चिनाब किनारे -5

चिनाब किनारे

चिनाब किनारे -5

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        सुबह अली के चेहरे पे हल्की हल्की बारीश की बूंदे पड़ने से उसकी नींद खुल गई,सुबह के कोई पांच साढ़े पांच बजे होंगे,उसने आस पास देखा , लोग जागने लगे थे,इधर उधर चहल पहल शुरु हो गई थी…..उससे कुछ दूर हट के अपने सामान के बक्से पे अपना सर टिका कर रज्जो गहरी नींद मे डूबी थी,हल्की बारीश की बारीक बूंदे उसके चेहरे को बहुत हल्के से भिगो रही थी,हवा मे इधर उधर उड़ती ज़ुल्फें कभी माथे पे पड़ रही थी,कभी गालों पे…..अली कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया,कुछ ही घण्टों में कितनी अपनी सी लगने लगी थी ये लड़की….
       अली अपनी जगह से उठ कर रज्जो तक गया और उसकी चुन्नी से उसका चेहरा ढांक कर वहाँ से निकल गया।।

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    सारी औरतें अलग-अलग जगह पर बीस बाईस की संख्या मे इकट्ठे खाना बनाने के काम में लग गई थी,कुछ कम उम्र औरतें बच्चों की देखभाल कर रहीं थीं,बच्चे सुबह से ही भूख से बिलबिला रहे थे,पर इतनी सुबह उन्हें देने के लिये उनकी माओं के पास दिलासे के सिवा कुछ ना था,ना दूध ना फल।।लोग ऐसी आफत मे जान बचा बचा के भागे थे कि बहुत से लोगों ने कपड़े भी साथ नही लिये थे,खाने का सामान रखना तो बहुत दूर की बात थी….

     पर भगवान जब विपत्ति देतें हैं,तो उसके साथ ही कुछ उपाय भी कर देतें हैं…..आस पास के गांव से और दिल्ली से लोगों द्वारा खाने पीने की सामग्री के साथ ही बच्चों,औरतों मर्दों सभी के लिये कपड़े भी भेजे जा रहे थे,दारोगा घूम घूम कर चोगे से आवाज लगाता हुआ यही बताता घूम रहा था,

“रज्जो मैं तो जाऊंगी,बच्चों के लिये कुछ कपड़े लेने ,तुम भी चलोगी क्या,वैसे तुम तो अपना बक्सा साथ लाई हो,तुम्हें तो कपडों की ज़रूरत नही होगी।”

  “नही! मुझे तो ज़रूरत नही है,पर ये तो बिना कपड़े लिये ही चल दिये ,इसिलिए इनके लिये तो लाना ही पड़ेगा,मैं चलूंगी तुम्हारे साथ।”

  “ठीक है,6 नम्बर चौकी पर कपड़े मिलने वाले हैं, कुछ देर में चलतें हैं,बच्चों को इन के पास छोड़ चलूंगी।”

   “अच्छी बात है!!
                 मानो (मनप्रीत)  तुमने इन्हें देखा क्या, सुबह से   जाने कहाँ चले गये हैं,कुछ बता कर भी नही गये।”

“बशर भाई उधर पन्द्रह ,सोलह,सत्रह नम्बर चौकियों की तरफ निकले थे सुबह,,जाते जाते कह गये,देख आता हूँ,शायद कोई पहचान वाला मिल जाये।”
      मनप्रीत के पति ने अबकी बार जवाब दिया।

  “अच्छा !! “हँसते हुए रज्जो ने कहा “मुझसे ज्यादा तो इन्हें जल्दी पड़ी है ,मेरे घर वालों को ढूँढने की।।”

रज्जो,मनप्रीत और भी औरतें इस खेमे से निकल कर 6 नम्बर चौकी को चल दी,वहाँ भी बेहद भीड़ थी,अपनी पारी आने का इन्तजार करती औरतें अपनी बातों मे लगीं थी,औरतों का हृदय ऐसी ही मिट्टी का बना होता है कि कितनी भी मुश्किलें हों ,अपना हौसला नही छोड़ पाती,और इधर उधर की बातों मे लग कर अपना दुख दूर करने की कोशिश करती रहती हैं ।।।।

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     कुछ औरतों की धीमी धीमी सी आवाज रज्जो के कानों में पड़ रही थी ,जिसका सार ये था कि इतना भाग दौड़ के यहाँ पहुंचने पर भी औरतों की जान और इज्जत बहुत महफूज नही थी,यहाँ भी कई वहशी उसी तरह से औरतों की इज़्ज़त को तार तार कर रहे थे,जैसे बेगाने मुल्क से भागने के पहले हो रहा था,बल्कि कुछ एक औरतें तो अपनी आप बीती बताते हुए वहीं रोने भी लगी ,उनका कहना था ,इससे तो अपने मुल्क में ही भले थे,वहाँ कम से कम इज्जत लूटने के बाद कटार घोंप के मार तो दिया जा रहा था,पर यहाँ तो जिंदा छोड़ दिया जा रहा,अगले दिन फिर से वही सब सहने के लिये।।

    सुनते हुए रज्जो और मनप्रीत के रौंगटे खड़े हो गये,अली के संरक्षण मे रज्जो खुद को कितना मह्फूज़ पा रही थी,उसे अली की याद आने लगी उसने मनप्रीत से कहा

  “चलो हम वापस चलते हैं,यहाँ जाने कितना समय लग जायेगा,वहाँ ये मुझे ढूंढते होंगे कि कहाँ चली गई ।”
   “हाँ तुम सही कह रही रज्जो,यहाँ इन सब की बातें सुन सुन के मुझे भी डर सा लगने लगा है,चलो इन लोगों के साथ ही जायेंगे ,जहां भी जायेंगे।”

  वो दोनो मुड कर वापस लौटने ही वाली थी कि कुछ छै सात वर्दीधारी वहाँ अपने दन्डे हवा मे लहराते चले आये,लाखों की भीड़ को सम्भालने के लिये हजारों की संख्या मे पुलीस भी मौजूद थी,पर ये जो आये थे ये सच मे पुलीस वाले थे भी या नही,ये वहाँ कोई ना जान पाया,उनमें से एक पूरी कतार मे से चुन चुन के लड़कियों को अलग निकाल कर एक अलग कतार मे खड़ा करने लगा किसी ने पूछा कि ये अलग क्यों किया जा रहा

  “जिन भी महिलाओं के घर वालों की खोज हो रही थी ,उनके नाम अलग से लिखे गये थे,उनमें से जिनके घर वाले मिल गये हैं,उन्हें अलग से चौकी 26पे ले जाया जा रहा है,आप जितनों को अलग से खड़ा कराया गया है,आप सब के घर वाले मिल चुके हैं,क्यों क्या नाम है तुम्हारा?”

  उनमें से एक आदमी ने रज्जो से पूछा -“जी राजेश्वरी ।”

“हां! देखा यही नाम तो लिखा है यहाँ,चलिये आप लोग उस तरफ 26नम्बर चौकी पर चलिये।आप बाकी महिलायें यहाँ से कपड़े वगैरह लेकर अपनी अपनी छावनी में लौट जाएं ।।”

   लगभग तीस चालिस औरतों को अलग कर दुसरी तरफ जाने के लिये बाध्य किया जाने लगा,पर जाने कैसे रज्जो और मनप्रीत को किसी गडबडी की आशंका होने लगी,पर उन लोगों की ना नुकुर किसी ने नही सुनी ,,मनप्रीत उस पंक्ति में नही थी,तो वही खड़ी रह गई और रज्जो को बाकी लड़कियों के साथ आई हुई टुकड़ी अपने साथ जबर्दस्ती ले जाने लगी,होते होते रज्जो मानो की आंखों से ओझल हो गई ।।

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    मनप्रीत भरे मन से जब वापस अपनी छावनी मे आई तब तक अली भी वापस आ चुका था।।

“कहाँ थे आप लोग ,बड़ी देर लगा दी वापिस आने मे ?” ऐसा पूछ कर अली मनप्रीत के पीछे देखने लगा की रज्जो कहाँ रह गई ।।

“मैं और रज्जो उधर कपड़े लेने गये थे,वहाँ कुछ हवलदार और दारोगा आये और रज्जो और बाकी लड़कियों को उधर 26 नम्बर चौकी में लेके गये हैं, उनका कहना था,जिनके घर वाले मिल गये हैं,उन्हें 26नम्बर चौकी पे रुकवाया है।”

“नही भाभी,26 नम्बर चौकी पर तो सिर्फ रसद रखी गई है,अभी अभी तो आटे की बोरियाँ वहीं से उठा उठा कर लाके रसोई वाली चौकी मे दी है मैनें।।
आप ठीक से याद किजीये,कोई और चौकी बोली होगी उन्होनें ।”

“नही भैय्या,यही चौकी बोली थी,चौकी 26।”

“क्या गज़ब कर दिया भाभी,यहाँ औरतों की आबरू को देखने वाला कोई नही है,क्यों उस पागल लड़की को अकेले छोड़ दिया आपने,उसे तो रोने के सिवा कुछ आता भी नही।”

ऐसा कहते हुए अली उठा और तुरंत ही चौकी 26 की तरफ दौड़ लगा दी,फिर अचानक उसे कुछ याद आया और वो वापस उस चौकी पे गया ,जहां एक दिन पहले उसने और रज्जो ने अपने नाम लिखवाए थे।।अली की किस्मत अच्छी थी उसे कल वाला दारोगा वहाँ मिल गया।

“दरोगा जी कल मैं यहाँ आया था,आपके   पास   ….आपने नाम भी लिखा था। बशर नाम है मेरा।”

“हां तो भाई यहाँ तो हजारों लाखों लोग नाम लिखा रहे,किस किस को याद रखूं,  ऐसे ही याददाश्त के पक्के होते तो क्या शास्त्री जी हमें भी लिखा पढ़ी वाला सुन्दर सा काम ना दे देते,हम भी आज संविधान लिख रहे होते,यहाँ तुम्हारे साथ माथा थोड़े ना फोडते।।”

“देखिए मेरे साथ कल जो औरत थी ना,राजेश्वरी उसे चौकी 26में कुछ लोग जबर्दस्ती ले गये हैं,ये बोलकर की उनके घर वाले मिल गये हैं,जबकी मै भली तरह जानता हूँ,इस समय चौकी में सिर्फ रसद रखी है,वहाँ और कुछ भी नही है,मेरी मदद कीजिए दारोगा जी।।”

अबकी बार दरोगा ने चेहरा ऊपर उठा कर घूर के अली को देखा ,और उसके माथे पे बल पड़ गये।।

“मियाँ तुम लोगों को कितना समझाए,यहाँ भीड़ भाड़ का फायदा उठा कर सभी तरह के लोग घुस आये हैं,हम लोग खुद नही जानते कि कौन सच बोल रहा ,कौन झूठ…इत्ता सारा काम वैसे ही फैला पड़ा है,और तुम अपनी बीवी की गुमशुदगी लिखाने आ गये,अभी कल जो गाड़ी पाकिस्तान से आई है,,उसमें सिर्फ और सिर्फ लाशें भरी थीं,सारे लोगों को मार दिया गया था,रात भर हम लोगों ने ट्रेन खाली करी और वापिस भेजी है,सोचो कितनी थकान में डूबा हूँ,और तुम लोगों से यहाँ अपनी औरत नही संभल रही,इतने हट्टे कट्टे छै फुटिया हो ,किस काम के,तुम्हारी नाक के नीचे से तुम्हारी बीवी गुम हो गई ।”

अली का पारा चढ़ने लगा पर वहाँ कुछ कहने का कोई मतलब नही था,वो वापस मुड़ कर चौकी 26पर जा रह था कि उसे एक बुजुर्ग हवलदार ने इशारे से अपने पास बुलाया,और उसे एक किनारे ले जाकर बहुत धीमी आवाज में उसे बताया–

  “सुनो बेटा,जहां अच्छे लोग हैं,वहाँ खराब लोग भी हैं,मेरी मानो तो यहाँ जिस शहर में भी तुम्हारा घर है,उधर को निकल जाओ ,….यहाँ छावनी मे रहना औरतों के लिये सही नही है,घर वालों के नाम पते लिखवा दो,बीच बीच में आके पतासाजी करते रहना।”

“बड़े मियाँ,मेरी बीवी खो गई है….आज सुबह ही उसे और कुछ और लड़कियों को चौकी 26में ले जाया गया है,अभी इत्ना वक्त  बीत जाने पर भी अब तक वापिस नही आई,उसे ढूँढ रहा हूं ।”

“अरे गलत हुआ ये तो,तुम्हें एक बात बता रहा हूँ,किसी से कहना मत,यहाँ जिन लड़कियों के घर के लोग नही मिल रहे ,उन्हें एक साथ लखनऊ को भेज दिया जा रहा वहाँ कोई बड़ी बी रहती हैं केसर बी! उनके कोठे को भेजा जा रहा उन लडकियों को
कल ही ये लोग बात कर रहे थे,तब सुना था,मै नही जानता ये सच है कि नही,पर जो भी हो चौकी 30से ही सारी गाडियाँ रवाना होती हैं,बिना देर किये वहाँ जाओ,शायद तुम्हारी बीवी मिल जाये।।जाओ बेटा देर मत करो।”

अली के जिस्म का सारा खून उसके माथे पर चढ़ कर हथौड़ियाँ चलाने लगा,गुस्से में पागल अली एक बार फिर दो दिन पुराना अली बन गया,जब उसके हाथ लोगों को गाजर मूली समझ रहे थे,उसकी कमीज की अन्दरूनी जेब में उस दिन की छिपी कटार आज भी मौजूद दी,हाथ से कटार को छू कर उसने उसकी मौजूदगी की तसकींन की और चौकी 30की तरफ को दौड़ लगा दी,भागता दौडता अली जब चौकी पे पहुंचा ,तो दो तीन आदमी एक बड़ी सी लारी मे लड़कियों को चढ़ा रहे थे,रोती बिलखती लड़कियाँ एक दूसरे पे गिरती पड़ती गाड़ी में सवार हो रही थी,अली ने ज़ोर से कड़कती आवाज मे पूछा “इन सब को कहाँ ले जाया जा रहा है।”

“तुमसे मतलब,जाओ अपना काम करो,हमे हमारा काम करने दो।”

“तुम बताते हो या मैं बताऊँ कि मैं कौन हूँ ।”

अली की ये बात सुनते ही उनमें से एक ने पलट कर गुस्से में उसे देखा और उतनी ही कड़कती आवाज मे उससे कहा-

“लखनऊ ले जा रहे हैं,इन लडकियों का वैसे भी कोई नही है यहाँ,और जो इनकी हालत है इन्हे केसर आपा ही अपने घर पे पनाह दे सकती हैं,और वैसे तू है कौन जो…..”उस आदमी ने अभी अपनी बात पूरी भी नही की थी कि अली ने उसके गला काट दिया,ये सब देख कर उसका साथी भी गुस्से में आ गया और अली को पकड़ने उसकी तरफ बढ़ा,पर जब तक वो आता उसके पहले ही सिर्फ दो कदम तय कर अली उस तक पहुंच गया और कटार सीधी उसके कलेजे के आर पार कर दी,तड़पता हुआ वो भी नीचे गिर पड़ा,अब उनका एक मात्र साथी बचा था जो गाड़ी चलाने वाला था,उसने ये सब देखा तो अली के सामने दोनो हाथ जोड़ दिये।।

“भैय्या माफ कर दो ,मैं पूरी बात बताता हूँ,सरकार की तरफ से ऐलान हुआ था की जिन औरतों,बच्चों के घर वाले नही मिल रहे उन्हे दिल्ली के समाज सेवी आश्रम तक पहुंचा दिया जाये,बस उसी बात का फायदा उठा कर ,औरतों की यहाँ से तस्करी यहाँ से की जानी थी।।।मुझे माफ कर दो भैय्या,मेरी जान बक्श दो,मुझे मेरे घर जाने दो,इस तरफ को मुड़ कर भी नही देखूँगा।”कहते कहते वो अली के पैरों पे गिर पड़ा,अली ने उसे अपने पांव से ठोकर मारी और पूछा-

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“दिल्ली जाने वाला रस्ता किस तरफ को जाता है,कौन सी दिशा मे जाना है ,बता पाओगे।”

“पूरा नक्शा खींचा है हुजूर,आपको दे देता हूँ ।”

इसी बीच उन लडकियों के बीच से निकल कर भागती हुई रज्जो आई और अली के गले से लग गई,कुछ देर तक दोनों चुपचाप खड़े इसी बात को महसूस करते रहे कि वो दोनो फिर मिल गये हैं,और दोनों ही ठीक हैं,थोड़ा सामान्य होने पर अली ने रज्जो को खुद से अलग किया और उस आदमी की तरफ सवालिया नजरों से देखने लगा ।

उसने अपनी कमीज से एक मुड़ा तुड़ा सा परचा निकाला और अली के हवाले कर दिया।।

“महिला आश्रम दीनपनाह में है??”

“हां बड़े भाई दीनपनाह मतलब दिल्ली 6में ।”

“लाल कोट ,सीरी होता हुआ जायेगा ये रास्ता ,है ना। चलो गाड़ी की चाबियां मेरे हवाले करो।”

“क्या आप गाड़ी भी ले जाओगे।नही मेरा मतलब गाड़ी आप ले जाओगे तो मैं मालिक को क्या कहूंगा।”

“हां गाड़ी तो ले ही जाऊँगा ,वर्ना इन सबों को छोडूंगा कैसे,शुक्र मना तेरी जान बक्श दी,पर गुनाह तो तूने भी किया है,इन्ही हाथो से गाड़ी चलाकर जाने वाला था ना…. ये कहकर जैसे ही अली ने वापस कटार उठाई रज्जो सामने आ गई

“रहने दो ना ,इसे माफ कर दो,इसने इतनी मदद तो कर ही दी।”

अली ने रज्जो को देखा फिर उस आदमी से कहा
“जा भाग बक्श दी तेरी जान और बक्श  दिये तेरे गुनाह भी,अल्ला मेहरबान था तुझ्पे,कभी ज़रूर कुछ अच्छा किया होगा तूने।”

अली ने सभी लडकियों से गाड़ी मे बैठने को कहा और सामने रज्जो को अपने साथ बैठा कर दिल्ली की तरफ एक नये सफर में निकल पड़ा।।

क्रमश:

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aparna..



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Abhishek kr singh
Abhishek kr singh
1 year ago

रज्जो मासूम है, वह अपने दिल मे आई बात को पत्थर की लकीर मानकर बैठी है, उसके लिए ही उसका प्यार पति जिंदगी है ऐसे में वह बिना उसके जी नहीं सकती और अली नेजो आज किया वह दोनों और क़रीब आ गए हैं, बेहतरीन भाग दीदी….💐🙏