अपनी आंखों से आग उगल कर हमे स्वाहा कर देगी ….
क्लास रूम में आलू के पराठें और आम के अचार की खुशबु फैल गई थी कि तभी एक तेज़ आवाज हमारे कानों में पडी और उस आवाज को सुनकर महसूस हुआ कि ताड़का सुरसा आदि राक्षसी जब बोलती होंगी तब ऐसे ही लोगों के कानो से खून निकालती होंगी..
” क्यों बे लालू तुम क्या कर रहे हो क्लास में?”
हमें बिल्कुल महसूस हुआ जैसे हमारे कानो से भी खून निकल कर रहेगा,पर हमने खुद को सम्भाल लिया … धीमे से बस यही कह पाए…
” हमारा नाम साजन है..!”
” तो क्या करें ‘देखा है पहली बार साजन की आँखों में प्यार ‘ गा गाकर नाचें। अरे तुम्हारे माँ बाप ने तुम्हारा इतना बकवास नाम रखा है तो इसमे हमारी क्या गलती? हम क्या करें..?”
वो और भी जाने क्या अनाप शनाप बोल जाती , उसे सुनने से अच्छा था हम बाहर ही निकल जाए…
हम चुपचाप बाहर निकल गए, इस सब में उसने एक बार भी हमारी तरफ़ आँख उठा कर भी नहीं देखा था…
हम बाहर निकल कर रेलिंग पर बैठ गए , वहाँ से वो खिड़की के पास बैठी हमें साफ दिखायी दे रही थी… और हम उसे तब तक देखते रहे जब तक राहिल ने आकर हमारे कान के ठीक पास अपना भोंपू नहीं बजा दिया ….
…..बचपन की यादों में खोए थे कि लगा वापस राहिल वैसा ही भोंपू बजा रहा है, ध्यान दिया तो समझ में आया दरवाज़े पर घंटी बज रही थी ….
इस वक़्त कौन होगा , सोचते हमने दरवाजा खोल दिया …
” आप ऑफ़िस से ही सीधे आ रहें हैं ना ! कर्नल साहब ने बताया था … ये आपके लिए चाय है..
आज तो आपका किचन भी रेडी नहीं होगा , इसलिए साथ ही ये नाश्ता भी है…
खा लीजियेगा…और बर्तन वापस करने की कोई जल्दबाजी नहीं है, हम खुद आकर ले जाएंगे!”
बिना हमारा जवाब सुने वो जैसे आईं थी वैसे ही लौट गई …
वाह साजन !! कभी सोचा भी ना था बेटा की उसके हाथ का नाश्ता और चाय भी मिलेगी तुम्हें …
हमने उसके जाते ही दरवाजा बंद किया और केसरोल खोल लिया …
ताजे गरम आलू के पराठों की खुशबु हमारे कमरें में फैल गई….
क्रमशः
aparna
