The bestseller -26

“द बर्न्स”
कामिनी मुहँ हाथ धोकर नीचे चली आयी…. नीचे उसका प्रकाशक बैठा उसी का इंतज़ार कर रहा था। कामिनी को आते देख खड़ा हो गया…
“अब कैसी हैं आप कामिनी जी?”
गर्दन आजू बाजू हिला कर उसने “मैं ठीक हूँ ” वाले भाव व्यक्त किये और उसके सामने जाकर बैठ गयी।
” आपने कुछ लिया … चाय या कॉफी?”
” हाँ हॉं डन… आपकी मेड अभी अभी कॉफी देकर ही गयीं । तो अपने अपने नॉवेल का आखिरी भाग लिख लिया है ? है ना,?
सशंकित नज़रों से वो उसे घूरने लगा। उसे यूँ खुद को घूरते देख कामिनी को हंसी आ गयी, पर उसने खुद को संभाल लिया…
” जी आप चिंता न करें । मैंने वो पार्ट लिख लिया है। और अब मेरी कहानी पूरी हो चुकी है।”
” वैसे तो आप इतना कंप्लीट लिखतीं हैं कि उसमें किसी तरह की एडिटिंग या करेक्शन की ज़रूरत नही होती, लेकिन फिर भी मुझे एक बार प्रूफ रीडिंग के लिए भेजना तो पड़ेगा। तो अगर आप मुझे ड्राफ्ट दे देती तो मैं आज और कल दो दिन में प्रूफ रीडिंग कर किताब पब्लिश होने दे देता। पहला लॉट 20000 प्रतियों का सोच रखा है मैंने।
वैसे जिस पागलपन के साथ लोग आपकी किताब का इंतजार कर रहे हैं, मुझे लगता है 20000 प्रतियां तो हाथों-हाथ निकल जाएंगी।
और बहुत जल्द मुझे सेकंड एडिशन के बारे में सोचना पड़ेगा।”
” यह कुछ ज्यादा ही आप आशाएं कर रहे हैं। जरूरी नहीं कि इतनी प्रतियां पहली बार में ही बिक जाए?”
“मैं पूरी तरह से श्योर हूं कि पहले लॉट की सारी प्रतियां हाथों-हाथ बिकेगी। आप लिखते ही इतना कमाल है कि लोगों के सर चढ़कर बोलती है आपकी कलम। आपके जैसी हॉरर फैंटेसी लिखना आज के जमाने के लेखकों के लिए बहुत मुश्किल है। आप जिस ढंग से सीन क्रिएट करती हैं, ऐसा लगता है जैसे सब कुछ आंखों के सामने चल रहा है। “
” पता नहीं मैं इतनी तारीफ के काबिल हूं भी या नहीं?”
” जी यह तो नहीं जानता कि आप इंसान कैसी हैं”,? लेकिन आप लेखक जबरदस्त है। “
मुस्कुरा कर कामिनी अंदर चली गयी,वो वापस आयीं तो उसके हाथ में उसकी डायरी थी। उसने वो डायरी उस प्रकाशक के हाथ में रख दी।
उस डायरी के साथ ही कुछ रफ पन्ने भी थे, उन पन्नों को भी समेट कर प्रकाशक वहाँ से उठ गया
” आप एक बार देख तो लीजिये, कुछ सही न लगे तो अभी सुधार कर सकती हूं।”
“आप के लिखे में सुधार की ज़रूरत ही नही…. “
मुस्कुरा कर उसने कामिनी के सामने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ दिया और वहाँ से निकल गया।
ऋषिकेश के जाने के बाद आज इतने दिनों के बाद कामिनी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान नज़र आई थी कि तभी उसका फ़ोन बजने लगा ….
फ़ोन रेशमी यानी ऋषिकेश के बड़े बेटे की पत्नी का था।
” हॉं रेशमी ! बोलो!”
” जी , कल पापा जी की आत्मा की शांति के लिए शांति पाठ रखा है, शाम चार बजे “आर बर्न्स” में। आप देख लीजियेगा ….
इतना कह कर रेशमी ने फ़ोन रख दिया। कामिनी समझती थी उसे खुल कर रेशमी वहाँ नही बुला सकती थी…
…. वापस उसकी आंखें भीग गयी । उसे कुछ दिन पहले का वो दिन याद आ गया जब ऋषिकेश की बॉडी उसके परिवार को हैंडओवर की गई थी । और उसके अंतिम संस्कार के समय उसके बेटों ने उसे एक किनारे कर दिया था। वो ठीक से ऋषिकेश के अंतिम दर्शन भी नही कर पाई थी।
जमना ताई समझ गयी कि कोई ऐसी बात जरूर है
जिसके कारण कामिनी इतनी दुखी हो गयी है…
लेकिन उन्होंने उससे कुछ पूछे बिना बस उसके सामने पानी भरा गिलास बढ़ा दिया।
दो घूंट पीने के साथ ही कामिनी एक बार फिर सुबकने लगी।
” ये लीजिये ,आप ज़रा इसे पढ़ कर देखिए …!
” ये क्या है जमना ताई ?”
” आप ही कि लिखी कहानी का अंतिम भाग। एक बार खुद भी पढ़ कर देखिए,हो सकता है इसमें किसी प्रूफ रीडिंग की ज़रूरत ही न हो।”
असल में जमुना ताई जानती थी कि कामिनी का मन हल्का कैसे हो सकता है? बस उसे सामान्य करने के लिए ही उन्होंने उसके सामने उसकी किताब खोल दी थी। और एक बार किताब खुलने के बाद कामिनी उसे बिना पढ़े बंद कर दे यह नामुमकिन था…. कामिनी वापस नीचे बैठ उस किताब के पन्ने पलटने लगी।
******
शेखऱ ने चार्जशीट तैयार कर ली और कुलदीप को सलाखों के पीछे डाल दिया।
” क्या ज़रूरत थी भाई सन्नी देओल बनने की। जब शुरुवात में ही सामने वाले कि चोरी पकड़ में आ गयी तो या तो चुपचाप किनारे हट जाना था या पुलिस में शिकायत कर देनी थी। खैर अब जो हुआ सो हुआ। चाय पिओगे थाने की?”
कुलदीप बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप बैठा रहा। उसे यूँ गुम देख शेखऱ ने अपने लिए चाय मंगवा ली।
“कहाँ हो कंसारी? ले आओ भाई गरमा गरम अदरख वाली चाय ? आज ज़रा तबियत से चाय पियेंगे हम। “
“जी हुजूर !”
भाग कर गिरधारी शेखऱ के लिए चाय ले आया….
शेखऱ अभी चाय का प्याला मुहँ से लगाने जा रहा था कि नंदिनी जल्दबाजी में उसके केबिन में प्रवेश कर गयी….
” अरे आओ नंदू। अभी अचानक कैसे आना हुआ? संसारी एक और कप ले आओ भई।”
गिरधारी ने एक खाली कप तुरंत टेबल पर रख दिया,उसे घूर कर शेखऱ वापस बमक पड़ा…
” अबे खाली कप का क्या करेंगे। एक और चाय का कप मैडम के लिए लाओ।”
“नही नही मैं नही लुंगी। ” नंदिनी ने गिरधारी को देख कर ज़ोर से हाथ हिला कर मना कर दिया। वो शायद कुछ बहुत ज़रूरी बात बताने आयीं थी, इसलिए उसके चेहरे की गंभीरता को देखते हुए शेखऱ ने भी अपना प्याला नीचे रख दिया।
” एक बहुत ज़रूरी बात बतानी है शेखऱ?”
” हाँ बोलो नंदू। “
” कल शाम के समय मैं झील के पास बैठी अपने किसी आर्टिकल पर काम कर रही थी, कि तभी एक छोटी बच्ची मेरे पास आई और मुझसे जरा दूर हट कर बैठ गई…
मैं उस बच्ची को पहचानती नहीं थी, मैंने उसकी तरफ देखा और एक छोटी सी स्माइल दे दी। मैंने उससे पूछा उसे कुछ चाहिए पर उसने मुझसे कुछ भी नहीं कहा बस मुझे देखती रही। फिर मैंने उससे पूछा बेटा क्या नाम है तुम्हारा, उसने तब भी कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उससे पूछा क्या उसे बलून चाहिए? उसने कोई जवाब नहीं दिया ।
मैं यह कह सकती हूं कि वह बिल्कुल न्यूट्रल बैठी थी, और सिर्फ मुझे देख रही थी। मैंने उस पर से अपना ध्यान हटाया और अपना आर्टिकल लिखने लग गई।
लिखने की कोशिश करने के बावजूद मेरा मन लिखने में नहीं लग पा रहा था। क्योंकि मुझे महसूस हो रहा था कि मुझसे तीन सीढ़ियां नीचे उतर कर बैठी वह बच्ची लगातार सिर्फ मुझे ही देख रही थी। मुझे लगा यह आस पास की कोई गरीब बच्ची है, जिसे शायद भूख लगी होगी। मैंने वही कुछ दूर पर खड़े चने वाले से 10 के चने ले लिये। मैं धीरे से सीढ़ियां उतर कर उसके पास पहुंची और चने से भरा लिफाफा उसके पास की सीढ़ी पर रख दिया। उसने नजर उठाकर उन चनों की तरफ देखा तक नहीं, उसने अपने हाथ में बहुत देर से रखा कोई कागज का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ा दिया।
मुझे बहुत आश्चर्य भी हुआ कि वह मुझे क्या देना चाहती हैं? लेकिन वह इतनी देर से मेरे सामने बैठकर मुझे घूर रही थी, कि अपने संशय का जवाब पाने के लिए मैंने तुरंत उसके हाथ से वह कागज ले लिया।
मैंने तुरंत उस मुड़े हुए कागज को खोल कर देखा उसमें सिर्फ एक नाम लिखा हुआ था…. “द आर बर्न्स”
मुझे एकदम से इस नाम का कोई अर्थ समझ नहीं आया मैंने आंख उठाकर देखा। तब तक वो वहां से जा चुकी थी। मेरे दिए हुए चने बिना चखे अब तक वहीं रखे थे और मेरा मजाक उड़ा रहे थे। “
“वो लड़की आखिर गई कहा? क्या तुमने उसे आस पास ढूंढने की कोशिश की?”
” हां मैंने ढूंढने की कोशिश की, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आई । पर फिलहाल मेरा ध्यान उस लड़की से ज्यादा उस पर्चे पर था। जिसमें उसने कुछ अजीब सा नाम लिखकर मुझे दिया था। मैं घर आ गई। मैंने लैपटॉप पर इस नाम को डाला और सर्च करना शुरू किया। जानते हो मुझे इस नाम से क्या मिला?
शेखर ने ना में सिर हिला दिया…
“आर बर्न्स का पूरा नाम रॉबर्ट बर्न्स है। यह एक बहुत प्रसिद्ध इंग्लिश कवि थे। स्कॉटलैंड की पैदाइश थे, और यह 18 वीं सदी के सामाजिक और प्रेमिल कविताएं लिखने के उस्ताद माने जाते थे।
साहित्यकारों में इनका नाम सुप्रसिद्ध है । आज भी नए साहित्यकार लिखना सीखने के पहले इन्हें जरूर पढ़ते हैं। इन्होंने ढेर सारी कविताएं लिखी थी, जिनमें से कुछ समाज सुधार पर थी तो कुछ पूरी तरह से प्रेमी ह्रदय के उद्गार थे। इनका लिखा हुआ पढ़ने वाले ही जानते हैं कि रॉबर्ट बर्न्स क्या हैं।
लेकिन वह अपनी कविताओं के साथ साथ अपने सामाजिक कार्यों और बाकी कारणों से भी प्रसिद्ध थे। जैसा कि मैंने एक जगह उनके बारे में पढ़ा , की चार अलग-अलग औरतों से उनके 12 बच्चे थे और उनका फैमिली ट्री हर दिशा में फैला हुआ था।
खैर वह जो भी हो लेकिन रॉबर्ट बर्न्स साहित्य के क्षेत्र का एक चमकीला सितारा था और वह भी 18 वीं सदी का।
तो मुझे यह नहीं समझ आया कि उस छोटी सी बच्ची के हाथ में इतने पुराने इंग्लिश कवि के नाम की पर्ची क्यों थी? “
” यही तो मैं भी सोच रहा हूं कि जिस ढंग से तुम इस साहित्यकार का वर्णन कर रही हो यह भी संभव है कि आज के राइटर्स को इनके बारे में कुछ खास मालूमात ना हो फिर वह बच्ची कैसे इतना सब जानती थी? “
” वह बच्ची इतना सब जानती है, कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम? बस उसने इस पर्ची को मेरे हाथ में रखा। मैं तो यह भी नहीं समझ पा रही हूं, कि किसी और ने उस बच्ची के हाथ से यह पर्ची मेरे पास भेजी, या फिर उस बच्ची ने खुद मुझे वह पर्ची दी? दूसरी बात अगर वह बच्ची खुद मुझे यह पर्ची देती है, तो इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? और आखिर उस बच्ची ने मुझे ही यह पर्ची क्यों दी? “
” बात तो तुम्हारी सही है। फिर आगे क्या सोचा तुमने? देखो यह भी हो सकता है कि उस बच्चे के स्कूल के सिलेबस में रॉबर्ट बर्न्स हो। और वह उन्हें नहीं पढ़ पा रही हो, या नहीं समझ पा रही हो। और इसीलिए पर्ची में उसने यह नाम यूं ही लिख लिया हो और घूमते फिरते तुम पर वह पर्ची चिपका दी?”
” नहीं उस बच्चे की आंखों में कुछ अजीब सा था। मैंने ध्यान से देखा वह पलकें बहुत कम झपक रही थी। या शायद झपक ही नहीं रही थी।
पर जो भी हो वह यूं ही घूमते फिरते मुझे पर्ची देकर जाने वाली तो नहीं लग रही थी। “
अपनी बात कहते कहते नंदिनी का गला सूखने लगा था। उसने वही रखी शेखर की चाय उठायी और गटक गई।
शेखर अब तक नंदिनी का लिहाज करके चुपचाप बैठा था ।
और उसके सामने ही एक बार फिर उसकी गरम चाय शहीद हो गई ।
उसने चाय की कप की तरफ देखा और वापस गिरधारी की तरफ।। गिरधारी ने इशारे से उसे चाय का दूसरा कप लाने के लिए पूछा भी लेकिन शेखर ने मना कर दिया…
” फिर अब क्या सोचा है नंदू? “
” कुछ सोच ही कहां पा रही हूं? बस यही नाम दिमाग में घूम रहा है… मैं ऐसा करती हूं कि हमारे शहर में किस लाइब्रेरी में मुझे आर बर्न्स की किताब मिल सकती है। यह सर्च करती हूं। हो सकता है उस लाइब्रेरी के थ्रू वह लड़की मुझसे कुछ कहना चाह रही हो? “
नंदिनी ने तुरंत शेखर की टेबल पर रखे लैपटॉप पर सर्च करना शुरू किया।
सर्च रिजल्ट सामने आते ही उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा उसकी आंखें फटी रह गई और उसने लैपटॉप की स्क्रीन शेखर की तरफ मोड़ दी।
“ये देखो। “
शेखऱ की भी देखते ही आंखे चौड़ी हो गयी….
” ये क्या ऋषिकेश का बनवाया हुआ है?”
“हाँ यहाँ तो यही लिखा है, कि सुप्रसिद्ध साहित्यकार ऋषिकेश रायसागर ने प्रसिद्ध ब्रितानी साहित्यकार के नाम पर एक बड़ा साहित्यिक भवन बनवाया था। जिसका नाम उन्होंने उसी साहित्यकार के नाम पर “बर्न्स” रखा है जहां अक्सर ऋषिकेश राय सागर की साहित्यिक गोष्ठियां और मुशायरे हुआ करते हैं। और यह कितना अजब इत्तेफाक है, कि ऋषिकेश राय सागर के पिता की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा की शांति के लिए रखा गया शांति पाठ भी उसी भवन में किया गया था और अब ऋषिकेश रायसागर के लिए भी शांति पाठ उनके परिवार वाले उसी भवन में रखने जा रहे हैं। “
” यह तुम गूगल पर कब की न्यूज़ पढ़ रही हो। “
” रीसेंट न्यूज़ ही है कुछ घंटों पहले ही अपडेट हुई है।”
” इसका मतलब ऋषिकेश रायसागर की आत्मा की शांति के लिए की जाने वाली पूजा अभी उसी भवन में होनी है।”
” हां इसमें कल की तारीख लिखी है। याने कल उसी भवन ” बर्न्स” में ऋषिकेश रायसागर के लिए पूजा रखी गई है। “
” ओके !! वैसे मैं तो ऋषिकेश राय सागर के फ्यूनरल में भी गया था… और वहां ऐसा कुछ खास देखने को नहीं मिला। लेकिन अगर तुम चाहो तो कल तुम और मैं इस शांति पाठ में भी चलते हैं। जरा चल के देखा जाए कि ऋषिकेश रायसागर के जाने के बाद उसके घर वाले उसकी आत्मा की शांति के लिए कितने उत्सुक हैं? वही कामिनी मैडम से भी भेंट हो जाएगी। “
“हां” में सिर हिला कर नंदिनी वापस अपनी सोच में गुम हो गई। उसे अब भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह बच्ची आखिर चाहती क्या थी? और उसके हाथ आए हुए उस पर्चे का क्या अभिप्राय था? क्या उसका इशारा ऋषिकेश रायसागर के बनाए इस साहित्य भवन की तरफ ही था या वह कुछ और कहना चाहती थी…..
क्रमशः
aparna…..
