The Bestseller -29

“इकरारनामा“
” फिर क्या हुआ? मेरा मतलब नयन का क्या हुआ?”
नंदिनी से रहा नहीं गया और उसने कामिनी से यह सवाल पूछ लिया और कामिनी नंदिनी को देख कर मुस्कुरा उठी….
” यह कहानियां ऐसी ही होती है इन्हें ओपन एंड लिखा जाता है। यानी पढ़ने वाले पाठक की इमैजिनेशन के ऊपर अंत टिका होता है। कोई सकारात्मक सोच का पाठक अंत यह सोचेगा कि नयन भी सुनयना के साथ उस पानी में डूब गया और कालचक्र ने उन दोनों के जिंदगी भर के साथ को पूरा कर दिया| लेकिन कुछ पाठक इस कहानी का एक नकारात्मक अंत भी सोच सकते हैं….कि किसी तरीके से नयन ने सुनयना से मुक्ति पा ली और आखिर कालचक्र को हराकर वो सनकी लेखक अपने किरदारों की दुनिया में गुम हो गया। “
” मुझे ऐसी कहानियां पसंद नहीं जिनके अंत समझ में नहीं आते। “
नंदिनी की इस बात पर कामिनी ज़मीन पर कहीं कुछ देखती हुई खो सी गयी…
” सिर्फ एक आपके हिसाब से कहानी नहीं गढ़ी जा सकती। कहानी गढ़ने के लिए एक लेखक को अपने अंदर एक किला बनाना पड़ता है, उस किले में अंदर घुसने के बाद वह उसके दरवाजे पर एक मोटा सा ताला डाल देता है। जिससे कि बाहरी दुनिया के साथ उसका कोई संपर्क ना रह जाए । फिर अपने बनाए उस किले के अंदर अपने किरदारों के साथ वह एक नई दुनिया बसाता है। उसकी कहानी की दुनिया… उसकी कल्पनाओं की दुनिया… उसके किरदारों की दुनिया…
पाठकों को पढ़ते समय जरूर यह लगता है, कि लेखक किरदार और कहानियां रच रहा है.. जबकि असलियत तो बहुत अलग होती है।
सच्चाई तो यह है कि किरदार खुद एक लेखक को चुनते हैं , उसके पास पहुंचते हैं अपने किस्से उससे बताते हैं। और उस से गुजारिश करते हैं, कि वह उनके बताए किस्सों को कलमबद्ध कर सके।
लेखक खुद थोड़े ही ना कुछ करता है , यह तो सब उसके किरदार उससे करवाते हैं। असल में तो लेखक पाप पुण्य की सोच से बहुत परे होते हैं बहुत दूर।”
कामिनी की यह फिलॉसफी वाली बातें नंदिनी के पल्ले नहीं पड़ रही थी। अभी फिलहाल उसके दिमाग में वह छोटी बच्ची और रायसागर परिवार को लगा श्राप ही घूम रहा था। इस सब के बीच इतनी मुर्दनी भरी कहानी कामिनी ने क्यों सुनाई? उसे बिल्कुल समझ नहीं आया। उसने शेखर की तरफ देखा शेखर पूरी तरह से कामिनी की कहानी में डूबा बैठा था । उसे देखकर साफ पता चल रहा था कि उसे कामिनी की कहानी ने हद प्रभावित किया था।
वह तीनों वहीं बैठे थे की कामिनी को बुलाने के लिए भीतर से कोई नौकर भागता हुआ चला आया।
“पाठ शुरू होने जा रहा है मेम साहब। आप चलिए अंदर। “
कामिनी ने उसे देख कर हाँ में गर्दन हिलाई और अंदर जाने लगी।
” यहाँ के नौकर आपको बहुत मानते हैं, लगता है?”
“कैसे नही मानेंगे? मैं ही तो यहाँ अक्सर आया करती हूं। “
कामिनी मुस्कुरा कर अंदर चली गयी… शेखऱ भी उसके पीछे अंदर चला गया…
नंदिनी वहीं खड़ी कुछ सोच रही थी कि उसकी नज़र ऊपर पहले माले की ओर उठ गई। पहली मंजिल के कमरे की खिड़की के कांच के परे उसे वापस कोई नज़र आया। वो ध्यान से उस तरफ देखने लगी , उसे लगा शायद वही बच्ची वहाँ मौजूद है।
नंदिनी भी हॉल के अंदर चली गयी। हॉल के मुख्य दरवाज़े के दोनो तरफ से चौड़ी चौड़ी सीढियां ऊपर की ओर जाती थीं। नंदिनी का मन तो था कि वो ऊपर चली जाए… लेकिन क्या इतने लोगों के सामने से उसका यूँ ऊपर चले जाना सही होगा। हालांकि लोगों की पीठ उसकी तरफ थी,पर कुछ लोग अब भी मुख्य दरवाजे से भीतर आ रहे थे।
नंदिनी धीमे से ऊपर की ओर बढ़ गयी। बार बार नीचे देखती वो ऊपर चढ़ रही थी कि सामने अचानक किसी के आ जाने से वो चौन्क कर रुक गयी…..
…..
” आप ऊपर कहाँ जा रही हैं। शांति सभा नीचे ही है। ऊपर का हिस्सा सिर्फ घर के सदस्यों के प्रयोग के लिए ही है। “
नंदिनी ने जल्दी जल्दी पलकें झपकी और थूक निगल कर धीमे से खुद को संभाल कर कहने लगी..
” जी मुझे प्यास लग रही थी। इसलिए मैं पानी की तलाश में ऊपर जा रही थी। मुझे लगा जैसे ऊपर कोई बच्ची है। “
सामने खड़ी उस औरत ने सीढ़ियों पर से झांक कर नीचे हॉल में देखा। उसकी निगाहों का पीछा करते हुए नंदिनी ने भी नीचे झांक लगा दी नीचे वेटर वहां बैठे लोगों को पानी सर्व कर रहे थे। नंदिनी का झूठ पकड़ा गया था और वह धीमे से सर झुका कर नीचे उतरने लगी। उसे जाने क्यों इस खडूस सी औरत का चेहरा बहुत जाना पहचाना लग रहा था। लेकिन वह याद नहीं कर पा रही थी, कि यह कौन है? इसका बात करने का लहजा इसकी साड़ी पहनने का ढंग, बालों को पीछे की तरफ बांधकर जुड़ा करने का तरीका, सब कुछ बहुत जाना पहचाना सा था.. लेकिन यह थी कौन…..
…… याद आ गया इसे नंदिनी ने कामिनी के घर पर देखा था यही उन सब के लिए कॉफी लेकर आई थी।
नंदिनी वापस पीछे मुड़कर अपने पीछे आती उस औरत को देखने लगी….
” क्या मैं आपसे पहले कभी मिली हूं?”
” मुझे क्या पता?”,
उस औरत का इतना ठंडा और पथरीला जवाब सुनकर नंदिनी को आग लग गई। लेकिन उसके अंदर का जुझारू पत्रकार चुपचाप बैठने वालों में से नहीं था…
” हां याद आया!! मैंने आपको कामिनी जी के घर पर देखा था। जब मैं और इंस्पेक्टर शेखर उनसे मिलने आए थे, तब आप ही हम लोगों के लिए कॉफी लेकर आई थी। “
धीरे से हां में सर हिला कर वह औरत तेज कदमों से सीढ़ियां उतर कर नीचे हॉल में चली गई… नंदिनी का तो जी किया कि पीछे से उसे सीढ़ियों पर से धक्का दे दे.| लेकिन अपने अंदर छिपे बैठे गब्बर को उसने प्यार से समझा बुझा कर मना लिया और जाकर चुपचाप शेखऱ की बगल वाली कुर्सी में बैठ गयी।
शांति सभा में बहुत से लोग आए थे लेकिन सभी को सामने आकर ऋषिकेश रायसागर के बारे में बोलने का मौका नहीं मिला। यह मौका उनके बेटों ने सिर्फ उनके कुछ खास पसंदीदा लोगों को ही दिया था और जाहिर था इनमें कामिनी शामिल नहीं थी।
सब कुछ निपटने के बाद कामिनी बिना किसी के बुलाए ही सामने रखी ऋषिकेश की तस्वीर तक गई और कुछ पुष्प उन्हें समर्पित करने के बाद नाक पर रूमाल रखें एक तरफ से होते हुए बाहर चली गई। शेखर और नंदिनी दूर खड़े यह सब देख रहे थे, वह वापस आकर अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ने लगे… कि शेखर फिर उसके पीछे हो लिया।
नंदिनी भी भागती दौड़ती कामिनी तक पहुंच गई।
” आपने नाक पर रुमाल क्यों रख लिया कामिनी जी? फूलों से एलर्जी है क्या?”
नंदिनी के सवाल पर कामिनी तो तटस्थ बनी रही लेकिन शेखर ने एक बार घूर कर नंदिनी को देखा और वापस सहानुभूति वाली नजरों से कामिनी की तरफ देखने लगा।
” जी हां मुझे इवनिंग प्रिमरोज से एलर्जी है। और यही फूल ऋषिकेश की जान हुआ करते थे। इसीलिए आज अंदर सारी साज सजावट इवनिंग प्रिमरोज से ही की गई है। “
” ओह्ह !!! अच्छा इसीलिए बाहर गार्डन में भी एक तरफ तो इवनिंग प्रिमरोज है , लेकिन दूसरी तरफ जिधर हम बैठे थे वहां एक भी फूल इवनिंग प्रिमरोज का नहीं था!”
” जी हां!! आपने सही पहचाना। पहले पूरे बगीचे में लगे हुए थे , लेकिन इसके कारण मुझे बाहर बैठने में दिक्कत होती थी। एक्चुअली मुझे अस्थमा की प्रॉब्लम है, तो इस खुशबू से मेरा अस्थमा ट्रिगर हो जाता है। और मुझे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है । इसलिए मैंने गार्डन के इस हिस्से के वह फूल हटवा दिए थे।”
कामिनी गाड़ी में बैठते बैठते एक पल को रुकी और शेखर की तरफ घूम गई…
” कल मेरी किताब का तेरवा भाग लॉन्च हो रहा है…. आप दोनों चाहे तो उस पार्टी में मुझे ज्वाइन कर सकते हैं।”
” श्योर!! हमें कहां आना होगा?”
” अगर सर जिंदा होते तो शायद यही बर्न्स में ही मेरी लॉन्च पार्टी होती। लेकिन फिलहाल पार्टी फ्लोरेंस में होने वाली है। कल दोपहर 3 बजे आप दोनों आइएगा। पार्टी से आधे घंटे पहले, मैं आपको एक कोड नंबर भेज दूंगी। उस कोड को मेन गेट पर खड़े गार्ड स्कैन करेंगे और उसके बाद ही आपको अंदर आने की अनुमति मिलेगी।
शेखर मुस्कुराकर हाथ बंधे खड़ा रहा, और कामिनी गाड़ी में बैठकर निकल गई।
” बस-बस होश में आ जाइए इंस्पेक्टर साहब!!! आपकी राइटर साहिबा चली गई है। और खुश तो बहुत होंगे आप!!! कल फिर आपको अपनी राइटर के साथ समय गुजारने का मौका मिल रहा है।”
” खुशी की तो बात ही है… इतनी इंटेलिजेंट लेडी के साथ वक्त बिताना किसे पसंद नहीं होगा?”
नंदिनी ने घूर कर शेखर को देखा और पैर पटकती हुई बाहर जीप की तरफ निकल गई। शेखर ने मुस्कुराते हुए अपने बालों में हाथ फिराया और उसके पीछे पीछे चल पड़ा…
” अरे नंदू माफ कर दो यार तुम उससे कहीं ज्यादा इंटेलिजेंट हो….
नंदिनी ने मुस्कुराकर शेखर की तरफ देखा ही था की शेखर ने अगला दांव फेंक दिया।
” हां खूबसूरती में थोड़ा 18-19 हो लेकिन मैं मैनेज कर लूंगा!”
नकली गुस्से से उसे घूरती नंदिनी उसकी बाजू की सीट में जाकर बैठ गई और दोनों नंदिनी के फ्लैट की तरफ निकल गए।
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उन ढेर सारी आत्माओं से घिरे डॉ सुधाकर बिंदल ने वहां रखी सर्जिकल नाइफ उठाई और अपने गले पर चला ली।कैरोटीड वेन कटने से बलबला कर खून बहने लगा और सुधाकर बिंदल वही उस बेड पर गिर पड़ा। कुछ देर तक सांसो के लिए तड़पने के बाद सुधाकर बिंदल की आत्मा ने उसका शरीर छोड़ दिया।
उसके मरते ही वहीं पर रखे प्रिंटर से उसका अब तक किया इकरार नामा प्रिंट होकर बाहर गिर पड़ा उस अस्पताल की ओटी में अब बीचो-बीच पड़े उस पलंग पर डॉ सुधाकर बिंदल का मृत शरीर पड़ा हुआ था उसका एक हाथ पलंग से नीचे झूल रहा था ।और उसके हाथ के ठीक नीचे वह पेपर पड़ा हुआ था। जिस पर वह सब कुछ लिखा हुआ था जो सुधाकर बिंदल ने अपने अब तक के जीवन में किया था। शुरुआत से लेकर अब तक का वह सब कुछ जिसमें उसने गरीब मरीजों की अनजाने में ही किडनी निकाल कर बेच दी। इसके अलावा उसने गलत ऑपरेशन से जो गलतियां की थी वह भी सारा सबकुछ उस पेपर में कलमबद्ध हो चुका था।
ओ टी का दरवाजा बंद था और उस दरवाजे के ऊपर जलने वाली लाल बत्ती अब अचानक से बुझ चुकी थी और उसके ऊपर हरी बत्ती जलती हुई नजर आने लगी थी।
वही बाहर बैठे सुहास को भनक तक नहीं लग पा रही थी कि अंदर क्या चल रहा है लेकिन उसे इतना तो समझ में आ चुका था कि रघु और उसके जैसी बाकी आत्माएं सुधाकर बिंदल से अपनी जिंदगी का और अपनी मौत का बदला लेकर रहेंगी।
सुहास कुछ देर तक इधर-उधर टहलता रहा फिर एक कुर्सी में टिक कर बैठ गया। उसकी खुद भी अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। इसलिए वह बाहर ही बैठा इंतजार कर रहा था , कि कब वह दरवाजा अपने आप खुल जाए।
उसी इंतजार में उसे मालूम भी नहीं चला कि कब उसकी आंखें लग गई और वह गहरी नींद में डूब गया।
क्रमशः
aparna….
