
जीवनसाथी बोनस पार्ट
कली से फ़ोन पर बात तो हुई थी लेकिन अब वासुकी ने तय कर लिया था कि किसी भी हाल में उसे इण्डिया जाना हो होगा..
अपनी फूल सी बच्ची को वो ऐसे नहीं छोड़ सकता..
वैसे तो बचपन से आज तक कली की मासूमियत कभी घटी नहीं थी, लेकिन आज पता नहीं क्यों रह रह कर वासुकी के दिल में आ रहा था की कली सुरक्षित तो है ना.. ?
अब भी लंदन का मौसम सही नहीं हुआ था… आसमान में सूरज नदारद था और रास्तों पर नज़ारे नदारद थे..
चारों तरफ कोहरे की घनी चादर थी..
किसी भी वक्त घनी बारिश की संभावना थी। दो दिन से जो ऑरेंज अलर्ट था, वह रात होते-होते रेड अलर्ट में बदल चुका था। शहर में अलग-अलग चौक चौबारों पर पुलिस तैनात थी। जिससे यातायात में रास्ता नजर ना आने के कारण से होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव किया जा सके।
गाड़ियों को 20 के ऊपर की स्पीड में भगाने की मनाही की जा रही थी। पुलिस पेट्रोलिंग गाड़ियां इधर से उधर घूम कर लोगों को घर पर ही रहने की गुजारिश कर रही थी। लेकिन वासुकी तब भी लंदन से निकलने के लिए तैयार था।
उसे फ्लाइट मिलने की कोई संभावना नहीं थी। और इसलिए उसने और दर्श ने अपनी गाड़ी से नीदरलैंड्स तक जाने का तय किया था..।
वही से उन्हेँ इण्डिया की फ्लाइट लेनी थी..।
लंदन से उन्हेँ पहले बेल्जियम पहुंचना था, उसमें भी समस्या यह थी कि लंदन से अपनी कार से वह लोग सिर्फ भूमि सीमा तक ही जा सकते थे। उसके बाद महासागर शुरू हो जाता था। जिसके लिए उन्हें फेरी लेनी थी। मौसम इतना खराब हो चुका था की फेरी मिलेगी या नहीं इसकी भी संभावना कम थी…।
दर्श ने वासुकी की तरफ देखा..
“अब भी सोच लो अनिर ! कहीं रास्ते में फंस गए तो लेने के देने पड़ जायेंगे !”
” अब किसी हाल में मैं घर पर नहीं रह सकता हूं। कली से अगर बात हो गई रहती तो, अलग बात थी लेकिन…
” कली से तुम्हारी हर रोज बात हो रही है। सिर्फ एक दिन बात नहीं हुई और तुम इस कदर छटपटा गये।
अब हमारी बच्ची बड़ी हो गई है। अपनी जिम्मेदारी खुद संभाल सकती है। समझने की कोशिश करो आखिर तुम्हारी ही बेटी है वह..।”
” मेरे साथ साथ नेहा की भी बेटी है वह, यह मत भूलना…।
अपनी जिद, अपनी हड़बड़ी, अपने जुनून और अपने पागलपन में ही उसने अपनी जान गंवा दी थी।
मैं कली के साथ कोई रिस्क नहीं ले सकता। उसने बाहर की दुनिया देखी ही नहीं है। पता नहीं मैं क्यों उसकी बातों में आ गया, और उसे इंडिया भेज दिया। वह किसी प्रोजेक्ट में है, क्या कर रही है, मुझे खुद उसके साथ जाना चाहिए था। मैंने क्यों सरू को क्योंकर भेज दिया..।
दर्श अगर मैं यहां से नहीं निकला तो मैं कली के बारे में सोच सोच कर पागल हो जाऊंगा.. !”
“ठीक है.. फिर चलते हैं.. लेकिन पुलिस पेट्रोलिंग से क्या कहोगे ?”
“देख लेंगे !”
“ठीक है !”
दर्श ने गाड़ी निकाली और दोनों लोग निकल गए…
दोनों ही खामोश थे। चुपचाप दर्श गाड़ी चलाता जा रहा था, और वासुकी बाजू में बैठा, उस मौसम को देखते हुए कुछ पुरानी यादों में खोने लगा था…
उसे अपना इंडिया में नेहा के साथ गुजरा वक्त याद आने लगा।
वह ऐसी ही शाम थी जब वासुकी अपने किसी काम से कुछ क्लाइंट से मिलने होटल में आया हुआ था। वह और दर्श साथ बैठे थे। उनके साथ बैठे लोग आपस में जाम टकराते हुए वासुकी और दर्श थे बातें कर रहे थे कि उसी वक्त वासुकी को ढूंढती हुई नेहा वहां पहुंच गई।
नेहा ने दूर से वासुकी को देखा और इशारे से अपने पास बुलाने लगी। अपने सामने बैठे लोगों का लिहाज करते हुए वासुकी नेहा के इशारों का जवाब नहीं दे रहा था। लेकिन नेहा भी मानने वालों में से तो थी नहीं। वह वही दूर खड़े हुए वासुकी की तरफ फ्लाइंग किस उछालने लगी।
वो उससे नज़रें चुराकर इधर-उधर देखने लगा। लेकिन वासुकी के ऐसा करने से नेहा को कोई खास फर्क नहीं पड़ना था, उसकी हरकतें अब भी वैसी ही थी..।
दर्श ने सामने बैठे लोगों की नजर बचाते हुए वासुकी के कान में धीरे से कह दिया, ‘चले क्यों नहीं जाते, जब वह बुला रही है।’ वासुकी ने दर्श की तरफ देखा और नेहा की तरफ देखकर वापस दूसरी तरफ देखने लगा कि तभी सामने बैठे लोगों में से कोठारी ने वासुकी को टोक दिया।
“क्या हुआ वासुकी, कुछ परेशान से लग रहे हो?”
” नहीं कोठारी साहब, ऐसी कोई बात नहीं।”
” अगर इस वक्त मीटिंग नहीं करना चाहते हो, तो कोई बात नहीं। बाद में कर लेंगे।”
” नहीं मैंने कहा ना, ऐसी कोई बात नहीं है।”
” आर यू श्योर?”
“जी।”
कोठारी और वासुकी की बातों के बीच दर्श ने नेहा की तरफ देखा और नेहा दर्श से हाथ जोड़कर वासुकी को अपने पास भेजने का इशारा करने लगी।
उसके इशारे देख दर्श को हंसी आ गई और उसे हंसते देखा कोठारी पीछे मुड़ गया। लेकिन कोठारी के पीछे मुड़ने तक में नेहा नीचे झुक गई और उसकी नजर में नहीं आ पाई…
वासुकी ने कोठारी को मुङते और नेहा को नीचे झुकते देख लिया। बहुत रोकने पर भी हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर भी आ ही गई।
‘ पूरी पागल है ये लड़की।’ वासुकी धीरे से अपनी जगह पर खड़ा हो गया।
” कोठारी साहब जरा तबीयत सही नहीं लग रही, मैं कल आप लोगों से मिलता हूं।”
” बिल्कुल तुम्हारा इंतजार रहेगा।”
कोठारी ने वासुकी को देखते हुए कहा और वासुकी उन लोगों से विदा लेकर वहां से निकल गया।
दर्श को उसने मीटिंग पूरी करने के लिए वही छोड़ दिया। दर्श ने मुस्कुरा कर वासुकी के कंधे थपथपाए और वापस कोठारी एंड टीम के साथ मीटिंग में बैठ गया।
वासुकी लंबे-लंबे डग भरता हुआ नेहा के बगल से होते हुए रेस्टोरेंट से बाहर निकल गया, और उसके बगल से निकलते ही नेहा खुशी से इठलाती झूमती वासुकी के पीछे-पीछे निकल गई।
रेस्टोरेंट के दरवाजे से वासुकी बाहर निकला ही था कि पीछे से आकर नेहा उसके कंधे से अपनी बाहें अड़ा कर झूल गई। वासुकी ने उसके दोनों हाथ पकड़ कर अपने सामने ला खड़ा किया।
“यह क्या बदतमीजी कर रही थी।”
” बदतमीजी नहीं प्यार था यह।”
” पागल हो गई हो क्या? अगर वह लोग देख लेते तो क्या होता जानती हो?”
” क्या होता बता दीजिए। उन्हें भी पता चल जाता कि उनके सामने चट्टान की तरह खड़े रहने वाले मिस्टर अनिरुद्ध वासुकी के दिल में भी मोम पिघलता है.. ।”
“यह सारे लोग, जिन्हें देख रही थी ना, वह सिर्फ बिजनेस के साथी हैं। इनका कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। कब अपने बिजनेस के फायदे के लिए यह मुझसे जुड़े लोगों को नुकसान पहुंचा बैठे। मैं इन लोगो पर बिल्कुल भरोसा नहीं करता।”
” अच्छा जी तो इसका मतलब आपको हमारी चिंता हो रही थी।”
नेहा की इस बात का वासुकी कोई जवाब नहीं दे पाया…
नेहा मुस्कुरा कर उसकी गाड़ी की अगली सीट पर बैठने की जगह ड्राइविंग सीट पर बैठ गयी।
” यह क्या कर रही हो? उस तरफ जाकर बैठो।”
” नहीं आज आप उस तरफ बैठेंगे, हम आपको कहीं ले जाना चाहते हैं..!”
“कहाँ ?”
“सरप्राइज है !”
“बताओ भी.. कहाँ जाना है !”
नेहा ने वासुकी का चेहरा दूसरी तरफ फेरा और अपने पर्स से एक रेशमी रूमाल निकाल कर उसकी आंखों पर बांध दिया।
” यह क्या कर रही हो यार। मुझे यह सब नौटंकी बिल्कुल पसंद नहीं।”
” लेकिन हमें पसंद है, और इसलिए हम करेंगे भी, आप चुपचाप बैठे रहिए बस..।”
वासुकी बेशक जिद्दी अकडू और गुस्से वाला था, लेकिन नेहा की प्यार भरी मनुहार के सामने पता नहीं क्यों उसकी बोलती बंद हो जाती थी। और वह चुपचाप वह सब कुछ करता चला जाता था जो नेहा उससे करवाना चाहती थी। उसकी आंखों पर पट्टी बांधने के बाद नेहा ने गाड़ी स्टार्ट की और एक तरफ को निकाल ली.. ।
नेहा ने गाड़ी चलाते हुए गुनगुनाना भी जारी रखा…
हो बक्शा गुनाहों को, सुन के दुवाओं को
रब्बा प्यार है तूने सब को ही दे दिया।
मेरी भी आहों को सुन ले दुवाओं को
मुझको वो दिला मैंने जिसको है दिल दिया,
आसमान पे आसमान उसके दे इतना बता
वो जो मुझे देख के हँसे, पाना चाहूं रात दिन जिसे,
रब्बा मेरे नाम कर उसे, तेनू दिल दा वास्ता …..
अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा,
फूल सा है खिला आज दिन
रब्बा मेरे दिन ये ना ढले, वो जो मुझे खवाब में मिले
उसे तू लगा दे अब गले, तेनू दिल दा वास्ता…..
वासुकी ने सीट पर पीछे सर टिका लिया था, उसे और कुछ भाये न भाये नेहा का गुनगुनाना बहुत भाता था..।
वो गीत सुनने में मशगूल था कि गाड़ी अचानक रुक गयी..
वो चौंक कर इधर उधर देख रहा था कि नेहा ने उसकी तरफ का दरवाज़ा खोल कर उसे हाथ का सहारा देकर बाहर निकाल लिया..
वो उसे साथ लिए धीरे धीरे एक तरफ बढ़ने लगी..
“कहाँ ले आयी हो यार.. बताओ भी..?”
“ज़रा सब्र कर लीजिये वासुकी साहब.. रुकिए ज़रा !”
कुछ दूर चलने के बाद नेहा ने वासुकी की आँखों से पट्टी उतार दी..
वासुकी आंखे मलता सामने खड़े ढाबे को देखता रहा..
उसने पहचानने की कोशिश में आंखे छोटी कर ऊपर लगा बोर्ड पढ़ने की कोशिश की..
“जायसवाल कचौड़ी वाले “
वो आश्चर्य से आंखे फाडे नेहा की तरफ देखने लगा..
क्या थी ये लड़की.. पूरी अजूबा !!
उसने कुछ दिन पहले जब नेहा दर्श और वो एक रेस्टोरेंट में खाना खा रहे थे, तब किसी बात पर दर्श को बताया था कि इसी शहर में एक छोटी सी टपरी थी “जायसवाल कचौड़ी वाले ” जहाँ उसके पिता उसे कभी कभी लाया करते थे..
वो बचपन का स्वाद वो आज तक नहीं भुला है…. पिता के जाने के बाद इसने कभी फिर वैसी कचौड़ियां नहीं खायी… अब तो पता नहीं वो जायसवाल भी होगा या नहीं..
ये बताते समय वासुकी का ध्यान इस बात पर नहीं गया कि नेहा बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रही थी..
उसे क्या मालूम था कि नेहा उस कचौड़ी वाले का पता ठिकाना ढूंढ़ निकालेगी और उसे वहाँ तक खींच कर ले भी आएगी..
लाख रोकने पर भी वासुकी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी..
उसने मुश्किल से ही सही सख्ती से अपने होंठ भींच लिए, और खुद को मुस्कुराने से रोक लिया..
“ये गलत बात है वासुकी साहब ! अगर खुश हैं तो ख़ुशी ज़ाहिर कीजिये… अपनी ख़ुशी को अंदर दबा लेना सही नहीं है.. ! अच्छा रुकिए पहले कुछ खा लीजिये !”
नेहा ने वेटर को बुला कर ऑर्डर दिया और अपनी बड़ी बड़ी आंखे वासुकी पर टिका दी..
“ऐसे घूरती रहोगी तो खा कैसे पाउँगा ?”
हँस कर नेहा ने एक टुकड़ा तोडा और वासुकी के मुहं में रख दिया….
उसके स्वाद को महसूस करता वासुकी हलके से मुस्कुरा उठा..
उसने आंखे खोली और उसके सामने बैठी नेहा ने एक बड़ा सा टुकड़ा उसके मुहं में रख दिया और उसे ना खाने का इशारा कर उसके चेहरे के एकदम करीब आ गयी..
“अब हम इसी टुकड़े में से अपनी बाईट लेंगे !”
वासुकी की आँखे चौड़ी हो गयी और उसने ना में गर्दन हिलानी शुरू कर दी.. और उसके इशारे का मखौल उड़ाती नेहा मुस्कुराती हुई उसकी तरफ बढ़ने लगी..
ना ना करते हुए वासुकी ने ऑंखें खोल दी..
उसने अपने बाजु में देखा, दर्श गाड़ी चला रहा था.. और नेहा कहीं नहीं थी…
गाड़ी में अब भी वही पुराना गाना चल रहा था..
हा माँगा जो मेरा है जाता क्या तेरा है,
मैंने कौन सी तुझसे जन्नत माँग ली,
कैसा खुदा है तू बस नाम का है तू
रब्बा जो तेरी इतनी सी भी ना चली,
चाहिए जो मुझे कर दे तू मुझको अता
जीती रही सल्तनत तेरी, जीती रहे आशिक़ी मेरी
दे दे मुझे ज़िंदगी मेरी, तेनू दिल दा वास्ता
रब्बा मेरे दिन ये ना ढले, वो जो मुझे खवाब में मिले,
उसे तू लगा दे अब गले, तेनू दिल दा वास्ता…
आज दिन चढ़या… तेरे रंग वरगा …
क्रमशः
aparna…

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बारिश तूफ़ान अब वासुकी का रास्ता नहीं रोक सकता क्यूंकि उसे अपनी बेटी की फिक्र हो रही है, वह इतनी दूर क्यूं चली गई है उससे यह बात वाह समझ नहीं पा रहा है बस अपनी बीवी के जाने से वह बदल गया है और उसे याद कर रहा है, नेहा भी प्यारी टाइप है, और दोनों के साथ जो हुआ उसका असर दिमाग़ और दिल पर है, मैं वासुकी के साथ हूं बेटी के लिए इतना तो बनता है और कहानी में मज़ा आयेगा , वाह बेहतरीन भाग दीदी…💐🙏
Ab toh Vasuki ko Neha se Mila dijiye🥺
आप जो लिखती हैं वो दिल से लिखती हैं और हमारे दिल तक लिखती हैं 💜💜💜💜
Very nice part ♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️👍👍👍👍👍👍👍👍👍👃👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍
अगले भाग का इंतज़ार है 😌❤
Dard mai bhi ye lab muskra jaatey hain ..beetey lamhe hamey jab bhi yaad aatey hain..ye songs ki chand line vasuki ke liye..
Bahut khubsurat part tha.neha ka sath bhale hi kuch hi dino ka tha par vasuki ne liye jivanbhar ka pyar pa liya usse.neha ne use kali aisi pyari beti dekar sarthak kar diya uska jivan.
आज कितने दिन बाद वासुकी और नेहा का प्यार भरा लम्हा फिर से देखने को मिल गया दिल को बहुत खुशी भी हुई और आंखें भी भर आए कि जो इंसान दुनिया में आग लगाने की कुब्बत रखता है वह अपनी पत्नी और बेटी के लिए कितना तड़पता है।😞😞😞😞😞😞
नेहा थी ही ऐसी की खुद से नाराज नहीं रह सकता था सख्त दिल बसुकी भी नहीं 😍😍😍😍😍😍😍😍
प्यारे भाग के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहिबा
💕💕