The Bestseller -7

” धोखा“
सुहास ने जैसे ही सुना कि वह दोनों भी कोयलीगढ़ जा रहे हैं उसने तुरंत उन्हें अंदर बुला लिया।
वह आदमी सामने सुहास की बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया और औरत पीछे बैठ गयी। सुहास ने उन लोगों से कोयलीगढ़ जाने का रास्ता पूछा और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
कुछ दूर चलने के साथ ही सुहास ने महसूस किया कि उसे हल्की सी ठंड लग रही है… उसने एसी की तरफ देखा और टेंपरेचर बढ़ा दिया।
” आप लोग किसी विशेष काम से जा रहे हैं वहां?”
” हां एक पार्टी है, उसे अटेंड करने जा रहे हैं। “
” अच्छा!! अच्छा मतलब पहले भी आपका जाना वहां हो चुका है? “
सुहास के सवाल पर उसके बाजू में बैठे आदमी ने ही जवाब दिया….” हां!!! हो चुका है… और आज हम वहां के मुखिया के बेटे की बर्थडे पार्टी में जा रहे हैं। “
‘क्या जरूरत है जबरदस्ती में झूठ बोलने की… आप भी ना सुधरेंगे नहीं।”
अचानक ही वह पीछे बैठी औरत उस आदमी को डपटने लगी।
उसका इस तरह अपने पति को डांटना देखकर सुहास खुद में ही शर्मिंदा हो गया।
“जी कोई बात नहीं… जरूरी नहीं कि आप मुझे कारण बताएं। “…
सुहास की बात पर इस बार फिर उस पीछे बैठी औरत ने हीं जवाब दिया।
“छुपाने वाली ऐसी कोई बात भी नहीं। सुनिए आप इन्हे सब कुछ सच-सच क्यों नहीं बता देते, कि हम अघोरिया बाबा जी से मिलने जा रहे हैं।”
गाड़ी चलाते हुए ही सुहास ने अपने बाजू में बैठे उस आदमी की तरफ एक बार वापस देखा। उसके चेहरे का एक हिस्सा ही सुहास ठीक से साफ-साफ देख पा रहा था…-” अघोरिया बाबा से लेकिन क्यों?” सुहास अपने मन की उत्सुकता छिपा नहीं पाया।
” क्योंकि वही ऐसे हैं जिन्होंने हमेशा हमारी मदद की है… और हमारा खोया हुआ रुतबा, हमारा खोया हुआ धन सब कुछ हमें वापस दिलवा दिया।”
” कैसे?”
उस आदमी ने अपनी बात कहनी शुरू की…….-” बात दरअसल यह है, कि हमारा गांव में खूब लंबा चौड़ा कारोबार था। ढेर सारी जमीन जायदाद सब कुछ। वहीं हमारा एक पड़ोसी था उसने मुझसे कहा कि हम दोनों अपनी अपनी जमीन का आधा हिस्सा बेचकर शहर में कोई नया कारोबार शुरु करते हैं… मैंने उसकी सारी बात मान ली, और उसके साथ ही मिलकर अपनी जमीन का आधा हिस्सा बेच दिया। पार्टनरशिप में हम दोनों ने मिलकर शहर में एक बड़ा सा शोरूम खोल लिया। काम अच्छा खासा चल पड़ा।
इसी बीच मुझे और मेरी पत्नी को काम से किसी दूसरे शहर जाना था। हमें लगभग 10 दिनों का समय वहां लगना था तो उसने मुझसे कहा कि इतने दिन अगर मैं नहीं रहूंगा तो बिजनेस में कोई भी निर्णय लेने के लिए उसके पास पावर ऑफ अटॉर्नी होनी बहुत जरूरी है.. मैं भी उस पर आंख मूंदकर भरोसा करता था, मैंने उसके नाम से कागजों पर दस्तखत कर दिया।
हम दोनों जब वापस लौट कर आए और अपने घर पहुंचे तो हमने देखा हमारे घर पर वह मौजूद था। अपने घर पर उसने कोई जलसा रखा हुआ था। और पता है उसने कैसा जलसा रखा था?”
” कैसा जलसा?”
” जैसा मैंने उस समय रखा था, जब हमने पहली बार शोरूम खोला था। उसके बाद मैंने सारे कस्बे को अपने घर पर निमंत्रित किया था । सभी का खाना पीना किया था घर पर। हम गांव में रहना भले ही पसंद करते थे और गांव से जुड़े हुए थे लेकिन हम दोनों ही पति-पत्नी की परवरिश और पढ़ाई लिखाई शहर में हुई थी। शहर में अच्छी नौकरियां करने के बाद हम आठ दस सालों में ही शहर की जिंदगी से उकता कर अपने गांव यानी कि अपने खुद के फार्म हाउस पर चले आए थे। और उसी फॉर्म हाउस से लगी जमीन हमने बेची थी। उस दिन सारा जलसा निपटने के बाद जब सारे लोग हमसे बिदा लेकर वहां से चले गए, तब वह अकेला रह गया। उसने कहा कि अभी उसकी पार्टी बाकी है और उसने शराब की बोतले निकाल लीं।
उसने कहा भाभी जी आप हमेशा मुझे एक से बढ़कर एक चीजें बना कर खिलाती हो। आज मैं आपके लिए कुछ बनाऊँगा। और हमें हॉल में छोड़ वह अकेला रसोई में चला गया।
कुछ देर बाद एक ट्रे में कुछ खाने पीने का सामान लेकर बाहर चला आया उसने मेरे और मेरी पत्नी दोनों की तरफ दो प्लेट बढ़ा दीं।”
उसकी बात सुनकर जाने क्यों सुहास को एकदम से पीछे बैठे उसकी पत्नी को देखने का मन किया और उसने बैक व्यू मिरर में ही एक बार झांक लिया लेकिन वह चौक गया क्योंकि उसके पीछे की सीट पर कोई नहीं बैठा था।
घबराकर उसने तुरंत अपनी गर्दन पीछे मोड़ी और उसकी सांस में सांस आई….. वह औरत पीछे बैठे मुस्कुरा रही थी। उसे देखकर अपने घबराए हुए चेहरे को संयत करते हुए सुहास ने भी उसे एक छोटी सी मुस्कान दी और वापस सामने मुड़ गया…
” फिर क्या हुआ?”
” फिर मैं और वो हम दोनों ही बैठ कर दारु पीने लगे। लेकिन जब तक में हमने अपना एक एक पैग खत्म किया इन्होंने अपनी पूरी प्लेट साफ कर दी । शायद इन्हें उस दिन का खाना बहुत ज्यादा ही पसंद आ गया था, लेकिन तब हम दोनों ही नहीं जानते थे कि उस खाने में जहर मिला हुआ था।
खाना खत्म होते ही इनसे प्लेट तक टेबल पर रखी नहीं गई और यह अपना गला पकड़ कर बेचैनी सी महसूस करने लगीं। मुझे अचानक लगा इन्हें क्या हो रहा है? मैंने इनसे पूछा भी..-” तुम ठीक तो हो” लेकिन उस ज़हर का असर इतना तेज इन पर शुरू हो गया था कि कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी और बेचैनी में यह अपनी कुर्सी से जमीन पर गिर पड़ी। मैंने जलती हुई आंखों से उसकी तरफ देखा वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था उसने कहा…-” भाभी जी तो अब गयी। इन्होंने तो जहर भरा खाना पूरा खा लिया। और अब तेरी बारी है।”
उसने अपने हाथ में एक चाकू निकाल लिया लेकिन जब तक वह मेरे सामने बढ़ता, मैंने वही रखा फल काटने वाला चाकू उठाकर उस पर वार कर दिया। लेकिन शायद वह मेरे वार के लिए पहले से तैयार था। अपने दूसरे हाथ से मेरे वार को रोकने अपने हाथ में पकड़ रखी कटार मेरे चेहरे पर चला दी यह देखो…..”
और उस आदमी ने अपने चेहरे पर के उस जख्म को मेरे सामने कर दिया उसकी दाहिनी तरफ की भौंह से लेकर नीचे होंठों तक उसके चेहरे पर एक लंबा सा कट का निशान था। निशान ऐसा ताजा लग रहा था, जैसे अभी उसमें से खून बलबलाकर बहने लगेगा।
” फिर क्या हुआ?” सुहास के रोंगटे खड़े हो रहे थे… लेकिन फिर भी वो ये जानना चाहता था कि आगे क्या हुआ
” फिर इनकी हल्की सी कुछ आवाज सुनाई पड़ी मैं इन की तरफ लपकने को था कि शायद इन्हें बचा सकूं उतने में ही उसने मुझ पर फिर वार करने की कोशिश की । और इस बार मैंने चाकू सामने अड़ा लिया, और उसी पर वार कर दिया …लेकिन उसने मेरा वार रोक लिया। और मेरा हाथ इस ढंग से घुमाया कि खुद को बचाने के लिए मुझे उसकी तरफ ही झुकना पड़ा और उसी समय उसने तेजाब मेरे चेहरे पर फेंक दिया… एक तीखी सी दर्द और जलन की लहर सी उठी और और मेरे ही सामने मेरे एक हिस्से की त्वचा गल गल कर गिरने लगी। अपने दर्द को समेटता, रोता चिल्लाता चीखता मैं नीचे गिर पड़ा और तभी उसने मेरी पीठ पर एक के बाद एक पांच बार उसी खंजर से वार किया। जो कभी हमारे घर की शान हुआ करता था। जो कभी किसी वक्त मेरे हॉल की शोभा बढ़ाया करता था। आज वह खंजर मेरे खून से सना पड़ा था और उसे मेरे पीठ पर उतारने वाला था किसी जमाने का मेरा दोस्त। “
सुहास ने बहुत घबरा कर उस बाजू वाले आदमी की तरफ देखा। अब तक उस बाजू वाले आदमी ने अपने सिर पर लगा रखी हैट उतार दी थी। मफलर से उसने अपनी दूसरी तरफ का जो चेहरा ढक रखा था उसे भी खोल दिया और उसका तेज़ाब से बिगड़ा झुलसा चेहरा सुहास के सामने था।
” मेरे सामने मेरी पत्नी तड़प तड़प कर मर गयी, और मैं खुद अपने उस बेईमान दोस्त के सामने अपनी आखिरी सांसो के लिए गिड़गिड़ा रहा था…
पत्नी मर गई यह शब्द सुनते ही सुहास के वापस रोंगटे खड़े हो गए… उसने धीरे से सिर घुमा कर पीछे देखा… पीछे वह औरत उसी मुद्रा में बैठी थी, जिस मुद्रा में पहले सुहास ने उसे देखा था। चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चिपकाए वह उसे अपलक घूर रही थी।
सुहास ने अपने बाजू वाले आदमी को देखा उसकी आंखों से मानो खून बह रहा था…. वह बहुत गुस्से में नजर आ रहा था।
सुहास के समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए। उसने जोर का ब्रेक लगाया और गाड़ी रोक दी, उसने दरवाजा खोला और खुद गाड़ी से बाहर निकल आया। उसे ऐसा लगा अंदर बैठे हुए उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी।
बाहर खुली हवा में आकर उसे लगा जैसे अब वह आराम से सांस ले सकता है… उसका सिर फटने लगा था… उसका पूरा शरीर पसीने से तरबतर था.. उसने अपने दोनों हाथों से अपना माथा दबाया और जोर से चिल्लाने लगा।
कुछ देर चिल्ला लेने के बाद जब उसके अंदर का डर थोड़ा सा कम हुआ , उसने देखा उसके आसपास कोई नहीं था। थके कदमों से वो अपनी गाड़ी के पास वापस आया, उसने धीरे से अंदर झांककर देखा अंदर ना तो वह आदमी बैठा था और न पीछे वह औरत।
अपनी पूरी हिम्मत समेटकर सुहास एक बार फिर गाड़ी के अंदर बैठ गया…-” हे भगवान बस किसी तरह मुझे उन बाबा जी तक पहुंचा दो, तुम्हारा एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा। “
सुहास का डर अब अपने चरम पर था और उसकी सारी हिम्मत भी सूख चुकी थी। वह हनुमान जी का नाम लेकर बार-बार हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा ।उसने गाड़ी की सभी तरफ़ की ग्लासेस चढ़ा ली , और कार को एक तरफ रोक कर खड़ा हो गया हनुमान चालीसा का मन ही मन पाठ करता वह आंखें बंद किए जाने कब तक ऐसे ही बैठा रह गया।
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नंदिनी अपने फ्लैट में पहुंच चुकी थी। नहाकर उसने अपने लिए कॉफी बनाई और आकर सोफे पर बैठ गई उसके दिमाग में यही चल रहा था कि आखिर वह लाश गई तो गई कहां?
यह सब इतना आसान नहीं था उसकी गाड़ी की डिक्की में पहले लाश आ गई, और फिर अचानक से गायब हो गई। यह दोनों ही बातें बहुत अजीब थी। और इन सब बातों में सबसे पहला सवाल था कि आखिर ऋषिकेश रायसागर को किसने मारा? मरने के बाद उसे किसने लाकर नंदिनी की गाड़ी में छुपाया और वापस आकर किसने उस लाश को नंदिनी की गाड़ी से निकाल लिया ? इस सबके बीच नंदिनी को यह तो समझ में आ गया था कि जिसने भी उसकी गाड़ी में लाश को डाला और हटाया था वह यह बात जान चुका है कि नंदिनी यह बात जानती है कि ऋषिकेश रायसागर मर चुका है।
उसके दिमाग में यह सब बातें यह सारे विचार चल रहे थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हो गई।
“ओह्ह नो अभी बिल्कुल मूड नहीं है, किसी भी मेहमान को एंटरटेन करने का। प्लीज भगवान कोई मेहमान ना आया हो। “
उसने जाकर बिल्कुल ही बेमन से दरवाजा खोल दिया…..
सामने शेखर खड़ा था।
शेखर थका हारा सा अंदर चला आया…-” ओ वाओ कॉफी? क्या मुझे भी एक कप मिलेगी?”
“श्योर!”
नंदिनी शेखर के लिए भी एक कप में कॉफी बना कर ले आई।
” आज कैसा रहा मिसेस राइटर से तुम्हारा टग ऑफ वॉर?”
” व्हाट टग ऑफ वार? वह बेचारी तो खुद ही बहुत परेशान लग रही है! पिछले चार-पांच दिन में जब से उसका पति गायब हुआ है, मुझे लगता है उसने ढंग से कुछ खाया पिया नहीं । आंखों के नीचे काले घेरे से पड़ गए हैं। दुखी सी लगती है हमेशा। और कुछ भी ज्यादा पूछताछ करो तो उसकी आंखें भर आती हैं। “
” जो सबसे ज्यादा विक्टिम नजर आता है ना शक सबसे ज्यादा उसी पर करना चाहिए।”
” लेकिन शक किस बात का करूं ? क्या अपने पति को ही गायब करवा कर वह खुद ही अपने आप को फोन करके रैनसम मांगेगी? “
नंदिनी को तुरंत याद आ गया कि शेखर अभी ऋषिकेश की मौत के बारे में कुछ नहीं जानता उसने खुद को संभालते हुए बातों की दिशा ही बदल दी… “अच्छा ये बताओ कॉफी कैसी बनी है।”
“अच्छी बनी है नंदू !! तुम्हें याद है सुबह तुम्हें वह केस बताया था ,मैंने जहां एक घर के सात सदस्यों ने एक साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली!”
” हां याद है.. उसमें कोई क्लू मिला?”
“कुछ खास ब्रेक थ्रू नहीं मिला है। लेकिन अब तक में सीसीटीवी की जांच और इस सब से यही नजर आ रहा है कि उनके घर में बाहर से कोई नहीं आया, ना ही उनके घर में पहले से कोई ऐसा इंसान था जो इन लोगों की मौत के बाद घर से बाहर निकला हो। इनका घर उस गली के मुख्य चौराहे पर था जहां पर इनके घर के मेन गेट के ऊपर ही इन लोगों ने सीसीटीवी लगवा रखा था। “
” तो फिर एंगल किस तरफ मुड़ रहा है?”
“सब कुछ कल और क्लियर हो जाएगा। उस परिवार का बड़ा लड़का पहुंच गया है। कल उसे उसे थाने पर बुलाया है पूछताछ करने के लिए।”
शेखर अपना कप लिए कॉफी पी रहा था कि उसका मोबाइल बजने लगा…-” इधर झील के पास एक डेड बॉडी मिली है सर। “
” किसकी बॉडी है? मेरा मतलब आदमी? औरत कौन है? कोई पहचान में आ रहा है?”
“सर बॉडी तो ऋषिकेश रायसागर की लग रही है?”
” व्हाट?? ठीक है लोकेशन सेंड करो मैं अभी पहुंच रहा हूं।”
” क्या हुआ शेखर किसका फोन था?”
” थाने से फ़ोन था… एक बहुत बुरी खबर है। उस साहित्यकार ऋषिकेश रायसागर की डेथ हो गई है। उस की डेड बॉडी झील के पास मिली है। “
नंदिनी की कॉफी उसके गले में अटक गई और उसे हल्का सा ठसका सा लग गया। खांसते हुए उसने अपनी कप नीचे रखी और खड़ी हो गई।
” तुम्हें क्या हुआ तुम क्यों खड़ी हो गई? तुम भी चलोगी क्या मेरे साथ?”
” मैं नहीं!! वो कुछ नही बस ऐसे ही। ” नंदिनी अपने चेहरे की घबराहट शेखर से छिपाने के लिए कप उठाकर सिंक में डालने चली गई।
रसोई में जाकर वह कुछ देर अपनी सांसो को संभालने की कोशिश में लग गई। उसे अचानक ही बहुत घबराहट होने लग गई थी। अब शेखर को भी पता चल चुका था कि ऋषिकेश रायसागर मर चुका है। वह सोचने लगी अब भी मौका है क्या उसे शेखर को बता देना चाहिए कि, ऋषिकेश रायसागर की डेड बॉडी उसकी गाड़ी में बहुत समय तक पड़ी हुई थी, और फिर अचानक ही गायब हो गई। उसने सोचा हां यही सही वक्त है उसे शेखर को सब कुछ बता देना चाहिए यह सोच कर बाहर आई कि उसने देखा शेखर जा चुका था……
क्रमशः
aparna …..

Disorganised website… Too difficult to read stories… Nothing comes as a sequence.. They pop in a random manner.