Bestseller-33

The bestseller -33

                      “, सैडिस्ट



    मुझे लगने लगा था कि वह अब सामान्य हो चुका है लेकिन मैं गलत थी और एक दिन मैंने देखा कि शाम के समय स्कूल से आती है छोटी सी बच्ची से बात कर रहा है… मुझे उस पर जाने क्यों शक होने लगा और मैं दूर से उस पर नजर रखने लगी वह बहला-फुसलाकर अपने साथ उस बच्चे को ले जाने लगा। मैं भी एक सुरक्षित दूरी बनाकर उसका पीछा करने लगी।

वह आड़ी टेढ़ी गलियों को पार कर उसे शहर के एकदम निर्जन छोर पर ले गया। और वहां उसने बड़ी बेरहमी से उस लड़की को मार दिया।
मैं जब तक उसके पास पहुंच पाती तब तक वह एक बड़े से पत्थर से उसका सर फोड़ चुका था। मुझे बहुत अफसोस हुआ कि मैं उससे इतना दूर क्यों थी क्योंकि जब तक मैं समझ पाती कि वह उसे मारने जा रहा है और उस तक भागकर पहुंच पाती तब तक वह उसे मार चुका था।
  वहां आसपास दूर-दूर तक कोई नहीं था। मैं जब तक कंकर के पास पहुंची वह उस लड़की के शरीर के पास बैठा पत्थर से मार-मार कर उसके चेहरे के हिस्सों को निकाल कर खा रहा था। यह सब इतना विभत्स था कि एक मां होकर भी मुझे अपने ही लड़के से नफरत हो गई।
  मेरा जी किया उसी पत्थर को उठाकर उसका सर फोड़ दूं, लेकिन हाय रे  एक मां का दिल!! मैंने उस पत्थर को अपने सर पर मार लिया.. और वहीं बैठ कर रोने लग गई। मुझे देखते ही वह हड़बड़ा कर उस लाश को छोड़कर उठ बैठा  और मेरे पांव पर गिर गया ।वह बार-बार मुझसे माफी मांगने लगा और कहने लगा मां मुझे माफ कर दो मैं क्या करूं मेरे दिमाग में ही कोई ऐसी तकलीफ है कि मुझे एक लाश को खाने में ही मजा आता है। मैं खुद चाहता हूं कि मुझे मेरी इस बीमारी से मुक्ति मिल जाए। लेकिन मैं अपनी सारी कोशिशों के बावजूद ऐसा नहीं कर पा रहा हूं ।माँ या तो मुझे माफ कर दो, या मुझे मार डालो। बस पुलिस के हवाले मत करना क्योंकि मैं यह जानता हूं कि मैंने बहुत गलत काम किया है। और इस काम के बदले पुलिस मुझे जो प्रताड़ना देगी कि फिर ना मेरी गिनती जीवित लोगों में होगी और ना मरे हुए में। मां एक बार मुझे माफ कर दे मैं कोशिश करूंगा कि मुझसे यह गलती फिर ना हो।
   मैं तेरी कसम खाकर कहता हूं मैं मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मैं दोबारा ऐसा कुछ ना करूं।”

    वो लगातार रो रहा था। गिड़गिड़ा रहा था और उसके इस पागलपन को देखकर धीरे-धीरे मेरा गुस्सा बह गया। मैं खुद उसे पकड़ कर रोने लगी कि अब हम क्या करेंगे?  फिर धीरे से हम दोनों सम्भले।
   हमारे सामने एक बच्चे की लाश पड़ी थी और उस लाश को किसी भी तरीके से ठिकाने लगाना था।
   दिल तो मेरा कमजोर हो ही गया था लेकिन अब दिमाग को दुरुस्त कर काम पर लगाना था। मैंने तुरंत उसे उठाया और कहा कि सबसे पहले तो हमें इस लाश को यहां से कहीं दूर जाकर ठिकाने लगाना होगा वरना हम पुलिस के हत्थे चढ़ा सकते थे।
   कंकड़ भी मेरी बात सुन कर तैयार हो गया।
जगह का बहुत ही विरान सुनसान सी थी यहां तक कि म एक परिंदा भी पर नहीं मार रहा था । हमने तुरंत आसपास पड़े सूखे पत्तों और लकड़ियों को इकट्ठा किया और उस बच्चे की लाश को जला दिया। मैं कंकड़ को लेकर तुरंत घर वापस जाना चाहती थी। लेकिन उसने मुझे समझा-बुझाकर वहां से घर के लिए भेज दिया और कहा मैं कुछ देर में जब लाश पूरी तरह जल जाएगी तब वापस आऊंगा, जिससे कि कोई भी सबूत ना बचे।
     मैं वहां से निकल तो गई लेकिन मेरा मन कंकड़ पर अटका हुआ था। कुछ दूर आगे जाने पर मैं वापस मुड़कर आई और मैंने जो देखा ,मुझे समझ में आ गया कि यह लड़का इस जन्म तो नहीं सुधर सकता । वह बाकी बची अधजली लाश को नोच नोच कर खा रहा था। उसे इस तरह करते देखो मुझे वही उल्टी हो गई और मैं उसे वहीं छोड़ कर घर वापस आ गई।

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लेकिन अब मेरे दिमाग में यही अंतर्द्वंद चल रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए क्या मुझे पुलिस के पास जाकर सारी सच्चाई बता देनी चाहिए या अपने बेटे को और एक मौका देना चाहिए। सोचते सोचते समय बीतता गया और आखिर एक औरत के ऊपर एक मां की जीत हुई।
      
   रात बीत गई और तब वह घर वापस आया मैंने उसे बैठकर समझाना शुरु किया कि उसे अपनी आदत को छोड़ने के लिए कोशिश करनी पड़ेगी वरना एक दिन वह सलाखों के पीछे होगा।
   पता नहीं वह मुझसे सच बोल रहा था या झूठ लेकिन एक बार फिर वह अपने आंसू गिराने लगा। आखिरकार मैंने उससे कहा कि मैं इस सब में उसकी मदद कर सकती हूं लेकिन फिर उसे भी मेरा कहा मानना होगा।
   मैंने उससे कहा कि उसे सिर्फ महीने में एक लाश ही मिलेगी। मुझे लगा अगर मैं ये शर्त नही रखूंगी तो वो पापी जाने कितने लोगों को मार कर खा जाएगा।  अपने बेटे के मोह में मैं अंधी हो गयी थी।
   और उसने मेरा कहना मान लिया। लेकिन उसने भी अपनी एक शर्त रख दी। उसकी शर्त बहुत अजीब थी। उसके अनुसार उसने आज तक काफी तरफ का इंसानी मांस खाया था लेकिन छोटी बच्चियों के मांस उसे सबसे ज्यादा भाया था। और इसलिए उसने वही खाने की ज़िद पकड़ ली।
   और अब हामी भरने की पारी मेरी थी।

  लगभग पंद्रह बीस दिन बाद वो कहीं से एक बच्ची को पकड़ लाया।
   इस बंगले में साहब रोज़ नही आया करते थे। और  उसका काम इसी बंगले की साज संभाल करने का था। वह बच्चे को यही इस बंगले में ले आया। उसे पहले से मालूम नहीं था कि उसी शाम कामिनी मेम साहब भी बंगले में अपने किसी काम से आने वाली थी मैं उनके साथ ही थी।
   मैंने जैसे ही बच्ची को उसके  साथ देखा मुझे सारी बात समझ में आ गई ।मैंने कंकड़ को इशारा करके थोड़ा धैर्य रखने को कहा और कामिनी मेम् साहब को लेकर कमरे में ऊपर चली गई।
     कमीनी मेम साहब उस दिन कुछ ज्यादा ही परेशान थी। और इसका कारण थी उनकी पड़ोसन।
  उनकी पड़ोसन रमा जब भी उनसे मिलती हमेशा बच्चे को लेकर उनसे पूछताछ करने लगती थी। वह बिना कामिनी मैडम के पूछे भी हर बात पर उन्हें बच्चों के लिए सलाह दिया करती थी और यह सब सुन सुनकर कामिनी मैडम थकने लगी थी परेशान होने लगी थी।
      एक औरत को जितनी तकलीफ इस बात से नहीं होती कि उसके बाल बच्चे नहीं है उससे कहीं ज्यादा तकलीफ उसे समाज की नजरों में अपने लिए सम्मान ना देखकर होती है। क्योंकि समाज के ठेकेदारों को यही लगता है कि अगर इस औरत के बच्चे नहीं है तो इसमें किसी का दोष है और यह बांझ है।
    उस दिन उस औरत से बातचीत के बाद कामिनी मेम साहब भी बहुत दुखी मन से बंगले में आई थी। वह जब हद से ज्यादा दुखी होती थी तब सिर्फ लिखना ही उनके मन को भाता था।

   उन्होंने कंकड़ के साथ उस बच्चे को देखकर मुझसे सवाल किया तो मैं उन्हें अपने साथ ऊपर उन्हीं के कमरे में ले गई मैंने उनसे कहा कि मैं अकेले में उनसे कुछ बात करना चाहती हूं….. और फिर मैं उन्हें समझाने लगी….

” आप रमा की बात सुनकर अपने दिल को इतना दुखी मत किया कीजिए । कहीं ना कहीं उसका कहना भी सही है, कि आपके भी बच्चे तो होना ही चाहिए। आखिर आपके बुढ़ापे में आप का सहारा कौन बनेंगे? अगर आप नही सोचेंगी तो बच्चे के बारे में कौन सोचेगा?”

” मैं अकेली क्या कर सकती हूं। बिना उनकी मर्जी के कुछ होता है क्या यहां? “

“आप इतना कुछ सहती हैं । तो फिर अपने मन की बात उनसे पूरी करवाती क्यों नहीं?”

  अब तक चुपचाप सारी बात सुनती नंदिनी ने धीमे से एक सवाल का तीर छोड़ ही दिया….

” कामिनी ऐसा क्या सहती थी?”

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” क्या नहीं सहती थी! ऊपर के कमरे में देखा नहीं? उस अलमारी में जितनी चीज़ें  सजी है… तरह-तरह के बेल्ट रस्सियाँ, कोड़े .. वो सब ऋषिकेश रायसागर का सामान था। उसे कुछ अजीब से शौक थे।
    उसे सामने वाले को मारकर, उसे तड़पता देख कर सुकून मिलता था। कुछ अजीब सा सुकून… और उसी समय वह अपनी कहानियां लिखा करता था।
    अपनी पत्नी के साथ में यह सब कभी नहीं कर पाया लेकिन कामिनी  और उसकी पहली पत्नी के बीच कई लड़कियां उसका इस तरह से शिकार बनी थी।
  देखने सुनने में तो बहुत खूबसूरत था ही , कला पारखी भी था। लिखता इतना अच्छा था कि उसका पढ़ा पढ़ने के बाद लड़कियां वैसे ही उसकी दीवानी हो जाए। फिर बस अपने प्यार के जाल में फंसा कर वह लड़कियों को यहां ले आया करता था। साथ वाला दूसरा कमरा उन्हीं लड़कियों के लिए हुआ करता था। 2 से 4 महीने ही कोई लड़की उसका प्यार सह पाती थी। और इसके बाद उसे छोड़कर ऐसा भागती कि वापस मुड़ कर नही देखती।

” इन लड़कियों ने फिर कभी ऋषिकेश रायसागर की शिकायत क्यों नहीं की? “

” क्योंकि वो रुपए पैसों से उनका मुंह भर देता था। दूसरा उपाय यह आजकल के मोबाइल और वीडियो है। वह उनके ऐसे ऐसे वीडियो बना लिया करता था कि जिन्हें दुनिया को दिखा देने का डर दिखाकर वह उन लड़कियों से पहले तो मनमाने काम करवाता था। और जब वो छोड़ कर भागने के लिए गिड़गिड़ाती  तब इसी शर्त पर उन्हें रिहाई देता था कि वह लड़कियां जिंदगी में कभी अपना मुंह नहीं खोलेंगी।
    इसी कड़ी में कामिनी मेम साहब भी उसके शिकंजे में फंस गई। लेकिन उनमें कुछ बात तो थी कि वह उन का फायदा उठाकर उन्हें छोड़ नही सका। खैर अब शेर बूढ़ा भी हो चुका था इसलिए उसका तेज़ चुकने लगा था। ऐसे में कामिनी जैसी संगिनी मिलना बहुत बड़ी बात थी।
   कामिनी ने भी अपने लालच में उससे शादी तो कर ली लेकिन उसे भी धीरे-धीरे ऋषिकेश की बहुत सारी बातें अखरने लगी।
   घर पर बच्चे को लेकर ऋषिकेश की सोच कामिनी को कभी नहीं पसंद थी।
ऋषिकेश की मर्जी के मुताबिक ही रहा करती थी, ऋषिकेश जैसा कहता कैसे कपड़े पहनती वैसा ही खाना खाती बाल भी वैसे ही रखती।
    यहां तक कि अपनी कहानियों में दुख दर्द लिखते समय ऋषिकेश को कहानी में जान डालने के लिए वैसे ही रोते हुये किरदार को देखने की तमन्ना पूरी करने के लिए अपनी नंगी पीठ पर ऋषिकेश के कोड़े भी खाया करती और उसे सिसकता और बिलखता  हुआ देखकर ऋषिकेश पूरी उमंग से अपनी कहानियों को पूरा किया करता।
     इतने कठिन जीवन के साथ भी वो अपनी एकमात्र ईच्छा की उसकी अपनी संतान हो जाये पूरा नही कर पा रही थी।
मैंने उसकी इसी कमी को ढाल बनाकर उसका फायदा उठाना शुरू कर दिया…

” अगर आपके भी बच्चे हो जाएंगे तो कम से कम इस बंगले और साहब की बाकी की वसीयत में आपकी तरफ से भी कोई दावेदार तो होगा। वरना तो उनके वह दोनों लड़के सब कुछ समेट कर ले जाएंगे और जिस दिन साहब नहीं रहेंगे आपको दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देंगे।
      आपको कुछ भी करके अपने बच्चे के बारे में सोचना ही चाहिए।”

“, मैं आपको कैसे समझाऊं जमना ताई सिर्फ  सोचने से बच्चे पैदा  होते तो अब तक मेरे पास मेरी एक फौज इकट्ठी हो चुकी होती, लेकिन बस सोचने से ही सब कुछ नहीं होता।”

” होता है मैम साहब। अगर आप प्रयास करेंगे तो आपके सोचने बस से ही सब कुछ हो जाएगा। आप एक बार सोच कर देखिए, अगर आप तैयार हैं तो मैं आपकी मदद करने को तैयार हूँ।”

” कैसी मदद?? क्या करोगी आप जमुना ताई?”

” मेरी मां तंत्र मंत्र विद्या जानती थी और उन्होंने काफी कुछ मुझे भी सिखाया है …इस सब के बारे में ज्यादा कुछ तो नहीं बता सकती लेकिन यह बता सकती हूं कि यह विद्या आज भी फल देती है। जिस तरह आप बाजार जाती हैं तो कोई भी सामान खरीदने के लिए आपको पैसे देने पड़ते हैं। बस वैसा ही कुछ इस विद्या में भी है तंत्र मंत्र में बलि देनी होती है। अगर आप छोटे बच्चों की बलि देंगे तो इस साधना से प्रसन्न होकर शैतान का देवता आपकी इच्छा पूरी करेगा और वह भी बदले में आपको संतान देगा?”

कामिनी मेम साहब पढ़ी लिखी समझदार औरत थी लेकिन मानसिक रूप से इतनी परेशान थी कि उन्हें मेरी बातें सच लगने लगी

” क्या सच में ऐसा हो सकता है?”,

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” 9 महीने लगातार 9 बच्चों की बलि दी जाएगी और उसके बाद दसवें महीने आप के गर्भ में वह सारे बच्चियां एक साथ एक बालक का रूप लेकर जन्म लेंगी। आप सोच लीजिए आप ऐसा करना चाहती हैं कि नहीं? क्योंकि यह प्रक्रिया पूरी तरह से आप के विश्वास पर निर्भर करती है। हर अमावस्या को हम एक बली देंगे और उस बली का एक हिस्सा आपके गर्भ में समा जाएगा । धीरे-धीरे 9 महीने पूरे होने के बाद 10 महीने में आपको खुद खुशखबरी मिल जाएगी। बोलिये क्या आप तैयार हैं? “

” क्या बच्चों की बलि देने से बच्चे मिलते हैं यह बात सच है?”

“बिल्कुल! मानो तो हर बात सच वरना झूठ के फसाने बहुत लंबे हैं।

” तो क्या तुम्हारा शैतान का देवता जो भी चीज लेता है उसके बदले में वही चीज देता है। “

” हां मेम साहब।”

” तो मतलब अगर मुझे साहित्यकार बनना है तो क्या मुझे किसी साहित्यकार की बलि देनी होगी?”

” मैं समझी नही मेम साहब आप क्या कहना चाहती हैं?”

” अगर मुझे कोई बेस्टसेलर किताब लिखनी है तो क्या बेस्टसेलर लिखने वाले किसी लेखक की बलि देनी होगी…?

क्रमशः

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aparna….

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Manjeet Kaur
Manjeet Kaur
2 years ago

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