गली बनारस की -15

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की …-15
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  ” आप कहीं बिजी तो नहीं हैं..अगर आपको काम हैं तो हम बाद मे आ जाएंगे ..?”

हाय मेरी, मेरा मतलब किसी और की भोली सी धानी,  तुम्हें कैसे समझायें कि तुमसे बढ़ कर हमारे लिए कोई काम नहीं है…
तुम एक इशारा भर कर दो हम अपनी नौकरी तक को लात मार देंगे …
दिल ही दिल में हम जाने क्या क्या सोच जातें हैं पर सामने तुमसे ये सब कह तो नहीं सकते …

” नहीं हम बिजी नहीं हैं…सुनाओ आगे क्या हुआ..?

हम धानी और खुद के बचपन में खोए थे लेकिन शायद धानी को लगा जैसे हम उसकी बेइज्जती से हैरान बैठे हैं…
वैसे भी जिस किसी पर बीतती है वह ही इस दर्द को जानता हैं…
हमारी शादी नहीं हुई तो क्या हुआ , क्या हम समझ नहीं सकते कि तुम्हारा पति तुम्हें कैसे बाँध कर रखना चाहता है…
  
” आप जाने क्या सोच रहे होंगे हमारे…

हमसे आगे कुछ सुना ही नहीं गया और धानी की बात हम बीच में ही काट गए..

” नहीं कुछ नहीं सोच रहे हम…हर एक कपल की लाइफ अलग होती है…उनके बीच का प्यार या तकरार जो भी हो वो सिर्फ उनके बीच ही रहे, यही अच्छा है …!”

धानी ने चुपचाप सिर झुका लिया ..उफ्फ ये जल्दबाजी में हम भी क्या कहना चाहते थे और क्या कह गए ..

” आई एम सॉरी धानी!! एक रिक्वेस्ट कर सकते  हैं तुमसे..?”

” हाँ प्लीज!”

” हमें तुम आप मत कहो…अच्छा  नहीं लगता , हम एक साथ पढ़े हुए है…हमउम्र ही होंगे फिर ये औपचारिकता क्यों ?”

चलो हल्की सी ही सही लेकिन मुस्कान तो आयी तुम्हारे चेहरे मे  और हमें लगा हजारों बल्ब जल उठे है आसपास….

“ओके!! मैं अब तुम ही कहूंगी… एक बात पूछ सकती हूं साजन..?

“हां!! बेशक तुम एक नहीं हजारों बातें पूछो..?”

“तुम्हारी शादी हो गई ..?”

हाय कितना भोला सवाल पूछा ?
और पूछ भी कौन रही है वह जिसे दुल्हन बनाने का सपना सजाए आज तक यह कुंवारा यूं ही मारा मारा फिर रहा है…

“नहीं धानी हमारी शादी नहीं हुई..?”

“क्यों? अब तक शादी क्यों नहीं की…? “

तुम जो नहीं मिली… मन में यह भले ही सोच लें लेकिन तुम्हारे सामने कह तो नहीं सकते…

“अभी 27 भी पूरा नहीं किया हमने, ऐसी कौन सी शादी की उम्र हो गई..?”

“हां, बात तो सही है। लेकिन हमारे समाज में ऐसा ही होता है ना।
     पढ़ाई पूरी हो गई शादी कर लो… कैरियर पूरा हो गया शादी कर लो। लोग शादी से हटकर और कुछ समझ ही नहीं पाते…।”

“तुम्हारी शादी कब हुई धानी…?”

“कॉलेज में थे हम, पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन लिया था और बस शादी हो गई…..।”

“मतलब पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा नहीं किया..?”

“नहीं, हम तो प्रीवियस ईयर का एग्जाम तक नहीं दे पाए..”

“ऐसी क्या हड़बड़ी थी शादी की…?”

“शादी की हड़बड़ी हमें नहीं थी। हमारी किस्मत को थी। क्योंकि उसे आगे जाकर फूटना जो था…
    हमारी किस्मत ने भी कहा.. खूब खुशियां समेट ली अपने माता पिता के आंगन में…..
    अब इस तितली को एक पिंजरे में ही रहना है हमेशा हमेशा के लिए…”

“तितली उस पिंजरे से रिहा भी तो हो सकती है?”

हे भगवान यह हम क्या कह गए? जाने तुम इसका क्या मतलब समझो? वैसे भी शादीशुदा औरतों का  सिक्स्थ सेंस कुछ ज्यादा ही तेज हो जाता है …कहीं तुम्हें यह न लगे कि हम तुम्हें बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं… लेकिन यह सच नहीं है धानी। अगर इस वक्त तुम्हारी जगह कोई और औरत भी हमारे सामने बैठी होती और हमें यह महसूस होता कि वह अपनी शादीशुदा जिंदगी में अपने पति के साथ खुश नहीं है तब भी हम उसे यही सलाह देते ।

हमारी बात सुन धानी हमें देखने लगी…

” नहीं!!  कुछ रिहाईयां साँसों के फना होने से ही मिलतीं हैं…अब ये रिहाई मुश्किल है..”

” नामुमकिन तो नहीं ?”

धानी जाने क्या सोचते हुए खिड़की से बाहर देखती खो गई…उसके मासूम चेहरे पर आते जाते रंग हम कितने करीब से देख पा रहे थे ..और उन रंगों को उतने करीब से देखते हुए हमने महसूस किया कि वाकई धानी की पारदर्शी त्वचा पर हल्के नीले हरे से रंग उभरे नजर आ रहे थे ….
  तो क्या इसका जल्लाद पति उस पर हाथ भी उठाता था ..उफ्फ हमारे सामने आ जाए तो हम उसका गला दबा दे…

” फिर क्या हुआ धानी..?”

धानी को अपने ख़यालों में खोए देख हम उसके लिए चाय बना लाए …चाय का कप हाथ में लेकर उसने इतनी कृतज्ञता से हमारी तरफ देखा कि हमारी आंखें भर आयी…
… काश..
   काश हम तुम्हें एक बार गले से लगा पाते धानी…!

चाय का एक गहरा घूंट भर धानी ने आगे कहना शुरू कर दिया ….

*******

    बिक्रम ना चाहते हुए भी चरण के हाथ मे चाबी थमा कर पन्ना के साथ निकल गया….रत्न को पन्ना का यूं एक लड़के के साथ घूमना जरा भी रास नहीं आ रहा था… उधर उसके गुस्से को शांत करने चौधरी ने अपने किसी आदमी से बिक्रम की जन्मकुंडली मंगवाने का  हुक्म दे दिया ….

चरण यह सब सुन कर वहाँ से बाहर निकल गया..उसने बाहर निकलते ही तुरंत बिक्रम को फोन लगा लिया …

” कहाँ पहुंच गए सर?”

” अभी तक कहीं नहीं..कहो क्या बात है ?”

” चौकन्ने रहिएगा , शेरनी अपनी मांद में लेकर जा रही है..आँख कान दुनो खुल्ला रखियेगा, जाने कब कहां कैसे दबोच ले…

बिक्रम ने पन्ना की ओर देखा वो उसे देख मुस्करा उठी…

  पन्ना गाड़ी भगाती कहां लेकर जा रही थी, बिक्रम यही सोच रहा था ..की गाड़ी एक बड़े से भवन के सामने जाकर रुक गयी…
  पन्ना गाड़ी से उतर गई…और गेट खोल अंदर चली गई…
बिक्रम भी उसके पीछे चल दिया …
   सामने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था…
” मधुमिता देवी बालक कल्याण आश्रम “

सामने मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे …उन बच्चों के सिरों पर हाथ फेरती वो आगे बढ़ कर एक ऑफिस के दरवाजे पर पहुंच गई … उसी समय ऑफिस का दरवाजा खुला और अंदर से चपरासी बाहर निकला उसने पन्ना को देखते ही एक सैल्यूट मारा और उसके लिए दरवाजे पूरा खोल दिया …
पन्ना और बिक्रम अंदर दाखिल हो गए …
अंदर एक लगभग पचास बरस की सभ्य सी महिला बैठी थीं..उन्होंने पन्ना को देखते ही अपनी जगह से खड़े होकर उसका स्वागत किया और बिक्रम को भी बैठने का इशारा कर चपरासी को बुला कर चाय के लिए बोल दिया …

” कैसा चल रहा है सब कुछ यहां मैम?”

” बस आपकी  कृपा है पन्ना जी..!

बिक्रम को अब भी कुछ समझ में नहीं आया था … उसने सवालिया नज़रों से पन्ना को देखा और पन्ना मुस्करा उठी…

” ये हमारे बाबा का खोला अनाथ आश्रम हैं.. आपको ये सब देख कर लग रहा होगा कि ये भी एक समान्य सा आश्रम है पर ऐसा नहीं हैं…
.. ये समान्य अनाथ बच्चे नहीं हैं…

” फिर..?”

” ये वो बच्चे हैं जिन्होंने बहुत छोटी उम्र में कोई न कोई गलत काम किया लेकिन कोर्ट में सबूत न मिलने से इन्हें सजा नहीं हुई…
हमारे बाबा का कहना था कि बच्चे अगर गलती करें तो उन्हें थोड़ी ही सही सजा मिलनी चाहिए और अगर उन्हें  ये एहसास नहीं करवाया की उन्होंने गलत किया है तो वो कभी नहीं सुधरेंगे ..इसलिए इन बच्चों को बाबा यहां उठा कर ले आते थे ,और फिर उन्हें सही और गलत समझाया करते थे ..
   इन्हें यहां लाने का एक और सबसे बड़ा कारण यह भी था कि इनमें से अधिकतर बच्चों के माता-पिता नहीं थे। झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ये वो अनाथ बच्चे थे जिनके रिश्तेदार उन पर ध्यान नहीं देते थे, और जिसके कारण यह बच्चे कब गलत काम को सही समझकर करने लग गए वह खुद भी नहीं जान पाए। इनमें से कुछ बच्चों ने बहुत छोटी उम्र में किसी पर जानलेवा हमला किया तो कहीं किसी जगह पर चोरी करके भाग खड़े हुए।  वैसे देखा जाए तो यह भी एक अनाथ आश्रम ही है , लेकिन ऐसे बच्चों का अनाथ आश्रम जिन्होंने कभी न कभी कोई गलत काम जरूर किया है और ऐसे बच्चों को सुधार कर उनकी सही परवरिश करना ही हमारे बाबा का उद्देश्य था। और वह अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी रहे
अब तक यहां से निकल कर कई लोग अच्छी जगहों पर पहुंच भी चुके हैं..
   यहां पलने वाले कई बच्चे आज बड़े ओहदों पर काम कर रहे हैं ….
    हम उस वक्त बहुत छोटे थे और बाबा की उंगली पकड़कर यहां आया करते थे। बाबा अक्सर हमारा जन्मदिन यही के बच्चों के साथ मनाया करते थे। और तब से हम ने बाबा को इन बच्चों को बहुत प्यार करते देखा। हमारे घर के त्योहारों में भी यह बच्चे बकायदे शामिल हुआ करते थे, बस तभी से इन से इस भवन से अलग सा जुड़ाव हो गया।  जब बाबा नहीं रहे तब उन्होंने जाते-जाते हमें यहां की जिम्मेदारी सौंप दी… जब हम कुछ बड़े हुए तो बाबू जी से कहकर यहां की बागडोर अपने हाथ में ले ली…
… आप जानते हैं बिक्रम जी,  बाबू जी का काम बहुत फैला हुआ है… अब आपसे क्या छुपा है…हर तरह के काम करते हैं बाबू जी, एक नंबर के तो दो नंबर के भी।
     उनका फाइनेंस डिपार्टमेंट हम ही देखते हैं। इसलिए सारा गोलमाल हम भी जानते हैं। हम यह नहीं कह रहे कि, इस बाल कल्याण आश्रम में आकर हम अपने पाप धोना चाहते हैं, लेकिन हां यह बात जरूर है कि जब रातों को बेचैनी के कारण हम सो नहीं पाते तो अगले दिन सुबह सुबह उठकर यहां चले आते हैं मन बहल जाता है…
हम यह नहीं कह रहे कि, यहां लाखों रुपए दान करके हम अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं…. लेकिन इस बात को भी झूठलाया नहीं जा सकता कि यहां रुपए खर्च करके हमारी आत्मा को जो सुकून मिलता है उसकी कोई कीमत नहीं है……
…ये सब दिखा कर आपको इम्प्रेस नहीं करना चाहते थे …
और सच कहें तो हमें कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि हमारे बारे में कोई क्या सोचता है…?
      इससे कोई फर्क़ भी नहीं पड़ता, पर ना जाने क्यों आपको देख कर लगा कि आपको हमारे बारे में सिर्फ गलतफहमी ही हो रही है..
     और इस बार हमारा मन नहीं माना कि आप हमारे बारे में सारी गलत बातेँ ही जाने …..
…पता नहीं आपको देख कर ये कैसा लालच मन में जाग रहा है…
  आप हमें अच्छे लगने लगे हैं इंजिनीयर साहब “

पन्ना गहरी नज़रों से सामने बैठे बिक्रम को देख रही थी… उसने बिक्रम के पैरों पर अपना हाथ रख दिया…

बिक्रम उसकी नज़रों की आंच सह नहीं पाया …उसका एकाएक वहां से उठ कर भाग जाने को दिल करने लगा , जैसे उसने पन्ना की आंखें पढ़ ली हों कि वो क्या चाहती है …
अखिर बिक्रम से रहा नहीं गया ….

” मुझे निकलना चाहिए पन्ना जी..”

” आप अकेले कहाँ जाएंगे..?हम आपको..”

” नहीं…आप यहां वक़्त बिताए,  आपको यहां अच्छा लगता है ना..? मैं बाहर से रिक्शा ले लूँगा..”

और फिर दुबारा पन्ना की ओर देखे बिना ही वो अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ …..
और तेज कदमों से बाहर निकल गया..पन्ना उसे रोकना चाहती थी लेकिन उसके धीर गंभीर चेहरे के आगे उससे कुछ कहा नहीं गया और वो मन मसोस कर रह गई….

बिक्रम तेज कदमों से चलता हुआ बाहर निकला और वहाँ से गुज़रते एक ऑटो रिक्शा को रोक झटके से उसमें बैठ गया, ये देखे बिना की बाजू वालीं सीट पर पहले से कोई बैठा था …

” आपकी ये मजाल की, आप हमारी रिक्शा में बैठ गए…

चौंक कर बिक्रम ने बगल वालीं सीट पर देखा, वहाँ धानी बैठी थी…

बिक्रम ने लाचारी से उसे देखा..

” देखो धानी,  इस वक़्त लड़ने के बिल्कुल मूड में नहीं हूं..प्लीज मुझे थोड़ा आगे तक ही चले जाने दो, फिर मैं दूसरा रिक्शा ले लूँगा ..!”

बिक्रम के चेहरे के भाव देख धानी कुछ देर के लिए घबरा सी गई…

” क्या हुआ ? कोई परेशानी है क्या ?”

” अभी कुछ नहीं कहना चाहता , और ना कह सकता हूं…!”

उसके चेहरे का उड़ा हुआ रंग देख धानी को ज्यादा कुछ तो नहीं पर इतना समझ आ गया कि, कोई तो उलझन है जिसके कारण बिक्रम इतना परेशान नजर अ रहा है…वो एकदम चुप होकर बैठ गयी….
ऑटो वाले ने बिक्रम से कहाँ उतारना है पूछा भी लेकिन अपने ख़यालों में खोए बिक्रम ने सुना नहीं और धानी ने गाड़ी घर की तरफ ही मुड़वा ली…
  घर के दरवाजे पर उतरने के बाद धानी ने बिक्रम की तरह देखा वो अभी भी हैरान परेशान सा लग रहा था…
धानी ने ऑटो वाले को पैसे देने के बाद बिक्रम की ओर देखा…

” उतर जाइए,  घर आ गया है …”

बिक्रम चुपचाप उतर गया , पैसे देने के लिए उसने जैसे ही हाथ बढ़ाया , धानी ने मना कर दिया…
वो चुपचाप ऊपर अपने कमरें की तरफ बढ़ गया ….. और उसे जाते देखती हुई धानी कुछ देर बाद अपने घर के अंदर घुस गई …

कुछ देर बाद बिक्रम के लिए चाय लेकर धानी ऊपर पहुंची तो देखा बिक्रम सूनी सूनी आंखों से खिड़की से बाहर देखता खड़ा था ..

” क्या हम अंदर आ सकते हैं…?”

धानी की बात पर बिक्रम ने उसे देख हाँ में सिर हिला दिया ..

” आपके लिए अदरक वालीं चाय लेकर आएं हैं..पी लीजिए, अच्छा लगेगा ..!”

” थैंक्स..!”

धानी कुछ देर खड़ी रही फिर जाने को मुड़ी कि बिक्रम ने उसे टोक दिया..

” चाय अच्छी बनी है …थैंक यू..अभी चाय की बहुत जरूरत थी,  आपको अपनी भी ले आनी थी,  साथ पी लेते..

धानी ने सामने रखी ट्रे की तरफ देखा जहां एक और चाय रखी थी , पर बिक्रम के ध्यान न देने से वो बिना पिए ही उसे ले जाने वालीं थी…

” ओह आप लेकर आयी थीं क्या ? तो पी लीजिए ना ..

मुस्करा कर धानी भी वहीं एक कुर्सी पर बैठ गयी…
उसने चाय का कप उठाया ही था कि बिक्रम का फोन बजने लगा …
   फोन पन्ना का था ….

” हम आपके घर के नीचे खड़े हैं इंजिनीयर साहब! क्या ऊपर आ जाएं..?”

पन्ना की बात सुनते ही बिक्रम के चेहरे का रंग वापस उड़ गया..वो धीमे से उठ कर खिड़की तक पहुंचा,  उसने झाँक कर देखा उसे गली में खड़ी लंबी काली कार दिखाई दे गयी……

क्रमशः

aparna

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