तू बन जा गली बनारस की-1
तू बन जा गली बनारस की
मैं शाम तलक भटकू तुझमें
तेरी बातें चटपट चाट सी हैं
तेरी आँखें गंगा घाट सीहै
मैं घाट किनारे सो जाऊं..
फिर सुबह सुबह जागूं तुझमें…..

जाने क्यों रोज सुबह इस गाने को सुनने की आदत सी पड़ गई है। और यह आदत आज की नहीं कॉलेज के जमाने की है। अब तो कॉलेज पूरा किए भी हमे लगभग चार साल बीत गए। इन चार सालों में कितना कुछ बदला होगा हमारे साथ वालों के जीवन में लेकिन हमारे जीवन में कुछ भी नहीं बदला..
कॉलेज के समय पर भी उसके चेहरे को याद करके ही सोया करते थे,और उसकी मुस्कान याद करके ही जागा करते थे, आज भी हमारा हाल वही है।
शहर बदल गया, गलियां बदल गई, घर बदल गया बस जो नहीं बदली वो उसकी यादें हैं, जो हमारे जेहन में आज भी उसी ताजे गुलाब की तरह महकती हैं जो स्कूल के समय ट्वेल्थ क्लास में हमने उसे देने की हिम्मत बड़ी मुश्किल से जुटाई थी ।
हालांकि डाली से उस गुलाब को तोड़ते वक्त भी हम जानते थे कि हम यह गुलाब उस तक नहीं पहुंचा पाएंगे ।
हमारा वो कमीना दोस्त राहिल हमारी बात सुनता और मानता तब तो कोई बात ही नहीं थी, पर उसने तो जैसे हमारी कोई भी बात ना मानने की कसम खा रखी थी। उसी की लगाई बुझाई थी, जो उस दिन गुलाब तोड़ कर शर्माते हुए हम स्कूल पहुंच गए थे। लेकिन उसे गुलाब देने से पहले ही क्लास टीचर ने हमारे हाथ में क्लास की यूनिट टेस्ट की कॉपियां थमा दी और हमे स्टाफ रूम में उन कापियों को रखने भेज दिया था।
उन कापियों के बीच वह गुलाब जाने कहां दब कर क्लास रूम की मिट्टी में ही स्वाहा हो गया था।
आज याद करते हैं तो कैसी मुस्कान खिल जाती है लेकिन उस दिन डर के मारे बुरा हाल था कि कहीं वह गुलाब किसी टीचर के हाथ लग गया तो हमारी तो चिता मणिकर्णिका में जल के रहेगी लेकिन कहीं उस बेचारी का नाम भी खराब ना हो जाए।
हालांकि हम कितने भी डरपोक लड़के रहे हों , उसके नाम पर कभी आंच नहीं आने देते, ये बात पक्की थी ।उसका नाम आते ही कुछ अलग सा एहसास महसूस होने लगता था…
शायद उम्र भी कच्ची थी और कुछ फ़िल्मों का असर था कि उसे देखते ही एक मीठी सी गुदगुदी एक तीखी सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती थी ….
… वो जब और जहां नजर आ जाती हमें फिर हमारा ही होश कहां रह जाता?
पता नहीं वो अब कहां होगी? बस भगवान से यही दुआ है कि वह जहां भी हो खुश हो।
खैर खुश तो होगी क्योंकि भगवान ने उसे वाकई बहुत फुर्सत से बनाया था, और जिसे भगवान इतनी फुर्सत से सजाता है उसकी किस्मत भी उतनी ही सुंदर कलम से सँवारता है।
हमारे जैसा हाल थोड़ी होता है ऐसे लोगों का….
अगर इसी तरह हम अपनी सोच में गुम रहे तो बाकी दिनों की तरह आज भी लेट हो जाएंगे…..
हमारे लिए तो यह नया शहर नई नौकरी सब कुछ नया है और आज ही हमे अपने नए फ्लैट में भी शिफ्ट होना है…
चल बेटा साजन खंडेलवाल काम पर लग जा।
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अपनी धुन में मगन साजन रसोई में चला गया आज उसका इस कमरे में आखिरी दिन था। अभी उसे इस शहर यानी कनपुर आए दस दिन ही हुए थे। अपने शहर में ही स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने वकालत की पढ़ाई भी अपने शहर बनारस से ही पूरी की थी..
अपनी जगह से अपने शहर से इतनी दूर मैक्स लॉ फर्म में उसे नौकरी मिल गई थी और इसीलिए उसे अपना घर छोड़कर यहां आना पड़ा था।
मारवाड़ी लड़का था। घर का उनका अपना जमा जमाया कारोबार था, लेकिन उसने पुश्तैनी व्यापार को संभालने की जगह वकील बनना चुना था। पता नहीं क्यों लेकिन बचपन से उसके दिमाग में वकील बनने का ही कीड़ा कुलबुला रहा था और उसने घर परिवार की खिलाफत कर के अपने सपने को पूरा किया था।
रसोई में जाकर उसने फटाफट अपनी चाय का कप धो पोंछ कर आखरी खुले कार्टन में डाला और उस काटर्न को भी पैक कर दिया। और बाहर आकर अपने उस कमरे को मुहब्बत से देखने लगा। सिर्फ दस दिन ही हुए थे उसे यहां रहते लेकिन फिर भी एक लगाव सा जुड़ गया था ।
कारण भी वाजिब था, अपने 27 साल के जीवन में वह पहली बार अपना भरा पूरा घर छोड़कर अपने आप को साबित करने के लिए बाहर निकला था।
जिस दिन लॉ फर्म ज्वाइन करने गया था, उस दिन वहां काम करने वाले अकाउंट्स सेक्शन के हेड सिन्हा जी ने उसे इस कमरे का अता पता बताया था और वह अपना एक इकलौता बैग टांगे यहां चला आया था। लेकिन दस ही दिन रहने के बाद ही उसे समझ में आ गया कि इस चाल जैसी जगह में वो नहीं रह पाएगा और फिर साथ काम करने वाले एक लड़के से उसे चाणक्यपुरी सोसाइटी के बारे में पता चला था।
चाणक्यपुरी उस शहर की महंगी सोसाइटी में से एक थी, एक से बढ़कर एक लैविश और पॉश घरों का अनूठा संग्रह थी वह सोसाइटी। इसमें उसे भी एक रिटायर्ड कर्नल का फ्लैट किराए पर मिल गया था। फ्लैट बहुत ज्यादा महंगा भी नहीं था और बहुत सस्ता भी नहीं, और इसीलिए बिना समय गंवाये उसने दो ही दिन में अपनी सारी पैकिंग पूरी कर ली थी…
आज लॉ फर्म से आने के बाद शाम को उसे अपने नये फ्लैट में शिफ्ट करना था। पेमेंट वगैरह वह ऑनलाइन ही कर चुका था कर्नल साहब अपने इकलौते बेटे के पास अमेरिका में ही रह रहे थे।
साल में कभी एकाध बार घर की देखभाल के लिए ही उनका आना हुआ करता था और इसीलिए अब वह घर को किराए पर दे देना चाहते थे। साजन के आ जाने से उनकी यह चिंता दूर हो गई थी।
उनके फ्लैट की चाबी उनके पड़ोस वाले घर में मिल जाएगी ऐसा उन्होंने साजन को बता दिया था।
एक बार फिर उस कमरे को ममता भरी नजर से देखने के बाद साजन ने अपना सामान उठाया और घर के दरवाजे को ताला मार कर घर से निकल गया।
ऑफिस में उसका सारा दिन बनारस की किसी चौधरी कंस्ट्रक्शन कंपनी के लीगल पेपर तैयार करने में ही निकल गया था……
आज दोपहर में खाना खाने की भी फुर्सत नहीं मिली थी उसे.. वैसे खाने पीने में उसका उतना मन भी नहीं लगता था। वह तो कई बार सिर्फ एक कप चाय के सहारे पूरा पूरा दिन काट लेता था। क्योंकि दिमाग में वह जो चलती रहती थी।
दोपहर का खाना मिस करने का कारण सिर्फ और सिर्फ इतना था कि वह कैंटीन में बैठकर खाते हुए वापस उसके ख्यालों में खो जाया करता था। और इसीलिए वह आधा घंटा उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण होता था ।
पूरे दिन भर में जब जब वह उसे याद करता, उसके बाद उसके काम करने की लगन सोचने समझने की शक्ति सब कुछ कितनी बढ़ जाती थी….
शाम को फ्लैट के लिए निकलने से पहले वो अपनी टेबल से उठ रहा था कि उसका दोस्त अनुराग अपना बैग कांधे पर टंगाये उस तक चला आया…
” चले भाई साजन कैंटीन में एक एक कप चाय हो जाए।”
“नहीं यार फ्लैट के लिए फिर लेट ना हो जाएं हम? चाबी भी किसी और के घर पर है, देर से किसी के घर पहुंच कर उन्हें डिस्टर्ब करना सही नहीं होगा।”
” अबे मुश्किल से 10 मिनट लगेगा यार चाय पीने में। वैसे भी फ्लैट में जाते साथ तुम्हें कौन सा चाय कॉफी कुछ भी मिलना है?
खाना तो आज बाहर से ही ऑर्डर करियेगा बाबु! तो चलिए चाय ही पी लिया जाए, आज कैंटीन में मटर कचौडी बना है, बढ़िया है मस्त।”
हम जानते हैं इससे इतनी आसानी से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता । अब जब तक यह साथ ले जाकर चाय नहीं पिला लेगा हमे नहीं छोड़ेगा। इसलिए इसके साथ जाना ही बेहतर है हालांकि दिमाग में यह भी चल रहा है कि चाणक्यपुरी यहां से काफी दूर है, और दूसरा वहां ज्यादातर रिटायर्ड कपल्स ही घर बनाकर रहते हैं। पता नहीं पड़ोस में कौन सी खड़ूस आंटी जी होंगी जो फ्लैट की चाबी रखे होंगी। कहीं यह ना हो कि हम 8 बजे तक पहुंच पाएं और अंकल आंटी डिनर करके सोने चले गये हों …खैर इससे इस सब को कहने का कोई मतलब नहीं है.. चाय के साथ कुछ खा भी लेना ठीक ही हैं क्योंकि फ्लैट में पहुंचने के बाद आज तो कुछ बनाने या मंगाने की भी हिम्मत नहीं बचेगी हम में..
हम और अनुराग कैंटीन की तरफ बढ़ गये । हम जानते थे दस मिनट बोलने वाला अनुराग अपनी बातों में फंसा कर आराम से हमारा आधा घंटा तो खा ही जाएगा… हुआ भी वही ऑफिस से निकलते निकलते ही हमें 7:30 बज गए।
चाणक्यपुरी लिए हमने टैक्सी बुक कर ली। गाड़ी अभी घर से लेकर जो नहीं आये हैं । पापा ने पहले ही कहा था इतने बड़े शहर में रहने जा रहे हो पहले बाकी सब व्यवस्था देख लो उसके बाद गाड़ी ले जाना, हमे भी वही सही लगा कि पहले खुद के रहने का तो ठिकाना हो जाए उसके बाद गाड़ी की व्यवस्था कर लेंगे…
वह तो हमने ज्यादा कहा नहीं वरना अनुराग का पूरा मन था कि वह भी हमारे साथ हमारे नए फ्लैट में चला आये।
पता नहीं वह इतना बातें कैसे कर लेता है? हमे तो जहां मौका मिलता है,हम अकेले बैठे उसकी यादों में खो जाते हैं ।शायद इसीलिए हम भीड़भाड़ से बचते हैं , क्योंकि हम से लोगों की तरह ज्यादा बोलते नहीं बनता। अनुराग तो लगातार घंटे भर भी बोल सकता है और अक्सर इस बात को नहीं पकड़ पाता कि उसके सामने बैठ कर भी हम अपने दिमाग में किसी और के साथ होते हैं …..वो हर वक्त हमारे जहन में मुस्कुराती रहती है और हम अनुराग की बकवास सुन कर मुस्कुराते रहते हैं ।
अभी भी तो हम उसके बारे में सोचते हुए ही अपनी सोसाइटी में दाखिल हो रहे है……
वाकई चाणक्यपुरी बहुत शानदार है । गूगल पर जितना सर्च किया था और जितनी तस्वीरें देखी थी उससे कहीं बेहतर है यह…
यहां रहने का मजा ही अलग होगा…
कैब से उतर कर बगीचे में चलते हुए अपने अपार्टमेंट की तरफ जाना बहुत सुकून दे रहा है हमे।
बगीचे में छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे हैं, उनकी मम्मी लोग आपस में बैठे गपशप कर रही हैं जाहिर है यह लोग खाना बना कर अपना काम निपटा कर बच्चों को लेकर नीचे इसी तरह चली आती होंगी और जैसे ही इनके पतियों का घर आने का वक्त होगा बच्चों को साथ लेकर चली जाएंगी …
सोसाइटी बहुत गुलजार है, बच्चों से भी और बुजुर्गों से भी ।
एक दूसरे गार्डन में कई सारे बुजुर्ग लाफ्टर क्लब चला रहे है …चलो यह भी बढ़िया है, सुबह शाम इनके हंसी ठहाको के बीच हमारा भी दिन आराम से कट जाएगा ।
एक दिन काटने की ही तो हमे कभी कोई समस्या नहीं रही। बल्कि हमे तो चौबीस घंटे भी कम लगते हैं। ऐसा लगता है थोड़ा वक्त और मिल जाता कि हम उसके बारे में कुछ जरा और सोच पाते।
बी विंग, इसी में है हमारा फ्लैट सातवें नंबर की मंजिल पर।
अब ऑफिस से वापसी के बाद सीढ़ियां तो नहीं चली जा सकती लिफ्ट लेना ही बेहतर है।
लिफ्ट के खुलते ही ठीक सामने हमें हमारा फ्लैट नजर आ गया 701..
कर्नल साहब ने कहा था ठीक बाजू वाले घर यानी कि 702 में उनके घर की चाबियां पड़ी है तो चलो पहले तो 702 की बेल बजानी पड़ेगी..
मन में कुछ अलग सा ही उत्साह लग रहा था लिफ्ट के बाहर कॉरिडोर में एक मीठी सी खुशबू घुली हुई थी जो ज्यादातर बड़े अपार्टमेंट्स में आती है किसी फाइव स्टार होटल के लाउंज की खुशबू , रूम फ्रेशनर की खुशबू….
फ्रेंच लेविनडर की बेहतरीन खुशबु….
उस खुशबू को जोर से खींचकर हमने अपने फेफड़ों में भर लिया। उस मीठी मीठी खुशबू को महसूस करते हुए हम अब 702 के सामने खड़े थे और हमारी उंगलियां उसकी दरवाजे पर लगी घंटी पर थी….
हमने घंटी बजा दी और इधर-उधर देखने लगे दरवाजे से लगी दीवार पर एक खिड़की थी, जो उस कॉरिडोर की खिड़की थी और वह खुली हुई थी। और उस खिड़की से 702 नंबर के फ्लैट के हॉल पर खुलने वाली खिड़की नजर आ रही थी, हालांकि उस खिड़की पर भी भारी और गहरे रंग के पर्दे पड़े हुए थे इसलिए अंदर का कोई सीन नजर नहीं आ रहा था। हम समझ गये अंदर रहने वाले बुजुर्ग दंपति को धूप से परहेज होगा इसलिए शायद इतने मोटे पर्दे डाल रखे होंगे उन्होंने…..
पहली बार बेल बजाए हुए लगभग 5 मिनट बीत चुके थे, हालांकि हम इतने उतावले भी नहीं हैं…बस यही सोच रहे थे कि हो सकता है आंटी जी अंदर के किसी कमरे में हों वहां से उन्हें बाहर तक चल कर आने में वक्त लग रहा हो,
इसलिए इंतजार करते रहे, लेकिन जब इंतजार की घड़ियां कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी तो हमारी उंगलियां वापस बेल पर चली गई…..
हम घंटी बजाने जा ही रहे थे कि फ्लैट के दरवाजे पर कुछ आहट सी हुई और दरवाजा एक झटके से खुल गया….
दरवाजा खुलने के साथ ही वह हमारे सामने खड़ी थी….
हां वही तो थी । हमारी आंखें जैसे झपकना ही भूल गई थी, लगभग 6-7 सालों बाद हम उसे देख पा रहे थे ….वह हमारे सामने खड़ी थी और बिल्कुल वैसी ही नजर आ रही थी जैसे उस समय दिखा करती थी… कोई अंतर भी तो नहीं आया था उसमें।
1 इंच का भी फर्क नहीं आया था उसमें , यह हमसे बेहतर कौन जान सकता था? इतने साल जिस शिद्दत से हमने उसे देखा था उतना शायद ही किसी ने उसे देखा होगा। उसे सामने देखकर हमारी बोलती बंद थी, समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहें कि तभी उसने हमसे कहा….
” शायद आप ही हैं वह, जो बगल वाले घर में आए हैं!
” जी हां!”
हमारे मुंह से जी हां भी कैसे निकली थी यह हम ही जानते हैं , समझ नहीं आ रहा था कि उसने हमें ठीक से देखा नहीं या पहचाना ही नहीं।
पता नहीं लेकिन उसने अपना एक हाथ बढ़ाकर अंदर किसी दीवार से टंगी हुई चाबी निकाली और हमारे हाथ में थमा कर दरवाजा बंद कर दिया………
क्रमशः
aparna
