
तू बन जा गली बनारस की…..14
” हमारी दुनिया देखना चाहेंगे..?”
बिक्रम के हाँ या ना बोलने का सवाल ही नहीं उठता था.. ….
वो उसके पीछे वहां से निकल गया.. पन्ना के ऑफिस के बाहर की तरफ भी बागीचा था जहां से होकर वो अपनी गाड़ी तक पहुंच गई….
उसके साथ उसी की गाड़ी में बिक्रम बैठ गया और पन्ना ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…
” पन्ना जी चरण जी मेरे साथ आये थे , उन्हें जरा ये बाइक की चाबियां दे दूं..?”
” क्या जरूरत है ? वो खुद चले जाएंगे और आपकी गाड़ी हमारा नौकर आपके घर पहुंचा आयेगा ..!”
” आपकी बात वाजिब है, लेकिन अगर कोई मेरे भरोसे पर चला आया तो मेरा फर्ज बनता है उसे उसके घर तक पहुंचाने का ….
पन्ना ने बिक्रम की तरफ गहरी नजरों से देखा…
” आपकी बाते हर बार हमारा दिल लूट ले जाती हैं…हम जहां और जैसे लोगों के बीच रहते हैं , पहली बार आप जैसा ईमानदार इंसान देखा है…”
बिक्रम उसकी बात सुनकर झेंप गया…
पन्ना ने गाड़ी सामने की तरह घुमा ली …वहाँ चरण के पास जाकर उसने गाड़ी धीमी कर दी , बिक्रम ने चरण के हाथ में चाबी रख दी…चरण ने घबराई आंखों से बिक्रम को देखा और झुक कर पन्ना को नमस्ते कर सीधा खड़ा हो गया …..
पन्ना ने तेजी से गाड़ी आगे बढ़ा दी..वहीं बैठा रत्न अपने मोबाइल पर से नजर उठा कर जाती हुई गाड़ी को घूरने के बाद चौधरी की तरह देखने लगा …
” ये क्या था बाबुजी?”
चौधरी ने हाथ के इशारे से उसे चुप रहने का संकेत किया और फिर किसी को फोन करने लगे …
” एक लड़का है , लगभग चौबीस पच्चीस की उम्र होगी…सरकारी इंजिनीयर है…उसकी कुंडली रात तक हमारे पास हाजिर करो..!”
चरण के कानों में सब पड़ गया , जाते जाते उसने सब सुन लिया …
और वहाँ से बाहर निकलते ही तुरंत बिक्रम को फोन लगा लिया ….
पन्ना ने गाड़ी में रेडियो चला लिया था …
ख़ामोशियों में, बोली तुम्हारी
कुछ इस तरह गूंजती है
कानों से मेरे, होते हुए वो
दिल का पता ढूँढती है….
बेसुवादियों में, बेसुवादियों में
जैसे मिल रहा हो कोई ज़ायक़ा
क़ाफ़िराना, सा है इश्क है या, क्या है
ऐसे तुम मिले हो…जैसे मिल रही हो इत्र से हवा…
उसी समय फोन की रिंग बजने लगी….
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तेजी से बजती रिंग सुन धानी चौंक कर खड़ी हो गयी…
” अरे ये तो हमारे घर पर लैंडलाइन बज रही है..”
और वो एक तरह से अपने घर की तरफ भाग गई ..और हम उसके इस तरह चौंकने से चौंक उठे..
वो जिस तरह घबरा कर गई, हम भी उसके पीछे उसके घर तक चले गए लेकिन उसके खुले दरवाजे से भीतर जाने की हिम्मत नहीं हुई…
…अब वो हमारी धानी नहीं थी , किसी और की हो चुकी थी और ये उसका आशियाना था। जहां उसके बिना बुलाए हम कदम भी नहीं रख सकते थे …
घर बेहद खूबसूरती से सजाया था उसने …हर एक चीज के लिए एक जगह और हर जगह पर एक खूबसूरत चीज…
हम तो बचपन से जानते थे कि तुम अंदर से कलाकार हो ..घर भी कितना कलात्मक था …
हम धानी के पीछे खड़े थे , इसी से उसे नजर नहीं आ रहे थे , लेकिन पीछे खड़े भी हम जाने कैसे उसके चेहरे पर छलकती पसीने की बूंदे महसूस कर पा रहे थे …..
… उसके खुंखार पति का फोन था जिसकी बिना साइलेंसर लगी आवाज हमें दरवाजे तक सुनाई पड रही थी….
” कहां मर गई थी..?”
” वो हम वॉशरूम में थे..”
” दो बार पूरी रिंग गई है…इतनी देर क्या कर रही थी वॉशरूम में..?”
” ये कैसा सवाल है अब , इसका क्या जवाब दें हम?”
” और तुम्हारा मोबाइल कहां पड़ा है फिर से चार्ज करना भूल गई? स्विच ऑफ बता रहा है?”
धानी ने अपने माथे पर अपना हाथ मार लिया…
“हां वह आज सुबह जल्दी उठना था, तो कल रात में हड़बड़ी में हम फोन चार्ज पर लगाना भूल गये , अभी लगाते हैं…”
“तुमसे सौ बार कहा है, हमें तुम्हारी ऐसी बेवकूफियां बिल्कुल पसंद नहीं है। पर तुम्हें समझ ही नहीं आता है… घर आने के बाद हम सीसीटीवी में यह देख कर चेक कर ही लेंगे कि तुम कितनी देर वॉशरूम में थी और कितनी देर बाहर घूम रही थी…
“हमने कब मना किया है देख लीजिएगा.. अच्छा सुनिए खाना खाया आपने..?”
“हां!!! खा लिया, लेकिन तुम्हारा टिफिन नहीं खा पाए… जज साहब के साथ लंच था, मना नहीं किया गया, कुछ और भी वकील साथ में थे तो हमने भी उन लोगों के साथ वही खा लिया। अच्छा सुनो तुम्हें इसलिए फोन किया था, कि हम आज रात में वापस नहीं आ पाएंगे हमें दिल्ली जाना पड़ रहा है..”
“क्या आप वहीं से दिल्ली निकल जाएंगे..?”
“हां वहीं से दिल्ली निकल जाएंगे… कल वहां कोर्ट में थोड़ा काम है… शाम तक काम पूरा हो गया तो रात में वापस आ जाएंगे वरना 1 दिन और लग जाएगा..”
“ठीक है आप ध्यान रखिएगा अपना..।”
“और तुम अपने फोन का ध्यान रखो, तुम जहां भी रहो तुम्हारा फोन पूरी हंड्रेड परसेंट बैटरी के साथ तुम्हारे साथ रहना चाहिए, हम किसी भी वक्त वीडियो कॉल कर सकते हैं.. सुनो….
… कोई आया तो नहीं है ना घर पर..?
“कौन आएगा घर पर? आप भी अजीबोगरीब बातें करते हैं..”
“हम तो ऐसे ही बातें करते हैं हमेशा से , फिर आज तुम्हें अजीबोगरीब क्यों लग रही है? तुम जानती हो धानी हमें झूठ बर्दाश्त नहीं होता। अगर घर पर इस वक्त कोई है , तो खुद बता दो अगर हमने कैमरे में देख लिया तो तुम जानती हो हम तुम्हारा क्या हाल करेंगे…।”
धानी ने धीरे से मुड़कर साजन की तरफ देखा, वह चुपचाप हाथ बांधे दरवाजे पर खड़ा था, और वह जहां खड़ा था वह हिस्सा सीसीटीवी कैमरा में नजर नहीं आता था। थोड़े से राहत के भाव धानी के चेहरे पर आए और वह वापस दूसरी तरफ घूम गई…
“विश्वास कीजिए घर पर कोई नहीं है, हम अकेले ही है। और खैर हम कितना भी कह लें कि हम पर विश्वास कीजिए लेकिन ना आपने कभी किया है और ना ही कभी करेंगे। इसलिए आपको जो सोचना है आप सोचते रहिए और आने के बाद आपको जो चेक करना होगा चेक कर लीजिएगा…”
“अगर हमें कहीं कोई भी गलती मिली तो तुम जानती हो कि हम तुम्हारा क्या हाल करेंगे..।”
“आदत हो गई है, अब हमें डर नहीं लगता..”
“बस कुछ घंटे हुए हैं, हमें घर से निकले और तुम शेरनी बन गई हो, ठीक है कल तक में आकर तुम्हारी अकड़ निकाल देंगे..”
“फोन रखें?”
“बड़ी जल्दी है फोन रखने की? जब हम ही घर पर नहीं है तो तुम्हें काम भी क्या होगा? खाना तो सुबह ही बना चुकी थी! साफ-सफाई झाड़ू पोछा बर्तन भी कर ही लिया होगा, फिर सीरियल देखने के लिए इतना मरी जा रही हो…?”
“आपसे जब तक बात करेंगे आप सिर्फ हमें गालियाँ ही तो देंगे, आखिर कोई कितनी देर गालियां सुन सकता है..?”
“कुछ ज्यादा ही नहीं बोल रही हो आज? ऐसा लग रहा है शादी के पहले वाली धानी तुम्हारे अंदर से बाहर चली आई है… याद है ना जब शादी होकर आई थी तब कितनी अकड़ थी तुम में और कैसे तुम्हारी अकड़ को दूर किया था…!”
“हम फोन रखते हैं, मोबाइल को भी चार्ज पर लगाना है। फिर कहीं हम भूल गए तो आप वापस नाराज हो जाएंगे..।”
“ठीक है ठीक है आधे घंटे बाद हमें वीडियो कॉल करके पूरा घर घुमा कर दिखाओगी कि कहीं कोई तुम्हारा आशिक छुपा तो नहीं बैठा हैं घर पर?”
धानी ने आंखों में छलक आए आंसू धीरे से पोंछे और फोन रख दिया… वह तुरंत हड़बड़ा कर वहां पड़े सोफे और बाकी चीजों में अपना मोबाइल ढूंढने लगी और किचन में उसे उसका मोबाइल मिल गया…
उसने तुरंत मोबाइल चार्ज में लगाया और हमारी तरफ चली आई…
उसने बिना कुछ कहे आंखों के इशारे से हमें पीछे सरकने को कहा हम समझ गए और अपने घर की तरफ चले गए……
अपने फ्लैट में वापस आकर कितना अजीब लग रहा था अब…
अब तक तुम भी इस कमरें में हमारे साथ हमारे समाने बैठी कितना कुछ बताती चली जा रही थी…
कितनी अजीब बात थी ना…. आज तक तुमने कभी हमसे बात नहीं की और आज जब बात करने बैठी तो अपना सारा जीवन ही सुनाती चली गई….
धानी धानी ऐसा क्यों हो रहा है …हमें तुम्हारी कहानी सुन कर लग रहा है काश तुम्हारे जीवन में हम साजन की जगह बिक्रम बन कर आ पाते…
…जाने क्यों लेकिन अब तक तुमने अपने और बिक्रम की झड़प के किस्से ही सुनाए लेकिन इस आँख मिचौली में छिपा प्यार क्यों हम देख पा रहें हैं……
हालांकि अब भी कहीं दिल के किसी कोने से आवाज आ रही है कि हो सकता है तुम्हें बिक्रम से प्यार ना हुआ हो …
पर दिल का एक और हिस्सा भी तो है, जो उतना ही जवान है जितनी तुम और जितना बिक्रम…
इसलिए हम जानते हैं , की बिक्रम को तुमसे पहली ही नजर में प्यार हो गया था ….
..दुनिया का कौन सा बेवक़ूफ़ होगा जिसे धनिया पसंद नहीं होगा …..
और जिसे वाकई पसंद नहीं भी होगा वो बार बार चिल्ला कर ये नहीं जताएगा कि ‘आई हेट धनिया ‘
” हम आ जाएं अंदर ?”
एक बार फिर तुम्हारी खनकती आवाज हमारी रूह तक सुकून पहुंचा गई…
तुम्हें दरवाजे पर ऐसे चुप सी खड़ी देख दिल कैसा तो हो गया धानी…
अपने सामने तुम्हें अपने पति से डांट खाते देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा , और हम जानते हैं हमसे ज्यादा तुम इस बात पर शर्मिंदा होगी..
..पर कोई नहीं , हम अभी तुम्हें चुटकियों में हंसा लेंगे….
” हाँ आ जाओ धानी..इतनी फार्मेलिटी की जरूरत नहीं है ..बिंदास बेधड़क चली आया करो , जब तुम्हारा दिल करे…”
फीकी सी मुस्कान के साथ धानी अंदर चली आयी…
” अच्छा तुम्हें याद है , एक बार स्कूल के एन्युअल फंक्शन में तुम्हारे डांस के ठीक पहले तुम्हारी एक स्पेशल सी नथ थी जो तुम कहीं भूल गई थी..
” हाँ अच्छे से याद है..माधुरी दीक्षित वालीं स्पेशल महाराष्ट्रियन नथ थी…गाना भी तो वहीं था माधुरी का…”
अपने स्कूल के समय की बात सुन धानी के चेहरे पर चमक आ गई…
” कितने बेलौस बेपरवाह दिन थे वो …कोई फिक्र नहीं … सब कुछ कितना सुंदर था …”
धानी अपनी बात कहती मुस्कराने लगी और हम उसे देखते खो गए उस शाम में जब धानी की नथ गायब हो गई थी…और वहां हड़कंप मच गया था..धानी बस रोने को थी कि हमने धीमे से कहा था …
” क्या उस नथ की कोई तस्वीर मिल सकती है..?”
सब की भीड़भाड़ में पता नहीं कैसे तुमने हमारी आवाज सुन ली थी..हालांकि कहा कुछ नहीं बस अपने फोन पर माधुरी दीक्षित की तस्वीर सामने कर दी थी… तुम इतने लोगों से घिरी थी कि तुम्हारे हाथ पर रखे फोन की तस्वीर देखने में हमे खासी मशक्कत करनी पड़ गई थी , और उसके बाद तो हम जो वहाँ से भागे कि सीधा गदौलिया जाकर रुके, भाग भाग कर एक दुकान से दुसरी दुकान छानते अखिर एक छोटी सी टपरी पर वो विशेष नथ मिल ही गई…
और फिर तो लगा साँस लेने में भी समय नहीं गंवाना है ….
उस दिन पहली बार हमने बाइक ऐसे इतनी तेज चलायी थी…
बाद में घर जाकर रात में डर के मारे बुखार आ गया था , सिर्फ यही सोच सोच के कहीं किसी लारी ट्रक के नीचे आ जाते तो चटनी बन चुकी होती…
पर उस दिन की तुम्हारे चेहरे की चमक हम अपनी आखिरी साँस तक नहीं भूल सकते धानी …उस दिन तुम्हारे हाथ तक जब हमने नथ पहुंचा दी तब लगा जग जीत लिया, अब और कुछ नहीं चाहिए ..काश उस दिन सिर्फ इतने में संतोष कर लेने की जगह भगवान से तुम्हें ही मांग लिया होता …
क्योंकि हमारी उस दिन की बात को भगवान ने शायद कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया ..
हम तुम्हें चहकते हुए नथ पहनते देख कर तुम में खोए थे और वो चांडाल चौकड़ी हमारा मज़ाक बनाती हुई गाती हुई निकली थी…
मेरा दिल भी कितना पागल है
ये प्यार जो तुमसे करता है
पर सामने जब तुम आते हो
कुछ भी कहने से डरता है ..
ओ मेरे साजन , मेरे साजन …..
और हम एक बार फिर उस शैतान मंडली से कन्नी काट कर स्टेज के सामने जा बैठे थे तुम्हारा जलवा देखने …..
और बस कुछ देर के इंतजार के बाद तुम स्टेज पर थी हमारे समाने और हम तुम्हारे सामने …
आज भी वो गाना जबानी याद है …जिस पर उस दिन तुम थिरक रही थी….
क्यों महका है यह गजरा
क्या कहता है यह गजरा
तू सपनो में खोयी है क्यों
बेचैन हैं क्यों नैना
क्यों खोया तूने चैना
ना जागी ना सोयी है क्यों….
हमको आज कल है इंतज़ार
कोई आये लेके प्यार……..
क्रमशः
aparna
