Bestseller-9

The bestseller -9

                      लिफ्टमैन

      कॉफी पीकर सुहास को जरा राहत महसूस हुई उसने अपनी गर्दन कुर्सी के पीछे टिकाई और अपने बचपन में खो गया।
    बचपन में अक्सर जब अपनी अम्मा के साथ मेला घूमने जाया करता था तो बड़े-बड़े झूलों में उसकी अम्मा उसके साथ बैठने में डर जाया करती थी। और वह अकेले पूरी हिम्मत के साथ झूलने चला जाया करता था।
   उसे आज भी वह शाम बहुत अच्छी तरह याद थी जब वह जॉइंट व्हील से उतरकर आया और अपनी अम्मा के पास पहुंचा तो उसकी अम्मा ने हौले से उसके सर पर एक चपत लगा दी थी….-” तू क्या खुद से बातें करता रहता है चिन्ना?  झूले पर तेरे साथ कोई था ही नहीं और तू लगातार झूलते वक्त अपने हाथ हिला हिला कर पता नहीं किसे क्या सुना रहा था? अगर लोग देखेंगे ना तो सोचेंगे तू पागल है।”
   7 साल की छोटी सी उम्र में सुहास के दिमाग में अम्मा की बातें ठीक से नहीं घुसी। उसे बस यह लगा कि वह अंकल तो बड़े प्यार से उसके साथ बैठे थे फिर अम्मा को क्यों नजर नहीं आ रहे थे?
     उसने एक बार फिर मुड़कर उस झूले की तरफ देखा, वह अंकल भी उसके पीछे झूले से उतर आए थे। और उसे हाथ हिलाकर बाय कर रहे थे। उसने भी अपना हाथ हिला दिया। लेकिन तब तक उसकी अम्मा उसका दूसरा हाथ पकड़े खींचकर उसे किसी और जगह किसी नए झूले की तरफ ले जाने लगी थी।
    और वह भी अपनी अम्मा के साथ मगन उस मेले में फिर उन झूले वाले अंकल को भूल कर रह गया था।
  और ऐसा उसके साथ एक बार नहीं कई बार हुआ था। एक बार और जब उसकी मां पार्क में अपनी सहेली के साथ गपशप करने में व्यस्त थी और वह दूर खेलता हुआ स्लाइडर से गिर गया था। तब वहीं खड़ी दीदी ने ही तो उसे उठाया था और फटाफट उसके जख्मों को साफ भी कर दिया था। उन्होंने इतने प्यार से उसके घुटनों में हाथ रखा कि वह थोड़ी देर के लिए अपना दर्द भूल कर रह गया था। और उसकी अम्मा दूर से उसे देखकर अपने पास बुलाने लगी थी।
  ” यह क्या चिन्ना….तू फिर खुद से बातें करने लगा?  बेटा जहां पर बहुत सारे लोग रहते हैं वहां पर खुद से बातें नहीं किया करते। “
” पर अम्मा मैं तो उन दीदी से बात कर रहा था जिन्होंने मेरा घाव साफ किया।”

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” कहां? कौन है वहाँ?”
” ब्लैक कुर्ते वाली दीदी।” लेकिन वहां ब्लैक कुर्ते वाली कोई दीदी खड़ी होती तब तो अम्मा को नजर आती।
    और उसके बाद उसके मन को यह समझ में आ गया था कि उसकी अम्मा उसके कई दोस्तों को शायद नहीं देख पाती लेकिन उसकी बुद्धि में यह बात नहीं आई कि वह कुछ अलग लोगों को भी देख पाता है महसूस कर पाता है जिन्हें सारी दुनिया नहीं देख पाती। 

    और यह बात उसे तब समझ आई जब वह थोड़ा बड़ा हो गया।
   11 या 12 साल का रहा होगा जब उसके पापा का ट्रांसफर एक नई जगह पर हो क्या और वो लोग अपने पुराने शहर को छोड़कर एक नई जगह एक नए शहर में चले आए।
   नई जगह नई बनी सोसाइटी ऊंचे ऊंचे घर उसे यह सब कुछ देखना अच्छा लग रहा था।
  उनका घर बारहवें माले पर था। बच्चों के तो दोस्त भी जल्दी बन जाते हैं उसके भी ढेर सारे दोस्त बन गए थे। रोज शाम को वह अपना रैकेट उठाएं लिफ्ट से नीचे चला जाता और खेल कूद कर वापस आ जाता। लिफ्ट में अक्सर एक लिफ्टमैन हुआ करता था जो उसे देखकर हमेशा मुस्कुरा देता था शायद उस लिफ्टमैन को सुहास बहुत पसंद था।
   कुछ दिनों बाद सुहास और उस लिफ्टमैन की दोस्ती भी हो गई । अब अक्सर लिफ्टमैन सुहास को एक कैंडी दिया करता था लॉलीपॉप कैंडी। और सुहास बड़े प्यार से उसे थैंक यू बोल कर कुलांचे भरता अपने घर की तरफ निकल जाया करता था।
     सब कुछ सही चल रहा था। उन लोगों को उस सोसाइटी में रहते हुए लगभग 6- 7 महीने बीत चुके थे की एक रात खाने की टेबल पर सुहास की मां ने उसके पिता को बताया कि दो दिन पहले लिफ्टमैन ने आत्महत्या कर ली।
” क्यों अचानक क्या हो गया?”
” पता नहीं वह तो स्वभाव का शांत और सुलझा हुआ लगता था। लेकिन लोग तो उसके बारे में अजीब ही बातें कर रहे हैं। कह रहे हैं उसे अपनी पत्नी पर हमेशा शक हुआ करता था और उसने 4 दिन पहले अपनी पत्नी को मार कर उसकी लाश कहीं छुपा दी, उसके बाद इसी गिल्ट में कि उसने अपनी बेगुनाह पत्नी को मार डाला आत्महत्या कर ली।”
” यह तो बहुत ही गलत हुआ।  यही तो इन लोगों की बेवकूफी होती है… गुस्से पर काबू नहीं कर सकते और ऐसे बड़े बड़े निर्णय लेकर अपनी जिंदगी को खत्म कर बैठते हैं। “
     सुहास के माता-पिता तो लिफ्टमैन और उसकी पत्नी की मौत के बारे में चर्चा करते रहे लेकिन सुहास की आंखों में खौफ उतर आया।  क्योंकि उसकी मां के अनुसार लिफ्टमैन दो दिन पहले ही आत्महत्या कर चुका था जबकि सुहास को तो आज ही सुबह स्कूल जाते समय लिफ्टमैन ने कैंडी दी थी। शाम को भी जब वह खेलने जा रहा था तब लिफ्टमैन लिफ्ट में ही मौजूद था और सुहास ने उससे कुछ बातें भी की थी।
    अब सुहास की जो उम्र थी उसे भूत प्रेत आत्माएं जैसी बातें समझ में आने लग गई थी। उसे अचानक बहुत डर लगने लगा लेकिन उसने अपनी मां से कुछ नहीं कहा।
    अगले दिन सुबह जब स्कूल के लिए उसे गाड़ी पकड़नी थी वह लिफ्ट में जैसे ही दाखिल होने लगा उसके पिता भी साथ चले आए और सुहास को लिफ्ट में लिफ्टमैन नजर नहीं आया।
  स्कूल से आने के वक्त भी सुहास के साथ और भी बच्चे साथ थे और शायद इसीलिए लिफ्टमैन नजर नहीं आया… और सुहास को लगा कि अब उसे वो कभी नजर नहीं आएगा लेकिन उसका यह सोचना गलत निकला।
    घर पहुंचकर सुहास टीवी देखते हुए खाते पीते इस बात को लगभग भूल ही गया था कि लिफ्टमैन ने दो दिन पहले आत्महत्या कर ली है।
  

      खेलने का वक्त होते ही वह बिना किसी संकोच के और बिना किसी डर के अपना रैकेट लिए लिफ्ट में पहुंच गया ।
   लिफ्ट नीचे जा रही थी… वो आराम से खड़ा था… “रिंग अ रिंग अ रोज़ेज़” गुनगुना रहा था कि तभी उसका ध्यान गया, उसकी जूते की लेस खुल गई है। उसने नीचे झुक कर लेस सही की और जैसे ही ऊपर उठा…
….    लिफ्ट की पिछली दीवार जिस में मिरर लगा हुआ था उसमें उसे अपने पीछे कुछ अजीब सा धुंधलापन नजर आया.. वो जैसे से ही चौक के पलटा सामने लिफ्टमैन बैठा था।
      लेकिन आज लिफ्टमैन वैसा नहीं नजर आ रहा था जैसे हमेशा नजर आता था। उसके चेहरे पर नाखूनों के खरोंचने के निशान थे। उसकी आंखों के पास से खून बह रहा था।  नाक पर नील पड़ी हुई थी। और तो और उसकी गर्दन पर ऐसे भयानक नीले काले निशान थे जैसे रस्सी से बांधने पर बन जाते हैं।  उसका चेहरा इतना भयानक और विकृत लग रहा था कि सुहास की डर के मारे चीख भी नहीं निकल पा रही थी। वह घबराकर और पीछे हट गया और लिफ्ट से टकरा गया।
  और उसी वक्त इत्तेफाक से लिफ्ट की लाइट चली गई।
” नहीं नहीं मुझे मत मारना प्लीज प्लीज प्लीज मुझे मत मानना मुझे बहुत डर लग रहा है भैया।”
    घर घर घर की तेज आवाज के साथ लिफ्ट एक बार बहुत जोर से हिली … और नीचे की तरफ तेज़ी से बढ़ने लगी।
   सुहास का डर के मारे इतना बुरा हाल था कि वह लिफ्ट पर एक तरफ गिरा पड़ा था । उसने घुटनों के भीतर अपना मुंह छुपा लिया था और अपने आप को कसकर अपनी दोनों बाहों के घेरे में पकड़े हुए था।  वह बस बार-बार मुझे मत मारना मुझे मत मारना की गुहार लगाये जा रहा था…. अचानक ऐसा लगा जैसे लिफ्ट बहुत तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगी और एक जोर की धड़ाम की आवाज के साथ लिफ्ट झटके से खुल गई…
    लिफ्ट खुलते ही बाहर सुहास के बाकी दोस्त खड़े थे।  उन्होंने उसे आवाज लगानी शुरू की तब कहीं जाकर सुहास ने हिम्मत करके अपना चेहरा ऊपर उठाया… उस पूरी लिफ्ट में उस वक्त सुहास के अलावा कोई नहीं था। और लिफ्ट से ठीक बाहर उसके दोस्त खड़े उसे बाहर बुला रहे थे।
     एक गहरी सांस लेकर सुहास एक ऊंची से छलांग लगाकर एक झटके में लिफ्ट से बाहर आ गया।
    
         बस वह दिन था और आज का दिन उसके बाद कभी सुहास लिफ्ट में नहीं चढा। उसकी मां उसके पिता आदि ने उसे बार-बार समझाया लेकिन वह हमेशा सीढ़ियों से ही आने जाने लगा। उसकी जिद के आगे आखिर उसके पिता ने घुटने टेक दिए और 15-20 दिन बीतते बीतते ही एक दूसरी सोसाइटी में उन्होंने पहले ही फ्लोर पर फ्लैट देख लिया…. और और जल्दी ही वो लोग उस जगह को छोड़कर दूसरी जगह रहने चले गए।
    और अब सुहास को पहली बार समझ में आया कि उसकी आंखों में शायद ऐसा कुछ है कि उसे दूसरी दुनिया के लोग भी नजर आ जाते हैं।


     
      लगभग 1-2 साल वहां रहने के बाद उसके पिता को अमेरिका के ओहायो में नौकरी का ऑफर मिला और वह अपने पूरे परिवार को लेकर भारत से अमेरिका चले गए!
          लेकिन अमेरिका चले जाने के बाद भी सुहास का आत्माओं से पीछा नहीं छूटा… यह और बात थी कि वह कभी इस बात को नहीं समझ पाया और न ही उसने समझने का कोई प्रयास किया कि वह आत्माएं आखिर उसे नजर क्यों आती है…….

******

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    जमना ताई ने सारी साफ सफाई करने के बाद उस टेबल पर रखी एक अजीब सी काले मनको की माला को उठाया और उसे ले जाकर ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।
   उन्हें वह चीज देखने में थोड़ी अजीब लग रही थी। पर उन्हें पता था कि कामिनी अजीबोगरीब गहने पहनने की शौकीन थी। वैसे तो वह अक्सर जींस टॉप और शर्ट पहना करती थी अपने छोटे छोटे बालों को भी अक्सर खुला ही रखा करती थी। लेकिन कभी साहित्यिक गोष्ठियों में जब साहब के साथ जाती थी तब उसे साड़ी पहनने का भी शौक था साड़ी के साथ अक्सर वह बड़े-बड़े पत्थरों की अजीबोगरीब से ज्वेलरी पहना करती थी। जमना ताई को यह वाला भी कुछ वैसे ही लगा।हालांकि इस माला का आकार बहुत छोटा था उसे हाथ में पकड़ कर इधर-उधर घुमा कर देखने पर जमना ताई को लगा कि यह तो हाथ में पहने जाने वाले ब्रेसलेटजैसा है और उन्होंने उसे ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।

   उन्होंने समय देखा बड़ी देर हो गयी थी और कामिनी अभी तक पुलिस स्टेशन से वापस नही लौटी थी।

******

   शेखर ने ऋषिकेश के परिवार में उसकी पत्नी उसके बेटे भाई आदि सभी से पूछताछ कर ली और लगभग सभी का एक सा मत था कि कामिनी ने अपने से 30 साल बड़े साहित्यकार से सिर्फ और सिर्फ इसी लालच में शादी की…. की कामिनी का भी नाम हो सके। वह भी एक जानी-मानी साहित्यकार बन सके।
    इन सब से बातें करने के बाद शेखर ने सब को वापस भेज दिया! जाते जाते ऋषिकेश के बड़े बेटे की पत्नी रेशमी ..-“मैं अंदर शायद अपना पर्स भूल गई हूं” अपने पति से यह बहाना कर एक बार फिर शेखर के पास आई और उसके हाथ में एक छोटी सी पर्ची थमा कर तुरन्त बाहर निकल गई।
     ” मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है। कल कॉफी शॉप पर 3 बजे आप मुझे मिल सकते हैं?”
   इस संदेश के नीचे ही रेशमी ने कोई नंबर लिख कर छोड़ा था।  जाहिर था वह रेशमी का मोबाइल नंबर था, और यह भी जाहिर था कि शेखर से वह कुछ ऐसी बातें कहना चाहती थी, जो वह अपने पति और अपनी सास के सामने उससे नहीं बता पाई ।क्योंकि पूछताछ के दौरान रेशमी का पति सारा वक्त उसके साथ मौजूद था और रेशमी ने वही रटी रटाई बातें शेखर को बताईं जो घर के बाकी सदस्यों ने बताई थी। कामिनी को अलग कमरे में रखा गया था। वह बेचारी बुझी बुझी सी एक कमरे में चुपचाप बैठी आंसू बहा रही थी। दो दिन पहले तक शायद उसे उम्मीद थी , कि उसका पति उससे बिना बताए कहीं चला गया है… और वापस आ जाएगा लेकिन आज उसके चेहरे से जाहिर था कि उसकी वह उम्मीद टूट गई थी।

शेखर ने कामिनी से कुछ बहुत ज्यादा पूछताछ नहीं की… कामिनी की हालत भी नहीं लग रही थी.. कि उससे ज्यादा कुछ पूछा जा सकता है। और इसीलिए शेखर ने उसे वापस भेज दिया।

 “कहां हो त्रिपुरारी?
” साहब गिरधारी!”
” हां भाई वही!! तुम्हारा नाम इतना अच्छा रखा है तुम्हारे माता-पिता ने कि, तुम्हारे नाम को बोलने के बदले मैं भगवान के सारे रूपों के नाम जप लेता हूं …इसी बहाने भगवान का नाम भी ले लिया जाता है। क्योंकि भई हमसे तो सुबह सुबह उठ कर दिया बाती नहीं होती। समझ रहे हो ना? वो क्या है कि हमारी अम्मा कहा करती थी कि:’ बिटवा भगवान के लाने दीया लगाने के पहले नहा लियो।’:अब यही रोज़ रोज़ का नहाना ज़रा मुश्किल हो जाता है हमसे पंसारी!”
” जी साहब चाय ले आएं हम आपके लिए?
” बिल्कुल नेकी और पूछ पूछ!! ले आओ। और ऐसा करना कुछ गरम मिल रहा होगा चाय के साथ तो वह भी ले आना यार… यह रायसागर फैमिली के पचड़े में सुबह से एक दाना पेट में नहीं गया। “

                  

   गिरधारी ने गरमा गरम चाय के साथ आलू गुंडों की प्लेट भी शेखर के सामने रख दी…
” वाह-वाह संसारी!! आलू गुंडे देखकर तो मजा ही आ गया। पेट के अंदर से आवाज निकल रही है कि तू जिए हजारों साल और साल के दिन हो पचास हजार।”
  गिरधारी शरमा कर इधर-उधर देखने लगा। शेखर ने एक टुकड़ा उठा कर मुंह में रखा ही था कि फोन बजने लगा…
” हां हां तुरंत भेज दो मैं फिलहाल अंदर ही बैठा हूं। “
   शेखर के हां बोलते ही बाहर से एक आदमी ने अंदर आने की अनुमति ली…. शेखर ने देखा सामने खड़ा आदमी लगभग 49-50 साल का दिख रहा था! उसने उसे इशारे से अंदर बुला लिया…..
” हां जी तो कौन साहब हैं आप?
   शेखर ने जैसे ही सामने बैठे उस आदमी से सवाल किया उतने में ही गिरधारी नाश्ते की प्लेट और चाय का भरा कप उठाकर वहां से ले गया। लाचारगी से अपनी चाय के कप को देखते हुए शेखर ने वापस सामने बैठे आदमी के ऊपर नजरें टिका दी…
” जी साहब मै कुलदीप हूं। कुलदीप भगत । “
” अच्छा इंद्रपुरी केस वाले..”
” जी साहब वह मेरा ही परिवार था। मैं ही उस घर का बड़ा लड़का हूं साहब। मैं गांव में रहा करता था, गांव में हमारे काफी सारे खेत खलिहान है। और उन सब की जिम्मेदारी मुझ पर ही है। मैं ही वहां का सारा काम कर देखता हूं । लगभग 6- 7 महीने में एक बार शहर  आना होता था… और तब मैं चावल,गेहूं,दालें सोया और इस तरह के जो भी अनाज हमारे खेतों पर उठते थे वह ले आया करता था …
      जब बच्चे बड़े होने लगे तो कुछ सालों पहले मेरी बीवी बच्चों के साथ शहर आकर रहने लगी। बच्चों की पढ़ाई के लिए यही जरूरी भी था।
” यहां पर कौन कौन रहा करते थे?
” मेरे दो भाई उन दोनों की बीवियां और उन दोनों के बच्चे और साथ में मेरी बीवी और उसके दो बच्चे।
   लेकिन अभी इस हादसे में मेरी बेटी और बेटे को कुछ नहीं हुआ वह दोनों असल में बाहर शहर में रह कर पढ़ रहे हैं। “
” वहां 3 बच्चे मृत पाए गए। वह तीन बच्चे कौन-कौन थे आप बता सकते हैं?
” जी उसमें से दो बच्चे एक भाई के थे । और दूसरे वाले भाई का एक बेटा था। असल में मेरे दोनो भाई जुड़वा हैं, उनमें से एक जो पांच मिनट छोटा है वही सबसे छोटा भाई है, उसी छोटे भाई की एक बेटी पिछले साल अचानक से गायब हो गई थी। उसके बाद से ही हमारा पूरा परिवार बहुत परेशान रहने लगा था। डिंपी को ढूंढने का हम सब ने बहुत प्रयास किया…… लेकिन हमारा सारा प्रयास असफल साबित हुआ।  पुलिस भी कुछ नहीं कर पाई। हमने हर जगह उसे ढूंढने की कोशिश की।  उसकी हर सहेली के घर पर आजू-बाजू हर जगह देख लिया ..लेकिन वह बच्ची कहीं नहीं मिली।  उसके बाद से ही उसका पिता यानी मेरा छोटा भाई थोड़ा सा अपसेट रहने लग गया था। और थोड़ा अजीबोगरीब चीजों की तरफ उसका झुकाव होने लग गया था?
” जैसे क्या,?  मेरा मतलब है कि कैसी अजीबो गरीब चीजें?
” साहब तंत्र-मंत्र पर उसका विश्वास बहुत बढ़ने लग गया था! किसी बाबा जी के पास अक्सर जाया करता था। और वह उससे कहते थे, कि तुम्हारी बेटी वापस आ जाएगी। मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, कि छोटे एक बार इस संसार से चले गए लोग वापस नहीं आते …लेकिन वह मेरी बात मानने को तैयार नहीं था! और उसके पागलपन में उसकी बीवी ही क्या मेरा दूसरा भाई और उसकी बीवी भी उसका साथ दे रहे थे। यहां तक कि मेरी खुद की बीवी ने भी मेरी बातें सुनना छोड़ दिया था। पता नहीं उस बाबा जी ने इन लोगों पर क्या चक्कर चलाया था साहब?
” ठीक है!! बाबा जी का कोई नंबर आता पता ठिकाना दे सकते हो?
” नहीं जानता साहब! मैं उन बाबाजी के खिलाफ बोला करता था, इसलिए घर के लोग मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं बताते थे। शुरू शुरू में उन्होंने मुझे बताया था लेकिन जब मैंने उनका साथ नहीं दिया तो उन्होंने मुझसे यह सारी बातें  छिपानी शुरू कर दी थीं।
” ठीक है!! आप जा सकते हैं लेकिन फिलहाल यह शहर छोड़कर आप नहीं जाएंगे। जब तक केस सॉल्व नहीं हो जाता।
      हमें जरूरत पड़ेगी यो हम आपको बार बार बुलाते रहेंगे। तो ऐसे में अगर आप गांव चले गए तो हम लोगों की दिक्कत बढ़ सकती हैं।
” जी साहब।”
   उसके वहां से जाते ही शेखर अपनी पेन उंगलियों के बीच घुमाते हुए कुछ सोचने लगा। उसी समय गिरधारी वापस उसकी चाय और नाश्ता ले कर चला आया…
” साहब आपकी इच्छा है….वैसे साहब क्या लग रहा है क्या सच में तंत्र मंत्र का चक्कर है?
” साफ सफेद झूठ बोल कर गया है ये। यह केस बिल्कुल पानी की तरह साफ है पुजारी ।
       इसी कुलदीपक से कुल को आग लगी है समझे! बड़ा भाई जरूर है यह, लेकिन है एक नंबर का लालची। पहले जमीन जायदाद की देखभाल के बहाने अकेले वहां रह गया। फिर बीवी बच्चों को चार-पांच साल से शहर में पटक दिया। बच्चे जब इसके बड़े हो गए और छोटे शहर से बड़े शहर के लिए निकल गए.. तभी इसने यह सारी प्लानिंग की।
।  अब देखो यहां की दो दुकानें जो इसके दोनों छोटे भाई चलाते थे… यहां का दुमंजिला घर जिसमें नीचे किराएदार भी रहते हैं… और उनके किराए का पैसा भी आता है। और साथ ही गांव की चालीस एकड़ जमीन सब कुछ किसे मिला?”
” किसे मिला साहब?

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“घर भर के कुलदीपक को… और उसके उन दो नौनिहालों को… जो पढ़ाई के नाम पर शहर से दूर चले गए थे। इसे कहते हैं बेटा पारिवारिक षड्यंत्र!!
      यह तुम नहीं समझोगे! दिमाग वालों का खेल है। समझे?
” पर साहब अपनी बीवी को भी लपेटे में ले लिया? आखिर इस सब में उसकी बीवी भी तो मरी ना!! “
” अबे यार पंसारी!!! पचास की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते ना अपनी बीवी में साक्षात दुर्योधन नजर आने लगता है… समझे! तो जब गेहूं के साथ इतनी आसानी से घुन पिस रहा है तो कौन होगा वह मूर्ख जो बीवी रुपए घुन को परिवार रूपी गेहूं से अलग करेगा? इसमें तो उसे डबल फायदा हुआ एक तरह से बोनस हो गया कि बीवी भी निकल ली… और इतनी सारी प्रॉपर्टी भी छोड़ गई। अब ऐश करेगा, दूसरी शादी करेगा, बच्चे तो वैसे ही दूसरी जगह रहते हैं।”
“मान गए साहब ?”
” किसे मुझे? या मेरे दिमाग को?”
” ये मान गए कि आप बड़े फिल्मी हैं। चाय पी लीजिए साहब और जे देखिए कुछ पर्ची टेबल छोड़ कर गिर गई है शायद आपके काम की हो।”
    गिरधारी ने रेशमी की छोड़ी हुई पर्ची शेखर के हाथ में थमा दी ….और शेखर उस पर्ची को खोल कर एक बार फिर सोच में डूब गया कि आखिर रेशमी उसे क्या बताना चाहती हैं…..

क्रमशः

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aparna ……

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