The Bestseller -31

“किस्सागोई”
मुस्कुराते हुए सुहास ने कॉफी का कप अपने होठों से लगा लिया। उसने सामने देखा , सामने खड़ा पियून भी सुहास को देख कर मुस्कुरा रहा था ।
लेकिन यह वह पियोन नहीं था जो हफ्ते भर से सुहास को उसकी पसंदीदा डार्क सिंगल फिल्टर कॉफी पिला रहा था….
द एंड …
कामिनी !!
कहानी खत्म कर कामिनी ने किताब को बंद कर दिया और सामने सुन रहे पाठकों की प्रतिक्रिया को देखने के लिए उन पर नजरें गड़ा दी।
फ्लोरेंस में दोपहर 3 बजे से शुरू हुआ कामिनी की किताब का एक्सक्लुसिव लांच सफल हो चुका था। उस किताब का अंतिम तेरहवाँ भाग प्रकाशित हो चुका था और इस भाग का बुक लॉन्च अपने शबाब पर था ।
कामिनी के चाहने वालों की भीड़ उस भवन में खचाखच भरी थी। सब अपनी पसंदीदा लेखिका के मुंह से कहानी का अंतिम हिस्सा सुनना चाहते थे। और बस इसीलिए सोंथालिया के बार-बार कहने पर कामिनी ने कहानी का वह आखरी हिस्सा जिसमें डॉक्टर खुद सर्जिकल नाइफ से अपना गला काट कर खुद को ही अपने किए की सजा दे देता है, से पढ़ना शुरू किया और कहानी को अंतिम रूप देते हुए सुहास की मुस्कान पर कहानी को समाप्त कर दिया।
” अगर आप लोगों के मन में किसी भी तरह का कोई सवाल हो तो आप अपनी फेवरेट राइटर साहिबा से पूछ सकते हैं। “
सोंथालिया की खुशी उसके हर ओर छोर से बह रही थी। वह खुशी से इतना उत्तेजित था, कि कामिनी की कहानी को समाप्त करते ही उसी ने सबसे पहले खड़े होकर जोर-जोर से तालियां बजानी शुरू की थी। कहानी के इस भाग की सफलता के लिए वह सौ प्रतिशत आश्वस्त था, और इसीलिए उसने आगे बढ़कर पाठकों से अपने मन की शंकाओं को सवालों में ढालने की गुजारिश कर दी
” मैडम मेरा एक सवाल है, आपकी हर कहानी के नायक का नाम सुहास ही क्यों होता है?”
कामिनी इस सवाल पर मुस्कुरा उठी..
” लेखक भी बहुत सी किस्मों के होते हैं… कुछ लेखक मेरी तरह सनकी होते हैं, जो अपने किरदारों को सच मानकर अपनी जिंदगी का हिस्सा मानने लगते हैं ।
बहुत बार हम अपनी जिंदगी के अहम हिस्सों को किस्सा बना देते हैं तो कई बार अपने किस्सों को ही ज़िन्दगी का हिस्सा बना देते हैं।”
तभी एक और पाठक खड़ा हो गया…
” मैडम आपने अभी अभी अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी झेली है,उसके बाद इस कहानी को पूरा करना आपके लिए कितना मुश्किल था।?”
” जी ऋषिकेश जी को खोना अपनी ज़िंदगी को खो देने जैसा ही था। अगर मेरी ये कहानी न होती तो शायद मैं भी जिंदा नही होती। अगर मैं आज आप सबके सामने खड़ी हूँ तो इसके पीछे ये कहानी ही है। इसे लिखना मेरे लिए अपने दुख से लड़ने का एक बहाना था।”
“आप बहुत खूबसूरत लिखती हैं। हम सभी आपके फैन हैं। क्या कोई ऐसा लेखक है जिसकी आप फैन हों।”
“हाँ !! मैं मेरे ससुर स्वर्गीय श्री राजऋषि रायसागर जी की बहुत बड़ी फैन थी। हालांकि वो ज्यादातर सामाजिक कहानियां लिखा करते थे, दुख दर्द आंसूओं में भीगी उनकी कहानियां बेस्टसेलर रहीं हैं। मुझे उनकी कहानियां तो कम पसन्द थी पर उनके कहानियों को गढ़ने का तरीका बेहद पसंद था। उनके लिए किसी भी कहानी को लिखना एक महा अनुष्ठान सा होता था। वो अपनी कहानियों से ऐसे जुड़ जाते थे जैसे ये कहानियां नही हकीकत हो ……
… बाकी आज कल के लेखकों में मैं किसी को इस लायक नही समझती की उन्हें पढ़ कर देखूं, या आप कह सकते हैं कि मेरे पास इतना वक्त ही नही होता कि किसी और को पढूं। “
“कुछ लोग आप पर घमंडी और बदतमीज लेखिका होने का भी इल्जाम लगाते हैं? इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?” ये किसी पत्रकार ने सवाल उछाल दिया।
” ये ज़रा व्यक्तिगत सवाल हो गया फिर भी मैं जवाब दूँगी। मेरे पास घमंड करने लायक कई चीजें है इसलिए उन पर मुझे घमंड है… जैसे मुझे पढ़ने वाले आप जैसे ढेर सारे पाठक!!अब क्या इन पर मुझे घमंड नही करना चाहिये? बाकी रही बदतमीजी वाली बात तो क्या अभी आपके सवाल पर मैंने आपको चांटा मारा? नही ना,मैंने तो चुपचाप जवाब दिया है आपके बेहूदा सवाल का फिर बदतमीज कौन हुआ?”
कामिनी के इस जवाब पर वहाँ बैठे उसके प्रशंसको ने तालियों की बौछार कर दी।
इस भीड़भाड़ में सबसे पीछे शेखऱ भी बैठा था। उसने नंदिनी से भी साथ चलने कहा था लेकिन वो काम का बहाना बना कर घर पर ही रहने की बात बोल कर शेखऱ को टाल गयी थी।
****
वो सुबह सुबह ही “बर्न्स” की तरफ निकल चुकी थी।
वो उस आलीशान भवन से कुछ पहले की गली में थी कि सामने सड़क पर जाती एक औरत से उसकी गाड़ी की हल्की सी टक्कर हो गयी।
साधारण से कपड़ो में दिखने वाली वो औरत गाड़ी से टकरा कर वहीं गिर पड़ी… अपने खयालों में खोई नंदिनी ने जैसे ही उसे गिरते देखा वो तुरंत गाड़ी रोक बाहर निकल आयी..
” माफ कीजियेगा मैं किसी धुन में चली जा रही थी, अरे आपको तो चोट लग गयी है। चलिए आपको अस्पताल पहुंचा दूँ।”
नंदिनी ने दुपट्टे से अपना चेहरा लपेट रखा था, इसलिए उसका चेहरा साफ साफ नजर नही आ रहा था।
” नही इतनी चोट नहीं है, कि हमें अस्पताल जाना पड़े। पर आपको देख कर चलाना चाहिए ना हमारे पैर में मोच आ गया है। अब हम अपने काम पर कैसे जाएंगे? हमारी आज की रोजी मारी गई ना।”
” अरे नही , अस्पताल जाने की तो आपको जरूरत है ही। और आपकी रोजी भी मैं दे दूंगी, चिंता मत कीजिए। आइए गाड़ी में बैठे, पास ही में अस्पताल है मैं आपको छोड़ देती हूं।”
वह औरत घूर कर नंदिनी को देखने लगी, कि आखिर नंदिनी उसे अस्पताल ले जाने के पीछे क्यों पड़ी है? और उसने कंधे उचका कर बस हाथ आगे बढ़ा दिया।
नंदिनी ने तुरंत अपना पर्स खोलकर उसमें से सौ-सौ के दो नोट निकाले और उस औरत को दिखाएं उस औरत ने उन नोटों को देखकर हल्का सा मुंह बना लिया, नंदिनी ने तीन और नोट निकाले और कुल पांच सौ रुपये उसने उस औरत के हाथ में रख दिए।
दो सौ की रोजी के बदले पाँच सौ का मिलना घाटे का सौदा नहीं था बावजूद उस औरत ने अपने चेहरे पर वही तीखे भाव रखें और अपने काम पर जाने के लिए आगे बढ़ने लगी कि नंदिनी ने आगे आकर उसे रोक लिया….
” अब जब तुम्हें आज की रोजी मिल ही गई है, तो काम पर क्यों जा रही हो? घर चली जाओ बच्चों को घुमाओ, फिराओ , दोपहर के बाद आ जाना काम पर। काम कौन सा भागा जा रहा है तुम्हारा?”
उस औरत को भी नंदिनी की बातें सही लगी और वह वापस अपने घर की तरफ मुड़ गई।
उसके वापस मुड़ते ही नंदिनी ने राहत की सांस ली और कार में जा बैठी। कार को थोड़ा आगे ले जाकर एक गली के मोड़ पर उसने एक किनारे खड़ी कर दी। गाड़ी को लॉक कर उसने चाबी अपने कुर्ते की जेब में डाली और अपने दुपट्टे से चेहरे को ठीक से ढक कर उस गली में आगे बढ़ गई।
बर्न्स के मेन गेट को हल्का सा खोलकर वह अंदर बगीचे में दाखिल हो गई… उसे इस तरह घुसते देखा गार्ड जोर से चिल्ला कर उसके पास पहुंच गया…
” ए लड़की कहां घुसी चली जा रही है?”
” साहब कोई काम हो तो दिलवा दो? “
बर्न्स में घुसने के पहले नंदिनी ने अपने कपड़ों पर और चेहरे पर हल्की सी मिट्टी लगा ली थी…
” नहीं नहीं यहां कामवाली की जरूरत नहीं है। जाओ यहां से फुट लो।”
गार्ड अभी नंदिनी को झिड़क रहा था कि अंदर से उस घर का केयर टेकर चला आया…
एक लंबा चौड़ा बाउंसर की तरह दिखता वो आदमी ठीक उसके सामने आकर खड़ा हो गया। एक पल को उसे देख नंदिनी भी घबरा गई।
” सुबह सुबह क्या हल्ला मचा रखा है यहाँ?”
“साहब ये लड़की अंदर घुसती चली आ रही है, कहती है काम दे दो।”
केयर टेकर ने नंदिनी को देखा। चेहरा ढका होने की वजह से सिर्फ उसके गोरे से माथे पर उलझी सी लटें और चमकती आंखें ही नज़र आ रही थी। एक नज़र उसे देखने के बाद उसने नंदिनी से सवाल किया..
“क्या क्या काम कर लेती हो? “
“सब काम कर लेंगे हुजूर! झाड़ू पोंछा साफ सफाई। बगीचा साफ करना भी कर लेते हैं।”
“ठीक है! आज वैसे भी बसंती नही आई है, तो आज उसकी जगह पर काम कर लो। अगर काम ठीक रहा तो कल से तुम्हें भी नौकरी मिल जाएगी। डेढ़ सौ रुपया रोज़ का मिलेगा , और काम सब करना रहेगा। बंगले की अंदर से साफ सफाई के साथ ही बगीचे की देखभाल, ऊपर छत और सीढ़ियों की धुलाई वगैरह सब काम। समझ गयीं?”
नंदिनी ने हाँ में सिर हिलाया और अंदर की तरफ बढ़ने लगी कि उस आदमी के पुकारने पर एक दूसरी औरत नंदिनी के पास चली आयी…
ये वही औरत थी जो एक दिन पहले अपने बड़बोलेपन में नंदिनी को रायसागर परिवार के किसी श्राप के बारे में बोलते बोलते रुक गयी थी। और वो औरत जिसे अभी कुछ देर पहले ही नंदिनी ठोंक कर आईं थी ने ही कल इस औरत को बोलने से रोक दिया था।
“ए सावन इसको भी काम सीखा दे , नई लड़कीं आयीं है ।”
सावन नंदिनी को साथ लेकर आगे बढ़ गयी…
“आज महल की अंदर से भी सफाई करनी है। कल पूजा पाठ हुआ था ना।”
नंदिनी यही तो चाहती थी। वो सावन के पीछे अपनी गर्दन हिलाती चल पड़ी।
अंदर उस बड़े से हॉल में वही दोनों थीं।
“यहां और कौन कौन रहता है?”
“कोई हमेशा यहाँ नही रहता है। ज्यादातर साहब के कार्यक्रम यहाँ हुआ करते थे, और बहुत बार वो लिखने भी यहाँ आते थे।”
“मेमसाहब भी आती थीं क्या?”
“कौन सी वाली बड़ी या…?
“कामिनी!! कामिनी मेमसाहब?”
“हैं तुम्हें नाम कैसे पता? हमने तो बताया नही!”
“अरे बताया तो, अभी अभी तो कहा बड़ी मेमसाहब या कामिनी मेमसाहब!”
“अच्छा! ऐसा बोला क्या? हाँ कामिनी मेमसाहब तो आतीं हैं। सबसे ज्यादा वहीँ आती थीं। हम तो यहाँ तक सुने हैं कि वो साहब के पीछे पड़ी थीं कि ये बंगला उनके नाम कर दें।”
“अच्छा !! फिर ?”
“फिर क्या ? साहब भी गोल मोल घुमा रहे थे। पर हमने सुना है कामिनी मेम साहब को ये बंगला बहुत पसंद है। वो तो अक्सर रात में रुका भी करती थीं यहाँ। साहब से बोल देती थी कि कहानी लिखना है और यही रुक जाती थीं।”
“उन्हें अकेले इतने बड़े घर में डर नही लगता था?”
“काहे डर लगेगा? अपने साथ जीती जागती चुड़ैल को साथ लिए घूमती जो हैं।”
“मतलब हम समझे नही?”
नंदिनी उस सावन की घटा से बातें निकलवाने में लगी थी।
“मतलब वही जमना ताई! वो किसी डायन चुड़ैल से कम है क्या? जाने क्या क्या पूजा पाठ किया करती है वो। और एक उसका ये बेटा ….!”
“जमना ताई का बेटा भी है? कौन है वो?”
“वही जो अभी बाहर मिला रहा। यहाँ का सुपरभाइज़र ( सुपरवाइजर)”
“वो लंबा चौड़ा सा मुस्टंडा , वो जमना ताई का बेटा हैं?”
“हाँ तो और क्या? और तुझे मालूम है ये बचपन में सिधार घर भेजा जा चुका है? “
“सिधार घर वो क्या होता है? “
“अरे जहाँ बच्चों को भेजा जाता है ना सुधारने के लिए…?”
“बाल सुधार गृह ? “
“हाँ हॉं वही जगह । वहीं भेजा गया था उसे।”
“अच्छा !!! लेकिन क्यों ? “
“अरे वो क्या तो कहते हैं ना अंग्रेजी में कानीबाली … या ऐसा ही कुछ… जो इंसानी मांस को खा जाता है।”
नंदिनी की आंखें चौड़ी हो गयी…
“ओह्ह माय गॉड !! कैनिबल ?? क्या वो आदमी कैनिबल है ?
नंदिनी अपने आश्चर्य में मरी जा रही थी और सावन की अलग ही फुहारें बरस रहीं थीं।
“तुझे इत्ती अंग्रेज़ी कहाँ से आती है।”
“यहाँ से पहले एक अंग्रेज के यहाँ काम करती थी। पर ये बता की क्या सच में वो बाहर खड़ा आदमी कैनिबल मेरा मतलब लाश खाने वाला इंसान है?”
“हाँ ये सत्रह साल की उम्र में इसी इल्जाम में गिरफ्तार हुए था, पर इसके खिलाफ कोई ज्यादा और पक्के सबूत नही थे इसलिए इसे बाल सुधार गृह भेज कर बाद में छोड़ दिया गया। “
“फिर इसे यहाँ नौकरी में क्यों रखा है?”
“इसके बारे में साहब लोग जानते ही नही ना। बस बड़े साहब के पिता जी जानते थे, उन्होंने ही जमना की मदद कर इसे छुड़वाया था। और फिर इस बंगले में काम पर रखने के लिए जमना ने ही बड़े साहब को मना लिया था। तबसे ये अकडू यहीं काम करता है। खैर हम लोगों को ये कुछ नही कहता। और अब शायद अपनी आदत भी छोड़ चुका है। हमने तो सुना था कि ये किसी बच्चे को…
” क्या बातों में लगी हो तुम दोनों। जाओ उधर फटाफट हाथ चलाओ।”
उसी खूसठ की आवाज़ सुन नंदिनी फटाफट हाथ चलाने लगी।
काम करते हुए वो धीमे से सीढ़ियों तक पहुंच गई, और एक एक कदम बढ़ाती सीढ़ियों को पोंछती आगे बढ़ने लगी।
सावन ने उसे बताया ही था कि आज यहाँ इस घर में उन दोनों के अलावा सिर्फ वहीं जमना ताई का लड़का बस है।
वो भी उन लोगों को डपट कर बंगले से बाहर निकल गया था।
सावन नीचे की सफाई में लगी थी…. इसलिए दबे पांव नंदिनी ऊपर बने कमरों की तरफ बढ़ गयी।
ऊपर दो बड़े शयनकक्ष बने थे। जिनके दरवाज़े बंद थे। उसने खोलने की कोशिश की लेकिन दरवाज़े लॉक्ड थे।
वो बाहर से झाड़न मारती बालकनी की तरफ निकल गयी। असल में वो चारों तरफ से घूम घूम कर देखना चाहती थी कि कहीं से तो उसे अंदर ताकाझांकी का मौका मिल जाये।
और आखिर उसे बाहर की तरफ खुलती एक खिड़की नज़र आ ही गयी।
उसने बड़ी मुश्किल से उस खिड़की में अंदर झांकने लायक दरार बना ही ली और अंदर देखने की कोशिश करने लगी।
अंदर जो नज़ारा नज़र आया उसे देख उसकी आंखें फटी रह गईं…..
क्रमशः
aparna..
