चिनाब किनारे -7

चिनाब किनारे -7

चिनाब किनारे

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     अब तक आपने पढा–चिनाब किनारे बसे गांव संतनगर में दो पड़ोसी आस पास रहते थे,जिनमें हिंदू घर की लड़की रज्जो की शादी वाले दिन ही दंगे हो जातें हैं,रज्जो के ससुराल मे कोई जिंदा नही बचता और एक से नाम होने के कारण अपने पति के हत्यारे बशर अली को गलती से अपना पति समझ रज्जो उसके साथ निकल जाती है,रज्जो को देख बशर अली को अपने गुनाहों पर पश्चाताप होता है,और वो रज्जो को सही सलामत उसके घर वालों तक पहुंचाने का प्रण लेता है,इसी सिलसिले मे दोनों हिन्दुस्तान पहुंच जातें हैं,और दिल्ली मे बशर के दोस्त के घर पर रुकतें हैं।।
     जहां एक शाम रज्जो बशर प्रभा और मेजर मिरांडा हाऊस के कौन्सर्ट में जातें हैं,वहाँ गलती से रज्जो को तबीयत सही नही लगती और बशर को तलाशती हुई वो वहाँ से काफी दूर पैदल ही निकल जाती है…..अब आगे….

  रज्जो के कंधे पे किसी ने हाथ रखा और उसका नाम लेकर पुकारा-‘ रज्जो ‘
  वही जानी पहचानी गहरी सी आवाज़ ,वही जाना पहचाना स्पर्श …… रज्जो पलट कर अली के गले से लग गई ।।।

  “कहाँ चली जा रही थी,यहाँ के रास्ते पता भी हैं तुम्हे? कहीं खो जाती तो,कहाँ ढूंढते फिरता  ,,कुछ होश भी है कहाँ हो अभी।”

अली घबराहट में रज्जो पे बरस पड़ा तभी मेजर और प्रभा भी गाड़ी से निकल कर उन तक भागते चले आये,

“बशर आराम से मियाँ,इतना घबराओ नही,रज्जो जी मिल तो गई हैं,घर चल के तफसील से झगड़ा कर लेना।”

“अच्छा !!बस यही नसीहत दीजिये घर जाके झगड़ा करना,अरे देख नही रहे कितना डरी हुई है रज्जो खुद।।आप लोगों का क्या हैं,खुद तो अपना सारा गुस्सा हम औरतों पे उतार देंगे और हम औरतें कहाँ जाएँ,हम किस पे अपना गुस्सा खाली करें।।।बेचारी बेजुबांं चुप खड़ी है।”प्रभा रज्जो को पकड़े गाड़ी तक ले आई ,और उसे अपनी बाजू में बैठा लिया,चारों घर को चल दिये।।

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  घर पहुंच के रज्जो  के अपने कमरे में जाने के बाद प्रभा ने अली को आड़े हाथ लिया-“उस बेचारी लड़की पे तरस नही आता तुम्हें अली,कितना डरा के रखा हुआ है उसे…..एक बार उसकी नज़र से भी सोच के देखो,वो समझती है तुम उसके पति हो,और तुम हो कि सीधे मुहँ उससे बात भी नही करते।”

“तो मैं क्या करुँ प्रभा,मैं खुद परेशान हूँ ।”

“तुम्हारी परेशानी तुम्हारी खुद की मोल ली हुई है, इसमें उस बेचारी का कोई कसूर नही है ,लेकिन आज उसके जो हालत हैं उसके जिम्मेदार तुम हो, उसे उसके घर वालों के सुपुर्द कर देने से तुम्हारी जिम्मेदारी खतम नही हो जाती अली ,उसे खुश रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है,अरे कम से कम जब तक तुम्हारे पास है तब तक तो हंस बोल लो,तुमने कभी एक बात सोची है?”

“क्या”??

“ये कि जब उसके घर वाले मिल जायेंगे और वो चली जायेगी तब उसके घर मे उसका जीवन कैसा होगा,उफ्फ मुझे तो सोच के भी रोना आता है, एक लड़की जिसका पति मर चुका है,एक अंजान मुसलमान  लड़के के साथ इतने दिनों से रह रही थी,उसकी घर वापसी इतनी आसान होगी ??”
   और चलो मान लिया कि घर वालों ने अपना लिया तब भी रज्जो का पूरा जीवन पड़ा है,क्या ऐसे ही अकेली, काट देगी।भगवान ने जाने किस सियाही से इसके जीवन की काली कहानी लिखी है ……बेचारी!! मुझे तो बहुत तरस आता है इस लड़की पर ।।

” तो तुम क्या चाहती हो,मैं क्या करूं?”

“ज्यादा कुछ नही,बस उससे थोड़ा मुस्कुरा के बात कर लिया करो,देख रही हूँ आजकल तुम्हारी हँसी बड़ी महंगी कर रखी है तुमने…. अरे हम लडकियों को इससे ज्यादा चाहिये भी क्या ,बस थोड़ी सी इज्ज़त,और कुछ तो नही मांग रहे तुमसे,पर तमीज़ से बात कर लो उत्ना भी कहाँ होता है तुम मर्दों से।।”

इतनी देर से मेजर अपनी ग्लास दो बार खत्म कर चुका था,और अली की ग्लास वैसी ही रखी थी।।

“क्या हुआ बशर मियाँ,पीना पिलाना भी भूल गये, अमा यार ये लड़कियों का चक्कर ही बड़ा बेकार होता है,तुम्हारी वाली कुछ बोलती नही तुम परेशान हमारी वाली चुप होती नही हम परेशान, क्यों सही कहा ना।”
प्रभा ने मेजर को घूर के देखा और वहाँ से उठ गई

“मेजर साब आप चलेंगे मुझे हॉस्टल छोड़ने या मैं पैदल ही चली जाऊँ ।”

“आज तो आप पैदल चली जायेंगी मोहतरमा, पर कल जो मेरी टाँगे तोड़ेन्गी उसका क्या,नही भाई इतना बड़ा जोखिम नही उठा सकता ,चलिये छोड़ आऊँ आपको हॉस्टल तक।।”

प्रभा निकल ही रही थी कि रज्जो के कमरे से कुछ आवाज आई,वो वापस उन दोनों से कहकर कि मैं देख कर आती हूँ,रज्जो के कमरे की तरफ मुड़ गई ।।

  प्रभा ने झांक के देखा रज्जो अपने पलंग पर बेसुध पड़ी थी,प्रभा ने उसके पास जाके उसके माथे पर हाथ रखा और रज्जो ने आंखे खोल दी–

“क्या हुआ रज्जो? तबीयत भली नही लग रही ?”

  “दीदी वहां से आने के बाद चार पांच बार उल्टियाँ हो गई,और अब बहुत कमजोरी सी लग रही।”

  इतने में मेजर और अली भी भीतर चले आये,मेजर तो अन्दर आके प्रभा के पास ही बैठ गया,पर अली दरवाजे के किनारे ही हाथ बांधे खड़ा रहा।

“मुझे लगता है,रज्जो को डिहायड्रेशन हो गया है,शायद पहली बार वाइन लेने के कारण।”

“क्यों,रज्जो जी आपने वहाँ कुछ पिया था क्या ।” मेजर ने रज्जो से पूछा

“हाँ,कुछ पिया तो था,बहुत प्यास लग रही थी,तो किसी ने शर्बत दिया और मैनें पी लिया।”

“अरे कम से कम पीने के पहले मुझ से पूछ तो लिया होता कि ये क्या हैं?? बस कोई भी कुछ दे देगा तुम पी जाओगी,अकल है या नही??”अली एक बार फिर बरस पड़ा।।

“आप थे कहाँ जो पूछती”इतना कह कर रज्जो सुबकने लगी

प्रभा ने घूर कर अली को देखा,अली बाहर चला गया,प्रभा रज्जो को चुप कराने के लिये उसके पास ही बैठ कर उसका माथा सहलाने लगी
“अरे तुम्हे तो बहुत तेज़ बुखार है रज्जो,ठंड लग रही है क्या?”रुको मै अभी तुम्हें कुछ दवा देती हूँ ।”

रज्जो को दवा खिला कर सुला कर प्रभा बाहर आ गई ।।

“सोंने जाने के पहले एक बार रज्जो का बुखार जांच लेना बशर ,अभी तो दवा के असर से सो गई है,पर दवा का असर खतम होते ही कहीं वापिस बुखार ना चढ़ जाये।।”

मेजर प्रभा को छोड़ने चला गया और अली उठ कर अन्दर रज्जो के कमरे में चला गया,वही पलंग के पास लगी आरामकुर्सी में बैठे खिड़की से बाहर चांद को देखते और अपनी नज़्म गुनगुनाते हुए उसने पूरी रात आंखों ही आंखों में काट दी।।

  “लगता नही है दिल मेरा उजड़े दयार में …..”

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   रज्जो को डिप्थेरिया बुखार हुआ था,,एक ऐसा बुखार जिसमें रोगी के नाक और गले के भीतर भी भयानक पिड़िकाएं फैल जाती हैं जो सांस लेने मे अवरोध उत्पन्न करती हैं,ये ऐसा बुखार है जो हवा से फैलता है और साथ मे रहने वाला परिचारक अगर कमजोर तबीयत का है तो उसे भी अपने फान्से मे ले लेता है।।
  
      अली ने सारे वैद्य हकीमों की फौज बुला ली,
अन्ग्रेजी डॉक्टरों के उपचार के साथ ही रज्जो को ‘ विषम्ज्वरहर्लौह’ और सर्वज्वरहर का काढ़ा भी पिलाया,जिसने जो उपाय बताया अली ने वो सब कुछ किया, किसी पीर बाबा का तावीज़ भी ला के बान्ध दिया ,और रात दिन एक कर आखिर मौत के मुहँ से रज्जो को वापस खींच लाया।।।जहां एक तरफ डॉक्टर भी रज्जो के कमरे में चेहरे पे मास्क लगाये आते थे कि कही उन्हें इन्फेक्शन ना हो जाये वही अली रात दिन भूखा प्यासा बैठा बस रज्जो की सलामती की दुआएं मांगा करता,अली की तपस्या रंग लायी और ठीक सातवे दिन रज्जो का बुखार उतर गया।।

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    लेकिन इस बुखार ने जाते जाते एक नई ही रज्जो को जनम दे दिया,उस दिन के कॉन्सर्ट का असर था या किसी और बात का लेकिन अब रज्जो ने खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला कर लिया।।

    इतने दिनों का कॉलेज का भी हर्जा हो गया था, उसे पूरा कराने अब प्रभा रोज ही दोपहर में अपने लैब के बाद रज्जो के पास आने लगी।।
    रज्जो को किताबी ज्ञान देने के साथ साथ प्रभा ने आभिजात्य वर्ग के कुलाचार की बारहखड़ी भी सिखाना शुरु कर दिया।।
    किस मौके पे कैसे कपड़े पहनने होतें हैं,उसके साथ कैसे बाल बनाये जातें हैं,के अलावा किसी से पहली बार मिलने पे क्या बोलना है और विदा लेते समय क्या,,,किसी कुशल ट्यूटर की तरह प्रभा सिखाती चली गई,और एक उम्दा विद्यार्थी की तरह रज्जो सब कुछ सीखती चली गई ।।
    सिर्फ एक महीने के अभ्यास से रज्जो नखशिखांत बदल चुकी थी,प्रभा की संगत मे उसने हल्का फुल्का पियानो बजाना भी सीख लिया, मेजर के दीवानखाने मे किनारे पड़ा उबासी लेता पुराना पियानो भी जी उठा और उसके साथ जी उठी रज्जो, एक अली ही था जो जानबूझ कर इन सब बातों से अपने आप को दूर रखने के लिये कभी बर्मा तो कभी लखनऊ के चक्कर लगाता फिर रहा था।।
     अली के ना रहने पर अक्सर प्रभा रज्जो के साथ रुक जाया करती या कभी रज्जो को अपने साथ हॉस्टल ले जाया करती।।
    मन ही मन कही ना कही रज्जो भी अली से खौफ खाती थी इसिलिए उसके सामने थोड़ा दुबकी सी डरी सहमी रहती पर जब अली घर पर नही होता,और वो प्रभा साथ होते तब रज्जो का असली किरदार नज़र आता,खूब बातें बनाने वाला और बातें निकलवाने वाला।।रामदींन काका से दोनो लड़कियों की खूब छनती,जब ये तीनो अकेले घर पे होते खूब तरह तरह की बातें बनती।।

     रामदींन कुमाऊँ का रहने वाला आम हिन्दुओ की बोली में बोला जाने वाला दासिपुत्र था,उस ज़माने मे अक्सर गर्मियों के मौसम मे अपने जीवन को खुशनुमा बनाने उंचे ओहदों पे काम करने वाले सरकारी अफसर ,अन्ग्रेज अफसर और मनचले  रईसज़ादे  पहाड़ों पर अपनी छुट्टियां बिताने जाते थे,और वापसी में किसी आपदा में फंसे गरीब की बेटी को ,नाचने गाने वाली को या घरों मे काम करने वाली कहारिन महरिन को रामदीन जैसे तोहफ़े दे कर वापस लौट आते,शुरु शुरु में ऐसे बच्चों की परवरिश के पैसे भेजे जाते लेकिन जल्द ही गृहस्थी की झंझटों मे फँसकर खुशनुमा छुट्टियों की याद के साथ ये भी भुला दिये जाते…
       रामदीन की परवरिश भी उसकी माँ ने अकेले अपने बूते पर करी,और जब रामदीन सत्रह का हुआ तो उसकी माँ ने संसार से आंखे मूंद ली,पर इन सत्रह सालों मे रोज रात दिन अपने ऊपर हुए ज़ुल्मों का ऐसा रोना रोया कि रामदीन का जिंदगी और लोगों से भरोसा उठ गया,अकेला जवान लड़का अपना पेट पालने के लिये जहां जो काम मिलता गया ,करता गया ….एक दिन काम की तलाश में एक बड़े अफसर के लाल बंगले पर काम पे लग गया,उसी बंगले में काम करने वाली लाली के साथ धीरे धीरे दिल जुड़ने लगा,अब दोनों की शामें कभी पहाड़ों की ढलानों पर तो कभी सेब के बागानों मे कटने लगीं….
       लाली की गुलाबी बातों में रामदीन अपना गम भूलने लगा,लाली को सिनेमा का बहुत शौक था,पर तब सब जगह सिनेमा हाल नही बने थे, लाली ने अपने किसी चच्चा से दिल्ली के सिनेमा के बारे में सुना था,उसने रामदीन के आगे जिद पकड़ ली, “पहले प्यार की हर हसरत सर आंखों पर ” ये मान कर एक रात रामदीन जिसे लाली दीन कहा करती थी,लाली को लिये दिल्ली को कूच कर गये…
       दिल्ली पहुंच कर दोनों प्रेमी युगल अपनी पहली जीत का जश्न मनाते रीगल सिनेमा पहुंच गये ।।

     उस समय बोलती फिल्मों का दौर नही था,और ज्यादातर अन्ग्रेजी सिनेमा ही दिखाया जाता था, दोनो ने हाथों मे हाथ डाले एक के बाद एक दो शो देखे “टेलिफोन गर्ल “के ,और उसी सिनेमा की खुमारी मे डूबे वापिस अलमोड़ा लौट आये, तीन दिन की उनकी अनुपस्थिती ने साहब के साथ साथ बाकियों को भी परेशान कर दिया।।
     रामदीन को अपने किये की सज़ा मिली सौ कोडों के रूप में,पर लाली की जो सज़ा साहब ने मुकर्रर की उसे देने के लिये साहब लाली को अपने साथ अपने कमरे मे ले गये,सारे नौकर हाथ बांधे सर झुकाये चुप खड़े रह गये,लेकिन उसके बाद वो बेचारी किसी को मुहँ दिखाने के लायक नही रही,और उसने रामदीन से सारे नाते रिश्ते तोड़ दिये,रामदीन को पहले पहल कुछ समझ नही आया,पर जब उसे सच्चाई समझ आई उसने उस नौकरी पे लात मारी और सियालफट में चढ़कर कोशी मे छलांग लगा दी, पर जीवन देना और लेना दोनो ही ऊपर वाले के हाथ है, रामदीन को बचा लिया गया,और उन्हें बचाने वाले थे मेजर के पिता चौधरी ज्ञानपरब सिंह ।।

    चौधरी जी उस अट्ठाईस उनतीस साल के युवक को अपने साथ लखनऊ ले गये,और तब से रामदीन चौधरी परिवार का एक हिस्सा बन गये।।रामदीन धीरे धीरे सब भूल गये,बस नही भूले तो वो था सिनेमा,,लाली की यादों को उन्होनें अपने सीने मे दफन कर दिया और उस बंजर मिट्टी पे जो खुशबूदार फूल खिला –वो था सिनेमा।।

  मेजर जब जवान हुए और दिल्ली को कूच किये तो चौधरी जी ने अधेड रामदीन को भी साथ कर दिया,तबसे घर और मेजर की देखभाल के साथ ही रामदीन अपने एक अदद  शौक सिनेमा को भी  अंजाम देते आये।
     
      जब प्रभा रज्जो और रामदीन काका साथ बैठा करते तब अक्सर रामदीन अपने सिनेमाई प्यार के किस्से उन दोनों को सुनाया करते,फिल्में देख देख के उन्होनें हातिमताई सा ज्ञान जोड़ लिया था, जिसका पैमाना वो जब तब छलकाते रहते….

    ” ‘ हिमांशु राय’ जर्मनी में निर्माता हुआ करते थे,वहाँ से वापस आये और क्या कमाल किया दोनो मियाँ बीवी ने कि पूछो मत,अरे जर्मनी वालों की तकनीक का क्या मुकाबला साहब,’ लाईट ऑफ़ एशिया’ मे गौतम बुद्ध बने खड़े थे,एक और सनिमा (सिनेमा) देखा था मैनें ‘ लंका दहन’ ओहो उसमे तो राम और सीता दोनो का किरदार एक ही शक्स ने निभाया ,पूछो कौन?”

   “आप बताइये काका कौन?”रज्जो खिलखिला के पूछ बैठी

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  “नाम तो याद नही बिटिया कोई शिन्दे विन्दे था, रसोईया था पहले,’ हरीशचंद्र ‘ मे रानी तारामती बना था,पहले पहले औरतें कहाँ काम करती थी,मर्द ही औरत बना करते थे,और बाद मे देखो ….. आज़ूरी, ज़ुबुन्नीसा,कज्जन,सुलताना,नादिया, सविता देवी , देविका रानी,एरोलीन, अनवरी बेगम, सिलोचना एक से एक रंगीन हस्तियाँ,मानो आसमान से उतर आईं थी,कैसी रेशमी सरसराती साड़ियाँ होती थी,और तरह तरह की लहर्दार फुग्गे वाली बाहों वाले ब्लाऊस,उफ्फ बालों का यूँ उंचा पफ बनाती थीं कि लगे चिड़िया का घोंसला है,निहायत ही खूबसूरत ….
…. देविका रानी ने कर्मा मे जो खालिस अन्ग्रेजी तरीके से गाया था–“कर्मा …. कर्मा ,उफ्फ दिल निकाल कर ले गई ।।
    हिमांशु राय की बेगम थी, और क्या हसीन माहज़बीं  मुकम्मल औरत थी।।यहूदी मोहल्ला के थियेटर में बहुत सनिमा बना और हमने देखा भी।।
     एक थी इशरत सुलताना बानो ,कम्बख्त जब आंचल मुहँ मे दबाकर और एक तरफ की आंखों को ज़रा उठा कर देखती थी ,ऐसा लगता था कलेजा चीर देगी।।

   “तो काका आपको सबसे ज्यादा पसंद वही थी।”

  “अरे नही पसंद तो हमे सबसे ज्यादा हंटरवाली आई,नादिया !! नादिया नाम था अदाकारा का,वो अंग्रजों के जैसे पैंट कमीज पहने जब हंटर लहराती तो सब हाय कर उठते।।”

   “हाय काका एक बार ज़रा कर के दिखाना ,कैसे सीने पे हाथ रख के किया अभी हाय !!”और रज्जो ज़ोर ज़ोर से हँसते हुए रामदीन के जैसे कर के दिखाने लगी ,प्रभा का भी हंस हंस के बुरा हाल हो रहा था कि तभी…

  “तो रामदीन तुम्हारी किस्सागोई चल ही रही है, अगर फुर्सत पा जाओ तो एक अदद चाय पिला देना हमें ।”

          अली लखनऊ से पूरे पन्द्रह दिन बाद वापस लौटा था,और पिछले दस मिनट से कमरे के बाहर से रज्जो को हँसते खिल्खिलाते अपलक देख रहा था,
      “हम्म बेहद खूबसूरत है,है ना!!!,बिल्कुल वो क्या कहावत है अंग्रेज़ी मे ‘ मिल्क विद हनी’ वैसी ही नज़र आतीं हैं आपकी रज्जो जी।” मेजर ने आकर अली के कंधे पे हाथ रखा।।

  “ये आपकी रज्जो जी क्या लगा रखा है,मेरी वेरी नही है वो,सब जानते हुए भी क्या बिला वजह कुछ भी बके जाते हो तुम भी।”

  “अरे मजाक कर रहे थे मियाँ,इतना बुरा क्यों मान गये,वो क्या है कि तुम दीन दुनिया को भुला कर रामदीन को देखने में लगे थे,और हमें मुगालता हो गया कि रज्जो को देखा जा रहा है,चलिये छोडिए, रामदीन को देख के मन भर गया हो तो अन्दर चलें।।”

मेजर अली को हाथ पकड़ कर अन्दर ले गया।।दोनो को इस तरह अचानक आया देख उन तीनों की रसभरी सभा भंग हो गई,रज्जो काका के साथ रसोई मे चली गई और प्रभा उन दोनो के साथ वही दीवान खाने में बैठ गई ।

   “प्रभा तुमने तो इसे बिल्कुल ही बदल दिया।”

   “किसे ? किसे बदल दिया मेजर साब ।”

    “रज्जो को,बिल्कुल पहचान मे नही आ रही, कहाँ सलवार कमीज मे दो चोटी लटकाये बच्ची सी लगने वाली लड़की को अचानक क्या खिला दिया तुमने,ऐसी रट पट बोल रही है,हंस रही है,क्या जादू की छड़ी घुमा दी भाई ,मै और अली पन्द्रह दिनो के लिये ही तो बाहर गये थे,और बस इतने मे ही तुमने एक कलि को फूल बना दिया।”

   “हमने तो कुछ नही किया ,रज्जो तो असली हीरा है ,हमने बस ज़रा सा तराशा है,कि हमारे बशर मियाँ की अँगूठी में ये नायाब हीरा सज जाये।”
 
   प्रभा की बात सुन अली वहाँ से सर झुकाये निकल गया।।

  “सारी बातें जानते हुए भी ,,ऐसा कैसे बोल सकती हो प्रभा,कुछ तो सोच समझ के बोला करो,वैसे ही उसकी नाक में गुस्सा बैठा रहता है….जहां पता है कि मंजिल मिल नही सकती,उस रास्ते जाने का मतलब क्या?”

  “मैं पूछती हूँ क्यों नही मिल सकती मंजिल,अगर वो लड़की इन्हें अपना सब कुछ समझे बैठी है,तो ये ही इतना अकड़ में क्यों हैं,अरे अपना क्यो नही लेते उसे।”

  “तुम तो ऐसे कह रही हो ,जैसे बशर को जानती नही हो,क्या वो ऐसा लगता है तुम्हें ।”
   रज्जो को चाय की ट्रे के साथ आते देख दोनो खामोश हो गये,उतनी देर मे कपड़े बदल कर मुहँ हाथ धो कर अली भी वापस आ गया।।
      सभी को चाय देकर रज्जो भी वहाँ रखे मोढे पे बैठ गई…
         उसकी आंखें नीचे थी,उसे अली के पैर नज़र आ रहे थे,गोरे लम्बे सफेद पैरों को देखते हुए रज्जो का कलेजा मुहँ को आने लगा,वो सोचने लगी क्यों उसका पति अब भी उससे इतना दूर भागता है,कहीं उसके मन में ये तो नही बैठ गया कि मैं मनहूस हूँ, जिस दिन बिदा होकर आई पूरे घर को खा गई,हाँ कहीं ना कहीं यही बात है,तभी तो शादी को इतने दिन हो गये प्यार से बोलना तो दूर आँख भर के देखा तक नही अपनी दुल्हन को….रज्जो अपनी सोच में गुम थी कि प्रभा ने अपनी बात छेड़ी ….

  ” अच्छा सुनिये आप लोग,……. आज रज्जो का मेरे साथ हॉस्टल जाना तय था,क्योंकि पिछले पन्द्रह दिनों से मैं यहीं पड़ी थी,तो आज मेरा वापिस जाना बेहद ज़रूरी था,तो बशर मियाँ क्या मैं आपकी बीवी को कुछ चार पांच दिनों के लिये अपने साथ ले जा सकती हूँ,अगर आपकी इजाज़त हो ।”

  “आप इन्हीं से पूछ लिजिये,मैं इस बारे मे क्या कह सकता हूं?  जैसा ये ठीक समझे।”

  “ये तो आपने मामला डिप्लोमेट कर दिया,अगर इजाज़त हैं तो हां कहिये वर्ना मना कर दीजिये।”

  “मैं आपके साथ चलूंगी प्रभा दीदी”……रज्जो ने अली की तरफ देखा और पूछा “मैं जाऊँ ना ?”

अली कुछ देर को हिरणी जैसी डरी डरी सी आंखों वाली उस लड़की को देखता ही रह गया।।
   “सुनो!! मैं जाऊँ ना?”

   “हाँ जाओ,अपना सामान ठीक से रख लेना।”

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  चाय पी कर मेजर प्रभा और रज्जो को हॉस्टल छोड़ने चला गया।।

   शाम से बीती रात उतर चुकी थी,हॉस्टल के गेट पर ताला जड़े एक खबीस चौकीदार अन्दर की तरफ बैठा अपनी बीड़ी सुलगा के पूरे इत्मिनान से कश भर रहा था,तभी प्रभा ने उसे आवाज लगाई,
   “फारुक ! ज़रा गेट खोल देना।”
    “अब नही खुलेगा गेट प्रभा मैडम,हॉस्टल वॉर्डन कह गई हैं,आठ के बाद किसी सूरत मे दरवाजा ना खोलूं ।”

    “मैं बुला के लाऊं क्या आपकी हॉस्टल  वॉर्डन को, उसके बाद ही आप दरवाजा खोलेंगे शायद।”

   फारुक ने मेजर को देखा और झट खड़े होके सलाम ठोंक के दरवाजा खोल दिया।।

   प्रभा और रज्जो मुस्कुराते हुए अन्दर दाखिल हो गये,प्रभा ने अन्दर से ही मेजर को हाथ हिला कर जाने का इशारा कर दिया ,और दोनो लड़कियाँ भीतर चली गई ।।

   भीतर एक बड़े से कमरे में जो लडकियों के खाने का कमरा था,एक गोलाकार लम्बी मेज़ पर कोई बीस बाईस लड़कियाँ मौजूद थी,जिनमें से ज्यादातर प्रभा की सहेलियां थी….. वैसे कॉलेज में मेजर से रिश्ते के कारण प्रभा की सखियाँ कम ही थी,ज्यादातर तो उसके पीछे उसके और मेजर के सम्बंधो की तुर्पाई में ही लगी रहतीं थीं ।।

  “अरे वाह प्रभा ये ‘ सोफिया लौरेन ‘ जैसी किस लड़की को पकड़ लायी हो।”
    
    प्रभा हँसते हुए रज्जो का सबसे परिचय कराने लगी।।
   
             “इनसे मिलो,ये मेरी बहुत प्यारी सखी हैं रज्जो ,ये पाकिस्तान से आईं हैं ,और रज्जो ये हैं शहाना, निम्मी, लता, सुरेखा ,भावना और अलमास ।”

  “पाकिस्तान से अभी कैसे आना हुआ आपका,अरे प्रभा कहीं ये वहीं तो नही जिनके पास तुम रुकने जाती हो।” भावना ने कहा

   “ओहो तो ये हैं बशर मियाँ की दुल्हन,वाह क्या कहने।” अलमास बोली

“हां जी बिल्कुल यहीं हैं हमारे बशर मियाँ की दुल्हन।”प्रभा ने कहा।

  “पर ये तो बड़ा गलत कर दिया जी आपने,बशर मियाँ को चुरा ले गई हम सब से।”

  “अच्छा बशर तुम्हारा कब से हो गया?”प्रभा ने लता की बात को काटते हुए कहा

  “इतना खूबसूरत बंदा जिसे देख लड़कियाँ आहें भरती हो वो किसी एक का कैसे हो सकता है भला,
अरे प्रभा जी आप नाराज ना होइये,हम तो मजाक कर रहे थे।”और सभी लड़कियाँ ज़ोर से खिलखिला कर हंस पड़ीं ।।

रज्जो चुपचाप मुस्कुराती रही,खाना खाने के बाद प्रभा और रज्जो ऊपर अपने कमरे की तरफ जाने लगे तभी लता ने आवाज दी ….

  “रज्जो जी वाकई हमारे लेडी किलर को ले उड़ी आप ।”और फिर एक ज़ोर का ठहाका लगा ,प्रभा और रज्जो भी हँसते हुए ऊपर चले गये।।

क्रमशः

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aparna..


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Abhishek kr singh
Abhishek kr singh
1 year ago

बहुत ही अच्छा भाग, पुराने फिल्मों की याद दिला दी आपने दी, जिसके बारे में फिल्म वर्कशॉप में सीखा था। पहले पुरूष काम नहीं करते थे फिल्मों में लेकिन उसके साथ ही यह गम भी उससे जुड़ा है रामदीन का, वह खो गया है खुद में ही, रज्जो आज़ाद पसन्द बन रही है और अली की दूरी को नया रंग दे रही है, बहुत अच्छा लगा पढ़कर, अलमास अच्छा नाम है, बेहतरीन भाग दीदी…💐🙏