गली बनारस की -10

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-10

   अपने ऑफिस में पन्ना चौधरी एक लंबे चौड़े टेबल के पीछे रखी रिवोल्विंग चेयर पर बैठी अपनी टेबल पर कुछ ढूंढने का प्रयास कर रही थी कि तभी बिक्रम भी चला आया ….
उसे देख पन्ना ने उसे बैठने का इशारा किया और वापस टेबल पर कुछ ढूंढने लगी..

” बस दो मिनट इंतजार कर लीजिए इंजिनीयर साहब,  हमारा चश्मा नहीं मिल रहा , उसे सहीं जगह रख दें …पैंतालीस हज़ार का है ना …”

पन्ना अपनी बात कह कर मुस्करा उठी , और उसे मुस्कराते देख बिक्रम भी मुस्करा उठा और उसी वक्त उसका ध्यान गया कि पन्ना ने चश्मा सिर पर चढ़ा रखा है ….
  बिक्रम को हंसी आने लगी लेकिन उसने खुद को रोका और खुद की तरह देखती पन्ना को इशारे से अपने सिर पर हाथ रखने को कहा …
   सिर पर हाथ फेरते ही पन्ना के हाथ में चश्मा आ गया और वो अपनी बेवक़ूफ़ी पर हंस पडी……

” बैठिए इंजिनीयर साहब!! कहिये क्या मंगवाए आपके लिए ..? चाय कॉफ़ी शर्बत या कुछ और ..?

” अरे नहीं , किसी फॉरमेलिटी की जरूरत नहीं है ..!”

” ऐसे कैसे नहीं है..आप पहली बात हमारे घर आए है…

पन्ना ने पास खड़े नौकर की तरह देखा और उसे चाय के लिए बोल दिया

   “बढ़िया अदरक वाली दो कप चाय भिजवाए.. हम भी जरा थक गए हैं…!
  हाँ बताए आप , क्या समस्या है ..?”

पन्ना ने इतने सलीके से अपनी बात रखी थी कि बिक्रम अपनी सारी नाराजगी भूल बैठा …

” जी मैं यहां  गंगा योजना के तहत काम कर रहा हूं…पिछली तीन बार से टेंडर शायद आपकी फर्म के अधीन किसी को मिल रहा है ..मैं आपको दोष नहीं दे रहा, पर मुझे लगता है आपकी फर्म का नाम लगा कर नीचे काम करने वाले काम नहीं कर रहे और पैसा बराबर ले रहे..
अब तक तीन  टेंडर पास हुए है , और तीनों की मिला कर कुल लागत लगभग सवा दो करोड़ दिखाई गई है ..
इतना रुपया खर्च कर दिया गया पर साइट पर मैं देख कर आ रहा हूं , काम तो तिनके का भी नहीं हुआ ? “

  बिक्रम की बात सुनते हुए पन्ना के चेहरे पर नाराजगी दिखने लगी…उसकी भंवे तन गई …

” अच्छा ये बात है ? अभी तो फिलहाल हमारे पास वो फाइल नहीं है ..कल हम  सारे कागजात लेकर आपकी साईट पर आते हैं , फिर देखते हैं कि मसला क्या है ..
वैसे जैसा आप कह रहे, अगर वहीं सच निकला तो जिसने भी ये किया है उसकी खैर नहीं …

बिक्रम ने हाँ में सिर हिलाया और उसे नमस्कार करता अपनी जगह पर खड़ा हो गया ……

” आप बैठिए , चाय तो ले लीजिए …” बिक्रम मुस्करा कर वापस बैठ गया ……

मन ही मन उसने सोचा कि चलो चौधरियों के अड्डे पर कोई तो पढ़ी लिखी इंसान मौजूद है जो बात करने लायक तो है….

“हमारे बारे में सोच रहे हैं ना?”

पन्ना की बात सुन विक्रम चौक कर उसे देखने लगा..

  “नहीं ऐसी बात नहीं…  दरअसल हां मैं आप ही के बारे में सोच रहा था… आप अपने घर वालों से काफी अलग है…”

“हां हम थोड़े अलग तो हैं…!”

बिक्रम  मुस्कुरा कर चाय पीने लगा। चाय का कप रखने के बाद वह अपनी जगह पर खड़ा हो गया…

“अब मुझे इजाजत दीजिए मैडम, कल अगर आप नहीं भी आए तो मुझे फोन कर दीजिएगा। आप जब कहेंगे मैं आ जाऊंगा..!”

“नहीं !! गड़बड़ी तो हमारी तरफ से हुई है, हम ही आएंगे, आपकी साइट पर।  आपसे मुलाकात अच्छी रही अपना ध्यान रखिएगा….!”

पन्ना की गहरी नीली आंखों में कोई बात तो थी, कुछ देर तक उन आंखों को देखते रहने वाला सम्मोहित हो जाता था।
       बिक्रम ने बहुत विनम्रता से गर्दन हिलाई और मुस्कुराते हुए वहां से बाहर निकल गया….

   तेज तेज कदमों से चलते हुए वह वापस उसी बगीचे की तरफ से बाहर की तरफ बढ़ने लगा… उसके आगे बढ़ते ही पीछे खाट पर बैठी एक बुढ़िया ने अपने माथे पर अपना हाथ मार लिया..

” छोरा तो गया काम से…”

बिक्रम के निकलने के कुछ देर बाद ही पन्ना भी उसके पीछे निकल कर अपने ऑफिस से बाहर आ चुकी थी…. और उसके ऑफिस के बाहर ही खाट पर वह बुढ़िया बैठी थी।
     उसकी कही बात पन्ना ने सुन ली और घूर कर उसे देखने लगी…

” क्या दादी अपनी पोती के लिए कुछ भी कहती रहती हो…”

” हां !! क्योंकि जाने हैं तुम्हें भी,और तुम्हारे बाप को भी… तुम दोनों का काटा तो पानी भी नहीं मांगता सीधे ऊपर जाता है…
   तेईस बरस की भई, अब तक अपन बाप के घर मा बैठी हो, सुहाता है क्या? ब्याह का विचार नहीं है का?”

   “ले आओ पकड़ के कहीं से एक अच्छा लड़का! हम कर लेंगे ब्याह!”

  पन्ना की दादी बैठे-बैठे अपने सरोते से सुपारी की कतरी काटती होठों ही होठों में कुछ बड़बड़ाते अपने में मगन हो गई और पन्ना हाथ बांधे सामने जाते हुए बिक्रम को देखती खड़ी रही….

बिक्रम को सही सलामत आते देखकर ठेकेदार के चेहरे पर राहत के भाव आ गए।
        वह बिक्रम के साथ दौड़ते भागते उस गेट से बाहर निकल गया। अपनी जीप में बैठते ही उसने एक गहरी सांस ली और दोनों हाथ जोड़कर ऊपर आसमान की तरफ देख कर  धन्यवाद किया….

” क्या हुआ ठेकेदार जी आप तो कुछ ज्यादा ही डर गए थे?”

” और आप कुछ ज्यादा ही निडर हो रहे थे सर। यह लोग अच्छे नहीं है, और इन लोगों से उलझना मतलब अपनी ही जान को दांव पर लगाना है..”

“यह तो चौधरी से मिलने के बाद मुझे समझ में आ गया है.. लेकिन मुझे लगता है कि उनकी बेटी इतनी बड़ी गवार नहीं है..”

“अभी हम आपसे क्या बताएं यह तो वक्त ही आपको बताएगा सर..!”

“चलिए आज तो पूरा दिन यही निकल गया। ऑफिस में हमें छोड़ दीजिए हम अपनी बाइक लेकर निकलते हैं..!”

” अब आज तो टेंशन दूर करने जाना पड़ेगा सर ..आप भी चलेंगे क्या फूंकने..”

” क्या फूंकते हो ? गांजा ?”

ठेकेदार ने हाँ में सिर हिला दिया …

” अरे काहे फेफड़ा जला रहे हैं…छोड़ दीजिए गांजा?”

” महादेव के भक्त है , वो फूंकते है तो हम भी ….

ठेकेदार की बात बीच में ही बिक्रम ने काट दी..

” महादेव ने तो सारी दुनिया के लिए विष पी लिया था , आप भी जाइए कीटनाशक पी लीजिए …..

” अरे सर काहे मज़ाक कर रहें हैं..”

” शुरू तो आप ही किए है..”

ऑफिस से अपनी बाइक लेकर बिक्रम घर की तरफ निकल गया। उसे तेज भूख लग रही थी उसने रोड किनारे लगे एक ठेले पर अपनी गाड़ी खड़ी कर दी….

  ” भैया जरा गोलगप्पे खिला दो..?”

  गोलगप्पे वाले ने हाँ में इशारा किया और मसाला तैयार करने में लग गया…

” हम यहां पहले से खड़े हैं इसलिए पहले हमें खिलाना…

  पहचानी हुई से आवाज कान में पड़ते ही बिक्रम ने झांक कर देखा सामने धानी और उसकी दो सहेलियां खड़ी थी……

विक्रम ने उसे देखकर ना में सिर हिलाया और ठेले वाले की तरफ देखने लगा…

ठेले में रेडियो भी बज रहा था …

   मैं रंग शर्बतों का
   तू मीठे घाट का पानी
   मुझे खुद में घोल दे तू
   मेरे यार बात बन जानी

  गाने से क़दम ताल मिलाते बिक्रम मगन था , उसने ठेला वाले से कहा…

” मुझे फटाफट खिला दो मुझे घर जाना है और ढेर सारा काम है..

” अच्छा तो मतलब हम सब बिना काम के यहां घूम रहे हैं।  ठेले वाले भैया के पास जो पहले आता है उसे पहले खिलाया जाता है। यहां पर यह भैया यह नहीं देखेंगे कि कौन ज्यादा व्यस्त है और कौन कम..।”

“अगर यह बात हम इन्हें डिसाइड करने दे  तो, बेटर नहीं होगा..?”

  “नहीं!! बिल्कुल भी नहीं।  ना यह डिसाइड करेंगे ना तुम हम डिसाइड करेंगे… क्योंकि शाम होने से पहले हम तीनों को घर पहुंचना है । इसलिए भैया आप पहले हम तीनों को खिला दीजिए, इन्हें बाद में चलाते रहिएगा…”

  “यह तो गलत बात है मतलब! अपने शहर में आए किसी मेहमान का स्वागत आप लोग इस तरीके से करते हैं?”

“मेहमान,  मेहमानों की तरह सलीके से रहे तब तो उनका स्वागत हो।अगर खुद ही हर जगह मेजबान बनके पहुंच जाए तो फिर क्या स्वागत किया जाएगा..

  “हां बात भी सही है। अब सोच रहा हूं मामी के दिए हुए अचार पापड़ अपने कमरे में ही ले जाता हूं। जब लोग यहां गोलगप्पे खा कर ही घर पहुंचने वाले हैं, तो उन्हें अचार की जरूरत ही क्या है?”

”  ये अचार भी लेकर आया है? तूने तो नहीं बताया था धानी?”

   धानी की सहेली प्रतिमा बिक्रम को पहचान गई थी। और उसकी अचार वाली बात पर वह अपने ऊपर काबू नहीं रख पाई और उसने धानी से सवाल कर दिया …
   उन दोनों के साथ खड़ी उनकी तीसरी सहेली अब तक इस बातचीत का और छोर नहीं समझ पा रही थी…
  और गोलगप्पे वाला भी गोलगप्पे बना कर कभी धानी की तरफ देख रहा था कभी बिक्रम की तरफ। दोनों इधर उधर खड़े थे और गोलगप्पे वाला उन्हें खिला नहीं पा रहा था..
  
” भैया जी! आप भी इधर आ जाइए सब को एक साथ ही खिला देते हैं…..”

“मैं अपनी जगह से नहीं हटूंगा जिसे आना है वह मेरी तरफ आ जाए..!”

“फिर हम क्यों अपनी जगह से हटे? हम तो फिर भी तीन लोग एक तरफ खड़े हैं । आप तो सिर्फ अकेले हैं.. कायदे से आपको ही हमारी तरफ आना चाहिए। हम तीन लोग उधर जाए, उससे ज्यादा आसान पड़ेगा कि आप अकेले हमारी तरफ आ जाए..”

” बाप रे इत्ता हिसाब?” बिक्रम ने मजाकिया अंदर में अपने मुहँ पर अपनी हथेली रख ली..

गोलगप्पे वाला इतनी देर से बिक्रम और धानी की बहस सुन रहा था। उसने प्रतिमा और उसके बाजू में खड़ी दूसरी लड़की की तरफ देखा और उन लोगों से इशारे से पूछा?  उन दोनों ने हां में सिर हिलाया और अपने अपने दोने आगे बढ़ा दिए… गोलगप्पे वाला उन दोनों को गोलगप्पे खिलाने लगा और धानी और बिक्रम अपनी ही बहस में उलझे रहें…
  कुछ देर बाद बहस करते करते धानी बिक्रम की तरफ चली गई और दोनों वही एक दूसरे से बहस करते रहे…
गोलगप्पे खा लेने के बाद प्रतिमा धानी के पास आई और उसके कंधे पर हाथ रख दिया…..

  ” चलें धानी? हम दोनों ने तो गोलगप्पे खा लिए!”

  “क्या ? कब खा लिए ?”

“अभी जब तुम गोलगप्पे से भी ज्यादा चटपटी बहस में उलझी हुई थी..।”

धानी का चेहरा देखकर बिक्रम को हंसी आने लगी… और वह हाथ झाड़ते हुए गोलगप्पे वाले की तरफ बढ़ गया और एक दोना उठाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया…

” भैया मेरे गोलगप्पे मे धनिया बिल्कुल मत डालना आई हेट धनिया..”

धानी ने गुस्से से बिक्रम की तरफ देखा और अपनी सहेलियों के साथ घर की तरफ बढ़ गई…..

  बिक्रम मुस्कराते हुए गोलगप्पे खाता रहा और इन सब से कुछ दूर खड़ी बीएमडब्ल्यू में बैठी पन्ना बिक्रम को देखते रहने के बाद जाती हुई धानी को घूरने लगी …
   पन्ना ने अपने ड्राईवर की तरफ एक बार देखा …

” शेरा जरा उस दुकान पर से हमारे लिए गोलगप्पे बंधा लो..”

” लेकिन बेबी साहब आप वहाँ के गोलगप्पे खायेंगे..?”

” जो कह रहे हैं वो करो…उतरो फटाफट..!”

शेरा के उतरते ही पन्ना गाड़ी में सामने जा बैठी और अपनी गाड़ी उसने आगे भगा दी…..
   सामने सड़क पर एक किनारे चलती धानी के बाजू से उसने इतनी तेजी से गाड़ी निकाली की पास के गड्ढे में भरा कीचड़ उछाल कर धानी की सफेद कुर्ती रंग गया …
  खीझ कर धानी  जोर से चिल्ला उठी …

” अबे अंधे हो क्या ? देख कर गाड़ी नहीं चलायी जाती..”

गाड़ी आगे बढ़ कर रुक गयी…पन्ना उतरने ही वाले थी कि उसने देखा अपनी बाइक से बिक्रम ठीक धानी के पास आकर रुक गया..

उसे रुकते देख पन्ना ने गाड़ी आगे बढ़ा ली….

क्रमशः

aparna

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