चिनाब किनारे -9

चिनाब किनारे

चिनाब किनारे -9

प्रभा के साथ 5रोज रहने के बाद रज्जो वापिस मेजर के घर चली आई,वैसे भी हॉस्टल जीवन की एकरसता से उसे बोरियत होने लगी थी,वहीं दुसरी तरफ इतने दिन बशर को देखे बिना रहना भी उसके लिये मुश्किल होने लगा था….एक ही घर मे रहते हुए भले ही बशर बाहर रहे पर उसके कमरे में, उसके कपडों में,उसके जूतों में उसके हर सामान में रज्जो उसे ढूँढ लेती थी,और उन्हें देख कर ,सहेज कर अपना प्यार लुटा लेती थी।।
   प्रभा और रज्जो शाम ढले जब मेजर के घर वापस आये तो मेजर कहीं निकलने की तैय्यारी मे था।।

” कहाँ को चल दी सवारी ,दोनो एकदम दूल्हा बने बैठे हो।”प्रभा ने बशर और अली को तैय्यार देख सवाल किया

“अरे आओ आओ ,मैं तो चाहता ही था कि आप दोनो भी हमारे साथ मुशायरे में शिरकत करें।”
   मेजर ने प्रभा से कहा

“अच्छा तो मुशायरे की तैय्यारी हो रही है।”

“हाँ आज मुबारक खाँ साहब का मुशायरा है,हमारे अली मेरा मतलब है बशर भी अपने शेर पढेंगे ,तो बस हम वहीं निकल रहे थे,हम तो चाहतें हैं,आप दोनो भी तैय्यार हो जायें और हमारे साथ ही चलें ।

“बिल्कुल अभी लो ,हम दोनो भी तैय्यार हुए जातें हैं,पर वापसी मे “इम्पीरियल” में खाना खिलाना पड़ेगा,मंजूर है?”

“आपका हुकुम सर आंखों पर,अब जाईये तैय्यार हो जाईये।।”

  चारों साथ ही निकल पड़े,’ इम्पीरियल ‘ प्रभा का सबसे पसंदीदा होटल था,वो रास्ते भर उसकी तारीफों पे कसीदे पढ़ती रही

“रज्जो क्या बताऊँ,ऐसा खूबसूरत सजा धजा हाल है,सारा का सारा टेबल वेयर लन्दन से मंगवाया है,और पूरा टीक वूड का काम बर्मा का है,सारे बेयरा लाल पगड़ी बान्ध इधर से उधर डोलते फिरते हैं,ऐसी बड़ी बड़ी तस्वीरें लगीं है,पुराने राजे महाराजाओं की ,जैसे तस्वीरों से बाहर निकल आयेंगे।।पर पता है ये सारी उन गोरों की साजिश थी, पुराने महलों ,और किलों को रिनोवेशन के नाम पर हथिया कर राजाओं की तस्वीरें टांग  कर बड़े बड़े होटलों का रूप दे दिया ,और रॉयल्टी के नाम पर उनकी पुश्तों को चंद रुपयों का नेग चढ़ा कर सारा माल हजम कर गये।।।
    और जब हिन्दुस्तान से जाने लगे तो बचा खुचा रॉयल्टी का हिस्सा अपने पुराने गिरिजाघरों के उन्नयन के नाम पर हमारे उदारवादी राजाओं से लेते चले गये,हमारे कथित राजा महाराजाओं के पास उनके नाम की तख्ती के अलावा कुछ भी कहा बचा, बची खुची कसर नई बनी सरकारें करेंगी.. अभी तो सत्ता समाज से हट कर लोकतंत्र की शुरुआत हुई है,अब देखो ये प्रजातंत्र हमें क्या क्या दिलवाता है।”

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“भई प्रभा कौन कहेगा कि आप रसायन शास्त्र में रीसर्च कर रही हैं,हमे तो लगता है,आपको राजनीति शास्त्र में होना चाहिये था,क्यों बशर सही कहा ना।”

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” जिम खाना” में सजी महफिल अपनी बहार पे थी,बड़े से गोलाकार हॉल को पुरानी तर्ज पर सजाया गया था,एक ओर पढ़ी लिखी नये समाज की नये दस्तूरों से सजी औरतें थी… वहीं दुसरी ओर कुछ आठ दस के अलग अलग  टुकड़ों मे मर्द महफिल की रौनक बने बैठे थे,सबसे सामने  मखमली कालीन से सजे गुदगुदे  तख्त पर मुबारक खाँ साहब बैठे अपनी गज़ल पढ़ रहे थे

“ये सब्र भी देखा है,तारीख की नज़रों ने
   लम्हों ने खता की थी,सदियों ने सज़ा पाई।”

  खाँ साहब  गाते रहे ‘लम्हों ने खता की थी’ और अली के भीतर कुछ चुभता रहा “सदियों ने सज़ा पाई”
           अली के भीतर जो टूट रहा था,वो जानता था इसकी किरचें अब उसके लहू में हमेशा-हमेशा दौड़ती रहेंगी, उसने सोचा था उसके गुनाह माफ हो जायेंगे जैसे ही वो रज्जो को उसके घर वालों को सौंप देगा, पर कहतें हैं ना ऊपर वाले की लाठी में आवाज़  नही होती।।
      क्या खूब सज़ा मुकर्रर की है अल्ला ने उसके गुनाहों की,जिस लड़की के शौहर को मौत के घाट उतारा उसी लड़की से मुहब्बत कर बैठा,अब किसी तरह इसके घर वालों को खोज के इसे उनके सुपुर्द कर भी दिया तो क्या खुद इसके बिना एक रोज भी सुकून से जी पायेगा,पर जीना तो पड़ेगा ही ,क्योंकि जिस दिन रज्जो इस सच्चाई को जान जायेगी ,वो कभी पलट कर उसका मुहँ नही देखना चाहेगी , उफ्फ ये क्या हो गया उससे,वो कितना भागना चाहता है रज्जो से लेकिन बार बार वो क्या चीज़  है जो उसे रज्जो की तरफ खींचती चली जा रही है, एक ऐसी अंधी सुरंग में फंस गया है जहां से सिर्फ और सिर्फ  वो ही उसे निकाल सकती है।।

“बशर मियाँ कहाँ खो गये? खाँ साहब की गज़ल खत्म हुई अब शेरों-शायरी का दौर चल रहा,कुछ आप भी सुना दें,कुछ हम भी अता फरमायेंगे।”

इसके बाद मेजर ने मिर्ज़ा गालिब साहब का एक शेर पढ़ा

    “आज फिर इस दिल में बेक़रारी है
    सीना रोए ज़ख्म-ऐ-कारी है
    फिर हुए नहीं गवाह-ऐ-इश्क़ तलब 
    अश्क़-बारी का हुक्म ज़ारी है
    बे-खुदा , बे-सबब नहीं , ग़ालिब
    कुछ तो है जिससे पर्दादारी है”

“कुछ आप भी कह दीजिये अपने दिल की बशर।”
   
      प्रभा के कहने पे बशर ने औरतों की तरफ बैठी रज्जो पे एक निगाह डाली और एक शेर पढा-

  ” बे नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नही जाता,
  जो बीत गया वो गुज़र क्यों नही जाता।।”

प्रभा और रज्जो उस समय की एक आला शायरा गुलबानो बेगम के साथ बैठी थीं,गुलबानों प्रभा से अक्सर ऐसे मुशायरों में मिलती रहतीं थी,जब प्रभा से उन्हें रज्जो के बारे मे मालूम चला तो वो बड़ी खुश हुईं,

“अरे हमें नही पता था बशर ऐसी चांद सी दुल्हन लेकर आयेगा,क्या खूबसूरत जोड़ी बनाई है ऊपर वाले ने ,तभी मैं कहूँ आज बशर बड़ा खोया खोया सा क्यूँ है,अब समझ आया,इश्क़ में जो पड़ गये हैं जनाब”

गुलबानो ने बशर को आवाज देकर कहा-

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“बशर मियाँ आपके लिये एक शेर पढ़ रहें हैं,गौर कीजियेगा –
    मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा
    उस को छुट्टी ना मिली जिसको सबक याद हुआ।

“अब आप कुछ जवाब फरमायें “

“बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया
  उसे गले से लगाये जमाना हो गया।।” बशर ने अपना शेर पढ़ा और रज्जो ने शरमा के आंखें नीची कर ली।।

“किस्मत वालीं हैं आप बशर जैसा शौहर मिला है आपको,हमें  पूरा यकीन है आपको सर आंखों पे बिठा कर रखेगा,एक हमारे शौहर थे …बिला वजह जब देखो तब बिगडते रहते थे,हम भी किसी तरह सब्र कर जाते थे,एक दिन गुस्से मे उन्होनें हमें तलाक दे दिया ,उस दिन के पहले हम हमेशा इसी डर के साये मे जीते रहे कि कही हमारे मियाँ हमें तलाक ना दे दें,उस दिन ये डर जाता रहा,बस सामान उठाया और निकल गये उस घर से,अम्मी अब्बू से सहारे की उम्मीद नही थी,अपनी बहन के घर चले गये,पढ़ने का बहुत शौक था जामिया मिलिया का इम्तिहान पास कर लिया और वजीफा लेकर बिना किसी पर बोझ बने पढ़ते चले गये….ट्रिब्यून में कॉलम लिखने के बदले पैसे मिलने लगे,आज देखो सब कुछ है हमारे पास पर खुशी नही है,अब लगता है काश कुछ सब्र मैनें भी कर लिया होता, ऐसा नही की उन्हें पछतावा नही हुआ,वो आये भी हमे वापिस ले जाने,पर हलाला से हमने इन्कार कर दिया,,वो भी गम मे डूबे रहे और हम भी पर मुहब्बत का कोई रास्ता हम दोनो को नही मिला ….पर हम जानते हैं बशर बहुत सलीके वाला बच्चा है,औरतों की दिल से कदर करता है,वो तुम्हें कभी नाखुश नही रखेगा…ऊपर वाला तुम दोनो की जोड़ी सलामत रखे।”गुलबानो ने कहा

“शुक्रिया आपका”

  एक एक कर औरतें खुसर पुसुर करती वहाँ से उठने लगीं

“अरे क्या हुआ मिसेस वेद ,आप अभी से उठ गई , अभी तो महफिल सज रही है।”

“अरे प्रभा कल व्रत है मेरा,अपने कर्नल साहब की लम्बी उम्र के लिये कल सारा दिन बिना पानी पिए व्रत करूंगी, तो अब जाके कल की कुछ तैय्यारी भी कर लूँ ।”

“कौन सा व्रत है कल?” रज्जो ने तुरंत पूछा

” हाँ भई बता दीजिये इन्हें,ये नई नई दुल्हन हैं,वैसे मैं तो यही कहूँगी कि ये सब रहने दो रज्जो,मालूम नही बशर को पसंद आयेगा या नही।”

“हाँ अगर नई दुलहन हो तो बेशक करो,कुछ ज्यादा नही करना हैं,बस सारा दिन व्रत कर लेना और शाम को चांद को पूज कर अपने पति के हाथ से पानी पी लेना उसके बाद कुछ भी मीठा खा कर व्रत खोल लेना,बस इतना ही करना है।।”

“जी अच्छी बात ,मैं ज़रूर करूंगी।”

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अगले दिन प्रभा को भी अपने साथ व्रत करने को रज्जो ने राज़ी कर लिया,और रात अपने साथ ही रोक लिया।।
   दोनो अगले दिन सुबह उठ कर पूजा पाठ की तैय्यारियों मे लगी रहीं।।पूरा दिन हँसते खेलते बीत गया।

  शाम अली और मेजर लगभग साथ ही वापस आये।। अली के चेहरे पे आज कुछ अलग सी उदासी नज़र आ रही थी…. अली और मेजर दीवानखाने में बैठे थे,मेजर ने चाय का कप उठा कर अली की तरफ बढ़ाया पर अली ने पीने से इन्कार कर दिया

“क्या बात है?? आज आपने भी औरतों के साथ व्रत कर लिया क्या,भई हमसे तो ये व्रत उपवास होते नही,हम तो चाय पी लेंगे।”

“मेजर चार रोज पहले  दुकान के पते पर एक तार आया था एम्बेसी का,रज्जो के घर वालों का पता मिल गया है,  तसल्ली करने  कि वाकई वो रज्जो के घरवाले हैं या नही मैनें उसी पते पर तार भेजा,आज सुबह उसका भी जवाब आ गया।”

“क्या बात कर रहे हो,तुमने बताया नही कुछ …. इतने रोज से मन मे छिपाये बैठे थे,क्या जवाब आया उनका।”

“वो लोग कल आ रहे यहाँ रज्जो को लेने।”
   अली ने जवाब दिया,और वहाँ से उठ कर ऊपर अपने कमरे में चला गया।।

   इधर पूजा की तैय्यारियाँ पूरी करने के बाद दोनो सजी संवरी लड़कियों ने रामदीन काका को नीचे भेजा मेजर और बशर को बुलाने के लिये

“मेजर साहब तो सुबह से खा पी के टंच बैठे हैं पर हाँ बशर मियाँ ने एक बूंद पानी भी नही पिया है आज।”
    रामदीन के ऐसा कहते ही प्रभा ने आंखे गोल गोल कर रज्जो की तरफ देखा

“देख लिया कैसा रंग चढ़ा दिया अपना ,बेचारे बशर मियाँ ! सुबह से सूखे मुंह यहाँ से वहाँ घूम रहे, ऐसा करो जाओ तुम ही अपने मियाँ जी को बुला लाओ।”

“मुझे तो उनसे बहुत डर लगता है दीदी,जाने कब किस बात पे बिगड़ जाएँ ।”

“अरे नही भई डरो मत,मैनें तो सुबह सुबह ही बशर मियाँ को बता दिया था कि आज तुम  उनके लिये व्रत रख रही हो,, पर जानती तो हो बशर मियाँ ज़रा शर्मिले किस्म के हैं,, खुद से हो के उनसे यहाँ आया नही जायेगा चाहे उनका यहाँ आने का कितना भी जी करे,वो यही चाहेंगे कि कोई आये और उन्हे बुला जाये,,जाओ जाओ देर ना करो।”

प्रभा की बात मान रज्जो बशर को बुलाने गई , बशर टेबल पे सर झुकाये कुछ लिखने में लगा था..

“सुनो! सारी तैय्यारी हो गई है,,आप आ जाते तो हम सब मिल कर पूजा कर लेते।”

” तुम लोग कर लो,मेरा जी अच्छा नही है।”

“आपकी ज़रूरत पड़ेगी ,ये पूजा जोड़े में की जाती है,आ जाइये ना,सब साथ ही कर लेंगे।”

“तुम्हें कोई बात एक बार में समझ क्यों नही आती, हर बात पे जिद पकड़ के बैठ जाती हो,मुझे नही करना पूजा पाठ,तुम्हारा मन है करो ना मन करे मत करो,पर मुझे परेशान ना करो ,जाओ यहाँ से।”

रज्जो की आंखों में मोटे मोटे आंसू आ गये,पलट के वो वापस छत पे प्रभा के पास चली गई ,

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” क्या हुआ नही आये बशर ?”

“नही दीदी आयेंगे भी नही,चलिये हम आप मिल कर ही कर लेते हैं ।”

पूजा पाठ निपटाने के बाद रज्जो और प्रभा रामदीन के साथ मिल कर खाने की टेबल लगा रही थी,तभी मेजर भी वहाँ पहुंच गये

“अरे भई रामदीन बशर को भी बुला लो,सुना है उसने भी सुबह से कुछ नही खाया।।”

बशर के आते ही सब खाने के टेबल पर बैठे खाने लगे ,रज्जो खाना परोसने में ही लगी रही

“अरे रज्जो कम से कम बशर को टीका ही लगा दो”

प्रभा के कहने पर रज्जो ने सवालिया नजरों से बशर की तरफ देखा ,बशर ने ना में सर हिला दिया

“मुझे नही लगवाना,आप लोग खाना खाईये।”

मेजर भी माथे पे शिकन लिये प्रभा को देखते रहे,प्रभा ने आंखों से ही उन्हें चुप रहने का इशारा किया और

“अरे ये क्या ? बस अपनी ही चलाये जा रहे हो,चलो मत लगवाओ अपने माथे पर,उसके माथे पर ही लगा दो ,ये लो “प्रभा ने हाथ में पकड़ी डिब्बी अली के सामने खोल के रख दी।।

पहले से ही नाराज अली ने गुस्से मे डिब्बी से सिन्दूर निकाला और रज्जो के माथे पे एक लम्बा सा तिलक खींच दिया,और वहाँ से चला गया।।

रज्जो और प्रभा मुस्कुराने लगे।।मेजर ने अली को आवाज़ दी

“अरे बशर आ जाओ भई,खाने से कैसी नाराजगी, आओ तुम लोग भी शुरु करो,वो आ जायेगा,रज्जो जी आखिर आपके पूजा पाठ से आपके भगवान खुश हो गये हैं,आपके घर वालों का पता मिल गया है।।”

“क्या !! सच में! “रज्जो खुशी में प्रभा के गले से लग गई,उसी समय अली भी वहाँ आ गया।।

“कल तुम्हें लेने आ रहें हैं तुम्हारे घर के लोग।” तैय्यारी कर लेना।।अली के ऐसा कहते ही प्रभा ने मेजर की तरफ सवालिया नज़रों से देखा

“तो कल रज्जो अपने घर चली जायेगी ,हमेशा के लिये,हाँ सही भी है जब घर वाले मिल ही गये तो यहाँ कैसे रहोगी।।”

“अरे प्रभा दीदी मैं अकेली थोड़े ही जाऊंगी,ये भी तो जायेंगे साथ ,और मैं कौन सा आपको भूल जाऊंगी ,आपसे मिलने आती रहूंगी ना ,कभी हॉस्टल कभी यहाँ।।”

रज्जो जितना ही चहक रही थी अली उतना ही डूबता जा रहा था,उसकी उदासी कोई पकड़ ना ले इसलिए वो वहाँ से उठ कर अपने कमरे में चला गया,प्रभा भी अपनी उदासी छिपाते हुए पूरी तरह से रज्जो की तैय्यारियों में लग गई ,उसने बहुत जिद कर अपनी गले की सोने की चेन भी रज्जो के गले मे डाल दी।

“ये क्या है प्रभा दीदी,आप तो पूरा घर मुझ पर लुटा देंगी।”

“मेरी तरफ से शादी का तोहफा समझ कर रख लो, मैनें कुछ दिया भी तो नही तुम्हें ।”

“और इतने दिन जो इतने प्यार से आप सबने मुझे रखा,उसका मोल तो मैं कभी चुका भी नही सकती, अगर आप नही होती ,मेजर साहब नही होते,तो मेरा और इनका क्या होता।।”

“रज्जो तुम्हें इतना संभाल के रखने वाला प्यार से रखने वाला वही है जिसे अपना प्यार जताना ही नही आता,बशर बहुत प्यार करता है तुमसे रज्जो ,,पर वो कभी आगे बढ़ कर तुम्हें ये बात नही कह पायेगा ,उसके प्यार को समझने की कोशिश करना।।”रज्जो को प्रभा का ऐसा कहना समझ नही आया पर घर वालों से मिलने की खुशी में उसने इस बात पे ज्यादा ध्यान नही दिया,दोनो लड़कियाँ बात करती करती ही सो गईं।।

  रात अचानक रज्जो की नींद खुली ,उसे ऐसा लगा छत से कुछ आवाज़ आ रही,वो दबे पांव अपने कमरे से बाहर निकली और धीरे धीरे सीढिय़ां चढ़ती ऊपर पहुंच गई,,जैसे जैसे वो ऊपर पहुंचती गई आवाज़ काफी साफ सुनाई देने लगी,,आवाज़ अली के कमरे से आ रही थी।।
    अपनी उदासी में डूबा अली अपनी खिड़की पर खड़ा वही नज़्म गुनगुना रहा था जो अक्सर उदास होने पर गाया करता था–

  “लगता नही है जी मेरा,उजड़े दयार में
    किसकी बनी है आलम-ए-नापायदार में ।।

    कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसे,
    इतनी जगह कहाँ है,दिल-ए-दागदार में ।।

  रज्जो बाहर खड़ी सुनती रही……ये तो वही नज़्म थी जो अली गया करता था ,हाँ ये तो अली की आवाज़ थी,उसके पड़ोसी रज़िया खाला के लड़के की आवाज़,आज तक बातें करने में वो इस आवाज़ को पहचान क्यों नही पाई,उसे वो शाम याद आने लगी  जब चिनाब किनारे उसने पहली बार ये गज़ल सुनी थी,फिर उसके अगले दिन अपनी छत पे  ….और फिर कुछ सालों बाद  अपनी शादी वाले दिन ….. रज्जो की आँख से आंसू बहने लगे,उसे एक एक कर हर बात याद आने लगी,
          अली ने तो आज तक उससे कभी कहा ही नही कि वो उसकी बीवी है…
          एक एक कर अब सारी कड़ियां जुड़ती चली जा रही थीं ………
           उसकी शादी वाली रात उसके कमरे में आने वाला अली था, अली ने तो कभी नही कहा की वो उसका शौहर है उसने ही अली को बशर समझ लिया था,हाँ अली का भी तो पूरा नाम बशर अली ही है,,हे भगवान !!! ये क्या हो गया??? अली ने तो उस दिन भी सच ही कहा था….
      ” बस तुम ही जिंदा बची हो” इसका मतलब उसके अलावा सादतगंज में उस रात कोई जिंदा नही बचा ,उसकी सास,उसके ससुर और उसका पति???? उनके साथ क्या हुआ ????
                     वो इतने दिन से जिसके साथ है ,वो अली है ,तो उसका पति कहाँ गया,कहीं उस रात वो भी….नही ऐसा नही हो सकता,ऐसा बिल्कुल नही हो सकता….
              एक एक कर अली की रुखाई का हिसाब रज्जो को मिलने लगा,क्यों अली उससे इतना दूर दूर रहता था  ??क्यों दोनो के कमरे अलग अलग थे  ??क्यों शादी के इतने दिन बीत जाने पर भी एक मर्द होकर भी उसने अपने रिश्ते से ताल्लुक रखती किसी ज़रूरत के लिये रज्जो से चिरौरी नही की??
  अगर वो सच में उसका पति होता तो क्या उम्र के ऐसे नाज़ुक दौर में अपनी इच्छाओं और जरूरतों को ऐसे दबा पाता अपने अन्दर ।।
     क्यों जब भी वो अली के गले से लगती, अली उसे बाहों मे नही भरता था,बल्कि उसकी बाह्ं पकड़ उसे खुद से दूर कर दिया करता था।।।
      उफ्फ ये क्या हो गया??उसके साथ ही क्यों हुआ ऐसा?? उसने किसी का भी क्या बिगाड़ा था जो उसका ऐसा बिगाड़ हुआ,और आज सब कुछ ऐसे बिगाड़ के भगवान को क्या मिला ??? अब इसके आगे क्या है उसके नसीब में??
       उसने तो अली को अपना पति समझ ना जाने क्या क्या कह दिया पर उस बेचारे ने तो हमेशा ही अपनी मर्यादा ,अपनी लक्ष्मण रेखा को याद रखा, कभी उस लकीर को लान्घने की कोशिश भी नही की,हाथ पकड़ना तो बहुत दूर अली ने तो कभी उसे भर नज़र देखा तक नही

रोते रोते रज्जो नीचे चली गई,भोर की चिरैय्या कहीं दूर बोलने लगी थी….

    सुबह सभी अपने अपने काम में लगे थे, हमेशा की चहकती महकती प्रभा भी अपनी उदासी को जैसे समेट नही पा रही थी,सभी गुम थे खुद में …हर काम को निपटाते हुए रज्जो को लग रहा था कि एक बार अली दिख जाता ,पर अली जाने सुबह से कहाँ छिपा बैठा था…..रज्जो को खुद समझ नही आ रहा था कि वो अली को एक बार देखने के लिये क्यों तरसी जा रही,अरे उसने बस मदद ही तो की है,आज तो वो कई महिनों बाद अपने घर वालों से मिलेगी,उसे उनके बारे में सोचना चाहिये,चाची का छुटकू कैसा होगा,दादी कैसी होंगी…पर ठीक है,अब इन्ही सब के साथ रहना है….लेकिन उसे तो आज छोड़ के चले जाना है हमेशा के लिये,क्यों एक बार सामने नही आ जाता।।
      अली वहाँ होता तब तो सामने आता।।

रामदीन के आवाज़ देने पर सभी साथ ही नाश्ता करने बैठ गये।।

  “बिटिया आज तुम्हारे पसंद की ‘ कोकी’ बनाई है, अच्छे से खा लो,आज से तो फिर अपने घर चली जाओगी।”
     रामदीन की बात सुन रज्जो की आंखों मे आंसू आ गये,वो चुपचाप सर झुकाये अपनी प्लेट में देखती रही।।

“कितने बजे तक आ रहे सब ,कुछ खबर है मेजर साब??”

“नही मुझे तो पता नही,बशर ने कुछ बताया नही, रज्जो तुम्हारे लिये बशर की टेबल पे कुछ छोड़ा है उसने….जाते जाते मुझे बोल गया था कि तुम्हें बता दूं ।” रज्जो आँखें उठा कर मेजर को देखने लगी तभी प्रभा ने पूछा

“सुबह सुबह बशर मियाँ कहाँ चले गये??”

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“शायद लखनऊ निकल गया,कुछ साफ साफ तो कहा नही उसने,पर जाते जाते इतना कह गया कि वापसी में उसे कुछ रोज लग जायेंगे।”

रज्जो के मुहँ का कौर कसैला हो गया…जाने के पहले एक आखिरी बार मिलने की भी ज़रूरत नही समझी उसने!!,उसे अली पे बेहद गुस्सा आने लगा ,अपनी बेबसी पे रोना आने लगा,वो अपने ही मन को समझाए जा रही थी कि,बस यहाँ लाने भर की ही तो मदद की है अली ने फिर क्यों वो उसके लिये ऐसी मरी जा रही….क्यों उसका दिल इतना तड़प रहा अली को देखने के लिये,कही उसके मन में अली के लिये कुछ…..ऐसा हो ही नही सकता ,ये प्यार व्यार नही है,उसके एहसान थे जिसके लिये वो शुक्रिया करना चाहती है बस!! इससे ज्यादा कुछ नहीं,कभी नही,,वो किसी और के बारे मे सोच ही नही सकती …एक हिंदू परिवार की शादीशुदा लड़की है वो ,किसी गैर मर्द के लिये ऐसा सोचना उसके लिये पाप है!! वो कभी ऐसा नही सोच सकती ! पर इस मन का क्या करे,जहां बार बार वो निष्ठुर मुस्कुराता खड़ा हो जा रहा था,उसकी सोच उसके संस्कारों को मात्र अपनी चीनी उंगली से परे धकेल  अपने मोती जैसे दांतों की हँसी मे उसे बहाता डूबाता चला जा रहा था।।

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  अपने सामान को एक जगह सहेज रज्जो ऊपर अली के कमरे में चली गई,वहाँ टेबल पर रोज़लीन के दिये पेंडेंट के नीचे एक कागज़ दबा फड़फड़ा रहा था,उसने लपक के वो कागज़ उठा लिया
  
  रज्जो!!
        मैं बशर अली आज तक तुमसे कह नही पाया,कई बार सोचा भी लेकिन तुम्हारा चूहे जैसा जिगर देख कभी हिम्मत नही पड़ी ।।
    मैं तुम्हारा पति बशर किरमानी नही हूँ,,बल्कि मैं वो गुनाहगार हूँ जिसने तुम्हारी जिंदगी से सारे रंग छीन लिये,तुम्हारी शादी वाले दिन जो खून खराबा हुआ मैं भी उसका हिस्सेदार था,मुझे तो ये भी याद नही कि उस दिन मेरा खंजर किस किस का गला रेत गया,तुम्हारे सारे घर को मैनें और मेरे कुछ साथियों ने मिल कर मरघट बना दिया,उस दिन मैं ऊपर तुम्हें मारने के इरादे से ही चढ़ा था,पर जाने तुम्हें देखने के बाद क्यों मै हिम्मत हार गया,तुम्हें नही मार पाया,और तुम्हारी जान बख्श वहाँ से निकल गया,पर जब समझ आया कि तुम मेरी पड़ोस वाली रज्जो हो तो वापिस लौटा कि तुम्हें कम से कम तुम्हारे घर वालों तक पहुंचा दूँ …..ऊपर वाले ने जाने क्या सोच कर हम दोनों की राह यहाँ तक साथ की थी,आज तुम्हारे घर वाले आ रहे तुम्हें लेने,आज तुम हमेशा के लिये चली जाओगी।।

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               मुझमे सच बताने के बाद तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नही बची थी,इसीसे सुबह ही निकल गया,जाने कभी वापिस लौटूंगा भी या नही।।
     हो सके तो मेरे गुनाह माफ़ कर देना।।
     अल्लाह तुम्हें अपनी नेमतों से बख्शे ,तुम्हे इस  जहान की हर खुशी से नवाज़े,खुश रहो आबाद रहो।।

                    अली।।

  रज्जो का सर चकरा गया।वो अपना सर पकड़े वहीं बैठ गई,आँसूओं के सैलाब में एक एक कर हर किस्सा जुड़ता गया,और उसे सब कुछ साफ साफ नज़र आने लगा ,वो उठी उस खत को अपने पास लिया और कमरे से निकल गई,पर फिर रोते हुए वापिस आई ,और उस खत को वहीं उसी जगह रख दिया ,उसके ऊपर रखी अली के हिस्से वाली पेंडेंट को उठा कर अपनी चेन में डाल लिया ,और अपने हिस्से वाली पेंडेंट को निकाल कर उस खत के ऊपर रख दिया और जाते जाते अली की नज्मों की डायरी उठा कर अपने साथ ले चली।।

   नीचे उसे लेने उसके बाबा,और दोनो चाचा पहुंच चुके थे,रोते रोते सबके गले लगी रज्जो बिलख पड़ी

    रज्जो की बिदाई ने सबकी आंखे भर दी थी,प्रभा और रज्जो तो बड़ी देर तक गले लगी बिलखती रहीं ,जाते हुए जैसे ही रज्जो ने मेजर के पैर छुए उन्होने उसे गले से लगा लिया”खुश रहो ,कभी कभी आ जाना हम सब से भी मिलने।”

रज्जो जाने लगी तो प्रभा उसे छोड़ने गाड़ी तक गई
“रज्जो बस एक इल्तिज़ा है,बशर को कभी गलत मत समझना,उससे भूल तो हुई है,हो सके तो उसे माफ कर देना ,और एक बात अपनी पढ़ाई कभी मत छोड़ना ,मैं तुम्हें कॉलेज में ही मिल जाऊंगी।।”

रज्जो उन सब से विदा ले अपने घर को चली गई,जाते जाते भी उसकी नज़रें अली के कमरे की खिड़की की तरफ ही लगी रहीं,बहुत भारी मन से उसने उस घर से बिदाई ली।।

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घर पे सब से मिल कर दुख कुछ कम होने लगा,माँ की गोद में,उसके आंचल में रज्जो एक बार फिर बचपन वाली रज्जो बनने लगी,जिंदगी किसी एक के ना रहने से रुकती तो नही ,उसका तो काम ही है चलना ,,जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही।।
   पूरे परिवार ने गले लगा कर घर की बेटी को सहेज लिया ,संभाल लिया….किसी ने उसके सामने उस मनहूस दिन का ,उसके बिखरे ससुराल का या उसके वैधव्य का जिक्र तक नही किया,सब अबाध गति से चलता गया,रज्जो भी सबके साथ वैसी ही रहने की कोशिश करती जैसा सब उसे देखना चाहते थे,घर भर के छोटे बच्चों के साथ खेलना ,उन्हें अन्ग्रेजी पढ़ाना ,उन्हें दिल्ली के किस्से सुनाना उसका प्रिय शगल होने लगा,पर इस सब के बीच एक चेहरा रात दिन उसकी आंखों मे आ आ कर उसे सताने लगा था।।
 
     अपनी हर बात पे उसे अली की याद आती,वो जिस दिन से आई थी रोज रोज दिन गिना करती, उसे वहाँ से आये पूरे पन्द्रह दिन हो गये,पर कोई दिन ऐसा नही बीता जिस दिन उसने अली को याद ना किया हो,एक दिन उसने अपने बाबा से वापस पढ़ाई शुरु करने की चाह जताई

“मैं वापस कॉलेज जाना चाहतीं हूँ,पढ़ना चाहती हूँ “

“नही!! इसकी कोई ज़रूरत नही,अब जितने दिन हो हमारे पास,सुकून से रह लो।।”

अब रज्जो में किसी से बहस करने की ताकत ही जैसे नही बची थी,वो चुपचाप सर झुकाये अपने कमरे में चली गई ।।

रज्जो की दो चाचियां थी जिनमें छोटी वाली चाची उससे कुछ पाँच छै साल ही बड़ी थी,इसिसे दोनो में बहुत बहनापा सा था,जिस दिन से रज्जो वापस आई थी,और सब तो नही एक गुड्डो को ही वो उदास सी लग रही थी।।

   गुड्डो ज़बरदस्त खुशमिजाज़ औरत थी,मझोले कद की गोरी सी बादामी आंखों वाली गुड्डो घर की छोटी बहू कम और रज्जो की बड़ी बहन ज्यादा लगती थी उसका मायका हिंदुस्तान का ही था,और ब्याह के बाद वो पाकिस्तान गई थी,इसीसे जब उसे मौका लगता अपने अमृतसर के किस्से सुनाने शुरु कर देती।।उसकी नज़र में अमृतसर से ज्यादा चकाचौंध वाला दूजा कोई शहर नही था उसने कभी देखा भी नही था,जब पन्द्रह की हुई तो ब्याह कर संतनगर चली गई,और शादी के सात साल बाद जब बंटवारे का बिगुल बजा ससुराल वालों के साथ वापस हिन्दुस्तान आ गई,गुड्डो एक लम्बे चौडे परिवार की लड़की थी इसिलिए उसे हर हाल मे खुश रहना पसंद था,खुद भी खुश रहती और सब तरफ खुशियाँ बांटती गुड्डो को रज्जो के चेहरे की हँसी उसकी मुस्कान सब कुछ जाने क्यों बड़ी नकली सी लग रही थी।।

   उसने अपनी तरफ से कई बार कुरेदना चाहा पर रज्जो ने अली की बेशकीमती यादों को अपनी दिल की तिजोरी में ऐसे समेट लिया था,कि एक मोती भी गलती से बाहर ना छिटक जाये।।
    रज्जो को अपना ससुराल पति कोई याद नही था,जिन्हें जीवन मे कभी देखा तक नही उनकी याद करे भी तो कौन सी बात,और एक वो था जिसे भूलना चाह कर भी वो भूल नही पा रही थी…..

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    अपने आप से अपने मन से बहुत जंग लड़ी और आखिर में अपने आप को अपने मन के अपने हृदय के हवाले कर दिया उसने,मीठा तो वो पहले ही बहुत था,पर उसकी यादें उससे भी मीठी लग रही थी, दिन भर की कोई तो ऐसी बात होती जिसमें उसे अली याद ना आता,जब सुबह उसे चाची आंगन में चाय का कप पकड़ा जाती,वो उस कप को देख मुस्कुरा उठती और चाची से ज़ोर दे कर कहती-
     “खूब अदरक इलाइची डाल के अच्छे से खौला के बनाई है ना चाची ,मुझे यही देसी चाय पसंद है,वो विलायती चाय नही।”

   “विलायती चाय क्या होती है लाड़ो??”

दादी के सवाल पर वो बस मुस्कुरा के रह जाती।।

  कैसे मुस्कुराता था वो,बाएं तरफ को ज़रा सा होंठ ऊपर की ओर चढ़ा कर,लेकिन सबसे अच्छा लगता था उसे खिलखिला के हँसते हुए देखना, जैसे एक टुकड़ा धूप उसके आंगन उतर आये,,अक्सर जब वो मेजर की बखिया उधेड़ने बैठता तभी इतना खुल के हँसता था,अनार के दाने जैसे दांतों की उजली हँसी चमकाता ,प्रभा के सामने एक एक कर मेजर की पोल पट्टी खोलना उसे कितना भाता था।।।

   “रज्जो अरी रज्जो क्या सोच रही ऐसा कि तुझे बारीश का भी पता ना चला,अरी बिन मौसम की बारीश है,भीग गई तो बीमार पड़ जायेगी,चल जल्दी से भीतर आ जा।।”

   माँ की आवाज़ सुन रज्जो अपने स्वप्नसंसार से बाहर निकल आई और आंगन से भाग कर अन्दर चली आई।।।

जीवन इतना भी कठिन नही होता जितना जीने के पहले हम सोच बैठते हैं ……………………….. ,ऐसा ही कुछ रज्जो के साथ हो रहा था, मेजर के घर से आते वक्त जो उसकी हालत थी और जैसे जीवन की उसने कल्पना की थी,वैसा कुछ नही हुआ,बल्कि अब दिन भर अली के बारे मे सोचते रहना उसे एक आसान जिंदगी दे रहा था,उसे किसी से कोई शिकायत नही रह गई थी,ना कोई चाह थी,उसे लगने लगा कि बस अली को याद कर कर के वो अपनी पूरी जिंदगी काट देगी।।
     
   कैसी भयानक सुबह थी,जिस दिन रज्जो और कुछ लड़कियों को जबरन गाड़ी मे चढ़ाया जा रहा था,और किसी अदृश्य ताकत सा अली वहाँ पहुंच गया था,और वो घबरा के उसके सीने से लग गई थी, पहली बार हुआ था जब अली ने भी उसे अपनी बाहों मे समेट लिया था……क्या उसकी देह की कस्तूरी अपनी चिता चढ़ने तक भी कभी भूल पायेगी,उसकी सांसों का स्पर्श ,उसकी धड़कनो की आवाज़ कुछ भी तो नही भूल सकती,नही कभी नही भूल सकती….काश आने से पहले एक बार देख पाती उसे,उसे समझ तो आ गया होगा की मैनें उसे माफ कर दिया ,इसिलिए तो अपना पेंडेंट उसके लिये छोड़ दिया,और जिस पेंडेंट को वो अपने गले मे लटकाये घूम रहा था,उसे अपने साथ ले आई,काश समझ जाये एक बार।।।

“अरी गुलाबो अकेली क्या बड़बड़ा रही है,समझ जाये,अरे कौन क्या समझ जाये,ज़रा मुझे भी तो बता,चाची हूँ तेरी ,बड़ी बहन जैसी हूँ ।”

“अपनी उम्र छिपाने को बड़ी बहन बन जाती हो,माँ जैसी हो मेरी ,समझी चाची!!”

गुड्डो ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी”अरे लाड़ो तुझे जो समझना है समझ,पर बता तो सही कि माजरा है क्या?? किन खयालों मे खोयी रहती हैं हमारी गुलबान परी।”

“कोई बात नही है चाची बस प्रभा दीदी की बड़ी याद आती है,अच्छा चाची ये बताओ वहाँ पाकिस्तान मे हमारे पड़ोसी थे ने रज़िया खाला लोग,उनकी कोई खोज खबर है?? कैसे हैं वो लोग?”

“वो लोग तो सब अपनों के बीच ही हैं सब खैरियत से हैं,उनका बड़ा लड़का तो तेरे साथ ही था ना ,हो सकता है वापिस चला गया हो,जाने यहाँ क्या करता था,दिल्ली में “

“दिल्ली में उनका करोबार है चाची,कपड़ो का!! मैं गई हूँ एक बार,कितना बड़ा कारखाना,उफ्फ 50आदमी तो सिर्फ कपड़ा बनाने में लगे रहतें हैं, कोई कारीगर कपड़े रंग रहा है,कोई उनपे कलमकारी कर रहा है,गोदाम के एक तरफ उपर ऑफ़िस है,एकदम शानदार !!”

गुड्डो मुस्कुराने लगी “सुना है अभी जहां तेरे रिश्ते की बात चल रही उनकी भी दुकान ही है,कपड़ो की।”

“क्या!! क्या कह रही हो?? किसकी रिश्ते की बात चल रही है??”

“तेरी लाड़ो और किसकी,और कौन है यहाँ शादी के लायक……कल ही तेरे चाचा बता रहे थे,तेरे बाऊ जी के दोस्त हैं बलविंदर सिंह उनके छोटे लड़के रणजीत से तेरे ब्याह की बात चल रही है।।”

रज्जो आंखे फाड़े अपनी चाची को देखती रही

“बहुत बड़े लोग हैं,सुना है तेरे बाऊ जी ने उन्हें सब बता दिया है,सादतगंज वालों के बारे में,पर उन लोगों को कोई परेशानी नही है,बल्कि वो लोग तो जल्दी से जल्दी शादी कर लेना चाह रहे।”

“सच बोल रही हो चाची,या मजाक कर रही हो।”

“हाय हाय मैं मजाक क्यों करूंगी भला,हमारी गुलाबो है ही इतनी प्यारी कि कोई मना कर ही नही सकता,तू चिंता मत कर ,सब अच्छा होगा लाड़ो।”

“चाची मुझे …….रज्जो कहना चाहती थी कि उसे शादी नही करना पर उसके बोल गले मे ही अटके रह गये,उसकी जगह उसने कहा कि वो पढना चाहती है ।

“लाड़ो अब पढ़ाई लिखाई तो तेरे ससुराल वाले ही करायेंगे तुझे,अच्छा सुन कल सुबह ज़रा जल्दी तैय्यार हो जाना,पहाड़ी वाले मन्दिर जाना है,शायद तेरे ससुराल वाले भी आयेंगे वहाँ,तब चुपके से अपने होने वाले पति को भी देख लेना,और देख ये सब मैने तुझे बताया है ये किसी से कहने की ज़रूरत नही है।”

रज्जो का मन किसी काम में नही लग रहा था,जाने भगवान ने उसके लिये क्या सोच रखा है,जिससे फेरे पड़े उसका चेहरा तक नही देख पाई और भगवान ने उससे अलग कर दिया,जिससे मन के फेरे पड़े उसे भी छीन लिया,पर फिर भी अपने आप को मना लिया था उसने कि अली की यादों के सहारे जीवन काट लेगी पर तभी ये नया चक्कर!! नही अली की यादों के साथ जीवन सरल था पर किसी और के साथ अब वो अपना जीवन सोच भी नही सकती थी।। नही वो किसी सूरत मे ये शादी नही करेगी ,काश कुछ ऐसा हो जाता की एक बार प्रभा दीदी से मिलने मिल जाता है,सारी लाज शरम छोड़ वो उन्हें अपने दिल की बात कह देगी ….पर ऐसा सोचने के दूसरे ही पल उसे अपने ऊपर ही गुस्सा भी आने लगा,यहाँ सौ सौ बार चाची खोद खोद के पूछ रही पर एक बार भी तो कहा नही जा रहा कि वो अली के अलावा अब किसी के बारे मे नही सोच सकती ,प्रभा दीदी से कैसे कहेगी….यही सब सोचते सोचते रात उसकी आँख लग गई….सुबह माँ की आवाज़ से नींद खुली तो उसे याद आया की आज उसे मन्दिर जाना है।।

वो नहा धोकर तैय्यार हो कर आयी तब तक घर पे सारी तैय्यारियाँ हो चुकी थी,बड़े बड़े थाल भर के मिठाईयाँ,फल,बताशे,रेवड़ीयां,काजू बादाम सब उसकी माँ और चाचियां मिल कर सजा रही थी, एक तरफ खूब सारे तरह तरह के कपड़े रखे थे,चांदी की तशतरी मे चांदी के वर्क और गोटे से सजा नारियल रखा था,उसी के साथ खालिस चांदी की सुपारियां और पान के पत्ते थे।।उसने छोटी चाची की तरफ देखा तो वो उसे देख मुस्कुरा दी ,उसने माँ से पूछा”ये क्या हो रहा है माँ?”

“अरे तू ये क्या पहन के आ गई,सुन लाड़ो रेशमी सलवार दुपट्टा पहन के आ जा,भगवान ने मेरी सुन ली बेटी!! बलविंदर भाई साहब के घर वाले तेरे रिश्ते के लिये मान गये हैं,आज मन्दिर मे रणजीत को टीका कर देंगे हम लोग,और वो लोग भी तुझे चूनर ओढा देंगे ,बस फिर जल्दी ही तेरा ब्याह हो जायेगा।।”

रज्जो की आंखों में आंसू आ गये,उसने आंसू भरी आंखो से अपनी माँ को देखा “अरे ऐसे रोते नही मेरी बच्ची,कब तक हमारे पास रह पायेगी ,एक दिन तो अपने घर जाना ही है ना तुझे,मैं और तेरे बाऊजी क्या अमृत खा कर आये है,हमारे बाद क्या होगा तेरा?? अब तेरे बाऊजी की भी तबीयत सही नही रहती,इस बंटवारे ने कलेजे को चाक चाक कर दिया है उनके।।।कल तक साथ रोटी तोड़ने वालों को अपनी जान का प्यासा होते देखा है उन्होनें,वो तो भला हो शेख भाई का कि कैसे कैसे उन्होने गाड़ी मे बैठा दिया,वर्ना तो वहाँ हमारा कब्रगाह ही बननी थी ।।”
    कमला ने सर नीचे कर अपनी आंखे पोंछ ली।

रज्जो भारी मन से सीढिय़ां चढ़ती ऊपर अपने कमरे में चली गई,कपड़े बदल कर बाल काढ़ रही थी कि उसकी माँ ऊपर चली आई कुछ गहने लिये उसे पहनाने…. कानों मे बड़े बड़े सोने के झुमके डालने के बाद हाथों में उसी से मेल खाते कामदारी कड़े पहना दिये,और गले में पहनाने को  उसने बड़ा सुन्दर मीनाकारी किया हुआ लहौरी हार निकाला

“अरे गले में ये क्या डाला हुआ है लाड़ो,चल निकाल इसे ,तू ये पहन मेरी माँ का हार है ये,मेरी बिदाई में मुझे पहनाया था,ला आज तुझे पहना दूँ ।।”

कमला ने जैसे ही पेंडेंट को निकलना चाहा,रज्जो ने कमला का हाथ पकड़ लिया-“नही माँ!! इसे मैं नही निकाल पाऊंगी,इसके ऊपर से ही पहना दो ना जो पहनाना चाहती हो।”

“अरे सुहायेगा नही ,इसे उतार दे।”

“रहने दो ना भाभी,दो मुझे दो हार,मैं ऐसे पहना दूंगी की अन्दर वो छिप जायेगा जो लाड़ो उतारना नही चाह रही।”गुड्डो ने हार अपने हाथ में ले रज्जो को पहना दिया,कमला गुड्डो को हार दे नीचे चली गई, इसे जल्दी नीचे भेज देना गुड्डो।।।

“अली का दिया हुआ है क्या??”

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चाची की बात सुन रज्जो आंखे फाड़े उन्हें देखने लगी और अचानक ऐसे सवाल पे उसे कोई जवाब ही नही सूझा ।।

तैय्यार होकर रज्जो नीचे उतर गई,घर के सारे लोग मन्दिर को चले गये,गुड्डो को मन्दिर नही जाना था वो घर रुक गई ।।।

  मन्दिर में दोनो परिवार बड़ी राज़ी खुशी से मिले,, सारे नेग नावर हो गये,उस समय सगाई की अँगूठी दूल्हा दुल्हन एक दूजे को नही पहनाते थे,रज्जो के भाई ने रणजीत को टीका चढ़ा कर सोने की अँगूठी पहना दी,उधर रज्जो की होने वाली सास ने रज्जो को माणिक और पुखराज जड़ी अँगूठी पहना दी और वापस अपनी बहन और ननद देवरानी के साथ जाकर बातों मे लगी  –
                     “जीजी (ननंद) तुम्हें शायद मेरी बातें बेमानी लगें ,क्योंकि मेरे अलावा मेरे घर में ये सारी बातें कोई नही मानता,मेरे रिश्ते के भाई हैं वाराणसी के पण्डित हैं,मेरे मायके के पडौसी हैं मुझे सगी बहन से ज्यादा मानते हैं,ऐसी कुंडली बांचते हैं कि लगता है ब्रम्हा जी का लिखा ही पढ़ दे रहे……बुरा मत मानना जीजी ,लड़के की माँ हूँ ना कहीं आगे कुछ बुरा ना हो ,सब अच्छा बना रहे इसीसे कमला बहन से लड़की की  कुंडली मँगा ली थी,और रत्नेश भैय्या से बंचवा भी ली,जानती हो उन्होनें क्या कहा- कहा कि  लड़की तो खरा  सोना है,जिस से इसका ब्याह होगा फेरा  जुड़ेगा वो तो फिर हीरे मोती ही तोलेगा,और बोल रहे थे,समाज की लकीरों को पार करने वाली कुंडली है इसकी ,बड़े शुभ कदम है,बस एक बात खटक रही है,कि इससे जुड़ने के बाद लड़का अपने माँ बाप से दूर हो जायेगा, लड़की का गुरू ज़रा कमजोर है पर सूर्य की राशि है,ये माणिक और पुखराज जड़ी अँगूठी पहना दो और फिर देखो चमत्कार !!! एक एक कर लड़की के सौभाग्य के द्वार अपने आप खुलते जायेंगे।।
    बस जीजी मैनें खट से अँगूठी उठा ली,तुम तो जानती हो,रुपयों के मामले में मैं कभी ज्यादा नही सोचती,पूरे दो सौ की पड़ी अँगूठी पर मैनें भी सोच लिया,कौन सा दूसरे घर जाना है,कम से कम बहू का कुलच्छन दूर हो जायेगा।।”

  रज्जो की होने वाली सास हट्टी कट्टी ज़रा नीचे कद की डील डौल से पूरी सेठानी थी,जिसे अपने पति और पुत्रों पे अति अभिमान था,पहली दोनों बहुयें उसने खूब ठोंक बजा के अपने समाज के उंचे नामचीन परिवारों से ग्रहण की थी,रज्जो से ब्याह के लिये उसका हिन्दुस्तानी शन्कालू चित्त किसी तरह भी तैय्यार नही हो पा रहा था,उसके अनुसार लड़की के ग्रह दोष के कारण ब्याह की पहली रात ही उसका पति मर गया ,पर अपने पति के गर्जन के आगे उसकी एक ना चली।।

बलविंदर सिंह नई सोच के कायल थे,हिन्दुस्तान के उभरते समाज और उभरती राजनीति में अपना पैर अंगद के समान जमाये रखने के लिये उन्हें कुरीतियों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाना ही था,क्या ऐसा किया जाये इसी सोच मे थे कि बचपन के मित्र अजमानी से मिलना हुआ,दोनो साथ साथ संतनगर के मोहल्ला जाफरी के सरकारी स्कूल मे छठी जमात तक पढ़े थे,उसके बाद बलविंदर अपने बाप दादाओं के साथ हिन्दुसतान आ गये और यहीं के हो गये…..जब इतने सालों बाद दोनो मित्र मिले तो खुशी से दोनों के आंसू निकल पड़े,जब अजमानी ने अपना दुखड़ा सुनाया तो दर्द से बलविंदर का कलेजा तो फटा पर आंखे एक नये विचार को सोच चौड़ी हो गये,उन्हें रज्जो में अपना शानदार चमचमाता राजनैतिक पद दिखने लगा,उन्होनें खुद होकर रज्जो का हाथ अपने सबसे निकम्मे और आवारा लड़के के लिये मांग लिया……ऐसे अकस्मात स्नेह वर्षा के लिये अजमानी तैय्यार नही थे उन्हें अपनी किस्मत पे भरोसा ही नही हो पा रहा था,उन्होनें घर पे जैसे ही बताया घर की औरतों ने एक स्वर में उनकी बात को स्वीकार लिया,कमला के खुशी से आंसू निकल आये,उसे लगा इतने दिन उसकी बेटी परायों के साथ रह आयी है,ठीक है अली के साथ ही थी पड़ोसी लड़का है भाई जैसा है ,पर ये तो हम जानते हैं,किस किस को इस बात की कैफियत दी जा सकती है,और इतने दिन से अपने दुख को समेटे घर में खुशिओं की बारीश के छींटे पड़ गये,आनन फानन में ही मन्दिर में टीका चढ़ाया गया और चार दिन बाद की शादी का मुहूर्त पक्का कर दिया गया।।।
   लड़के का खुद को यूं घूर घूर के देखना रज्जो को अन्दर से सुलगा गया…. गुस्से में भरी रज्जो वहाँ सारा समय चुप ही बैठी रही,इतनी चुप की जैसे सांस लेने में भी कष्ट हो,सब कुछ निपटने के बाद घर आकर ही उसने चैन की सांस ली।।

नीचे आंगन में सभी बैठे भावी समधियाने की तारीफों में लगे थे,गुड्डो ने सबको चाय दी और अपनी और रज्जो की चाय लिये ऊपर चली गई ।।

“ले लाड़ो !! तेरी देसी चाय !!! पी ले ,तू भी थक गई होगी।।”

देसी चाय सुन के रज्जो के चेहरे पे जो चमक आती थी ,वो आज नदारद थी,चेहरा जैसे एक ही दिन में सूख के कुम्हला गया था।।

“अरे ऐसा क्या हो गया हमारी राजकुमारी को,इतना क्यों सूखी जा रही है,अरे हाँ मैं बताना भूल गई,वो तेरी प्रभा दीदी हैं ना,वो आई थी आज तुझसे मिलने।”

“क्या!! प्रभा दीदी आई थी,कैसी हैं वो,क्या कहा उन्होनें,मुझे याद कर रही होंगी ना,किसके साथ आई थीं?”

“अरे बस बस ! इतने सारे सवाल एक साथ,सब बताती हूं,ज़रा सबर तो कर!! अपनी किसी कॉलेज की सहेली लता के साथ आई थी,दिल्ली 6 से हमारा घर दूर भी तो पड़ता है,एक घंटा तो उन बेचारीयों को यहाँ पहुंचने में लग गया,तुझे बहुत याद कर रही थी।।”

“और क्या कहा उन्होनें?? मैं मिल भी नही पाई प्रभा दीदी से,देखो यहाँ आये एक महीना बीत गया,आखिर वही आई मुझे मिलने,क्या सोचती होंगी कितनी खुदगर्ज लड़की है।””

“मुझे तो नही लगा तेरी प्रभा तेरे बारे मे ऐसा कुछ सोचती है,चल अब मै जा रही नीचे….शाम के खाने की तैय्यारी भी तो करनी है,कल से तो फिर तेरी शादी की तैय्यारियों में लगना है।।”

ये कह कर गुड्डो वहाँ से उठ गई,जाते जाते पलट के उसने कहा”अरे एक बात और प्रभा कह रही थी अली की तबीयत बहुत खराब है,पिछले दस दिन से बिस्तर पे पड़ा है।”गुड्डो अपनी भेद भरी नज़र से रज्जो के चेहरे के बदलते रंगों को एक पल देख कर नीचे चली गई ।।।

क्रमश:

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aparna..

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Abhishek kr singh
Abhishek kr singh
1 year ago

बिल्कुल गंगा नदी की लंबाई 2525 km की तरह लंबा यह पाठ भी है लेकिन अच्छी बात यह हर पैरा में नई चीज़ है, ग़ज़ल, एहसास, मिलन, बिछुड़न और प्रेम अगाध प्रेम, रज्जो क्या कह पाएगी दिल की, लौट पाएगी क्या अली तक, उसकी बीमारी क्या पिघला जायेगी उसके मन को चाची की उम्र भी अधिक नहीं है इसलिए समझ गई, आगे कल पढ़ने को उत्सुक, बढ़िया भाग है दीदी….💐⭐🙏