
रज्जो कहाँ खोई हुई हैं ………..अरे आज शाम तो तुम्हारी बारात आनी है,और तुम सुबह सुबह यहाँ छत पे खड़ी अपने जोगी की गज़ल सुन रही हो।”
“चुप कर मुहंजली!! वो कोई मेरा जोगी वोगी नही है,रज़िया खाला का लड़का है अली….वही सुबह शाम ये नज़्म गाता फिरता है।”
“हां भई जब आप जैसे कदरदान सुनने वाले हैं तो नज़्म क्या ,पूरी गज़ल ही गाएंगे ,पर ये साहब हैं कौन?”इन्हें पहले कभी तो संतनगर में नही देखा।”
“हाय तू कहाँ से देखेगी,जब बाजू के घर मे रहते हुए मैनें ही नही देखा कभी,पड़ोस की रजिया खाला हैं ना,उनका सबसे बड़ा लड़का है,पूरा नाम तो मैं भी नही जानती…..सब अली ही बुलातें हैं ।”
“रज़िया खाला बताती हैं,जब अली सिर्फ सात आठ साल के थे,तभी रज़िया खाला के अब्बा उन्हें अपने साथ लाहौर ले गये थे,तालीम के लिये,तब से उनका यहाँ आना जाना कम ही होता था। पहले पहल तो छुट्टियाँ लगने पर आ भी जाते थे पर इधर कुछ सालों से अपने नाना के व्यापार मे हाथ बंटाने लगे तब से आना बहुत कम हो गया,अबकी बार तो पूरे पांच बरस बाद आये हैं।”
“क्या बात है रज्जो जी ,आपको बड़ी मालूमात हैं अली साहब की ।”
“अरे क्यूँ ना हो? पड़ोसी हैं हमारे…….पर आज तक कभी ध्यान से देखा ही नही ,बस यही नज़्म गुनगुनाते सुना है उन्हें ,बहुत पहले हिन्दुस्तान में आखिरी मुगल सम्राट हुए थे ‘बहादुर शाह जफर’, सुना है बहुत उम्दा शायर भी थे,उन्ही की लिखी नज़्म है,जो अली मियाँ रात दिन गुनगुनाते हैं
‘लगता नही है जी मेरा,उजड़े दयार में ।
किसकी बनी है आलम-ए-नापायदार में ।।”
” अच्छा तो ये बात है,रज्जो जी तो कब से आप इन शायर साहब को सुन रही ,वो भी बता दीजिये।”
“अरे कब से क्या,अभी तीन चार रोज पहले ही अली साहब घर वापिस आये हैं,मैनें परसों शाम को पहली बार सुनी,अचानक बहुत पहले का कोई किस्सा याद आ गया,बस उसके बाद कल सुबह और फिर आज ही सुन रही थी कि तुम आ गई,खलल डालने ।।”
“हां हां!क्यों नही शौक से सुनो,इधर अली मियाँ की गजलें सुनों,उधर बशर साहब बारात लिये उलटे पैरों वापस ना लौट जायें ।”
“अरी गुल्लो,आज आखिरी बेला सुन लेने दे ,फिर कल से तो हम सादतगंज के हो जायेंगे,कल से ये गजलें तुम्हें मुबारक….जी भर के सुनना।’
“अरे कहाँ रज्जो,कल शाम ही बात हो रही थी ,तुम्हारी बिदाई के साथ ही हम सब भी अमृतसर कूच कर जायेंगे,हिन्दुस्तान-पाकिस्तान मे बंटवारा जो हो गया है।।”
“हां सुना तो मैनें भी था कल,पर इतनी हाय तौबा क्यूँ मचा रहे लोग,यही समझ नही आ रहा।”
“समझ तो मुझे भी कुछ कहां आ रहा,सबका कहना है,तुम्हारी बिदाई होते ही हम सब भी चले जायेंगे,हर कोई ,घर का एक एक इन्सान ,पर समझ नही आया…. मेरी भेडों का क्या होगा,और बकरियों का,,,मैनें बगीचे में कितनी सारी गुल्दाऊदी बो रखी है,उन्हें पानी कौन देगा, मेरी चमेली की बेल भी सूख जायेगी….क्या हम जाते समय अपने जानवर और पेड़ पौधे भी ले जायेंगे?”
“बस तू इन्हीं सब का सोच,मेरे बारे मे कुछ ना सोच…..पगली !! क्या जानवर और पौधे भी बांटे जा सकते हैं क्या??”
“हां क्यों नही,जब लोग बाँटे जा रहे तो जानवरों की तो औकात ही क्या?”
“अरे तो क्या लोग भी बांट दिये जायेंगे,ऐसे कैसे हो सकता है,तुम सब अमृतसर चले जाओगे तो मेरा मायका कहाँ रह जायेगा,4 दिन बाद पैर फिराने कहाँ आऊँगी वापस।”
“हो गयी ना अभी से ससुराल वाली,ये ना कहा गया,कि मैं भी तुम लोगों के साथ हिन्दुस्तान चलती हूँ,बड़ी आई पैर फिराने वाली।”
और दोनों मौसेरी बहनें खिलखिला के हंस पड़ी।।
चिनाब के एक ओर बसा गांव सादतगंज था, और दूजी ओर संतनगर ।। सिख और मुसलमान परिवार ही सबसे ज्यादा बसाहट से थे, और कुछ एक सिन्धी परिवार भी उनमें घुल मिल गये थे।।
संतनगर के पठान मोहल्ले के सेठ अजमानी भाई की बड़ी लड़की रज्जो का आज ब्याह था।।अजमानी को पूरा मोहल्ला बहुत मानता था,किसी की हारी बिमारी उनकी मदद के बिना ठीक नही हुई थी,इसीसे एक हफ्ते से सारा मोहल्ला लड़की के ब्याह में जूझा पड़ा था।।
आजमानी कुछ गिने चुने सिन्धी रईस परिवारों मे से था,उसका अपना भरा पूरा परिवार था।।उसकी बीवी ,उसके तीन भाई उनकी बिवियाँ,दोनो भाईयों के कुल मिला के सात बच्चे,उसकी खुद की बूढ़ी माँ,एक अदद बहन -बहनोई और उनके दो लड़के , ऐसे कुल इक्कीस बाईस लोगों की उसकी गृहस्थी थी….घर के सारे मर्द दुकान को जाते थे,उसके राशन की दो दुकाने संतगंज के चौखाना बाज़ार में थी,और एक नई दुकान पीली कोठी लाहौर रोड पे उसने पिछले महीने ही डाल ली थी।।
अच्छा खाता पीता खानदान था,आजमानी एक साफ दिल नेक इन्सान था,उसके पास आस लेकर आया कोई फरियादी आज तक उसके दरवाजे से खाली हाथ नही लौटा था,उसके पास हर एक चीज़ थी जो सुकून से जीने को ज़रूरी थी,कुछ सालों पहले तक उसके जीवन मे बस एक अदद औलाद की कमी थी,वो भी सत्रह साल पहले रज्जो के पैदा होने से पूरी हो गई थी……आजमानी और उसकी बीवी को कई पीर फकीरों के चक्कर लगाने ,कई मन्दिरों मे नारियल चुनरी चढ़ाने के बाद शादी के लगभग बीस साल बाद औलाद हुई थी,इसी से घर की सबसे लाड़ली बेटी थी रज्जो।।
पूरा घर उसपे जान छिड़कता था,जब सादतगंज के सबसे रईस घर का रिश्ता रज्जो के लिये आया तो पूरा परिवार खुशी से चहक उठा था।।
चिनाब के उस पार रहने वाला किरमानी परिवार भी दौलत हैसियत से कही भी इस परिवार से कम नही था…..जब शादी की बात चली तो घर के मर्दों और बड़े बुजुर्गों ने मिलकर सब कुछ तय कर लिया, लड़के और लड़की का एक दूसरे को देखने का तो सवाल भी नही उठता था,सारी बातें तय कर के एक तारीख तय कर ली गई थी,वैसे तो सिंधियों मे लड़की वाले ही शादी के लिये जातें हैं,पर आजमानी का बहुत मन था कि,उनके पुशतैनी घर से ही बिदाई हो और इसिलिए सादतगंज वाले बारात लेकर आने को तैय्यार हो गये थे।।।
यहाँ संतनगर का पठान मोहल्ला पूरी तरह से रज्जो की शादी की तैय्यारियों मे डूब गया था, कहीं खानसामा साहब के घर से मिठाईयों के थाल आ रहे थे,कही किसी की दुकान से सजावट का सामान …. रज्जो का शादी का जोड़ा खुद रज़िया बेगम सिल रही थी,ऐसा लग रहा था मानो पूरे मोहल्ले की बेटी बिदा होने वाली हो ,पर इसी बीच दोनों मुल्कों के बीच ये खुरापात हो गई ।।
अचानक से आयी इस विपत्ति से आज दो दिन से बाज़ार की रौनक बुझी हुई थी,हिन्दुस्तान पाकिस्तान के हुक्मरानों का फरमान हर गली कूचे पे चस्पा हो गया था,दोनों के बीच सरहदें बांट दी गई थी,बांट दी गई थी नदियाँ,पहाड़, ज़मीन और बांट दिये गये थे इन्सान ।।
जो लोग कल तक ईद दिवाली साथ मना रहे थे, आज अपने जात बिरादरी धर्म के लोगों को ढूँढ ढूँढ के उनके साथ महफूज़ महसूस कर रहे थे, हिन्दूस्तान से मुसलमान भाग कर पाकिस्तान आ रहे थे और पाकिस्तान से हिंदू हिन्दुस्तान को भाग रहे थे,अजब अफरा तफरी का माहौल हो गया था, आजमानी अजीब पसोपेश मे फंसा था,उसने तय कर लिया था,रज्जो को सही सलामत बिदा कर हिन्दुस्तान को निकल जायेंगे,,सिर्फ दो ही दिनों में माहौल अचानक से बिगड़ने लगा था।।
उनकी हवेली पठानों के मोहल्ले में ही थी,एक तरफ कैसुद्दीन की कोठी थी,और दुजी ओर मोमिन अली का मकान था,दोनों परिवारों से उनका खाना खर्चा जुड़ा था।।
मोमिन की बेगम रज़िया के कुल जमा 7 बच्चे थे, जिनमें सबसे बड़ा लड़का बशर अली था, अली जब आठ बरस का हुआ तभी उसकी चौथी बहन पैदा हुई और उसके बाद उसे उसकी नानी के घर लाहौर पढ़ने भेज दिया गया।।
रज्जो और उसके भाई बहनों का रज़िया के घर रोज का आना जाना था,आधा बचपन रज्जो ने रज़िया खालू के आंगन की इमली के पेड़ के नीचे ही बिता डाला था,पर जब से वो बारह तेरह बरस की हुई घर से निकलना ही बन्द कर दिया,कभी छत पर से ही खालू की लड़कियों ज़रीना,नूरी,मेह्ताब से बातें कर लेती,,लेकिन अक्सर वो चिनाब किनारे बने छोटे छोटे पथरौटोँ पे जा बैठती थी।।।
ऐसे ही एक शाम जब सूरज ढलने की तैय्यारी मे था और आसमान नारंगी रंग में रंगा हुआ था,वो अपनी गुलाबी सलवार को घुटनों तक चढाये,चिनाब किनारे की सीढियों पर बैठी पानी में पैरों को डाले कुछ गुनगुना रही थी, उसके गोरे गुलाबी पैर पानी मे भीग कर और गुलाबी हो रहे थे कि एक धीमी सी गुनगुनाहट उसके कानों मे पड़ी ।।
ध्यान से सुनने पर उसने समझा किसी मर्द के गाने की आवाज आ रही थी,नज़्म इतनी बेहतरी से गाई जा रही थी कि वो आहिस्ते से उठ कर आवाज की दिशा को बढ़ चली,कुछ कदम की दूरी पर ही एक उँचे दरख्त के साये मे कोई उसी की तरह पानी मे पैर डूबाये बैठे गा रहा था।।गाने वाला पूरी तरह से अपनी नज़्म मे डूबा आंखे बन्द किये किसी और ही दुनिया मे खोया हुआ था।
तभी रज्जो ने पीछे से पानी मे झांक लगाई,और उसके रेशमी दुपट्टे की सरसर से लड़के की आँख खुल गई और चिनाब के पानी मे अपने आप को देखती दो आंखे उसने पकड़ ली, ये सब इतनी जल्दबाजी मे हो गया कि दोनों ही एक दूसरे को ठीक से देख भी नही पाये,और रज्जो वहाँ से भाग गई।।घर लौटने के बाद बशर ने जब ये वाकया ज़रीना को बताया तो ज़रीना ने फौरन पहचान लिया कि इस वक्त चिनाब किनारे बैठने वाली और कोई नही पड़ोस की रज्जो ही है।।
ये रज्जो और बशर अली की पहली मुलाकात थी, जिसमें दोनों एक दूसरे को ठीक से देख भी नही पाये थे ………..उस वक्त रज्जो सिर्फ बारह तेरह बरस की थी और अली सत्रह अट्ठारह का ।।।
क्रमश:
aparna..

बहुत प्यारी कहानी की प्यारी शुरुआत हुई है, इन कहानियों से रूबरू रहा हूं दी पर अच्छा ही है फिर से पढ़कर अनुभव करने का एहसास ही जुदा है, अच्छा लगा पढ़के…. शेर बहुत अच्छा है दीदी ,
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसे
इतनी जगह कहां है दिल ए दाग़ दार में….
इस कहानी को पूरा पढूंगा दी….💐🙏
Chinab किनारे पढ़ी हुईं प्यारी सी प्रेम कहानी जिससे हर किसी से प्रेम हो जाएं ❤️❤️❤️❤️