
चिनाब किनारे -4
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रज्जो का चेहरा देखते ही कितना सुकून मिल गया था अली को,लोगों को हाथों से दूर करते हुए जल्दी ही अली रज्जो तक पहुंच गया।।।भीड़ ऐसी थी कि बैठने क्या खड़े होने की भी जगह नही हो रही थी।। चार लोगों के बैठने की जगह पे दस दस लोग अटे पड़े थे,जगह जगह लोगों का सामान रखा था,उसपे भी बच्चे बूढ़े जिसे जगह मिल गई थी ,बैठ गया था,जिसे जगह नही मिली वो खड़ा रह गया था, पर गाड़ी वहाँ से छूटने के बाद भी लोगों के चेहरे पे सुकून नही दिख रहा था,सभी के चेहरे पे एक डर काबिज़ था कि कहीं आतताइयों के हाथों मारे ना जाएँ,सबने सुन लिया था कि सुबह मे जो गाड़ी यहाँ से रवाना हुई थी,उसमें कुछ दूर जाने के बाद गाड़ी को रोक के कोई चालीस पचास लोग चढ़े और मार काट मचा दी थी,वही डर अभी भी लोगों को सता रहा था….पूरी गाड़ी में हाहाकार मचा था,कहीं बच्चे चिल्ला के रो रहे थे,कही औरतें उन्हें चुप कराने उनसे ज्यादा तेज़ आवाज मे चिल्ला रही थी,पर इस सारे हो हंगामे के बावजूद दो आत्माएँ वहाँ ऐसी भी थीं जो इस वक्त सब से चैन और सुकून में थीं ….रज्जो इसलिए क्योंकि उसके हिसाब से वो अपने पति के साथ थी और अली इसलिए कि कुछ देर पहले उस भीड़ में खो गई रज्जो उसे मिल गई थी।।।।।
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गाड़ी बहुत ही धीमे धीमे आगे बढ़ती रही ,पर आखिर अपने मकाम पर पहुंच ही गई ।।
सरहद के पार एक अस्थाई व्यवस्था की गई थी जिसमें पाकिस्तान से आने वालों के नाम दर्ज कर उन्हे शरणार्थियों के लिये बने कैम्प में भेजा जा रहा था,जहां से उनके हिन्दुस्तान भेजने की व्यवस्था की जा रही थी,और साथ साथ हिन्दूस्तान से आये लोगों को पाकिस्तान भेजने की कवायद की जा रही थी।।
अलग अलग कई शरणार्थी कैम्प बने थे,बहुत सारी पोलिस और समाजसेवी काम मे लगे थे, व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये,लेकिन फिर भी सब कुछ अव्यवस्थित था…..जनसैलाब ऐसा उमड़ा पड़ा था कि उनकी व्यवस्था के लिये दोनों तरफ की सरकारें कम पड़ रही थी,,दोनो ही मुल्कों मे नई नई सरकार चुन कर आई थी, सरकारें अपने अपने विभाग और मंत्रियों की नियुक्तियां करने में,सुशासन स्थापित करने मे,संविधान निर्माण में,ऐसे कई कार्यों मे व्यस्त थी,और उसके साथ ही हुई विभाजन की त्रासदी ने एक और काम बढ़ा दिया था।।
बहुत से ऑफीसर सरहदें खींचने मे भी रात दिन एक किये हुए थे,सारी नाप जोख कर के ही सरहदें बाँटी गई थी,सरहद मे बसा कौन गांव किधर आयेगा ये मुकर्रर करने के बाद भी एक आध जगह कोई कोई गांव ऐसे बीच मे पड़ गया था कि उसको किस तरफ गिना जाये,और किधर नही ऐसे सोचने वाले सवाल बार बार मुहँ उठा कर अफसरों को चिढ़ा रहे थे।कहीं कोई नदी बीच मे पड़ रही थी,कहीं कोई मस्जिद ।।।।
सरकारी अफसरों की ऐसी परेड कभी ना हुई थी, ना खाना समय पे नसीब हो रहा था,ना सोना…. घर वालों से दूर अपने काम मे जी जान लगा कर जुटे अफसर,पोलिस विभाग और अन्य कर्मचारी बुरी तरह थकान महसूस कर रहे थे शारीरिक भी और मानसिक भी…. और इस सब के बीच दोनों मुल्कों के शरणार्थियों को पार लगाना अपने आप में बहुत बड़ा कार्य था।।
शरणार्थियों में कई अकेले बच्चे थे,कई औरतें अकेली थी,कई बुजुर्ग थे,सब के घर परिवार को खोजना बेहद मुश्किल काम था,इसिलिए इस कैम्प में आये युवक भी अपनी तरफ से पूरी पूरी मदद करने लगे थे।।।
दो अलग अलग जगहों पर लोंगो के नाम लिखे जा रहे थे,हिन्दूस्तानियों के लिये बने शिविर में रज्जो और अली भी पहुंच गये,बहुत ही लम्बी पंक्ति मे अपना इन्तजार करते दोनो ही भूख प्यास से बेहाल खड़े थे,पर वहाँ तो सभी का यही हाल था।।
“चलिये नाम बताएँ अपना?”
“जी राजेश्वरी!! मेरा नाम राजेश्वरी है,और ये मेरे पति बशर किरमानी।”
“घर का और कोई सदस्य ?जो खो गया हो।”
“जी नही,हम दो ही जिंदा बचे हैं ।”
“कोई बाल बच्चे?”
“नही !नहीं हैं ।”अबकी बार थोड़ा तेज़ आवाज़ मे अली ने जवाब दिया
“जी अच्छी बात ! आप दोनों को जाना कहाँ है? अपना पूरा पता बताएँ ।”
अली और रज्जो एक दूसरे को देखने लगे, रज्जो की कोई दूर की मौसी दिल्ली में रहतीं तो थी,पर उनका पता ठिकाना उसके पास नही था,इधर अली के नाना जी का कारोबार दिल्ली तक फैला था,जिसे अली ही बीच बीच मे आकर देखा करता था।
अली के वालिद साहब की माली हालत उतनी अच्छी नही थी,बस अपनी दाल रोटी आराम से चल जाती थी,पर अली के नाना का कारोबार इधर कुछ सालों में अच्छा खासा जम गया था,उसका एक कारण अली की अपनी मेहनत भी थी… नानाजी ने बातों बातों मे कई बार दिल्ली का सारा काम अली को सौंपने का इशारा भी किया था,इसके पीछे उनकी एक ख्वाहिश ये भी थी कि उनकी मरहूम बहन की तलाकशुदा बेटी तरन्नुम की इकलौती लड़की नाहिद से अली का निकाह हो जाये,हालांकी ऐसा कुछ नाहिद और अली के सामने नही कहा गया था।।
“आतिश फर्नीशींग ,,पचकुईयां रोड।”
अली ने अपना पता लिखवा दिया…
” सुनिये दारोगा जी इनके घर के लोग नही मिल रहे ,हमे उनकी तलाश करनी है,क्या इस बाबत आप हमारी मदद कर सकतें हैं?”
“बिल्कुल कर सकतें हैं जी,उसी काम के लिये तो बैठे हैं,शुरु से ही पूछ रहें हैं कि और कौन कौन है घर मे ,पर आपकी बेगम ने कहा सिर्फ आप दोनों ही बचे हैं ।”
” असल में इस सब भाग दौड़ में ये थोड़ा घबरा गई हैं,इनका जी सही नही चल रहा।”अली ने रज्जो की तरफ मुड़ कर उससे कहा
“सुनो सभी घर वालों के नाम और पहचान लिखवा दो ,किसी को भूलना मत,हो सकता है,सभी यहीं कहीं आसपास हों,तब तक मैं देख कर आता हूँ, शायद कोई मिल जाये।”
रज्जो ने झट से अली का हाथ पकड़ लिया
“नही रुको,मुझे छोड़ के मत जाओ,मैं नाम लिखवा के साथ ही चलती हूँ ।”
अली ने धीरे से अपने दूसरे हाथ से रज्जो का हाथ हटा दिया और कहा
“समझती क्यों नही हो,देख रही हो यहाँ की भीड़ भाड़,तुम्हारे पीछे भी बहुत लोग राह देख रहे,तुम जब तक सब कुछ लिखवा रखो,मैं इधर उधर चाचाजी की तलाश करता हूँ ।”
“ससुर जी को कोई चाचा जी कहता है भला।”
“मेरी बात समझो,मैं देख के आता हूँ ।”
“नही,तुम्हें अकेले नही जाने दूंगी।”
इतनी देर से दोनो के चेहरों को बारी बारी से देखता दारोगा चिल्लाया
“अरे ओ हीर राँझा,यहाँ बाकी लोग भी हैं भाई कतार में,हम भी भूखे प्यासे लगे हैं काम पे ,और यहाँ आप लोग इश्क़ फरमा रहे,वैसे हीर राँझा के बारे मे सुना तो होगा,पाकिस्तान के गांव की ही कहानी है।”
“जी हाँ मैनें पढ़ी है,इनका मुझे नही पता,इन्होनें सुना है या नही।”अली ने जवाब दिया।।
“कौन हीर राँझा ? मैं नही जानती।”
“कोई बात नही ,आप बाद में अपने पतिदेव से कहानी सुन लेना अभी घर वालों के नाम बताएँ,और
आप चुपचाप तब तक यहीं खड़े होकर इनका इन्तजार किजीये,जहां जाना है,साथ ही जाना वर्ना कहीं आप दोनों बिछड़ गये तो हमारा एक और काम बढ़ जायेगा।”
वहाँ सारे नाम और पहचान लिखवा कर अली और रज्जो लोगों की भीड़ भाड़ में अपने लोगों को ढूँढते रहे,सुबह से शाम हो गई पर उन्हें वहाँ कोई भी जान पहचान का चेहरा नज़र नही आया।।
शाम होते ही माहौल और उदासी भरा सा लगने लगा,कहीं कहीं पर चिराग रौशन कर दिये गये थे, पर वो इतने काबिल नही हो पा रहे थे कि पूरी तरह से उस सारी जगह को रोशन कर सकें ,इसिलिए लोग झुंड बनाकर अलग अलग मशालों के पास धीरे धीरे सिमटने लगे थे,तभी वहाँ दारोगा जी ने एलान किया कि कल सुबह से ही औरतें मिल जुल कर खाना पकाने का काम करेंगी और सारे मर्द लोगों को ढूँढने और जिनके पते और परिवार मिलते जा रहे उन्हें उनके घर भेजने में सहायता करेंगे,कुछ देर मे सबका खाना पीना भी निपट गया।।
एक जगह कई परिवार इकट्ठे बैठे अपना अपना सुख दुख साझा कर रहे थे,वहीं पास में अली और रज्जो भी बैठे थे।।उनमें से एक महिला ने रज्जो से सवाल किया
“आपके घर से कौन कौन बचा जी।”
“बस मैं और मेरे पति,बाकी सभी को तो उन दरिन्दों ने मौत के घाट उतार दिया,हाँ मेरे मायके के लोग जान बचाकर निकल गये थे,पर कहाँ है,हमे कुछ पता नही।”
रज्जो की बात सुन अली का मुहँ का स्वाद कसैला सा हो गया,उसे जैसे सब अचानक याद आ गया,और उसके चेहरे पर भी वही कसैलापन उतर आया ।
रज्जो ने जब अली को देखा तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ,उसने तो अपना ससुराल ही खोया था,जिनके चेहरे तक उसे याद नही पर बशर यानी उसके पति ने तो अपने पूरे परिवार को अपनी आंखों के सामने मरते देखा था,क्या हाल हुआ होगा उस बेचारे का,फिर भी अपने दुख को दबा कर उसके साथ उसके घर वालों को खोजने में लगा हुआ है….अचानक उसे अपने पति पर बहुत प्यार उमड़ने लगा,उसने बड़े प्यार से अली की आंखों में देखकर उससे कहा
“सुनो! सुबह किसकी बाबत बता रहे थे,कौन है हीर राँझा? मुझे सुनाओ ना कहानी।”
तभी वहाँ बैठे एक लड़के ने कहा कि उसने कुछ आधा अधूरा सुना तो है पर ज्यादा अच्छे से नही पता।।
“मैनें एक कहानी पढ़ी थी ‘ वारिस शाह साहब ‘ की उर्दू मे लिखी हुई,जब मैं लाहौर रहा करता था।”
“अच्छा ,आप भी लाहौर रहा करते थे?”
“हाँ रहता था,पढ़ने गया था,पर तुमने ऐसे क्यों पूछा?”
“नही बस ऐसे ही,मेरे मायके मे मेरी पड़ोस वाली रज़िया खाला हैं ना उनका बेटा भी वहीं रह कर पढ़ रहा था,अच्छा वो सब छोड़ो,मुझे हीर राँझा की कहानी सुनाओ ना।”
रज्जो की बात सुन अली को हंसी आ गई,और उसने मुस्कुराते हुए सर नीचे झुका लिया।।
“हंसने क्यों लगे,सुनाओ ना,मुझे कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता है।”
“और मुझे कहानियाँ पढ़ना बहुत अच्छा लगता है,
तुमने कुछ पढ़ाई लिखाई की भी है या नही।”
अबकी बार अली के सवाल पर रज्जो हंसने लगी, “कहानी नही सुनानी तो ऐसे ही बोल दो,मेरी बखिया क्यों उधेड़ रहे,वैसे मैनें सातवीं जमात तक पढ़ाई की है,उर्दू भी पढ़ी है….पर कहानियों की किताबें कभी पढ़ने को मिली ही नही,जो पढ पाती।।
“अच्छी बात है,तो सुनो
हीर राँझा की कहानी कोई सौ या डेढ़ सौ साल पुरानी होगी,हमारी चिनाब है ना उसके पास ही एक गांव था ‘ तख्त हज़ारा’ वहाँ के जाटों में एक उपजाति थी राँझा ।।उस गांव में ‘ मौजू चौधरी’ रहा करता था,जिसके चार लड़कों मे सबसे छोटा लड़का था ‘ धीदो’ …. धीदो अपनी धुन मे मगन बाँसुरी बजाता घूमता रहता था,सब उसे प्यार से राँझा कहते थे,उसके भाई खेती किसानी में अपना पसीना बहाते और अपने अब्बू का लाड़ला राँझा बान्सूरी बजाता,आखिर एक दिन घर पे इसी बात को लेकर औरतों मे बहस छिड़ गई और राँझा की भाभियों ने उसे रोटियाँ देने की बजाय उसे ताने मारने शुरु कर दिये,गुस्से मे धीदो ने अपना घर छोड़ दिया….. चलते चलते वो पंजाब के ही एक दूसरे गांव पहुंच गया,जहां ‘ सियाल’ रहा करते थे,वहीं रहा करती थी हीर।।
हीर के घर वालों ने राँझा को अपने घर पे मवेशी चराने के काम पे रख लिया,अब दिन भर मवेशियों को चराते फिरते राँझा अपनी वन्जली (बान्सूरी) बजाता रहता,उसकी बान्सूरी सुन सुन के धीरे धीरे को हीर को राँझा से प्यार हो गया और हीर को देखने के बाद राँझा के हीर से,दोनों चोरी छिपे मिलने जुलने लगे ,लेकिन एक दिन हीर के चाचा कैदो ने दोनों को एक साथ देख लिया और घर पे कोहराम मचा दिया, बस आनन फानन में राँझा को काम से बाहर कर दिया गया और हीर की शादी ‘ सैदा खेड़ा ‘ से कर दी गई ।।
रज्जो – “ओह ये तो बहुत बुरा हुआ,मतलब वो दोनो मिल नही पाये।”
अली-“कहानी अभी बाकी है,आगे तो सुनो….
हीर की शादी के बाद राँझा एक गांव से दूसरे गांव भटकने लगा,तभी उसे कनफडा जोगियों की टोली मिल गई,जिनके साथ चलते चलते वो ‘टिल्ला जोगियां’ पहुंच गया,और वही उसने भी अपना कान छिदवा कर बालियां डाल ली।
रज्जो-“ऐसे बालियां डालने का भी कोई खास मतलब होता है क्या?”
अली-“हाँ बिल्कुल होता है,इसका मतलब ये कि अब सार समाज दुनियादारी से उसका कोई लेना देना नही है,वो पूरी तरह से जोगी हो गया।”
रज्जो-“हाय,तो क्या राँझा जोगी हो गया।”
अली-“आगे की कहानी सुनोगी या बस हाय हाय करना है…..
बेचारा राँझा,जोगी बनने के बाद भी उसके दिल को सुकून नही था,वो गांव गांव भटकता ही रहा,और आखिर एक दिन उसे हीर का गांव मिल ही गया,वो हीर के घर पहुंचा तो सैदा की बहन सहती ने किवाड़ खोला ,उसे हीर की प्रेम कहानी पहले ही पता थी और वो अपने भाई के हीर से बिना मर्ज़ी शादी के खिलाफ भी थी,सबसे बड़ी बात वो भी हीर की हम उमर थी,इसीसे उतनी ही नाज़ुक दिल वोभी थी,उसने हीर को राँझा के हवाले कर दिया, दोनो लोग वहाँ से भाग कर वापस हीर के गांव आ गये,जब हीर के घर वालों ने दोनों की हालत देखी तो उनके निकाह के लिये राज़ी हो गये,पर इस बात से हीर के चाचे को करारी चोट लगी,और शादी वाले दिन उसने चुपके से एक चाल चल दी …. सब शादी की तैय्यारियाँ कर रहे थे,तब कैदो ने हीर के खाने मे चुपके से ज़हर मिला दिया,जिसे किसी ने देख लिया,वो भागा भागा राँझा को बताने गया,सुन कर रान्झे के होश उड़ गये,वो वापस भागा भागा हीर के पास आया पर तब तक हीर ने वो जहरीला लड्डू खा लिया था,राँझा की बाहों मे ही हीर ने दम तोड़ दिया,राँझा के लिये हीर के बिना जीना बेहद मुश्किल था,उसने भी वही लड्डू खा कर अपनी जान दे दी,दोनों को एक साथ ही झंग मे दफन कर दिया गया,और इस तरह एक प्रेम कहानी अपने मकाम मे पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गई ।”
अली ने कहानी खत्म कर देखा तो वहाँ बैठे सारे लोग बड़े ध्यान से उसकी कहानी सुन रहे थे,पर रज्जो की आंखों मे आंसू भर आये थे।।
“क्या हुआ ? तुम्हारी आंखों मे आंसू,तुम ही तो सुनना चाह रही थी….. दोनों मर गये इसलिए बुरा लग रहा ना?”
रज्जो ने आंसू पोन्छते हुए धीरे से ना में सर हिलाया।
“फिर? फिर किस बात पे रोना आ गया।”
“दोनों साथ ही मर गये ,यही तो मुझे सबसे अच्छा लगा,मैं भी हीर जैसे ही तुमसे पहले मरना चाहतीं हूँ
चाहे कुछ भी हो जाये,तुम मुझसे पहले मत मरना ,मैं सुहागन मरना चाहतीं हूँ ।”
अली को जब जब लगता कि वो संभलने लगा है,तभी ये पागल लड़की कोई ना कोई ऐसी बात छेड़ जाती कि अली अपने गुनाह के अन्धे गड्ढे में गिर पड़ता,रज्जो की बात सुन उसका मन अजीब सा होने लगा।।
पर अब उसे कहीं ना कहीं एक आस जाग गई की थी कि यहाँ हजारों लोगों में आज नही तो कल वो रज्जो के घर वालों को ढूँढ ही लेगा ,और उसके बाद रज्जो को उन्हें सौंप कर अपनी सारी सच्चाई बता देगा,उसके पहले रज्जो से कुछ भी कहने का मतलब था फसाद को बुलाना,क्योंकि इतनी भावुक और नाज़ुक सी लड़की अली के बारे मे जानने के बाद जाने क्या कदम उठा ले,इसलिए इसे सब बताने के लिये उसे कुछ रोज और इन्तजार करना होगा।।
ये सब सोचते सोचते जाने कब अली की आँख लग गई,और वो सो गया अगले दिन जागने के लिये और फिर से अपने गुनाहों का बोझ उठाने के लिये।।।।।।
क्रमश:
aparna..

Waaah Heer aur ranjhe ki kahani, bahut achchi hai, Ali aur rajoo ke bhi utne hi judaw ho jaayenge kya! Filhaal to wo Mujrim hai par kaise dhundhega uska Parivar aur ky hoga rajjo ka….ll read after a antral…. very nice chapter Didi?..💐👍🙏