
चिनाब किनारे -10
अगले दिन खाना पीना निपटा कर औरतें बाज़ार करने चली गई,रज्जो सारा दिन अपने कमरे में अनमनी सी पड़ी रही।।।
रात का खाना निपटा कर गुड्डो ऊपर रज्जो के ही पास अपना तकिया चादर समेटे चली आई।।
रज्जो उस समय भी पलंग पर लेटी छत को ताक रही थी
“अरे लाड़ो ऐसी क्यों मुरझा गई है?? मुझे तो बता सकती है,हो सकता है मै कोई मदद कर सकूँ।।
“नही चाची ऐसी तो कोई बात नही।””
“एक बात सच सच बताना लाड़ो क्या तू इस ब्याह से खुश नही है??”
रज्जो चुपचाप छत की बल्लियां ताकती रही,गुड्डो को उसका मनचाहा जवाब मिल गया
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“देख लाड़ो ,कहीं फिर बहुत देर ना हो जाये,और तेरे मन की मन में ही रह जाये,मैं तो बैठी हूँ यहाँ तेरी मदद करने,मेरा तो जाने कैसा जी घबड़ा रहा है,लग ही नही रहा कि घर में दो दिन बाद शादी ब्याह होना है,जो काम हाथ में ले रही वही बिगड़ा जा रहा… अब क्या कहूँ तुझसे बिटिया!!! तेरे लिये तो हम बैठे हैं,हमारी मदद को तो कोई ना आया।
“क्या मतलब चाची?”
“नारायण नाम था उसका ,बिल्कुल मेरी छत से लगा घर था,उसकी बहन नीरू और मैं साथ ही पढ़ते खेलते थे….हमारी दोनो की छतें जुड़ी हुई थीं …..गर्मियों की रातें हमारी छत पे सबके बिस्तर डले होते वही नीरू की छत पे उसके घर के लोगों के।।
नारायण फौज में था लपटन (लेफ्टिनेंट),मैंने उसे तब देखा जब बैसाखी की छुट्टियाँ पड़ी और वो घर आया,सरदार था उंचा पूरा…सर पे ऐसा साफ़ा बाँधता की और उंचा दिखने लगता था,मैं नीरू की भैंस को चारा दे रही थी उसने पीछे से आके मुझे नीरू समझ गोद मे उठा लिया और गोल गोल चक्कर दिलाने लगा,उफ्फ कैसा तो जी हो गया, लगा उल्टी ही कर बैठूँगी,घबरा कर ऐसा ज़ोर से चिल्लाई की वो भी डर गया और मुझे गोद से उतार दिया,उसके बाद जब मेरा चेहरा देखा तो बेचारे का रंग उड़ गया तब तक नीरू और उसके बाकी भाई बहन भी दौडे चले आये,सब हँस हँस के बुरा हाल था….और हम दोनों के चेहरों का रंग उड़ा हुआ था।।
वो मुझे झेलम कहा करता था,और मैं उसे कहती थी लपटन साब ……मैं और नीरू अक्सर नदी किनारे कपड़े लिये जाया करते धोने के लिये,वो वहीं छोटे बच्चों को तैराकी सिखाया करता, एक से एक नये करतब दिखाता मछली के समान उफनती नदी के भी दोनो पाट यूं चुटकियों मे तैर के पार कर जाता,मैं तो बस उसे तैरते देखती खड़ी रह जाती दीन दुनिया से बेखबर मैं उसमें खोती जा रही थी और वो मुझमें डूबता जा रहा था,फिर एक एक कर उसकी दस दिन की छुट्टियाँ बीत गई,और हमारे रस भरे दिन भी चूक गये,वो चला गया जल्दी वापस आने का वादा कर,और मैं उसका इन्तजार करती रही……
इसी बीच तेरे चाचे का रिश्ता आ गया,इतना अच्छा रिश्ता मेरे घर वाले अपने हाथ से जाने नही देना चाहते थे,उन्होनें फट हाँ कर दी,मै भी तो उमर और अकल से कच्ची ही थी,बाऊजी के खिलाफ बोलने की हिम्मत नही कर पाई और ब्याह कर के ससुराल चली आई….नये रिश्ते नया घर मैं ऐसी रमी की अपना मायका भी भूलने लगी बस नही भूल पाई तो उसे,बस एक टीस हमेशा मन में रहती कि बिदा होने के पहले एक बार उसे मिल लेती….छुटकू होने वाला था तभी मायके जाना हुआ,वहाँ नीरू मिलने आई,जब उससे उसके भाई के बारे में पूछा तो बेचारी मेरे गले से लगी सिसक उठी
“भाई अब कहाँ हैं गुड्डन,तेरी शादी के बाद जब घर आये तब एक दिन नदी किनारे पैर फिसला और पानी में डूब गये,पूरे 2 दिन बाद लाश मिली,माँ तो देखते ही बेहोश हो गई ।”और इतना कहते ही नीरू की हिचकियां बँध गई….कही ना कहीं मैं जानती थी लपटन साब कभी डूब के मर ही नही सकते थे,कैसी उमड़ती उफनती नदी पे अपनी कलाबाज़ी दिखाने वाला मरा भी तो डूब के !!
नदी का पानी नही बल्कि मेरी शादी उसे ले डूबी, कैसा बड़ा सा बोझ लिये मायके से लौटी मैं,कहीं कुछ भी कर लूँ मन से वो बोझ हटता ही नही,लगता है काश एक बार अपने बाऊजी से बात कर पाती तो आज शायद तस्वीर ही अलग होती।।
ऐसा नही है कि मैं तेरे चाचा के साथ खुश नही हूँ, बल्कि उनके प्यार का सहारा ही है जो मैं आज जिंदा हूँ,इसीसे कह रही हूँ रज्जो ! अगर कोई बात है जो संवारी जा सकती है तो उसे यूं ही हाथ से जाने मत देना लाड़ो।।।
किसी का जीवन किसी के जाने से रुक नही जाता ,पर अफसोस ज़रूर रह जाता है जिंदगी भर के लिये।।”
“तुम्ही बताओ चाची मैं क्या करूं,बाऊजी से या माँ से क्या बोलूं?? कि मुझे उस लड़के से शादी करनी है, जो ना हमारी जात का है,ना हमारे मज़हब का,और जिसने मेरे पूरे ससुराल को मार डाला।।”
“रज्जो वो दौर ही ऐसा चल रहा था,कि आदमी आदमी के ही खून का प्यासा हो गया था,अगर अली ने लोगों का कत्ल किया और वो गुनाहगार है तो तेरे बाऊजी और चाचा भी गुनाहगार हैं,भागते समय इन लोगों ने भी रास्ते में अपनी जान बचाने के वास्ते कई मुसलमानों का गला काट डाला,पर अभी तू इन सब बातों को छोड़,अभी तेरी बातें किसी की समझ में नही आयेंगी।”
“फिर ,फिर क्या करुँ मैं??”
“मेरी मान तू घर से भाग जा,आज रात जब सब सो जायेंगे,मैं जीने के पीछे की तरफ का दरवाजा खुला छोड़ दूंगी,तू दबे पांव निकल जाना,सुबह तक किसी को कोई खबर नही होगी,सुबह मैं सब संभाल लूंगी।”
“हाय चाची क्या कह रही हो?? किसके भरोसे जाऊँ,मुझे तो ये भी नही पता कि वो मुझसे प्यार करता भी है या नही।”
“तुझे प्यार नही करता तो प्रभा को यहाँ क्या तेरी शादी के लिये मिठाईयाँ बनाने भेजा था,प्रभा से मेरी सारी बात हो गई है,प्रभा यही खबर तो लेके आई थी कि वो वहाँ तेरी याद में घुल घुल कर बिस्तर पकड़ चुका है,चली जा लाड़ो उसके पास,उससे ज्यादा खुश तुझे कोई नही रख सकता,रही तेरे माँ बाऊजी की बात ,तो एक दिन ये लोग भी मान जायेंगे, आज भी आखिर शेख भाई और रज़िया बहन का कर्ज़ तो मानते ही हैं,दोनो घर एक से ही तो थे,क्या कभी दोनो परिवारों मे हिंदू मुसलमान का फर्क दिखा? नही ना,वो फर्क आज भी नही आया है लाड़ो, ये तो सारा सियासतदारों का खेल है जिसमें हम जैसे नादान उलझ के रह गये।।
मैं जानती हूँ,तेरे माँ बाऊजी अभी तो नही पर एक दिन राज़ी खुशी तेरे और अली के रिश्ते को मान लेंगे,अब देर मत कर…..आज की रात तू निकल जाना,पीछे से मैं सब संभाल लूंगी,मुझे भी माँ जैसा मानती है ना,बात भी मान मेरी।।।तेरी खुशी तेरा भला ही चाह रही मैं ।।
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सुबह गुड्डो सब को चाय देने के बाद ऊपर रज्जो के कमरे की ओर चली ,दरवाजा खोला अन्दर गई,और एक चीख मार के वापस भागी भागी जीना उतरती नीचे को दौडी।।।
“हाय जिज्जी ये क्या हो गया!!, मैनें तो पहले ही कहा था लड़की सूखती जा रही है ,उसके मन का भी पूछ लो ,पर यहाँ मेरी सुनता कौन है??”
गुड्डो के अनर्गल प्रलाप का एक शब्द आंगन में बैठे किसी को समझ नही आया,कमला बड़े बड़े कनस्तरों में लड्डू और अमृतसरी बड़ीयां भर रही थी,बेटी की विदाई मे भेजने के लिये,वो मुहँ उठाये गुड्डो को देखने लगी।।
“क्या तमाशा है सुबह सुबह,क्या बोल रही गुड्डो??”
गुड्डो के पति ने उसकी बाँह झिंझोड़ के पूछा
अपने दुपट्टे से आंखो की कोर पोंछती गुड्डो ने एक खत अपने पति के हाथ में पकड़ा दिया।।
“चरण स्पर्श बाऊजी,
मैं किसी भी तरह से अपने आप को इस शादी के लिये मना नही पा रही ,एक ही शादी से भर पाई,पर इस बाबत आपसे बात करने की मेरी हिम्मत नही थी,इसिलिए घर छोड़ कर जा रही हूँ…. अपनी बेटी की गलती को हो सके तो माफ कर दिजियेगा ।।
आपकी रज्जो।”
कमला भागी हुई सी आई और देवर के हाथ से चिट्ठी छीन ली,ये क्या कर गई लड़की!! चिट्ठी पकड़े पकड़े वही ज़मीन पे बैठी सुबकने लगी।।
“मेरा तो किसी काम में मन ही नही लग रहा था, सुबेरे से आँख फड़क रही थी,कुछ तो बुरा होने वाला है,मैनें इन से कहा भी जिज्जी!!”
“अरे बस करो तुम लोग,तुम लोगों के रोने चीखने से सारे अडोस पड़ोस को भी मालूम चल जायेगा,अभी ये सोचो की परसों होने वाले फेरों को टालने के लिये लड़के वालों को क्या कहना है।।”
“भाई साहब मेरी माने तो लड़के वालों को कह दीजिये लड़की अभी तक बंटवारें की त्रासदी से उबर नही पाई है,रात मे चौंक चौंक के उठ जाती है, ऐसी हालत मे हम शादी नही कर पायेंगे।।”
“तुम तो अपना दिमाग कम ही चलाओ,भाई साहब देख लेंगे क्या बोलना है।”गुड्डो के पति ने उसे झिड़क दिया
“अरे उसपे गुस्सा करने से क्या फायदा गुड्डो ठीक ही कह रही,सबर रखने का वक्त है ये…..कमला तू भी ये मान ले कि तेरी लड़की अभी तक मिली ही नही,मैं जा रहा बलविंदर के घर ,उन्हें समझा आऊँ ।।”
“भैय्या हम भी चलतें हैं आपके साथ।”
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ये सब होने के एक रात पहले अपनी पूरी हिम्मत जुटा के रज्जो ने अपना ज़रूरी सामान रखा और रात जब घर के सारे लोग सो गये,चुपके से पिछले दरवाजे से निकल गई ।।
दरवाजा खोल के बाहर निकल वो एक तरफ को चलती चली गई,उसे गुड्डो ने कहा था बस स्टैंड तक पहुंच जाना वहाँ से दिल्ली 6की टिकट कटा कर बैठ जाना,एक घन्टे में पहुंच जाओगी।।
घर से निकल तो गई पर निकलने के बाद उसे एहसास हुआ कि उसने भारी भूल कर दी है,इतनी रात मे अकेले बस स्टैंड तक जाना भी उसके लिये बहुत भारी हो रहा था,आज तक कहीं अकेले जाना हुआ जो नही था,इसके साथ ही एक और बात उसे परेशान करने लगी कि कहीं अली वैसा ना सोचे जैसा रज्जो उसके बारे मे सोच रही है तब फिर वो क्या करेगी? कहाँ जायेगी??उसने तो अपने ही हाथों अपने लिये सारे दरवाजे बन्द कर लिये थे ।। तभी उसे प्रभा की याद आई ,अन्धेरे में जैसे एक तारा टिमका,हाँ प्रभा दीदी के पास ही चली जायेगी, आगे पढाई शुरु कर लेगी,इन्हीं सब विचारों मे गुम रज्जो चली जा रही थी कि उसे अपने पीछे तेज़ कदमों की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी,पिद्दी से कलेजे वाली रज्जो की मुड़ के देखने की भी हिम्मत नही हुई ,वो और तेज़ कदमों से चलने लगी,पीछे आती आवाज़ भी उसी गति से तेज़ हो चली,डर के मारे रज्जो का कलेजा मुंह को आने लगा ,वो पूरा दम लगा के भागने लगी ,तभी उसे लगा किसी ने उससे तेज़ कदमों से भाग कर उसका हाथ पकड़ लिया।।
रज्जो ठहर गई,वही आवाज़ वही स्पर्श !! उसने मुड़ कर देखा,सामने अली मुस्कुराता खड़ा था!!
“कहाँ भागी चली जा रही थी,कितना भगाया मुझे,उफ्फ अब तक सांसे उखड़ रही हैं।”
रज्जो के मुहँ से कुछ नही निकला ,उसने अपनी सांसों पे काबू किया और बोली
“आप यहाँ कैसे?”
“वैसे ही जैसे तुम ।”और दोनो एक दूसरे का हाथ थामे मुस्कुराने लगे ,तभी प्रभा और मेजर भी उन
दोनो के पास चले आये।।
“थका दिया हमे भगा भगा के,भई रज्जो तुम्हारी चाची ने तो हमें तुम्हारे पिछले दरवाजे के पीछे खड़े रहने की ताकीद की थी,पर तुम तो निकलते ही ऐसा भागी कि लगा इम्पीरियल स्क्वैयर जा के ही रुकोगी।”
मेजर और प्रभा हँस पड़े
“चलो भई जल्दी घर चलो,फिर कल सुबह अली और रज्जो के फेरे भी तो पड़वाने हैं ।।”मेजर के ऐसा कहते ही प्रभा ने अली को देखा और कहा-
“क्यों बशर मियाँ,निकाह पढ़वाना है ,या सात फेरे लोगे रज्जो के साथ।।”
“मैं तो सारा इन्हीं का हो गया,अब जैसा ये चाहे ,मैं तैय्यार हूँ,चाहे फेरे डलवा लो या निकाह पढ़ा लो।।”
ऐसा बोल कर बशर ने पहली बार रज्जो को बाहों मे भर लिया!!
आसमान पे चांद भी अपनी चांदनी बरसाता मुस्कुराते
end

Bahut pyari kahani
रज्जो ने तहलका मचा दिया, लेकिन चुप रहो, पड़ोसी ना सुन ले कहकर ख़ामोशी घर में छा गई और चाची ने अपने जीवन की अधूरी हसरत को रज्जो की चाहत को पूरा कर हासिल कर लिया।
रज्जो के रुप में कहीं भी कन्फ्यूजन नहीं नज़र आया, एक आज़ाद पसन्द लड़की अपनी जिन्दगी प्यार के साथ निभाने चल पड़ी, अली का स्वरूप रज्जो के अस्तित्व से जुड़ा था इसलिए साथ आने पर कहानी का अंत भला लगा। लेखन सुपबर्व, इमोशन फाइन और भाषा अच्छी रही है, नाईस स्टोरी दी 5 ⭐…👍👍👌💐🙏
इतनी अच्छे उर्दू के शब्द लिखे है आपने में समझ नहीं पा रहा हूं कि मेडिकल की पढ़ाई के साथ लेखनी में भी पीएचडी कर रखी है क्या आपने। बहुत सुंदर रचना है Dr साहिबा
बहुत ही शानदार कहानी। उर्दू शब्द भी बहुत अच्छे से प्रयोग किए है आपने । ये कहानी तो प्रतिलिपि पर भी नही पढ़ी थी मैंने । मजा आ गया ये कहानी पढ कर।
जी धन्यवाद.. बहुत सी ऐसी कहानियाँ जो लिपि पर नहीं डाली थी वो अब यहां आएंगी
Ye kahani muje bahot jyada pasand he…..aapki to sari kahaniya bahot khubsurat he .par ye muje kuch jyada hi pasand he …..par jivansathi se thoda kam. 🤣
बहुत प्यारी कहानी, दिल खुश हो गया।
Bohot khubsurat 💓💓💓