
तू बन जा गली बनारस की…-12
ब्रिज से निकलकर बिक्रम सीधे पुलिस स्टेशन के लिए रवाना हो गया…
पुलिस स्टेशन में बिक्रम और ठेकेदार को देखकर इंस्पेक्टर पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा वह पहले ही फोन पर किसी से उलझा हुआ था..
दिनदहाड़े शहर के विख्यात व्यापारी को गोली मार दी गई थी यह कोई छोटी मोटी बात नहीं थी और इसीलिए पुलिस स्टेशन में हड़कंप मचा हुआ था…
पुलिस की एक टीम वारदात वाली जगह के लिए जा चुकी थी और अब यह इंस्पेक्टर फोन पर अपने अधिकारियों से डांट खा रहा था, ऐसे में बिक्रम और ठेकेदार का वहां पहुंचना सही साबित नहीं हुआ।
जिस बात की शिकायत दर्ज करवाने के लिए बिक्रम वहां आया था उसी कांड की जांच करने के लिए इंस्पेक्टर निकल रहा था कि बिक्रम ने उसे रोककर उसे अपनी आपबीती सुनानी शुरू की लेकिन उस वक्त इंस्पेक्टर के पास इतना वक्त नहीं था, कि वह बिक्रम और ठेकेदार की बात सुन सके इसलिए उन्हें झड़प कर वह आगे बढ़ गया…
“आप हमारी बात समझते क्यों नहीं? यह सब उन्हीं लोगों का किया धरा है वह लोग जैसे दिखाई देते हैं वैसे ही नहीं?”
“क्या बात कर रहे हो, वह वैसे ही दिखाई देते हैं जैसे वह लोग हैं। चौधरी को देखा नहीं, मेरे सामने ही उस लड़के को धमकी दे रहा था कि उसकी किडनी निकाल कर बेच देगा…।”
“वही तो समझा रहे हैं सर!! आप हमारी बात समझने की कोशिश काहे नहीं करते? हम कम से कम 10 साल तो बड़े होंगे आपसे, हमारे अनुभव को ही सुन लीजिए..”
“अच्छा एक बात बताओ तुम्हारा नाम क्या है..”
“चरण दास गुप्ता है सर..!”
“ठीक है तो गुप्ता जी, आप मुझसे कम से कम 10 साल बड़े हैं , यह सोचकर आज से मैं आपको गुप्ता जी बुलाऊंगा…!”
“सर!! आप क्या बुलाएंगे इसकी तो हमें कभी कोई समस्या ही नहीं है, आप सिर्फ चरण भी बोलिए तब भी तकलीफ नहीं है, बस यहां से निकल जाइए..।”
“अब तो यहां से निकलना ही पड़ेगा दोस्त, यहां कोई तुम्हारी और मेरी बात सुनने के लिए बचा भी तो नहीं है चलो..!”
चरण को पीछे बैठा कर बिक्रम वहां से अपने रूम के लिए निकल गया…
“चाय पिएंगे गुप्ता जी..!”
ठेकेदार बहुत ही ज्यादा परेशान लग रहा था, उसकी परेशानी जानने के लिए ही बिक्रम ने एक गुमटी पर अपनी बाइक खड़ी कर दी और दो कप चाय का आर्डर देकर सामने रखी बेंच पर बैठ गया। ठेकेदार को भी उसने अपने सामने हाथ पकड़कर जबरदस्ती बैठा दिया…
बाजू वाले पान ठेले से एक सिगरेट मंगा कर जला कर उसने ठेकेदार के हाथ में पकड़ा दी..
“ठीक है ?? अब आपका दिमाग चलेगा..”
” हुजूर हमारा दिमाग तो चल ही रहा है, दिमाग आपका कुंद बैठा है…. आपको समझ नहीं आ रहा है कि यह लोग आपको खिला खिला कर मारने वाले हैं…
होता है ना बकरे को हलाल करने से पहले उसे खूब खिलाया पिलाया जाता है। नहलाया धुलाया जाता है, टीका लगाया जाता है माला पहनाई जाती है, फिर एक झटके में हलाल कर दिया जाता है हमें जाने क्यों आप के चेहरे में…
” वही बकरा नजर आ रहा है?”
” हम कहना तो नहीं चाहते हैं, लेकिन हां आपके चेहरे में वही बकरा नजर आ रहा है। जिसे चौधरी परिवार हलाल करने को तैयार बैठे हैं.. आपसे पहले भी एक इंजीनियर साहब आए थे। सीनियर आदमी थे, रिटायरमेंट के बाद विशेष तौर पर उन्हें इस परियोजना के काम को देखने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने भी आपके जैसे सारा कच्चा चिट्ठा जांचना शुरू किया…
और जांच के पहले दिन से ही उन्हें सच्चाई के सबूत मिलने लग गए थे… ठीक इसी तरह दूसरे दिन वह भी चौधरियों के घर गए थे मिलने…
“फिर? फिर क्या हुआ?”
“तीसरे दिन उनकी लाश बाहर आई थी । चौधरियों के पर्सनल डॉक्टर ने कहा कि चौधरी साहब से बातचीत करने के बाद खाने पीने के लिए वहीं रुक गए थे। और उसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें हार्ट अटैक हो गया..
पहले से ही हार्ट की बीमारी थी, दवाइयां खाते थे उस दिन पता नहीं कैसे अचानक से तबीयत बिगड़ गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका…!”
“यह तो बहुत बुरा हुआ…!”
“बुरा तो हुआ था सर !क्यों कि अटैक वटैक कुछ नहीं आया था… उम्र भले ही ज्यादा थी, लेकिन हट्टे कट्टे थे, साहब यह चौधरी उन्हें समझाने की कोशिश की कि इन लोगों का नाम कहीं पर भी नहीं फंसना चाहिए, वह जरा सिरफिरे थे अकेले ही उलझ गए और बस उस माणिक चौधरी ने खड़े-खड़े हाथ से गला दबा दिया उसका..”
“क्या बात कर रहे हो? किसी ने शिकायत नहीं कि इस बात की? “
“साहब जंगल में शेर की शिकायत हिरण नहीं करता? उसे बस यह मालूम होता है , कि शेर की नजर उस पे पड़े इसके पहले उसे तेजी से भागना है, वह जानता है कि उस पूरे जंगल में शेर का एकछत्र राज्य है और उसके खिलाफ कोई नहीं खड़ा हो सकता..”
“तुम्हें यह सब किसने बताया…?”
“शहर का चप्पा चप्पा इस बात को जानता है, और यह कोई पहली बारी थोड़ी है कि चौधरी किसी को मार रहे हैं । उनके लिए मारना काटना तो आम बात है…
जैसे उनके घर की औरतें सलाद में मूली गाजर काटती हैं वैसे उनके घर के आदमी लोगों को काटते हैं..
किसी मजदूर ने मजदूरी के लिए सिर उठाया उसका सर पत्थर पर फोड़ दिया। किसी कर्मचारी ने कोई शिकायत की, उसे गोली मार दी.. अंधेर नगरी है सर हम तो यही कहेंगे कि आप जितनी जल्दी हो यहां से ट्रांसफर लेकर निकल जाइए….
“अब तो पक्का नहीं निकलेंगे , अब तो यहीं रहकर इन चौधरियों का सारा कच्चा चिट्ठा सामने लाकर ही जाएंगे यहां से…!”
“अच्छे खासे तो दिखते हैं साहब आप! नौकरी भी बढ़िया ,है सरकारी है। पैसा भी बढ़िया मिलता होगा। एक अच्छी सुंदर सी लड़की देख कर ब्याह कर लीजिए और किसी दूसरे शहर में जाकर बस जाइए।यहां रहकर क्यों इन लोगों से बैर पाल रहे हैं…।”
“बैर तो पाल लिया है दोस्त, अब तो बस देखना यह है कि यह बैर आगे जाकर क्या रंग दिखाता है…?”
“आत्महत्या करने का इतना शौक है, तो ऐसे ही गंगा जी में कूद जाइए ना।उन चौधरियों की मांद में क्यों घुस रहे हैं?और आप तो घुस रहे, हमें भी साथ ले कर चले हैं.. बताइए यह कोई बात हुई?: हमारी एक ठो बीवी है दुई ठो बच्चा है हम उनका क्या करें?”
“अब आए ना लाइन पे, ऐसे साफ-साफ बोलो कि हमारे साथ नहीं रहना चाहते हो? कोई बात नहीं हम अकेले सब काम देख लेंगे…”
“अब यही तो परेशानी है हमारे साथ!! दो ही दिन में आपसे इतना लगाव बढ़ गया है, कि आपको अकेले भी नहीं छोड़ सकते। कोई बात नहीं जब आप आत्महत्या करने का मन बना ही लिये है, तो हम भी अपने सर पर कफन बांध लेते हैं…”
बिक्रम हंसते हुए उठ गया…
” आओ चलो, तुम्हें तुम्हारे घर उतारकर मैं भी mere कमरें की तरफ निकलता हूं……”
“यहां से हमारा घर पास ही है, हम चले जाएंगे सर। आप के चक्कर में हमारा जीप साइट ऑफिस में खड़ा रह गया आज..”
“कोई बात नहीं, कल ऑफिस जाते हुए मैं तुम्हें साथ ले लूंगा..!”
मुस्कुराते बिक्रम ने गाड़ी आगे बढ़ा दी …गाड़ी चलाते हुए भी हर पल उसके दिमाग में पन्ना और सभरवाल ही घूम रहे थे…
उसे गोली मार दो, पन्ना को यह टाइप करते हुए बिक्रम ने देख लिया था…
दरअसल बिक्रम की एक दिन पहले ही बलराज सभरवाल से मुलाकात और बातचीत सब कुछ हो चुकी थी। बलराज सभरवाल निहायत ही अकङू बददिमाग बदतमीज और घमंडी किस्म का आदमी था। जिसने बिक्रम की किसी भी तरह से मदद करने से इंकार कर दिया था। इसके साथ ही उसने सब कुछ स्वीकार कर लिया था कि, उसने और चौधरी ने एक साथ मिलकर इस परियोजना का सारा पैसा डकार लिया है… और साथ ही कोई काम भी नहीं किया। उसने बिक्रम से साफ शब्दों में कह दिया था कि, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इसलिए बिक्रम अपनी उछल कूद मचाना बंद करें और चुपचाप एक तरफ होकर बैठ जाए। सभरवाल को और चौधरी को जो करना है वह करते ही रहेंगे..
बिक्रम ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश भी की लेकिन सभरवाल बिक्रम की किसी भी बात को मानने को तैयार नहीं था..
” अरे जा जा तेरे जैसे कई आए और गए, तुझे जो करना है, कर ले। मैं किसी के बाप से नहीं डरता…!”
” सोच लीजिए सभरवाल जी, कल को कहीं आपका यह बड़बोलापन आपको किसी जाल में ना फसा दे..”
” अबे तेरी जैसी छोटी मछली मुझ जैसे बड़े मगरमच्छ को कभी किसी जाल में नहीं फंसा सकती….
तू समझता क्या है बे खुद को ? चार दिन आए हुए हुआ है तू शहर की साफ सफाई करने निकला है? इस शहर पर एकछत्र राज्य है चौधरी का , और मैं उसका सेनापति हूं। तू ना मेरा कुछ बिगाड़ सकता है और ना उसका….”
” मैं जानता हूं आप तो बहुत बड़े मगरमच्छ हैं, बहुत बड़े शिकारी हैं लेकिन बहुत बार एक बड़ा सा हाथी भी छोटी सी चींटी से डर जाता है। इस लिए कभी भी खुद को सर्वश्रेष्ठ मानने की गलती मत कीजिएगा..।”
“अच्छा किया बेटा, तूने मुझे समझा दिया और मैं समझ भी गया। अब तू चल निकल ले यहां से…।”
बिक्रम बलराज सभरवाल के मुंह से सारी सच्चाई सुन चुका था, और बलराज को मालूम भी नहीं चला कि कब बिक्रम ने उसकी कहीं सारी बातों को अपने फोन पर रिकॉर्ड भी कर लिया था…
अपने रुपए पैसों और रुतबे के घमंड में चूर बलराज सभरवाल का इस बात की तरफ ध्यान ही नहीं गया कि टेक्नोलॉजी कितनी आगे बढ़ चुकी है और उसकी कही बातें कितनी आसानी से रिकॉर्ड की जा सकती हैं। उससे बात करके निकलने के बाद बिक्रम के पास पुख्ता सबूत थे, लेकिन बलराज सभरवाल ने हर जगह सिर्फ चौधरी शब्द लिया था और सब चौधरी कह भर देने से यह साबित नहीं हो जाता था कि, वह मानिक चौधरी की ही बात कर रहा था। और इसीलिए इस बात को साबित करने के लिए ही बिक्रम ने जानबूझकर पन्ना से मुलाकात का समय तय किया था और पन्ना को ब्रिज पर बुला लिया था…
यह सब बिक्रम की सोची समझी चाल थी, जिसमें वह पन्ना को फ़साना चाहता था। और आखिर वही हुआ जो बिक्रम ने सोच रखा था,।
पन्ना को बिक्रम ने सारी बातें खुद कह कर सुना दी बिक्रम की बातें सुनते ही पन्ना को पहली बार में तो यकीन भी नहीं हुआ कि, बलराज बिक्रम जैसे लड़के को सब कुछ सच बता सकता है ….
लेकिन फिर उसे अचानक ध्यान आया कि इसी प्रोजेक्ट के रुपए पैसों के मामले में उसके पिता और बलराज सभरवाल का कुछ झगड़ा भी हुआ था। यही सोच कर उसे लगा कि हो सकता है उसी नाराजगी में बलराज ने बिक्रम से सारी बातें कह दी हो…और यही सोचकर उसने अपने आदमी को बलराज को ठिकाने लगाने का मैसेज भेज दिया था…
…
हालांकि बिक्रम ने यह नहीं सोचा था कि पन्ना बलराज सभरवाल को सीधे अपने रास्ते से ही हटवा देगी। उसे बस यह लगा था कि पन्ना किसी तरह से बिक्रम से पीछा छुड़ाकर बलराज सभरवाल से मिलने जाएगी और उन दोनों को रंगे हाथों बिक्रम पकड़ लेगा। लेकिन उसके पहले ही पन्ना ने बलराज का खात्मा करवा दिया।
और इससे बिक्रम का शक यकीन में बदल गया कि पन्ना चौधरी और माणिक चौधरी ही सारे प्रोजेक्ट के पीछे हैं और यह सारी कारस्तानी उन लोगों की ही है……
*****
सुबह से इधर उधर भाग कर बिक्रम अब थक चुका था। वह अपने कमरे में पहुंचा और कमरे का दरवाजा लगा का कर रेडियो ऑन कर नहाने जाने की तैयारी करने लगा…..
दिलदारा दिलदारा
यह रत्ती भर का जग सारा
दिलदारा दिलदारा
तेरे नज़रो कदम
पे सब वारा
दिलदारा दिलदारा
तब जीता जब तुझसे हारा
दिलदारा दिलदारा……
ओ रहबरों….
गाने के बोलों में मगन बिक्रम अपने पलंग पर आंखें बंद किए पड़ा था कि दरवाजा खोल कर धानी अंदर चली आयी…
” माँ ने आपके लिए मुंगोङियां भेजी है धनिया की चटनी के साथ…”
धानी की आवाज सुनते हैं बिक्रम अचकचा कर पलंग पर बैठ गया….
उसने कमीज नहीं पहन रखी थी, उसे ऐसे देखते ही धानी भी तुरंत पलट कर नीचे उतरने लगी कि, बिक्रम ने टी शर्ट पहनते हुए उसे आवाज लगा दी…
” ऐसे किसी के कमरे में बिना नॉक किए घुस जाना चाहिए क्या?”
” कोई शौक नहीं है किसी के कमरे में हमें बिना नॉक किए घुसने का। लेकिन सामने वाला भी तो इतना समझदार हो कि कपड़े पहन कर अपने कमरे में रहे..”
” मेरा कमरा है चाहे जैसे रहूं..!”
” लेकिन घर तो पूरा हमारा है..!”
” इस कमरे का किराया देता हूं मैं, इसलिए इस कमरे पर पूरा हक मेरा है, मेरी जो मर्जी आए वह करूंगा..!”
” खाली किराया ही देते हो खरीद नहीं लिया है। इसलिए मालिक नहीं हो।
..वैसे भी ये लड़कियों वाला घर है इस लिए तमीज से रहना सीखना पड़ेगा..
और अगर ऐसे ही घूमना है तो कमरें का दरवाजा लॉक कर के रखिए…खुद को तमीज है नहीं दूसरों को सिखाने चलें हैं…!”
” तुम लड़कियों को भी लड़कों के कमरे में आने से पहले तमीज के दायरे बढ़ाने पड़ेंगे…
और सुनो जाते-जाते यह धनिया की चटनी ले जाओ आई हेट धनिया!”
” खाना पसंद नहीं है तो अपने सर पर पलट लो और उसी से बाल धो लेना कम से कम धनिया की ठंडक से दिमाग में ठंडक तो पड़ेगी!”
तुनक कर धानी सीढियां उतर गई..और उसके पीछे खड़े बिक्रम मुस्कराता हुआ गुनगुनाने लगा….
ओ रहबरा मेरे रहबरा
तुझसे वास्ता….
तू मंज़िल है और तू ही….
उस मंज़िल के आगे का रास्ता….
क्रमशः
aparna
