चिनाब किनारे -8

चिनाब किनारे

चिनाब किनारे -8

…………….
    
     “प्रभा दीदी  एक बात पूछूँ,ये सब इन्हें कैसे जानती हैं ?”
    रज्जो के सवाल पर प्रभा हंसने लगी”क्या बात है रज्जो?? जलन होने लगी क्या,दुसरी लड़कियों के मुहँ से बशर का नाम सुन के “।।

   “बात दर असल ये है कि ये सारी लड़कियाँ  गजलें  लिखने पढ़ने की जबरदस्त शौकीन है,शहर मे हुआ कोई मुशायरा इनके बिना अपने अंजाम को नही पाता ….
        “एक बार किसी मुशायरे में अलमास ने बशर मियाँ को सुन लिया और बस उसके बाद लेडी इरविन में हुए सालाना जलसे पे हमारी प्रिन्सिपल सत्यभामा अवस्थी मिस के हाथ पैर जोड़ के उन्हें मुशायरा करवाने और बाहर से शायर बुलाने को राज़ी कर लिया…इसके आगे का काम मुझे सौंपा गया,मेरी बात वैसे भी बशर मियाँ टालते नही,तो बस चले आये,जब वो स्टेज पर आये तो पूछो मत,बस एक के बाद एक कलाम पढ़ते चले गये….बेचारे जैसे ही उतरने को होते लड़कियाँ वन्स मोर का आलाप छेड़ देती…..उस दिन बड़ी मुश्किल से उनकी जान छूटी,बशर मियाँ तो स्टेज से उतर के सीधे निकल गये लेकिन अपने पीछे जाने कितने कदरदान छोड़ गये…..”
     “एक तो शायरों पे वैसे भी फिदा होती हैं लड़कियाँ ,और उसपे शायर बशर मियाँ जैसा हसीन हो तब तो क्या कहने….पर एक बात है,बशर ने आज तक किसी लड़की को आँख उठा कर नही देखा।।”
     “अलमास ने तो कसम तक उठा ली कि शादी करूंगी तो बशर से,पर बशर ने उस जैसी हसीन जहीन लड़की पर भी एक उड़ती निगाह तक नही डाली,बेचारी अलमास आज इसीसे तुम्हें ऐसे घूर रही थी।”

   रज्जो हल्के से मुस्कुराने लगी”तो प्रभा दीदी  आपके मेजर साहब ने किसे आँख उठा के देख लिया।”

  “अरे इनकी तो तुम पूछो मत,मुझसे मिलने से पहले जब एक बार लखनऊ गये तो घर वालों के कहने पे एक राजपुतानी से सगाई कर आये,उसके बाद यहाँ मैं मिल गई,और मुझसे मिलते ही ये सारी दुनिया ही भूल गये…..मुझे उसके बारे मे कुछ नही बताया और उसे तो खैर बताने का सवाल ही कहाँ उठता था,पर हमारे कॉलेज में एक लड़की इनकी मंगेतर की मौसी की लड़की निकली,उसने चोरी चोरी हमारी सारी खबर अपनी बहन को कह सुनाई, और वो गर्म मिज़ाज़ जाहिल औरत अपने चार गुंडे भाइयों को लिये मुझसे लड़ने चली आई।।”

   “हाय दीदी !!! फिर आपने क्या किया??”

  “करना क्या था,भाई मुझसे तो ये गाली गलौच लड़ना झगड़ना होता नही,मैनें उसे कह दिया,जाओ मेरी तरफ से मेजर आज़ाद है,ले जाओ और बांध लो अपने पल्लू से…..पर एक बात याद रखना अगर तुम्हारा पल्लू इतना ही महकता होता तो उसे ज़रूरत ही क्या थी दूसरी औरत की ।”

  “क्या सच !! आपने ऐसा कह दिया।”

“तो और क्या करती,गुस्सा तो मुझे भी मेजर पे बहुत आ रहा था,मेरी वो बात सुनते ही ठकुराईन एकदम से भड़क गई और मुझे मारने को हाथ उठाया ही था कि मेजर और बशर मियाँ पहुंच गये,  मेजर उस बदमिजाज गुस्सैल बददिमाग औरत को एक तरफ ले गया और बशर उसके भाइयों को समझाने लगा,तब तक में मैंने अपना सामान बांधा और वहाँ से निकल गई,उसी रात मैं केरल चली गई,मुझे भी सोचने के लिये वक्त चाहिये था।।”

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“फिर क्या हुआ प्रभा दीदी ।”

“फिर क्या ,जब गुस्सा उतर गया तो वापिस आ गई, पर मैं खुद मेजर के पास नही गई ….तब एक दिन बशर मियाँ आये और उन्होनें बताया कि उस दिन उन लोगों को समझा बुझा के भेजने के बाद मेजर भी लखनऊ को चले गये और अपने बाऊजी के पैर पकड़ लिये……अब ऐसा छै फुटिया जवान लड़का रोए गिडगिड़ाए किसे अच्छा लगता है,घर वालों ने इनकी बात मान कर सगाई तोड़ दी,पर उस सगाई को तोड़ने के बाद इनके घर वालों के नाम पे ऐसा बट्टा लगा की इनके दादा  जी मेरे नाम पे एकदम ही रूठ गये और कसम खा ली कि वो जब तक जिंदा रहेंगे तब तक मैं उस घर की बहु नही बन सकती।” तब से हम बस रस्ता देख रहे हैं ।”

“किस बात का दीदी कि दादा जी कब परलोक सिधारेंगे??”

रज्जो की भोली बात सुन प्रभा को ज़ोर की हँसी आ गई “अरे नही पगली,इनके घर के लोग खुशी खुशी हमारे रिश्ते के लिये हां बोल दें उस बात का “”।

दोनों लड़कियाँ बड़ी देर तक इधर उधर की बातें करती रहीं और सो गई।।।

  अगले दिन सुबह रज्जो के जागने तक प्रभा उठ कर कमरे से बाहर जा चुकी थी,वो पलंग में बैठी सोच ही रही थी,कि प्रभा वापस आ गई ।।

   “आओ चलो नीचे गुसलखाने तक ले चलूँ ।” रज्जो के लिये ये लड़कियों के हॉस्टल मे रहना एक बिल्कुल नया अनुभव था, रात में तो ठीक से देख भी नही पाई थी,कमरे से निकलते ही एक लम्बा गलियारा था,जिसमे दोनो तरफ छोटे छोटे कमरे बने हुए थे,दीवारों पर हल्की सीड़न थी, कहीं कहीं पर कुछ छोटे गमले रखे थे,एक गमले मे पतली सी चमेली की बेल लगी थी,जो कमरे के बाजू पे बनी जालीदार मेहराब पे चढ़ी हुई थी,रज्जो को उस बेल को देखते ही बशर के घर पे अपने कमरे की खिड़की पे चढ़ी चमेली की बेल याद आ गई, और याद आ गई एक शाम -‘ जब वो खिड़की के बाहर देखती कुछ सोच रही थी,और उसे अचानक चमेली के फूल तोड़ने का मन किया,उसने जालीदार खिड़की पर से हाथ बाहर निकाल कर फूल तोड़ने की बहुत कोशिश की और जब नही तोड़ पाई तो आखिर में थक के कमरे से बाहर रसोई में चली गई रामदीन का हाथ बंटाने,कमरे से बाहर निकलते मे उसने देखा कि बशर आ चुका है तो चाय चढ़ाने चली गई,जब चाय ले कर वापस आई तो दीवानखाने की मेज़ पर खूब सारे चमेली के फूल बिखरे पड़े थे…..वो मुस्कुराते हुए पानी से भरा भगौना ले आई और सारे फूलों को उसमें डाल अपने कमरे में ले चली।’ इन फूलों को याद करते हुए उसे बशर की भी याद आ गई

“क्या बात है,बड़ा मुस्कुरा रही हो सुबह सुबह…. रात सपने में कहीं सुहाग रात तो नही मना ली।”

“क्या प्रभा दीदी ,आप भी,कुछ भी कहतीं हैं।”

“अच्छा जाओ तुम नहा लो,यहाँ से निकलते ही उस तरफ सीधी चली आना ,वही हमारा खाने का कमरा है।”

रज्जो जब तक तैय्यार हो कर खाने के कमरे में आई उसके लिये नाश्ता मेज़ पर लग चुका था,रात जिन लडकियों से मिलना हुआ था,वही सब वहाँ अब भी थी,कुछ औपचारिक मुस्कानों के आदान प्रदान के बाद एक घंटा बीतते उन सब के ठहाकों से हॉस्टल की छत गिरने को होने लगी…..

           यही तो औरतों की खासियत है,जिसे आधा घंटा पहले जानती भी ना होंगी उसिसे आधा घंटा बीतते-बीतते अपनी सारी रामकथा कह सुनाएगीं और ऐसी आत्मीयता पैदा हो जायेगी कि लगेगा जन्मों का नाता है,वहीं मर्द छै दिन साथ में बैठ के जाम छलका लेंगे खूब पी लेंगे पर अलग होने के बाद पूछो तो साथ में पीने वाले का नाम भी शायद ही पता हो…….
      
                यही तो सबसे बड़ा अन्तर है,औरत बार बार अपनी भावनाओं को बतायेगी अपने प्यार को जतायेगी,पर मर्द सिर्फ प्यार करना जानता है,उसे ना अपनी भावनाएँ बतानी आती और ना जतानी, समय कितना भी आगे बढ़ जाये इस मामले में मर्द कभी आगे नही बढ़ सकते।।

  नाश्ते के बाद सभी लड़कियाँ कॉलेज निकल गई, प्रभा को अपनी किसी सखी से मिलना था,तो वो रज्जो को लिये अपनी सखी के घर को चल दी।।

  दिल्ली के एक छोर में बसी एक पुरानी एंग्लो इंडियन कॉलोनी थी,जहां उन्हें जाना था….प्रभा ने पहले ही मेजर को इस बाबत बता दिया था,उसने अपनी गाड़ी भेज दी थी।।
     प्रभा ने बहुत जिद कर के अपनी एक पीली जोधपुरी बांधनी रज्जो को पहना दी थी,कानों में उसी से मेल खाते बूंदे पहना दिये…दोनो तैय्यार हो कर नीचे उतरी तब तक मेजर की गाड़ी गेट पे लग चुकी थी,किसी बात पे ज़ोर से खिलखिला के हंसती रज्जो ने चालक की सीट पर जब अली को बैठे देखा तो कुछ सैकेण्ड के लिये  उसकी सांस ही रुक गई ,फिर अपने आप को संयत कर के वो पीछे जा बैठी।

“अरे ऐसे कैसे रज्जो,तुमने तो बशर मियाँ को ड्राईवर बना दिया,सामने जा कर बैठो भाई,अच्छा थोड़े ही लगता है,कि हम दोनों पीछे बैठे और बशर गाड़ी चलाये,वैसे बशर मियाँ एक रात की दूरी भी बर्दाश्त नही हुई,जो सुबह सुबह ही दौडे चले आये, अपनी बेगम को देखने ।”

“नही नही,ऐसी कोई बात नही,मेरा भी कुछ काम था सीरी में,तो सोचा आप लोगों को वहाँ उतार कर मैं अपने काम पे निकल जाऊँगा और वापसी में आप लोगों को लेता चलूंगा।”
    
              पर बात प्रभा ने बिल्कुल बराबर ही कही थी, जाने क्यों लेकिन सच मे रज्जो के जाने के बाद अली का मन घर मे बिल्कुल नही लग रहा था… उसे मन ही मन रज्जो पे गुस्सा भी आ रहा था,खुद भी तो मना कर सकती थी प्रभा के साथ जाने से पर नही ,प्रभा के सामने उसे आजकल कुछ और दिखता भी तो नही…..एक बार भी ये नही सोचा की पन्द्रह दिन बाद लौटा हूं,कैसा हूँ,तबीयत ठीक है या नही,कुछ पूछना ज़रूरी नही समझा बस बक्सा उठाया और चलती बनी जैसे मुझसे कोई लेना देना ही नही………………………………..
            पर सही भी तो है,आखिर मुझसे उसका क्या लेना देना,अच्छा है ऐसी तंगदिल है,कल को जब घर वाले मिल जायेंगे तब भी ये कहाँ कुछ सोचेगी बस अपना सामान समेटेगी और चलती बनेगी ,उसके बाद कौन अली किसका अली,जाहिल लड़की,अभी भी मुहँ में कुल्फ़ी जमाये बैठी है,ये भी नही पूछा जा रहा कि कैसे हो।

“सुनो!! कैसे हो,सुबह नाश्ता किया ना?”

अली अपनी सोच मे गुम था कि रज्जो ने उससे पूछा ,सवाल सुन के वो हडबड़ा गया।।

“हम्म मैं ठीक हूँ,तुम कैसी हो?तुमने कुछ खाया?”

“क्या बनाया था रामदीन काका ने? पराठे बनाये होंगे,है ना??मक्खन वाले बनाये ना ?”

“अब मुझे नही पता कौन से वाले बनाये ,मैनें तो खा लिये चुपचाप ।”

“प्रभा दी आपको पता है,इन्हें ना घी वाले पराठे माफिक नही होते,जिस दिन सुबह घी वाले पराठे खा लिये फिर उस दिन खाना ही नही खाते इसीसे इनके लिये ताजा मक्खन निकाल कर पराठे बनातीं हूँ,तब ये अच्छे से खाना खा पाते हैं ।”

अच्छा !!अली ने सोचा ये तो उसे भी पता नही था, खुद के बारे में ….

“हा हा ,तुम्हें इतनी छोटी उमर में इतना सब किसने सिखा दिया रज्जो,मुझसे तो भाई ये चौका चूल्हा होता ही नही।”

“मेरे मायके में घर के बाजू में रज़िया खाला रहतीं थीं,मैनें उनसे ही खाना बनाना सीखा ,क्या लज्जत भरे पराठे बनातीं थी कि खाने वाला उंगलियाँ भी खा जाये,बहुत कुछ सिखाया है उन्होनें मुझे,बल्कि प्रभा दी सब कुछ उन्होनें ही तो सिखाया,क्या गज़ब का सालन बनातीं थी …. मुर्ग मुसल्लम बनाने के पहले उसे साफ कर रात भर शबनमी रात में भीगने छोड़ देती थीं,और कहतीं थी ओस मे भीगने के बाद जब मुर्ग पकता है तो उसका जायका ही अलग होता है। एक से एक नुस्खे होते थे उनके पास ,जाने वहाँ सब कैसे होंगे ।।

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  एंग्लो इंडियन समुदाय के लोगों की बसाहट वाली कॉलोनी दूर से ही अलग से नज़र आ गई,एक कतार मे सजे लाल बड़े बड़े पत्थरों से बने घरों में अपनी सहेली रोज़लीन का घर ढूँढने में उन्हें कोई परेशानी नही हुई,अली उन दोनों को वहाँ उतार के निकल गया।।

   घर के बाहर छोटा सा बगीचा था,जिसमें बहुत करीने से  लगे कई विदेशी फूल लहलहा रहे थे,लिली, ट्युलिप, डेसी,ग्लौडियस,कार्नेशन के बीच खिले बड़े बड़े गुलाब उनसे टक्कर ले रहे थे,उस बगीचे पे एक किनारे मे खड़ा बीमार सा दिखने वाला एक आदमी उन्हें पानी दे रहा था,प्रभा गेट खोल कर अन्दर चली गई ।।

  रोज़लीन गोरी सी नीली आंखों वाली दुबली सी लड़की थी,प्रभा को देखते ही चहक के उसके गले लग गई,उसकी आंखों से आंसू छलक आये ,जब थोड़ा संभली तब रज्जो की तरफ देख कर प्रभा से पूछा”ये कौन है? पहले कभी तो तुम्हारे साथ नही देखा??”

   “ये मेरी सहेली है,पाकिस्तान से आई हैं ।” रोज़लीन दोनों का हाथ पकड़े अन्दर ले आई ,बैठक आम साधारण एंग्लो इण्डियन घरों की तरह ही थी, व्यवस्थित सजे सोफे ,शीशे की टेबल और किनारे दीवार से लगी लकड़ी की शैल्फ जिसपे अलग अलग रंगों और आकारों की मोमबत्तियाँ सजी थी, पूरे घर की सज्जा को मुहँ चिढ़ाती  एक पुरानी  उड़न खटोला नुमा आराम कुर्सी किनारे पे पड़ी थी ,जिसके एक दम करीब एक छोटे लकड़ी के मोढे पे एक तस्वीर रखी थी।।

“ये मेरी माँ की तस्वीर है,उसे घर सजाने का बहुत शौक था,ये कालीन माँ तेहरान से लाई थी,और ये पर्दे शंघाई से।”

रज्जो को उस रंग उड़े कालीन में ऐसी कोई बात नजर नही आई,पर वो चुप ही रही,रोज़लीन अन्ग्रेजी में ही बातें कर रही थी,पर आज रज्जो को अंग्रेजी से वैसी घबराहट नही हो रही थी।।

“तुम दोनों बातें करो मैं ज़रा बाहर तुम्हारे पिता जी से मिल कर आती हूँ ।”प्रभा उन दोनों को वहीं छोड़ बाहर चली गई

“मेरे दादा के पिता हिन्दुस्तान आये थे,जब ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी ,तब उनके साथ….उन्हें हिन्दुस्तान ऐसा रास आया कि वापस गये ही नही, मेरे दादा जी को पढ़ने इंग्लेंड भेज दिया था, पढ़ाई खतम कर वो भी यहाँ आ गये,पर मेरे पिता ने यहीं से पढ़ाई की और शादी की एक पारसी औरत से, इस बात पे मेरी दादी ज़रा नाराज हो गई,पर जब मैं पैदा हुई तब दादी की हर नाराजगी दूर हो गई,और वो मुझे पढ़ने के लिये अपने साथ ले गई ….. आह कितने प्यारे दिन थे वो बचपन के….

   हम कुछ लड़कियाँ सुबह सुबह अपने स्कूल चर्च में कैरल गाते थे,फिर लाइन बना कर अपनी अपनी क्लास मे जाते थे,मुझे तो आज भी याद है,मेरी ट्यूनीक का रंग नीला होता था…सफेद झब्बे वाली कॉलर पहने नन हमें पढातीं थीं,उसके बाद होती थी हमारी पेंटिंग की क्लास ….मैं भी क्या बातें लेकर बैठ गई,तुम भी सोच रही होगी कैसी पागल लड़की है,पर क्या करूं जब से माँ नही रही बहुत अकेली सी हो गई हूँ,पिता जी इस घर को छोड़ना नही चाहते ,और मैं उन्हें अकेला नही छोड़ना चाहती।।”

“नही नही,मैं ऐसा कुछ नही सोच रही,आपकी माँ को क्या हुआ था?”

“छाती का कैन्सर ! डॉक्टरों ने काट कर सब हटा दिया,सोचो एक औरत के लिये उसकी खूबसूरती इस तरह से खत्म होना कितनी बड़ी सज़ा है,उस पे वो जो दवा के इन्जेक्शन देते थे उससे माँ का रंग एकदम स्याह पड़ गया था,माँ को इलाज के लिये दादी के घर ही ले जाना पड़ा था,और तुम्हें पता है,मै उस वक्त घर पर नही थी।।”

“तुम कहाँ थी रोज़लीन ?”

“मैं उस समय जूनियर कैम्ब्रिज में थी,मुझे पेंटिंग बनाना बहुत पसंद था,मैं बनाती थी लंगड़ी भेड़ की तस्वीर पवित्र नगर की ओर जाती हुई,कभी बनाती थी,गहरे हरे पेड़ों पर चमकीले लाल सेब,
              वो हमारा पेंटिंग टीचर था….अपनी धुन मे मगन रहने वाला पेंटर,!!उसे काफी उँची तन्ख्वाह पर ही हमारा स्कूल आयात कर पाया था,कभी किसी की तरफ ना देखने वाला,ना किसी को कुछ सिखाता,ना किसी से कुछ बोलता,तब साथ के कुछ और पढ़ाने वालों ने उसकी शिकायत कर दी।।
     उसके बाद उसके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आ गया,अब वो हर किसी की पेंटिंग देखता और उनमें सौ सौ गलतियाँ निकाल कर फिर अपने काम में डूब जाता,एक दिन उसे सेब की टोकरी उठाये लड़की की तस्वीर बनानी थी,तब उसने ध्यान से हम सब लड़कियों को देखा और मुझे चुन लिया।।
    उफ्फ कितना सरफिरा था वो ,मुझे एक ही तरीके में सुबह से शाम तक खड़ा रखता ,तेज़ धूप में!!!
और खुद पेंटिंग में डूबा रहता,आखिर उसने तस्वीर बना ली,प्राग में लगने वाली किसी प्रदर्शनी के लिये उसने बनाया था,और उस प्रतियोगिता मे उसका प्रथम स्थान आया,बस उसके बाद मैं उसकी चहेती मॉडल बन गई……..
        एक एक कर उसने मेरी कई तस्वीरें बनाई ,और उसके रंग मेरे जीवन में उतर गये,हम एक दूसरे से प्रेम में डूब गये,मेरी कैथोलिक दादी ने शादी के लिये इजाज़त नही दी ,और मैं उसके साथ घर छोड़ कर भाग गई ……
        पर दो ही दिन में मुझे अपने कलाकार प्रेमी की सच्चाई पता चल गई,उसकी पहले से दो बीवीयाँ थी ,उसने मुझसे कोई सच्चा प्रेम नही किया था,मै बस और बस उसकी पेंटिंग्स की प्रेरणा थी,और मेरे जैसी जाने कितनी उसकी प्रेरणा या तो बन चुकी थी,या बनने वाली थीँ ….उसी समय माँ अपना कैन्सर का इलाज करवाने आई …….
       मैं इतने गहन पश्चाताप में थी कि घर लौटूं या नही यही सोचती रह गई,और माँ का आखिरी समय आ गया,बहुत हिम्मत जुटा कर एक रात घर पहुंची तो देखा माँ की ये हालत हो गई थी,,पर मेरी माँ अपने आखिरी समय में भी बहुत खुश थी,क्योंकि उनके जीवन में मेरे पिता का सच्चा प्यार था,दोनो के मज़हब अलग थे,लेकिन दोनों ने अपनी सारी जिंदगी अपने प्यार के मज़हब में बिता दी,माँ ने अपनी आखिरी सांस बहुत सुकून से ली ,उनकी आंखों के सामने उनका प्यार था,मेरे पिता!!
      आज भी मेरे पिता माँ को भुला नही पाये,,इन दोनों का सच्चा प्यार देख कर लगता है कि प्यार किसी धर्म ,जाति या मज़हब में बन्धा नही होता, उन दोनों के बीच सिर्फ प्रेम था पवित्र प्रेम ,जो मुझे नही मिल पाया…और पता नही कभी मिल पायेगा भी या नही।।।

    “क्या हुआ भई बहुत बातें हो रही यहाँ?”

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  “प्रभा आज तुम्हारी सहेली को बोर कर दिया अपनी कहानी सुना कर”

  “रोज़लीन आप तो प्राग से पढ़ी हैं,फिर आप लोगों का मिलना कैसे हुआ??”रज्जो ने पूछा

“लेडी इरविन में मिले थे ,मैं भी वहाँ रीसर्च कर रही हूँ ना।”

  “वाह वाह रज्जो ,तुमने तो बड़ी फर्राटेदार अंग्रेजी सीख ली वो भी बहुत कम समय में ।।”

रोज़लीन चाय लेने चली गई तब प्रभा ने रज्जो से कहा –“बहुत दुख भरी कहानी है इसकी ,बहुत धोखा हुआ इसके साथ,जब ये जोसेफ को छोड़ कर आई उसके कुछ दिनो में ही इसकी माँ भी चल बसी , बेचारी उसके बाद अपने पिता के साथ यहाँ चली आई,अब लैब मे रीसर्च में ही खुद को डूबा के रख दिया है।।”

उनकी बातें हो ही रही थीं कि हाथों मे चाय की ट्रे लिये रोज़लीन चली आई,अलग अलग बरतनों मे चाय बनाने का सामान देख अचानक रज्जो को अली की विलायती चाय वाली बात याद करके हँसी आ गई,और फिर अपनी हँसी रोक वो चुपचाप चाय पीने लगी।।

शाम गहरी होने लगी थी,तभी गेट पे गाड़ी का हॉर्न  सुनाई दिया,प्रभा रज्जो का हाथ पकड़े जाने के लिये खड़ी हो गई ….
 
“प्रभा मेजर को भी अन्दर ही बुला लो”

“नही रोजलीन  मेजर नही हम बशर के साथ आये हैं।।

“आईये ना रोज़लीन आप भी मिल लिजिये,मेरे पति हैं वो।”रज्जो के ऐसा कहते ही रोजलीन अन्दर जा कर कुछ लेकर आई और उन दोनों के साथ ही बाहर आ गई ।।

जब वो लोग गाड़ी मे बैठने लगे तब रोज़लीन ने अपने हाथ में पकड़ा पेंडेन्ट रज्जो को पकड़ा दिया, उसमें दो दिल ऐसे जुड़ के बने थे,कि उन्हें अलग करने पे वो दो पेंडेन्ट बन जाते थे-“इसमे से एक तुम पहनना और एक अपने पति को पहना देना,मुझे बहुत खुशी होगी…. परमपिता तुम दोनो को हमेशा खुश रखे,हमेशा साथ रखे,कभी तुम दोनो के जीवन में अलगाव ना आये,,आमीन !!”

गाड़ी में बैठते हुए रज्जो की आंखें भर आई ,उस लड़की से बिदा लेते हुए मन कैसा भारी हो गया था जिसे सुबह तक वो जानती भी नही थी।।

“इनकी आंखों में पानी की टंकी फ़िट करके भेजा है ऊपर वाले ने,जब देखो तब नलका खोल शुरु हो जाती हैं ।”

“क्या बशर मियाँ आप भी ना,बेचारी भावुक है,हर किसी के दुख से दुखी हो जाती है।”

“देख लिया प्रभा दीदी!! किसी के दुख का कैसा मजाक उड़ा रहे।”

“अरे मजाक से याद आया,रोज़लीन अपनी इतनी दुख भरी कहानी सुनाने के बाद जब चाय लेके आई तो तुम्हें हँसी क्यों आ गई थी रज्जो,वो तो अच्छा हुआ उसने तुम्हें देखा नही।”

“कुछ नही प्रभा दीदी ,बस ऐसे ही।”

क्या बताती कि वहाँ बैठे हुए भी वो अपने खडूस पति को याद कर के मुस्कुरा रही थी…

” प्रभा दीदी क्या हम किसी देवी मन्दिर जा सकते हैं, शादी के बाद से हम दोनों कहीं मत्था टेकने नही गये।।”

“ये मैं क्या बताऊँ,अपने ड्राईवर से पूछ लो,उसे ऐतराज ना हो तो मुझे मन्दिर जाने मे कोई आपत्ति नही है।”

अली ने गाड़ी थोड़ी तेज़ कर दी,कुछ समय बाद वो मन्दिर के सामने खड़े थे…. रज्जो प्रभा अन्दर जाने लगे ,अली बाहर ही गाड़ी से टिक के खड़ा हो गया।।

“अरे आप नही आयेंगे क्या?”

“आ जाओ जी बशर मियाँ,तुम्हारे आने से भगवान बुरा नही मानेंगे पर तुम्हारे नही आने से तुम्हारी देवी जी ज़रूर बुरा मान जायेंगी।।”

कुछ देर बाद तीनों मन्दिर से हॉस्टल रवाना हो गये,  प्रभा और रज्जो गेट पर ही उतर गये और अन्दर चले गये… अली गाड़ी से बाहर निकल कर उन्हें तब तक जाते देखता रहा,जब तक वो हॉस्टल के भीतर नही चले गये…

क्रमशः

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aparna…

कहानी में रोज़लीन वाले हिस्से को पहले अन्ग्रेजी मे लिखा पर फिर लगा कि ये प्रयोग पाठकों को शायद पसंद ना आये तब उस हिस्से का अनुवाद किया इसिलिए वाक्य कुछ अलग से बन गये हैं,,जैसे holy city के लिये पवित्र नगर।।।

कहानी पढ़ने के लिये आप सभी का धन्यवाद ।।

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Abhishek kr singh
Abhishek kr singh
1 year ago

नाईस पार्ट दी, रोजलीन की स्टोरी इंगेजिंग है और एक जुड़ाव हुआ, अली और रज्जो के बीच मौन प्यार में वह एक ख़ामोशी है जो कुछ कह रहि है, पढूंगा अगले भाग में, बेहतरीन…💐🙏