
चिनाब किनारे -6
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यहाँ से हमारी कहानी मुडती है दिल्ली की तरफ, दिल्ली की रोशनियाँ,वहाँ की रंगीनियाँ उस समय अपने शबाब पे हुआ करती थीं,उस समय की दिल्ली का वर्णन करने के लिये मैनें जो किताबें पढ़ी,उनमें मुख्य किताब जिससे मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुई उसकी लेखिका हैं “कुर्रतुलएन हैदर”
मैनें जो दिल्ली उतारी है,वो पूरी तरह से हैदर जी की आंखो देखी है,उस समय ताजा ताजा अंग्रेजों की रुखसती हुई थी,वो चले तो गये थे पर अन्ग्रेजीयत बुरी तरह से छोड़ गये थे,उस समय की ज्यादातर दुकानों पर अन्ग्रेजी मे नाम लिखे होते थे, सारे सरकारी काम दस्तावेज अन्ग्रेजी में होते थे, इसके साथ ही हिन्दुस्तान के खानदानी रईसों के दिलों दिमाग पर भी अंग्रेजी छायी हुई थी, जंग खतम हो चुकी थी,और दिल्ली पे बहार आई हुई थी।
कहानी शुरु करने के पहले एक और बात ,उस समय बोली जाने वाली ज़बान हिंदुओ और मुसलमानों की लगभग एक सी ही होती थी,क्योंकि अंग्रजों के आने के पहले मुगल शासन था,और सारे मुल्क मे हिन्दी और उर्दू की मिली जुली ज़बान ही बोली जाती थी(बल्कि आज भी सरकारी दस्तावेज़ों मे हम कई जगह उर्दू के शब्द लिखते हैं) तालीम भी वैसी ही दी जाती थी, लगभग सभी को उर्दू पढ़ना लिखना आता ही था,उसके बाद अंग्रजों के 200साल के शासन ने आभिजात्य वर्ग को एक नई भाषा की पहचान दी ,अंग्रेजी की।।
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इतने सालों की खोयी आज़ादी मिल चुकी थी,देश आज़ाद था,लोगों के खयाल आज़ाद हो चुके थे,पूरे हिन्दुस्तान ने सालों बाद एक नई करवट ली थी।।
लोधी,सूरी,तुगलक,खिलज़ी,मुगल और फिर अंग्रेजों के जाने के बाद भारत खुल कर सांस ले रहा था ,विभाजन से जुड़ी त्रासदी भयानक थी ,वीभत्स थी,जो भुक्तभोगी थे वही उस पीड़ा को समझ सकते थे,पर उस दुनिया के पार यहाँ एक और नई दुनिया प्रकाश में आ रही थी,रोशनी की दुनिया चमत्कारों की दुनिया,दिल्ली की रंगीनियों की दुनिया…..
करोड़पति व्यापारियों,और उच्च अफसरों की लड़कियाँ …हिंदू सिख मुसलमान ,लम्बी लम्बी मोटरों मे उड़ती फिरती नित नई पार्टी और जलसों का हिस्सा बनने लगी थी।।ये सब नई नई अंग्रेजीयत थी जो उनके सर चढ़ कर बोल रही थी,दिल्ली और आस पास के रईसों के चोंचले नित नये रंगों मे निखर रहे थे।।
लोग अंग्रेजी तहज़ीब और अंग्रेजी सिनेमा के दीवाने हो रहे थे,दिल्ली के नौजवान रईसों की शामें बालरुम डांस करने मे या सिनेमा देखने मे खुशगवार हो रही थी।।
कभी इन्द्र्पृस्थ कॉलेज में कन्सर्ट हो रहा था तो ,कभी मिरांडा हाऊस में …….कभी लेडी इरविन में कभी लेडी होर्डीँग में ।
चेम्सफोर्ड क्लब,रोशनआरा इम्पीरियल,जिम खाना हर तरफ अलिफ लैला सी बहार थी।।
नौजवान फ़ौजी अफसरों और सिविल सर्विस के बिन ब्याहे अधिकारियों का झुंड इन रोशन पनाहगारों के आस पास डोलता फिर रहा था,आये दिन ही रसीली और रंगीन पार्टियों की बहार हो रही थी,इन अधिकारीयों अफसरों की भीड़ मे कुछ नये बने रईस भी अपनी जगह बनाने को आतुर थे,अपने व्यापार को आगे फैलाने के लिये भी इस भीड़ भाड़ का हिस्सा बनना बेहद ज़रूरी था….
अली जब भी दिल्ली आता निकल्सन मेमोरियल के पास ही अपने दोस्त खुशबख्त सिंह के आलिशान घर पे ही रुका करता था,खुश्बख्त आगरे का रहने वाला राजपूत था और फौज मे मेजर था, लम्बा चौड़ा गोरा चिट्टा साढ़े छै: फुट का नौजवान अली का जुड्वा भाई लगता था।।दिखने में वैसे भी ऐसा सुन्दर था कि आंखे जुड़ा जाये उसपे मेजर का तमगा सोने पे सुहागा था ।।गालिब का ज़बरदस्त चाहने वाला था,और बात बात पे शायरियाँ बोलना उसका शौक था…..मेजर और अली दोनो ही लड़के पढ़ने के शौकीन थे,इसीसे मेजर के घर का एक कमरा चीनी जापानी रुसी हिन्दी और अंग्रेजी की कविताओं की किताबों से पटा पड़ा था।।
ये वो समय था जब आभिजात्य वर्ग खुद को सिविल वालों के लिटररी का हिस्सा बन जाने के लिये जी जान से जुटा पड़ा था,उस पर ये दोनो तो असल में उस सर्किल का हिस्सा बनने के पूरी तौर पे काबिल थे।।अली का दिल्ली का समय दिन मे अपने व्यापार के काम में और शामें अक्सर खुश्बख्त के साथ किसी मुशायरे में या किसी कौन्सर्ट मे बीता करती थी…… इस दफा पहली बार ही हुआ की अली बिना किसी तार के खुश्बख्त के पास पहुंचने वाला था।।
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अली लारी को भगाये चला जा रहा था,उसे समझ आ गया था ,कि वहाँ और रुकना उसके और रज्जो के लिये सही नही होगा….. गाड़ी सीधी दीनपनाह को जाके रुकी ,वहाँ आसपास पूछताछ करने पर महिला आश्रम का पता मिल गया,सारी लड़कियों को वहाँ उतार कर उसने चैन की सांस ली।वहाँ की मुख्य अधिकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रह चुकी थीं,ये पता चलते ही अली को और भी तसल्ली हो गई और रज्जो को लेकर वो वहाँ से निकल्सन की तरफ मुड़ गया।।
घर पहुंचते में उन्हें रात हो गई थी,खुश्बख्त का पुराना नौकर रामदीन घर पे मौजूद था,उसिने दरवाज़ा खोला,और अली को देखते ही उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।।
“कैसे हो बेटा? वहाँ तो सुना बड़ी आफत मची है,ऐसे मे इधर आना कैसे हुआ? और ये साथ मे लड़की कौन है,तुम्हारी बहन है क्या??”
थकान से परेशान अली इतने सारे सवाल सुन और परेशान होने लगा
“रामदीन पहले तुम गर्मा गर्म चाय पिलाओ,फिर सब कुछ बताता हूँ,और नहाने के लिये पानी भी चढ़ा देना,जाने कितने दिन हो गये नहाया ही नही हूँ,शायद दो या तीन दिन हो गये होंगे।”
“पूरे पांच दिन से नही नहाए हैं आप,हमारी शादी वाले दिन ही नहाए होंगे,उसके बाद से कहाँ?”
“शादी!! बशर मियाँ शादी कर के आ रहे हो तुम ? तो ये दुल्हन है तुम्हारी? पर इतनी अफरा तफरी मची है वहाँ,ऐसे मे शादी करने की क्या सूझी? शादी की है ना,भागा के तो नही ले आये हो कहीं।”
“अल्ला कसम रामदींन बहुत थका हूँ,एक चाय पिला देते ,कर्जदार रहूँगा जिंदगी भर तुम्हारा।
“अरे अभी गया अभी आया हुजूर,बस आप चुटकी बजाएं और बन्दा चाय लेकर हाजिर।”
“अमा इतनी जल्दी भी नही,थोड़ा अदरख इलायची डाल के खूब खौला के देसी वाली चाय पिलाना ,विलायती पानी उबाल के मत परोस देना, अलग अलग कटोरे में चिनी और पत्ती के साथ।”
इतने दिन बाद रज्जो पहली बार अली का ये रूप देख रही थी,उसके सामने तो वो सिर्फ हाँ हूं में ही बात करता था,और कई बार उतना बोलने की भी ज़रूरत नही समझता था,बस सर हिला के काम चला लेता था।।
“काका जी मुझे गुसलखाना बता दीजिये,मै भी नहा लूं ।” रज्जो ने रामदीन से कहा, रामदीन को ये नई नवेली जोडी बड़ी भा रही थी,उसने खूब मुस्कुरा कर रज्जो को एक तरफ इशारा कर दिया,रज्जो अपना बक्सा उठाये जाने लगी तब अली जल्दी से उठ कर उसके पास गया और उसका बक्सा ले लिया,
“चलो मैं दिखा देता हूँ ,इधर गलियारे को पार करने के बाद दाहिनी तरफ जो आखिरी दरवाजा दिख रहा है ना ,वही गुसलखाना है,उसके बाजू से लगा कमरा मेहमानों का है,वही तुम्हारा सामान रख देता हूँ ।”
“अच्छी बात है! मेहमानों का मतलब आपका कमरा है ना?”
“नही मेरा कमरा तो ऊपर है”अली को समझ आया कि वो जल्दबाजी में कुछ गलत कह गया,फिर उसने अपनी बात सुधारी और कहा
“मेरा कमरा ऊपर है,जिसमे अभी कुछ काम चल रहा तो तब तक तुम नीचे ही रहो,जैसे ही कमरा ठीक हो जायेगा,ऊपर चली आना।”
“मैं ऊपर क्यों आऊंगी,क्या हम जिंदगी भर आपके दोस्त के घर ही रहने वाले हैं क्या? पहले आप कभी कभी आते थे,तब की बात अलग थी,अब तो हमे अपनी गृहस्थी जमानी है ,है ना,तो कल से ही अलग घर ढूंढना शुरु करना है।”
“हाँ सही कहा ! जाओ नहा लो,मैं बाहर हूँ,किसी चीज़ की ज़रूरत हुई तो पुकार लेना।”
अली रज्जो को वहाँ छोड़ बाहर आकर बैठ गया,अभी उसने चाय का प्याला मुहँ से लगाया ही था कि खुश्बख्त भी पहुंच गया।
“अरे बशीर मियाँ,क्या बात है,सब खैरियत तो है,वहाँ पाकिस्तान मे सब कैसे हैं,यहाँ तो सुनने में आ रहा,बड़े बुरे हालात चल रहे वहाँ,अचानक कैसे आना हुआ?”
ये कहते कहते खुश्बख्त बशीर के गले से लग गया,दोनो बिछड़े यार बड़े दिनों बाद मिले थे…
“हालात तो वाक़ई बहुत बुरे हैं,क्या बताऊँ,क्या ना बताऊँ,बड़ी मुसीबत मे पड़ा हूँ,तफसील से सारी बातें बताऊंगा,अभी सांस तो ले लूँ ।”
“”बिल्कुल सांस भी लो ,आराम भी लो,और एक नई विलायती ला कर रखा हूँ उसे भी लो,”ये कहते कहते खुश्बख्त ने किनारे पे रखी अखरोट की लकड़ी की बनी आदमकद आलमारी में सजे सेलर से एक नई चमचमाती बोतल और दो कांच की गिलास निकाल कर टेबल पर सजा दी।।
“अमा तुम चाय पीने बैठे हो अभी,मतलब वाकई हालात बहुत खराब हैं अभी,आओ थोड़ा गला तर कर लो,उसके बाद कुछ खाया जाये ।।।”
खुश्बख्त ने रामदीन को आवाज़ दी और टर्की बनाने की हिदायत दे ही रहा था,कि नहा कर रज्जो अपने भीगे बालों को हाथों से झटक झटक कर पोछतें हुए वहाँ आ गई….रज्जो को देखने के बाद वो वापस मुड़ कर अली की तरफ देखने लगा ,आंखों मे सवाल लिये कि ये लड़की है कौन?
“नमस्ते जी! “रज्जो ने खुश्बख्त से जैसे ही ये कहा ,वो कूद कर रज्जो की तरफ मुड़ गया।
“नमस्ते जी नमस्ते ! आपका बहुत बहुत स्वागत है मेरे गरीब खाने मे,किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो फर्माइयेगा,वैसे आप की तारीफ…..
अभी खुश्बख्त ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि अली बोल उठा- “ये रज्जो है,राजेश्वरी! मेरे साथ ही आईं हैं ।”
” दुल्हन हैं बशर मियाँ की !!,शादी कर के आ रहे हैं सीधा पाकिस्तान से ” रसोई से खाने की ट्रे हाथ में पकड़ कर आते हुए रामदीन ने कहा।
“क्या शादी कर ली ,कब?? बशर तुमने एक दफा बताया भी नही,मैं भी इसी बहाने पाकिस्तान आ जाता,और मियाँ यहाँ मुल्कों के बीच ऐसी आग लगी है ऐसे समय में शादी करने की क्या सूझी, इतनी भी क्या जल्दी पड़ी थी,कौन भागा जा रहा था भाई।”
खुश्बख्त को अचानक रज्जो का ध्यान आया ,जो इतनी देर से चुपचाप एक किनारे खड़ी थी।।
“भाभी जी आप आईये ,इधर तशरीफ रखिये ,आराम से बैठिए,रामदीन एक गरम चाय और ले आओ,लिजिये भाभी जी आप तब तक पकौड़े खाईये।।”
मुस्कुराती हुई रज्जो ने खुश्बख्त से बोतल को दिखा कर पूछा
“ये क्या रखा है?”
“कुछ नही तुम्हारे मतलब का नही है,तुम चाय पीयो,और इनसे मिलो ,ये मेरे दिल अज़ीज़ दोस्त हैं मेजर खुश्बख्त सिंह…. आगरा मे इनका पुश्तैनी घर है,पर ये यहाँ रहतें हैं,कभी काम से देहरादून चले जातें हैं,कभी सियाचीन,अभी पिछली मर्तबा छै महीने नेफ़ा मे बीता कर आ रहें हैं।”
ये सब बताते बताते अली ने बोतल और ग्लास उठा कर वापस आलमारी मे डाल दी।।
“नेफ़ा तो शायद वही जगह है ना जहां चीनियों से जंग चल रही थी हिन्दुस्तान की।”रज्जो ने पूछा।
“हाँ,बिल्कुल वही जगह है जी,चीनियों के ऐसे बड़े बड़े बम गोले खा कर आयें हैं कि क्या बताएं,पर हमारे हिन्दुस्तानी सैनिक भी मानने लायक हैं,चुन चुन कर मारा है उन्हें, पर अभी भी पूरी तरह से नेफ़ा की सीमा पर शान्ती नही हो पाई है,छिटपुट चल ही रहा है।”
रज्जो ने अपनी चाय खतम की और बरतन समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी,खुश्बख्त ने उसे टोकने की कोशिश की पर अली ने इशारे से उसे मना कर दिया,रज्जो के जाने के बाद अली खुश्बख्त से मुखातिब हुआ-
“अभी ज्यादा कुछ नही बता पाऊंगा ,बस एक बात ध्यान रखना,मुझे अली मत बुलाना,और वक्त मिलते ही रामदीन से भी कह देना,अभी कुछ समय के लिये ये भूल जाओ कि मैं एक मुसलमान हूँ ।”
“मतलब क्या कहना चाहते हो बशर”?
“मतलब ये कि वो लड़की हिंदू है,वो नही जानती कि मैं मुसलमान हूँ।”
“या अल्लाह! तो तुमने अपना मज़हब बिना बताये ही इससे निकाह कर लिया,अमा ऐसा भी क्या गदर मचा था तुम्हारे अन्दर ,दिल्ली की तितलियाँ कम पड़ गई थी तुम्हारे लिये,क्या कहर किया यार।”
” अरे कोई निकाह विकाह नही पढ़ा,समझो बात को।”
“अरे तब तो और गलत कर डाला ,बिना शादी के ही लड़की भगा लाये हो।”
“या खुदा! कैसे तुम्हे समझाऊँ,अभी जितना कहा उतना याद रखो,और रामदींन से भी कह दो…
“क्या कहना है रामदीन काका से,मैं कहे देती हूँ, और सुनिये आप भी नहा लिजिये ,मै जा रही काका के साथ खाना लगा देती हूँ ।”
रज्जो के जाते ही अली ने फिर कहना शुरु किया
“इस सारे ज़लज़ले में इस लड़की का पूरा खानदान तबाह हो गया,इसके पति का नाम भी बशर था,ये किसी गलतफहमी मे मुझे अपना पति समझ बैठी है,इसके अम्मी अब्बू यहाँ दिल्ली ही आ गये हैं वो मेरे पड़ोस वाले थे,बस उन्हे खोज के इसे उनके सुपुर्द कर दूँ,उसके बाद सुकून से वापिस पकिस्तान चला जाऊँगा।”
“तो इसे सारी बात बता क्यों नही देते।”
“कैसे बताऊँ कि शादी की पहली रात ही उसके पति को मैनें मार डाला,क्या ये सुनने के बाद वो मेरे साथ रहेगी,यकीनन वो चाहेगी की मेरी जान ले ले ,पर ये कर पाना उसके बस की बात नही ,वो पलट कर अपनी जान ले लेगी,वैसे ही गुनाहों में डूबा बैठा हूँ,ये एक और जान मैं अपने सर नही ले सकता ,मैं जानता हूँ मर के दोजख ही जाऊँगा,लेकिन उसके पहले इस लड़की को हिफाज़त से इसके घर वालों तक पहुँचा दूँ,तो मेरे गुनाहों का बोझ कुछ कम हो जायेगा,कम से कम चैन से मर तो पाऊंगा।।”
“उफ्फ ये क्या गज़ब कर डाला ,तुम तो ऐसे ना थे आखिर बात क्या हुई जो तुमसे ऐसा खून खराबा हो गया?”
“पता नही उस समय किस शैतान ने मेरे दिमाग को काबू कर रखा था,पर सच कहता हूँ,अल्ला कसम अब बहुत पछता रहा हूँ,शर्मिंदा हूँ अपने किये पे।”
“सम्भालो खुद को बशर ,वो आती ही होगी।”
अली उठ कर नहाने चला गया,तभी रज्जो हाथ मे तशतरी लिये वहाँ आई और टेबल पर रखने लगी।
“आप रहने दीजिये,रामदीन काम देख लेगा ,आप आराम से बैठिए,थकी होंगी आप।”
रज्जो ने अली को वहाँ ना देख कर खुश्बख्त से पूछा -“ये नहाने चले गये क्या,मुझसे ज्यादा तो ये थके हैं,जाने कब से चैन की नींद सोये नही…. मेरा तो फिर भी ठीक है,इन्होने तो अपना पूरा परिवार इस हादसे मे खो दिया,इसिलिए ऐसे गुमसुम से हो गये हैं,ज्यादा कुछ बोलते भी नही।”
“अरे रज्जो जी आपने बशर को जाना ही कहाँ है, इनसे ज्यादा बोलने वाला हमारे बीच और कोई नही है,क्या नज़्मे गातें हैं क्या बताऊँ ,एक से एक शेर इन्हें ज़बानी हैं, कल चलिये आप भी हमारे साथ… लाजवाब मुशायरा होना है,एक से बढ़ कर एक शायर आने वाले हैं,वैसे आपको शौक है या नही ,नही जानता पर बशर को तो शेर ओ शायरी का बहुत शौक है,क्या उम्दा गजलें पढ़ता है,वाह तबीयत खुश हो जाती है।।
अली के आते ही तीनों ने खाना खाया और रज्जो नीचे वाले कमरे में सोने चली गई,रात काफी देर तक दोनो दोस्त कहाँ और कैसे रज्जो के घर वालों को ढूंढना है,इसकी तदबीर बनाते रहे…. दोनों थके हारे कब नींद की गोद मे लुढ़क गये,उन्हें पता भी नही चला।।
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अगले दिन सुबह अली तैय्यार हो कर अपनी दुकान को चला गया,उसका वहाँ का काम ही यही था,लखनऊ और आस पास के इलाकों से सस्ते दामों पर कच्चा माल उठा कर अपने कारखाने में कपड़े तैय्यार करवा कर वो लाहौर और बर्मा को भेजा करता था,इतने दिनों से सारा काम ठप पड़ा था।।।वहाँ पहुंचते ही उसने अपनी खैरियत की खबर का तार अपने घर वालों को कर दिया,उसके बाद जो काम मे डूबा ,शाम को ही उसे फुरसत मिली…..
अब धीरे धीरे ये रोज का सिलसिला होने लगा ,वो सुबह रज्जो के जागने से पहले ही निकल जाता और जब तक वापस लौटता तब तक वो सो चुकी होती,अपने काम के साथ साथ उसका एम्बेसी का चक्कर भी लगता ही रहता कि कही से उसके घर वालों की कोई खोज खबर मिल जाये।
खुश्ब्ख्त राम दीन सभी रज्जो का दर्द समझ रहे थे,पर कोई भी उसकी मदद करने मे लाचार था, आखिर एक दिन खुश्बख्त ने रज्जो के सामने फिर से पढ़ाई शुरु करने का प्रस्ताव रखा,और इस प्रस्ताव पे अली ने भी मुहर लगा दी ,अब रज्जो ने लेडी इरविन कॉलेज मे दाखिला ले लिया।।।
उर्दू में अब तक की तालीम हासिल की हुई रज्जो के लिये कॉलेज दो ही दिनों में जी का जन्जाल होने लगा,तब उसकी अंग्रेजी दुरुस्त करने का जिम्मा उठाया खुश्बख्त ने ,उनकी एक महिला मित्र थी प्रभा!!
प्रभा नई फसल की नई पौध थी,उँची सांवली दुबली सी प्रभा केरल की थी,और इसिलिए अंग्रेजी पे उसकी अच्छी पकड़ थी,वो वहाँ लेडी इरविन में रसायन शास्त्र पे कुछ रिसर्च कर रही थी
मिरान्डा हाऊस में हुए यूथ फ़ैस्टिवल में प्रभा और मेजर एक दूसरे से पहली बार मिले थे,और उसके बाद इत्तेफाक़ से हर शाम दोनों कहीं ना कहीं टकरा ही जाते थे,वो महीना पूरा बीतते बीतते प्रभा मेजर की मिस्ट्रेस के नाम से पूरे इरविन में विख्यात हो चुकी थी।।
परीक्षाओं के समय पढ़ाई में पूरी तरह डूब जाने वाली प्रभा ,परीक्षाओं के बाद मेजर के साथ दो तीन बार पहाडों पर हवा बदली कर आई थी,कभी देहरादून,तो कभी अलमोड़ा उनका खास आरामगाह हुआ, करता था,दोनों मे बिल्कुल वैसा ही प्यार पनप चुका था,जैसा कि अमूमन पति पत्नि के बीच हुआ करता है,जब कभी मेजर पी पिला कर प्रभा की ज़बरदस्त पिटाई भी कर देता था, और ऐसे समय में नये ज़माने की प्रभा अपना बक्सा लटकाये वापस अपने हॉस्टल पहुंच जाती थी….हर बार ‘ अब तुम्हारा मुहँ इस जनम में कभी नही देखूँगी ‘ की कसम खा कर आने वाली प्रभा,रो धो के गुस्सा उतरने के बाद वापस मेजर के पास दौडी चली जाती थी…..
अभी कुछ समय से दोनो के बीच सब ठीक चल रहा था,मेजर ने रज्जो की सारी कहानी प्रभा को सुनाई,जिसे सुन कर वो बेचारी भी पिघल गई,और दूसरे ही दिन रज्जो से मिलने चली आई।।
सफेद सलवार और धानी कुर्ती में रज्जो को देख कर प्रभा का चेहरा खिल उठा-‘
“वाह वाह हमारे बशर मियाँ की पसंद की तो दाद देनी पड़ेगी,बहुत खूबसूरत गुलाब चुना है आपने।”
अली के दिल में प्रभा के लिये बहुत इज्जत थी, वो दिल से चाहता था कि प्रभा और मेजर शादी कर लें,पर कुछ कारणों से दोनो ने अब तक शादी नही की थी,इसके बावजूद वो दोनो के प्यार को बहुत पवित्र ही माना करता था।।
प्रभा की बात सुन अली ने चुपचाप सर झुका लिया,और रज्जो मुस्कुराने लगी।
“नही बशर मियाँ ऐसे काम नही चलेगा,,आपने तो अपने कोहिनूर को बिल्कुल ही छिपा रखा है,हम बैठे हैं ना तराशने के लिये,चलिये आप दोनो भी तैय्यार हो जाइये,आज मिरान्डा हाऊस मे कल्चरल मीट है,एक से बढ़ कर एक कलाकार आने वाले हैं,मैं तब तक ज़रा रज्जो जी को तैय्यार कर के लाती हूँ ।”
प्रभा अपने कुछ कपड़े हमेशा मेजर की आलमारी में भी रखा करती थी,उसी मे से निकाल कर पिस्ते के रंग की साड़ी उसने रज्जो को पहना दी ,उसकी लम्बी लम्बी दो चोटियों को खोलकर सुलझा कर फ़्रैंच बुफो तैय्यार कर दिया,और आंखों मे गहरे सुरमे की रेखा आन्ज दी,साथ ही अपने गले से निकाल कर सच्चे मोतियों की सतलड़ भी उसे पहना दी,मन भर के रज्जो को सजाने के बाद उसने उसे देखा और अपनी ही की सजावट पे खुद ही की दाद दे दी,जब वो रज्जो को नीचे लेकर आई तब तक दोनो दोस्त तैय्यार हो चुके थे।।
“ओहो क्या बात है,प्रभा तुमने तो रज्जो जी का हुलिया ही बदल दिया।”
“और क्या! मैनें तो देखते ही इस हीरे को पहचान लिया था।”प्रभा और मेजर ज़ोर से हंस पड़े,पर इन सब बातों से अलग एक जोड़ी आंखे ऐसी भी थी जो रज्जो पर से हट नही पा रही थी,जब रज्जो ने अली को देखा तो अली ने झेंप कर अपनी नजरें नीची कर ली।।
चारों वहाँ से मेजर की राजसी ब्यूक मे सवार होकर मिरांडा हाऊस को चल पड़े,सामने अली के साथ मेजर और पीछे दोनो औरतें बैठी।।
रोशनीओं से जगमगाता मिरांडा हाऊस दूर से किसी जंगी जहाज़ सा खड़ा दिखाई दे रहा था, बहुत तेज़ रोशनी और तेज़ आवाज के शोर गुल और भीड़ भाड़ को देखकर रज्जो की तबीयत घबराने लगी,पर शर्म के मारे किसी से कुछ कह ना सकी।।
वहाँ इधर से उधर रेशमी साड़ियों की सर फर्र करती मचल्ती एक से एक सुन्दरियों को देख रज्जो को अपने गंवारपने पे बेहद शर्म आने लगी,उसे लगा कैसे भी किसी तरह से यहाँ से बच के भाग जाऊँ, उसने इधर उधर देखा पर अली उसे आसपास कहीं नज़र नही आया,प्रभा भी अपनी कुछ सखियों से बातें करने में लगी थी,मेजर अपने दोस्तों मे गुम था,तभी उसके पास से गुजरते हुए किसी ने अंग्रेजी मे उसे कुछ कहा जो बेचारी को बिल्कुल ही समझ नही आया…. तभी उसके कन्धे पे किसी ने हाथ रखा ,उसने मुड़ कर देखा तो वो कोई विदेशी (रूसी ) मेहमान था ,उसने अंग्रेजी मे रज्जो से पूछा कि “क्या तुम्हें प्यास लग रही है।”बात को ना समझ पाने के कारण रज्जो ने हां मे सर हिला दिया , जिसका कुछ और ही मतलब समझ कर उसने रज्जो को एक ग्लास थमा कर इशारे से उसे पीने को कहा,घबड़ाहट में रज्जो ने पूरा ग्लास एक सांस मे गटक लिया…..
पीने के बाद कडवाहट से उसके मुहँ का स्वाद खराब होने लगा,और कम होने की जगह उसकी घबराहट और बढ़ गई,वो लोगों की भीड़ में अली को ढूँढने लगी और जब अली कहीं नही मिला तो चुपके से वहाँ से बाहर निकल गई,बाहर ठंडी-ठंडी हवा मे उसे सुकून मिलने लगा और उसे पता ही नही चला की चलते चलते कब वो काफी दूर निकल आई,चारों तरफ फैले अन्धेरे को देख उसे एहसास हुआ की उसने कितना गलत कर दिया, उसे तो ये तक नही पता था की मेजर का घर कहाँ है,अगर उसे कोई मिले भी तो वो क्या पता बतायेगी अपना,रज्जो को अपने खुद पर बहुत गुस्सा आने लगा ,ऐसी बेचारगी में उसके पास कोई रस्ता नही बचा था,तभी उसके ठीक पीछे कोई गाड़ी आकर रुकी और उसे अचानक सरहद वाला वो मन्जर याद आ गया,जब इसी तरह की किसी गाड़ी मे उन्हें जबरन बैठाया जा रहा था,उसने डर से अपनी आंखे बन्द कर ली,तभी किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रखा और उसका नाम पुकारा ….. रज्जो
वही जानी पहचानी गहरी आवाज और वही पहचाना स्पर्श,,,रोते रोते रज्जो अली के गले से लग गई ।।।।

रज्जो अभी भी यह सोच रही है, दोनों की गाड़ी पटरी पर कैसे आए, वह अली को पति मानकर उसकी ओर खिंची जा रही है और अली उसकी मदद करके अपने गुनाह को कम करना चाहता है … वह आज भी खुश नहीं है चिंतित है पर रज्जो की वह दुनिया है अब आगे ना जानें क्या होगा, दिल्ली का बेहतरीन वर्णन है, १९१२ में जब से दिल्ली राजधानी बनी तब से अंग्रजों ने गोद में उठा लिया था और दिल्ली रॉयल हो गई थी, बहुत अच्छा वर्णन दीदी, बेहतरीन भाग…💐🙏