The bestseller-25

“बदला“
अगले दिन सुबह सुदीप उस बाबा से मिलने गया और उसने यह बेवकूफी की, कि इस बाबा को सिर्फ यह बताया कि वह और नूपुर इस विधि को करने के लिए तैयार है।
उस बाबा ने विधि के लिए सामग्री की एक लिस्ट और काले दुपट्टे लिखकर सुदीप को थमा दिये। सुदीप ने घर के सभी लोगों के हिसाब से सारी चीजें खरीदी और निकल गया।
बाबा ने जाने से पहले उसे एक भस्म वही पर की एक किताब से छुआ कर दे दी, और कहा था …-” इस विधि को करने के पहले भस्म की दो चुटकी अपनी जीभ पर रख लेना…. ऐसा करते ही तुम्हारे अंदर का सारा डर दूर हो जाएगा।”
सुदीप को लगा था यह कोई चमत्कारी भस्म है। घर पहुंचने के बाद रोज के काम निपटा कर शाम को सारे परिवार के लोग एक साथ इकट्ठा हुए, और इसके बाद वो लोग इस विधि की तैयारी करने लगे। किस्मत से मेरा बेटा और बेटी उस वक्त घर पर मौजूद नहीं थे। मैं खुद गांव में था और बस घड़ी पर नजरें टिकाए बैठा था , कि कब मुझे शहर से फोन आएगा कि नूपुर और सुदीप नहीं रहे।
इधर सुदीप ने वह भस्म सबकी जबान पर रख दी। घर के छोटे बच्चों को भी उसने वह भस्म चखा दी। घर का एक सबसे छोटा बच्चा जो इस विधि में शामिल नहीं होने वाला था… वह खेलते हुए दूसरे कमरे में चला गया । इनमें से किसी ने उसके पीछे जाकर देखने की जहमत नहीं उठाई, कि वह क्या कर रहा है? अगर यह लोग पहले ही देख लेते तो शायद यह लोग इस विधि को करने से रुक जाते ।
वो भस्म असल में एक तेज ज़हर था जो पहले दिमाग पर असर करता था जिसके कारण इंसान गहरी नींद में सो जाता था, और उसी नींद में वह मारा जाता था।
इस बाबा को लगा था कि कहीं सुदीप और नूपुर ने इस विधि को नहीं किया तो वह दोनों जिंदा बच जाएंगे और मैं इस बार उस बाबा को इस गलती के लिए माफ नहीं करूंगा। इसलिए उसने कहीं से ढूंढ कर “वत्सनाभ” की जड़ी की भस्म तैयार की थी और उसे सुदीप के हाथ पर रख दिया था।
घर का वह सबसे छोटा बालक जो गोली का बड़ा भाई था, सबसे पहले इस भस्म का शिकार हुआ। अपने कमरे में खेलते खेलते वह कब गहरी नींद सो गया कोई नहीं जान सका। इधर सब लोगों के मुंह में भस्म रखने के बाद सुदीप ने अपनी जीभ पर भी वह भस्म रखीं और नूपुर की तरफ बढ़ा दी। नूपुर ने भी वैसा ही किया। इसके बाद जैसा उस बाबा ने बताया था सुदीप और प्रदीप ने मिलकर घर के सभी लोगों के हाथों में रस्सियाँ बांन्ध दी और उनके गले में दुपट्टे का फंदा डाल दिया । सभी लोग नींद के नशे में झूमने लगे थे इसलिए फंदे पर लटकने से होने वाली बेचैनी उन लोगों को इतनी ज्यादा महसूस नहीं हुई।
सबसे आखिर में सबसे सामने की तरफ खड़े सुदीप और नूपुर में भी अपने अपने गले में फंदे डालने के बाद एक दूसरे के हाथ बांध दिए… सभी के ऊपर उस भस्म का असर होने लगा था। और भस्म का असर होते हैं जैसे वह लोग नींद में लुढ़के , उनकी गर्दन एक तरफ को झुकी और वह सारे के सारे लोग फांसी के फंदे पर लटक गए।
उनमें से ना तो कोई तड़पा और ना ही परेशान हुआ। भस्म के प्रभाव से नीम बेहोशी में वह लोग कब फांसी पर झूल गए उन्हें पता भी नहीं चला।
सारे के सारे सात लोग एक साथ उस घर पर आधी रात के वक्त झूले में झूमते उन सात दुनिया के बीच में गोली को तलाशने निकल चुके थे। उन लोगों का इतना बुरा अंत होगा…… मैंने सोचा भी नहीं था। आखिर था तो मेरा ही परिवार। मेरी बेवकूफी कह लो या नूपुर सुदीप का पागलपन जिसकी भेंट एक हंसता खेलता परिवार चढ़ गया।
मैं अगली सुबह का इंतजार कर रहा था, कि कब मुझे शहर से पड़ोसियों का फोन आएगा कि नूपुर और सुदीप नहीं रहे और मैं तुरंत शहर की तरफ निकल पडूंगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैं पूरी रात जागता बैठा रहा, कि मालूम नहीं कब फोन आ जाए। लेकिन कोई फोन नहीं आया। फिर सुबह लगभग 7:30 बजे पुलिस का फोन आया कि उस घर के रहने वाले सात के सात लोग मारे जा चुके हैं।
मेरे दिमाग का फ्यूज उड़ गया …मुझे समझ नहीं आया कि, यह क्या हो गया? मुझे बस यह लगा था कि किसी तरह से सुदीप नूपुर मेरे रास्ते से हट जाए ,तो मैं अपने परिवार के साथ आगे की जिंदगी सुखचैन से बिता पाऊंगा। अपने दोनों बच्चों के भविष्य के लिए जी तोड़ मेहनत करूंगा। लेकिन यह तो कुछ और ही हो गया था । मैं तुरंत अपनी गाड़ी निकाल कर शहर के लिए भाग चला।
और वहां पहुंचते ही मैंने जो देखा, कि मेरे होश उड़ गए। यह क्या कर लिया था मेरे पागल भाइयों ने। पहले ही गोली की लाश को छुपा कर मैंने एक बहुत बड़ा गुनाह किया था, और उस गुनाह की आग में मैं अब तक जलता आ रहा था। और अब यह एक और उससे भी बड़ा गुनाह मेरे सर पर आ गया। मेरी समझ से परे था कि मैं क्या करूं क्या नहीं?
लेकिन मैं इतना जरूर जानता था कि अगर मैं सब कुछ सच-सच पुलिस को उस वक्त बता देता तो, मेरे दोनों बच्चों का भविष्य चौपट हो जाता। अगर उन दोनों के कॉलेज में पता चल जाता कि इनका पिता इतना बड़ा षड्यंत्रकारी है तो जाने उन दोनों के साथ बाकी लोग क्या सलूक करते ? इसके अलावा अगर मैं इस सारी सच्चाई के बारे में पुलिस को बताता तो कहीं ना कहीं गोली की हत्या का राज भी पुलिस के सामने खुल ही जाता और अगर गोली की हत्या का राज खुलता तो अनन्या फंस जाती, उसे जेल हो जाती है और मैं फिर कहीं का नहीं रह जाता।
ले देकर कॉलेज जाने के बाद ही तो वह थोड़ा सा सम्भली थी। उसकी शादी भी हमने तय कर दी थी। उसी के साथ उसके कॉलेज में उसका सीनियर लड़का था, जो उसे बहुत पसंद किया करता था। इस रिश्ते की शुरुआत उस लड़के की तरफ से ही हुई थी। अनन्या ने तो दोस्ती करने से पहले ही मुझसे उस लड़के की बात करवा दी थी ।
कॉलेज के सेमेस्टर ब्रेक में वह उस लड़के को लेकर मेरे पास गांव भी आई थी। और मैं उन दोनों से मिलकर बेहद खुश हुआ था। मैंने इसीलिए इतनी जल्दी और हड़बड़ी में अनन्या की उस लड़के से शादी तय कर दी थी कि जिससे अनन्या अपने मानसिक विकारों से बाहर निकल सके। एक स्वस्थ रिश्ते की नीव रखकर ही वह खुशी और प्यार के सहारे अपनी मां की कलुषित आचरण को भूलने की कोशिश कर रही थी। और उसकी इस कोशिश में मैं उसका पूरी तरह से साथ देना चाहता था और उसी वक्त घर पर इतना बड़ा कांड हो गया।
मेरा एक दिल किया भी कि मैं पुलिस को सारी सच्चाई बता दूं लेकिन दूसरे ही पल अनन्या का चेहरा उसकी मासूम आंखें मेरे सामने घूम गई। और मैं कुछ भी नहीं बता पाया। ये सब मेरे लिए भी उतना ही शॉकिंग था जितना बाकी लोगों के लिए, क्योंकि मुझे सिर्फ सुदीप और नूपुर से नाराजगी थी , और मैं सिर्फ उन दोनों की मौत देखना चाहता था।
इस तरह से पूरा परिवार उजड़ जाएगा यह मैंने नहीं सोचा था।
जब मैंने वहां घर परिवार के छोटे-छोटे बच्चों की लाश देखी तो मेरी आत्मा कलप उठी। मुझे लगा मुझे खुद को खत्म कर लेना चाहिए। लेकिन हर बार मैं चूक गया।
मैं अपने आप से हार गया, अपने अंदर के पिता से हार गया। मुझे लगा मेरे बच्चों को मां तो अच्छी नहीं मिली कम से कम पिता का सहारा तो उन दोनों के लिए जरूरी है। मैं जानता हूं यह सब कह कर मैं अपने गुनाह कम नहीं कर सकता मैंने बहुत बड़ा गुनाह किया है।
यह सब देखने के बाद की कहानी तो आपको खुद पता है, मेरे पुलिस थाने के चक्कर लगने लगे थे। आप सब सदा मुझ पर ही शक कर रहे थे और मैं जानता था कि मैं शक के घेरे में आता भी हूं। और इसीलिए मैंने हर बात का ध्यान रखा ।
मैंने अपने फोन से ना तो राजेश को कॉल किया और ना ही उस बाबा को। मैं जानता था अगर कुछ भी ऐसा होगा तो इस बाबा का नाम जरूर आएगा। और इसीलिए मैं हर बार राजेश के फोन से ही उस बाबा से बात किया करता था । इसलिए जब आप लोगों ने मेरे फोन कॉल्स को ट्रेस किया और डिटेल्स निकाली तब आप लोगों को कोई भी ऐसी अजीब बात नजर नहीं आई।
राजेश के हाथों संदेश भेज कर मैंने उस बाबा को भी यहां से कहीं दूर चले जाने को कहलवा भेजा । वह बाबा सुदीप के दिए सारे गहने रुपए और मेरे दिए रुपए लेकर पहले ही चंपत हो चुका था।
राजेश ने बिल्कुल अपने आप को इस तरह तटस्थ रखा हुआ था, कि आप में से किसी का भी उस पर शक नहीं हुआ। वह एक आधि बार शहर आया भी, लेकिन आप लोगों ने शायद उस पर ध्यान नहीं दिया।
तो बस इंस्पेक्टर साहब यही है इन सारी मौतों का राज।”
कुलदीप अपनी बात खत्म कर चुका था …बीच-बीच में वह काफी रोने लग गया था। लेकिन अब अपनी बात खत्म करते करते, वह भी समझ चुका था, जान चुका था, कि अब उसका ठिकाना जेल की सलाखें ही हैं। वैसे देखा जाए तो उसने किसी को मारा नही था लेकिन सच को जानने के बावजूद हत्या की सच्चाई छिपाना और गोली की मौत के बाद उसकी बॉडी छुपाना ही अपने आप में बहुत बड़ा क्राइम था। अब शेखर कहने लगा….
” पोस्टमार्टम रिपोर्ट आते ही मेरा शक तुम पर गहरा होने लगा था। क्योंकि पोस्टमार्टम में आ चुका था कि इन सभी ने फांसी लगाने से पहले कोई जहर लिया था। लेकिन वो जहर इतना तेज है और इस ढंग से ब्रेन पर काम करने वाला है यह हमें बाद में मालूम चला।
पहले तो इस कांड को देखकर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए थे, फिर धीरे-धीरे मैंने कड़ियों को जोड़ना शुरु किया। सब कुछ ध्यान से देखने समझने पर भी कहीं कोई पेंच नजर नहीं आ रहा था। कहीं कोई गलती या सुराग नही मिल रहा था, इसका मतलब साफ था कि जो भी किया गया था बहुत पर्फेक्टली किया गया था।
यह मर्डर ऐसे प्लान किया गया था, कि सबको यही लगे इन लोगों ने एक साथ मिलकर सुसाइड किया है । और हुआ भी वही।
असल में देखा जाए तो उन लोगों ने आत्महत्या ही की थी, वह तो सिर्फ उनका ब्रेनवाश किया गया था की वह लोग उतना बड़ा आत्मघाती कदम उठाएं। मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि आखिर वो कमज़ोर कड़ी कौन था, जिसका सबसे पहले ब्रेनवाश किया गया था।
गहराई से जांच पड़ताल करने पर पता चला कि पूरा घर परिवार सुदीप की बहुत बात माना करता है। और तब मैंने सुदीप पर फोकस करना शुरू किया। इसी बीच हमें यह भी पता चला कि सुदीप की एक बेटी डेढ़ साल पहले गायब हो चुकी है। और जब वह गायब हुई थी तब वह आपकी बेटी के साथ ही थी। यह एक बहुत बड़ा पॉइंट था हमारे शक को हवा देने के लिए ।
इसके साथ ही मर्डर वाली रात की अगली सुबह जब मैं घर की चीजों का मुआयना कर रहा था, तब मैंने आपके उस चमत्कारी वास को भी देखा था। जिसमें ढेर सारे प्रिज़्म सीधे उल्टे अलग-अलग एंगल में जुड़े हुए थे। उस प्रिज्म की एक खास बात और है क्या आप जानते हैं कुलदीप…”
कुलदीप आश्चर्य से शेखर की तरफ देखने लगा।
” उस वास में कुछ तस्वीरें कैद होकर 8 से 10 घंटे तक अंदर के प्रिज़्मों में सुरक्षित रहती हैं। और अगर उस वास को एक स्पेशल एंगल में रखा जाए तो कुछ तस्वीरें उसमें हमेशा के लिए प्रिजर्व रह सकती हैं। उन तस्वीरों को हटाने के लिए सिर्फ वास का एंगल बदलना पड़ता है।
आपकी पत्नी नूपुर यह बात जानती थी। और इसीलिए वह उस वास का एंगल लगभग रोज सुबह बदला करती थी। और यह बात आपके परिवार को जानने वाले हर एक उस व्यक्ति से मुझे मालूम चली जो नूपुर को करीब से जानता था।
मैंने आपकी पड़ोसन से बात की, और उनसे उस वास के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह वास कभी टीवी के दाएं और रखा दिखता है , तो कभी बाएं ओर रखा दिखता है।
कभी नीचे तो कभी ऊपर तो कभी डाइनिंग पर।
इस तरह से उस वास की कोई जगह फिक्स नहीं है।
यही बात आपकी कामवाली बाई ने भी मुझ से कहीं।
खैर !!! इन लोगों के यह सब कहने के पहले ही मर्डर की सुबह जब मैंने उस वास को उठाकर देखा था, तो उसके अंदरूनी प्रिज़्म पर मैंने नूपुर को प्यार से सुदीप की बाहों में झूलते देखा था। मेरे लिए यह शॉकिंग था क्योंकि तब तक मैं सुदीप और नूपुर को पहचानता नहीं था। जब आप मुझसे मिलने पुलिस थाने आए तब मुझे पता चला कि आप घर के बड़े लड़के हैं।
आपके घर पर कुछ फैमिली फोटोस लगे हुए थे, जिनसे बाकी की फैमिली का अंदाजा हो गया। और जब आपने उन्हीं तस्वीरों में मुझे नूपुर को दिखाया और कहा कि वो आपकी पत्नी है, तब मैं और भी ज्यादा चौक गया।
दिमाग की घंटी तो तभी बजने लग गयी थी। उसके बाद जब आपके घर आया और हर चीज करीने से सजी देखी और आपने बताया कि नूपुर को घर सजा संभाल के रखने का बहुत शौक है , तब एक बार फिर आपके पड़ोसियों और कामवाली बाई की कही बात याद आ गई।
और मैं सोच में पड़ गया कि जो औरत अपने गांव वाले घर को इतने सलीके से रख सकती है, वह अपने शहर वाले घर में एक वास की जगह बार-बार क्यों बदलती है ? और मेड के साफ सफाई करने के बावजूद उस वास को वह खुद क्यों साफ करती है?
उस वास को मैंने अपने कब्जे में ले लिया था। और धीरे से मुझे सब कुछ समझ में आ गया । नूपुर यह बात जानती थी, कि उसके अंदरूनी प्रिज़्मो में देखी हुई इमेजेस सुरक्षित रह जाती हैं । और इसीलिए रोज सुबह सबके जागने से पहले वह वास की जगह बदल कर उसे पोंछ कर रख दिया करती थी, कि जिससे अगर उसकी और सुदीप की कोई इमेज उस वास ने कैप्चर की भी है तो वह गायब हो जाए ।
शायद नूपुर को वो वास बेहद पसंद था इसलिए उसेवो वहां से हटाना भी नही चाहती थी।
लेकिन उस रात जिस रात सुदीप और नूपुर ने आत्महत्या की .उसके अगले दिन वह उस वास का एंगल बदलने के लिए मौजूद ही नहीं थी। और इसीलिए एक रात पहले की वह तस्वीर उसमें सुरक्षित रह गई थी, जिसमें विधि को पूरा करने के पहले दोनो ने एक दूसरे के गले लग कर एक दूसरे को ढांढस बंधाया था।
बस यहीं से मेरा शक तुम पर गहराता चला गया। मुझे समझ में तो आ गया था कि यह मामला विवाहेत्तर संबंधों का ही है। लेकिन मैं हर एक कड़ी को एक दूसरे के साथ जोड़ते हुए आगे बढ़ना चाहता था। इसीलिए मैंने तुम्हें जानबूझकर थाने में एक रात रखा तुम्हें मारा पीटा और फिर वापस छोड़ दिया। जिससे तुम्हें लगे कि मैं अपनी गिल्ट के कारण तुम्हें गांव जाने के लिए इजाजत दे रहा हूं।
मैं जानता था तुम गांव जाने के बाद थोड़ा सा ही सही रिलैक्स हो ही जाओगे और वही हुआ। गांव जाते ही तुमने अनन्या को फोन किया और मैं तुम्हारा फोन टैप कर रहा था। अनन्या से हुई तुम्हारी बातचीत में इतना तो समझ में आ गया की अनन्या अपनी मां से जुड़ी बातें जानती है, बाकी की बात घर पर मिली दिवाली की उस तस्वीर ने पुख्ता कर दी जिसमें अनन्या उदास और अकेली बैठी थी।
एक बात और कहना चाहता हूं कुलदीप !!!
मैंने तुम्हारी बेटी से उसकी मां को लेकर कोई बातचीत नहीं की थी… मैं समझता हूं एक बेटी के लिए यह मसला कितना संवेदनशील हो सकता है। और मैंने तुम्हारी बेटी को बिल्कुल भी डिस्टर्ब नहीं किया था। यह सिर्फ मेरा तुक्का था, जो मैंने तुम पर फेंका था और तुमने बड़ी आसानी से मेरे तुक्के को सच मानकर कैच कर लिया और खुद ही इकरारनामा दे बैठे।
चलो भाई अब तुम्हें थाने तो ले जाना ही पड़ेगा। क्या जरूरत थी इतनी लंबी चौड़ी दास्तान सोचने की अरे बदला ही तो लेना था। उस नूपुर के मुंह पर तलाक के कागज मारते और अलग हो जाते।
अपनी दुनिया अपने बच्चों तक ही सीमित रखते । भाई मेरा तो यही सोचना है कि अगर तुम्हारा पार्टनर तुम्हें चीट कर रहा है, तो उससे किसी भी तरह का बदला लेने या उसको सजा देने से अच्छा है, उसके रास्ते से ही हट जाओ।
उसे जो करना है करने दो। एक न एक दिन उसे खुद अक्ल का जाएगी और उसे समझ में आ जाएगा कि उसके लिए तुम से बेहतर कोई नहीं था।
मतलब ये की फिर जब उस दिन वह तुम्हारे पास आए तब उसे बाहर का रास्ता दिखा दो । यही उस चीटर के लिए सबसे बड़ी सजा होती है।
खैर अब तुम्हें भी क्या कहूं? तुम्हारे लिए मन में संवेदना तो है , लेकिन कानून संवेदनाओं और भावनाओं पर नहीं टिकता। उसकी नजर में गुनाहगार, गुनहगार ही है। चाहे वह किसी भी मानसिक अवसाद की स्थिति में रहा हो।
क्योंकि तुम कबूल भी कर ही चुके हो तो तुम्हें हमारे साथ चलना होगा। हां हम लोग यह कोशिश जरूर करेंगे कि तुम्हें कम से कम सजा मिले….
शेखर अपनी जगह से खड़ा हो गया और आगे बढ़ गया कुलदीप भी चुपचाप सिर झुकाए शेखर के पीछे पीछे आगे बढ़ गया…..
क्रमशः
aparna…..

👍💯