गली बनारस की -7

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-7

    ” तो यह विक्रम राज तुम्हारे घर पर किराएदार बनकर आया? यह था कौन ?और करता क्या था? और एक सवाल यह है,  के इसका इस पूरी कहानी से क्या लेना-देना है?”

” इस पूरी कहानी से इन्हीं का तो सबसे ज्यादा लेना-देना है । हम शायद बहुत शुरू से ही अपनी कहानी आपको सुनाने लगे है, कहीं आप बोर तो नहीं हो रहे है ना?”

” नहीं हम बोर नहीं हो रहे!”
   अब हम तुमसे कैसे कहें धानी कि हमारा तो सपना ही यही है कि तुम जिंदगी भर यूं ही हमारे सामने बैठी रहो और हम तुम्हें देखते रहे। वो एक  पुराना गाना था ना…’ तू मेरे सामने, मैं तेरे सामने तुझको देखूं कि प्यार करुं’ बस वैसा ही कुछ हमारा भी हाल है। लेकिन हमें यह भी मालूम है कि तुम अब कभी हमारी नहीं हो सकती। और बस यह विचार दिमाग में आते ही हमारे दिमाग में उस मोगैंबो की शक्ल घूम गई, और हमने ना चाहते हुए भी  वह सवाल कर ही लिया…

” तुम्हें घर का भी तो काम होगा धानी?”

” हां हमें घर के काम तो रहते ही हैं, लेकिन आज हमने सुबह जल्दी उठकर सब कुछ निपटा लिया…?

” सब कुछ निपटा लिया मतलब?  कोई हेल्पर, हाउसमेड कुछ नहीं रखी है तुमने?”

  ” नहीं जरूरत ही नहीं पड़ी। सारा दिन हम घर पर ही तो रहते हैं, घर पर पड़े पड़े बोर होने से अच्छा है घर के काम निपटा लें।”

  ” क्या? इसका मतलब तुम अपने सारे काम खुद करती हो?”
     हमारे ऊपर एक के बाद एक बम गिरा जा रहा था।मतलब यह तो हद हो गई, ऐसी नाजुक और प्यारी सी लड़की से कौन घर के काम करवाता है?  चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए इसके पति को। क्या मतलब ऐसे पति का जो अपनी इतनी खूबसूरत और नाजुक सी पत्नी को संभाल कर भी नहीं रख सकता…
     इन्हीं कलाइयों से धानी बर्तन धोती है, कपड़े धोती है, झाड़ू और पोछा करती है…
    एक पल को हमें धानी पर इतना तरस आने लगा कि हमे लगा उसे अपने सीने से लगा ले।
     लेकिन हम जानते हैं धानी कि अब तुम हमारी नहीं हो।  हमें कोई हक नहीं बनता कि हम तुम्हें सीने से लगाने के बारे में सोच भी सकें…
   पता नहीं कुछ तो अजीब सा महसूस कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई हमारे दिल को मरोड़े दे रहा है। और बस उस दर्द से बचने के लिए हम अपनी जगह पर खड़े हो गए….

“कुछ खाओगी धानी?”

  जाने क्यों लेकिन यह सवाल पूछने से पहले ही हम जानते थे कि तुम्हारा जवाब ना में होगा…

” हम जानते हैं तुम्हारे जितना अच्छा तो हम नहीं बना पाएंगे लेकिन अपना पेट भरने लायक ठीक-ठाक हम बना ही लेते हैं..!”

” अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, हमारा तो खाने पीने में कोई नखरा नहीं है। हम कुछ भी खा लेते हैं। लेकिन इस वक्त भूख नहीं है। आज सुबह से रसोई में जुटे हुए थे ना तो पूरी तलने के कारण के वो तेल की महक नाक में ऐसी भर गई है कि अभी कुछ भी खाने का जी नहीं कर रहा…

” अच्छा तो आज नाश्ते में आलू पूरी बनाया था?”

” हां!! ये काम से शहर से बाहर गए हुए हैं। और यह ज्यादातर बाहर खाना पसंद नहीं करते, तो हम इन्हें टिफिन बना कर दे देते हैं…”

   तो यह बात है!! आज धानी के पति देव घर पर नहीं है …इसलिए वह हमारे सामने बैठी अपना किस्सा सुना पा रही है।
     कल पहली झलक देखने के बाद ही हम इतना तो समझ ही गए थे, कि वह अत्याचारी क्रूर आदमी तुम्हें बहुत प्यार से नहीं रख पाता है। धानी!!लेकिन हम भी कुछ नहीं कर सकते, किस्मत की बात है…
      अगर हमारी किस्मत अच्छी होती तो आज तुम हमारे इस घर की मालकिन होती और हम तुम्हारे गुलाम….
 
  ” हम आगे क्या हुआ यह बताएं…?”

धानी!! यार तुम जितनी नाजुक हो उतनी ही नजाकत से बात भी करती हो।  तुम इतने प्यार से पूछती हो कि लगता है हम सब कुछ हार गए तुम्हारे सामने ।
   अब तुमसे कैसे कहें कि हमें बहुत कस के भूख लग रही है, और हमारा मन रसोई में लगा हुआ है। पर चलो कोई नहीं तुम सुना दो विक्रम राज का किस्सा थोड़ी देर बाद हम कुछ खा लेंगे….

  ” हां तो बताओ कौन था यह विक्रम राज?”

  ” उस दिन मां का प्रदोष व्रत था और वह सुबह से मंदिर में होने वाले अनुष्ठान के लिए गई हुई थी.. पापा अपने काम पर गए हुए थे…
   हम नहा धोकर बाजू मे रहने वाली हमारी दोस्त प्रतिमा के घर जाने वाले थे..
   हमनें अपना दुपट्टा उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ ही रहे थे कि दरवाजे पर किसी ने दस्तक दे दी। हमने दरवाजा खोला और सामने एक अनजान लड़का खड़ा था…
   ब्लू जींस पर गहरे काले रंग की शर्ट पहने , आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाये सामने खड़ा था।
     दिखने में अच्छा खासा नजर आ रहा था लेकिन शुरू से ही माँ और प्रतिमा ने हमारे दिमाग में लड़कों के लिए इतना ज़हर भर दिया था कि अब हमें हर लड़के में अपना दुश्मन ही नजर आता था…

” क्या हुआ किस से मिलना है?”

हमने बहुत बदतमीजी से उससे यह सवाल किया और उसने अपना धूप का चश्मा अपने सिर पर चढ़ाने के बाद हमें एक नजर घूर कर ऊपर से नीचे देखा और घर पर अंदर की तरफ झांकने लगा…

” ओ मिस्टर ना तो हमें कोई जीवन दीप पॉलिसी लेनी है और ना ही हम किसी तरह का कोई भी प्रोडक्ट खरीदना चाहते हैं…

” एक्सक्यूज मी!!  मैं तुम्हें एलआईसी एजेंट नजर आ रहा हूं? घर के मालिक को बुलाए…”

” हमने इतनी ध्यान से आपको देखा ही नहीं  कि हम यह बता सके कि आप में हमें क्या नजर आ रहा है? और हम ही इस घर की मालकिन हैं।”

” तो फिर मुझे जीवनदीप पॉलिसी बेचने वाला क्यों कहा…? एक मिनट तुम इतना एटीट्यूड क्यों दिखा रही हो? तुम्हारे शहर में तमीज से बात नहीं की जाती क्या?

” हम आपको बदतमीजी से बात करते हुए नजर आ रहे हैं क्या?”

  “बदतमीज नहीं, तुम महाबदतमीज हो। घर पर आए हुए मेहमान से कैसे बात करना है, तुम्हारे मम्मी पापा ने तुम्हें सिखाया नहीं?”

” ओये हमारे मम्मी पापा तक पहुंचने वाले तुम होते कौन हो..?

” मैं होता कौन हूं? यह तो अब तुम्हें तुम्हारे मम्मी पापा ही बताएंगे। फिलहाल यह बताओ कि उनमें से कोई घर पर है या नहीं? क्योंकि मैं बेवकूफ़ो के मुंह नहीं लगता..

” बेवकूफ किसे बोला तुमने?

” तुम्हें ही बोला क्योंकि तुम हो बेवकूफ !
   पता नहीं सिर्फ शक्ल सूरत अच्छी हो जाने से आजकल की लड़कियां क्यों सातवें आसमान पर उड़ने लगती हैं अकल तो भगवान ने दी ही नहीं..

“ये होठों ही होठों में क्या बड़बड़ा रहे हो?”

” क्यों बताऊं? तुम कोई मेरी अम्मा हो, जो मैं जो भी बड़बड़ा रहा हूँ या जो भी सोचूँ,उस हर बात का तुम्हें हिसाब दूँ..?

हम अभी उससे उलझे हुए थे कि तभी बगीचे का गेट खोलकर मम्मी अंदर चली आई…

” अरे बेटा तुम आ गए?  विक्रम ही हो ना?”

” जी आंटी! बिक्रम हूं! प्रणाम,  वैसे तो मैं शाम तक पहुंचने वाला था, लेकिन मेरी ट्रेन छूट गई और मुझे बस लेनी पड़ी….  बस ने मुझे 3 घंटे पहले ही पहुंचा दिया। मुझे लगा था मैं आपको सरप्राइज दूंगा लेकिन यहां पहुंचकर मुझे ही बहुत बड़ा सरप्राइज मिल गया..”

   मम्मी तो उस विक्रमादित्य को देखकर ही इतनी खुश हो गई थी कि उन्होंने हमारी तरफ देखा ही नहीं। हम दरवाजे पर एक और खड़े रह गए और उन्होंने हाथ से हमें हटाकर विक्रम को घर के अंदर ले लिया…
   और अंदर जाते जाते  उस विक्रम ने हमें ऐसी नजर से घूर कर देखा जैसे कह रहा हो… ‘देख लिया दे दी ना पटखनी…
   … खैर हमें भी उस से क्या लेना देना था? हम अपना दुपट्टा संभालते प्रतिमा के घर के लिए निकलने लगे कि मम्मी ने टोक दिया…

” धानी तू कहां चल दी? अंदर आ बेटा, चाय तो बना ले।”

   बस यही हमारे लिए सबसे बड़ा जहर होता है…’ चाय तो बना ले बेटा ‘ यह जो मम्मी हर एक मेहमान के आने पर हमसे चाय बनवाती है ना, कसम से उस वक्त दिल करता है कि चाय की पतिली में ही मेहमान का सिर डूबा दें।
      हमें चाय बनाना कभी पसंद नहीं था, और ना ही पीना पसंद था, लेकिन मां को चाय बहुत पसंद थी। और वह भी तब ज्यादा पसंद आती थी जब उन्हें खुद ना बनाना पड़े और कोई बनाकर उनके हाथ में कप पकड़ा दे…और बस इसीलिए जब तब हमसे चाय उबलवाती रहती थी। कभी सिर दर्द का बहाना करके कभी हमें बहुत काम हो गया इसलिए हम थक गए हैं तो चाय बना दे बिटिया कहकर या फिर कभी मेहमानों के सामने ।
      मां भी अच्छे से जानते थे कि उनकी धानी उनके सामने कितना भी रूआब झाड़ ले, लेकिन मेहमानों के सामने तो शांत ही रह जाती है…

    हम बिल्कुल ही बिना मन के चाय बनाने रसोई में घुस गए और तभी उसकी आवाज कानों में पड़ी…

“आंटी चाय रहने दीजिए..”

  उसका बस यह वाक्य सुना और हम खुशी से कूदकर वापस बाहर की तरफ मुड़ने लगे कि तभी माँ फिर शुरू हो गई…

” अरे ऐसे कैसे? पहली बार घर आए हो चाय बिना पिए तो हम जाने नहीं देंगे…

” आंटी बेशक, मैं पहली बार आपके घर आया हूं, लेकिन रहना तो मुझे यही है ना तो पीता रहूंगा। वैसे भी मुझे चाय बहुत पसंद है…

हो गया कबाड़ा!! मम्मी को मिल गया उन्हीं के जैसा दोस्त प्यारा…

   अब ये दोनों बैठ कर जब तब चाय के प्याले टकराते रहेंगे और चियर्स कर चाय को पीते रहेंगे। हम समझ गए थे कि धानी तेरा कुछ नहीं हो सकता…
  
        प्रतिमा के भैया किसी नई फिल्म का सीडी लेकर आए थे और वही देखने हम प्रतिमा के घर जा रहे थे लेकिन समझ में आ गया था कि, अब जब तक हम चाय बनाकर इन दोनों  के मुंह में घुसा नहीं देंगे, हमें चैन से रितिक रोशन की फिल्म देखने नहीं मिलेगी..
   और कहीं गलती से हम बिना चाय बनाये चले गए तो इन दोनों की भटकती हुई आत्मा आकर वही हमारा गला दबा देगी..
    बुझे मन और भारी कदमों से हम रसोई की तरह वापस मुड़ गये और वह हमारी मां को अपनी बातों में उलझाने में लग गया…
    हमारी चाय लेकर आते तक में उसने मां को जाने क्या घुट्टी पिलाई थी कि हमारी मां अपनी हथेली पर अपना मुखड़ा टिकाए सामने बैठे उस लड़के को सम्मोहित नजरों से देख रही थी। यूं लग रहा था जैसे उन्हें उस लड़के की हर बात अनोखी लग रही है। कारण हमें समझ में आ रहा था लड़का सुम्मी मौसी का रिश्तेदार जो था। हमें लगता है कभी-कभी पापा की बातें भी सही होती हैं । पापा हमेशा कहते हैं मां अपने मायके वालों को देखते ही सब कुछ भूल जाती हैं, वही हुआ था। आखिर यह लड़का सुम्मी मौसी की किसी रिश्तेदार का बेटा जो था…
   हमने ट्रे ले जाकर उन दोनों के सामने रखी टेबल पर पटक दी और वापस मुड़ने को थे कि उसने हमें टोक दिया…

” थैंक यू! और वैसे अब तो आप मुझे पहचान ही गई होंगी… आपकी सुम्मी मौसी मेरी मामी है…

  हमने हां में सिर हिलाया और एक गंदी सी मुस्कान देते हुए उसके सामने हाथ जोड़ दिया…

” अरे नहीं मैं इतना बुजुर्ग नहीं हूं कि आप मुझे नमस्ते करें…

  वह जानबूझकर मां के सामने हमें इस तरह छेड़ रहा था और हमें उसकी ये फालतू गिरी बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी। हमने घूर कर उसे देखा और पैर पटकते हुए प्रतिमा के घर चले गए…

” यह लड़की बस घोड़े पर सवार रहती है। घर पर पैर नहीं टिकते इसके। ठीक बगल वाले घर में इसकी दोस्त रहती है, प्रतिमा! सारा दिन उसी के घर पड़ी रहती हैं, आप जानते तो हैं इस उम्र के बच्चों का यही हाल रहता है। अपनी उम्र वालों के साथ ही इन्हें अच्छा लगता है।
   वैसे बेटा तुम्हारा कमरा ऊपर है सामने से ही सीढ़ियां हैं सामने अच्छा खासा बरामदा है , और उससे लगे दो कमरे हैं । दोनों कमरों के पीछे छोटा सा रसोई घर पर बना हुआ है। किसी चीज की दिक्कत नहीं होगी। पुराने पलंग और कुर्सियां सोफे वगैरह थे वह सब ऊपर जमा दिया है, तुम्हें कोई फर्निचर लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी…

” जी मैं लेकर भी नहीं आया हूं आंटी।  बैचलर लड़के को फर्नीचर की क्या जरूरत है? मैं तो चटाई बिछाकर जमीन पर भी सो सकता हूं। पूरा दिन तो काम में निकल जाएगा बस रात को आकर सोना ही तो है..”

” खाने पीने का क्या करोगे?”

” आंटी आपकी शहर का खाना पीना  तो फेमस है।  वैसे सुबह का खाना तो हमारा वही ऑफिस साइट पर हो जाएगा, रात को कभी बाहर से कुछ ले आएंगे कभी मन हुआ तो कुछ बना भी लेंगे..
  आज शाम को ही मार्केट जाकर कुछ जरूरी रसोई का सामान खरीद लूंगा..!

” ठीक है बेटा कुछ भी जरूरत लगे तो हम से कह देना जैसे सुम्मी है तुम्हारे लिए ,वैसे ही हम भी हैं।

”  जी आंटी जरूर….वो मैं जरा ऊपर रूम देख लूँ।”

” हां क्यों नहीं?  यह रही चाबियां, और सामने के बाहर वाले दरवाजे  से लगी हुई सीढ़ियां हैं जो ऊपर ही जाती है…!

क्रमशः

aparna

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