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“सज़ा “
धड़कते दिल से सुहास ने मुख्य द्वार खोल दिया …
और उसके सोचे अनुसार पूरब बिंदल का ऑफ़िस “रेनबो” उसके बाप के “मिशनरी अस्पताल” में बदल चुका था।
सुधाकर ने अंदर प्रवेश किया, और उसने अपने जीवन में जो कभी नही सोचा था, वो उसकी आँखों के सामने था….
अंदर मद्धम सी रोशनियों से भरी एक छोटी सी ओटी यानी ऑपरेशन थियेटर नज़र आ रहा था। छोटे छोटे धीमी सी रोशनी देते हुए बल्ब लटक रहे थे। कमरे में एक तरफ कुछ बड़ी स्टील की टेबल और रैक रखे हुए थे, जिनमें सर्जरी में प्रयोग किये जाने वाले औजारों के साथ ही ग्लव्स, हेड कैप, एप्रन, सर्जिकल ड्रम, सीज़र्स आदि रखे थे।
उस कमरे के बीचों बीच एक बेड पड़ा था, जिसके एक तरफ ऊंचा सा स्फिग्मोमैनोमीटर यानी बीपी जांचने का यंत्र रखा था। दूसरी तरफ एक कॉर्नर टेबल पर कुछ छोटे से डिस्प्ले में से कुछ वायर्स निकली थीं। एक तरफ तरफ भरा हुए ऑक्सीजन सिलेंडर रखा था।
सुधाकर बिंदल के अंदर घुसते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया था और सुहास उस कमरे के बाहर ही रह गया….
बिंदल उस कमरे को आंखें फाड़े देख कर माज़रा क्या है समझने की कोशिश कर ही रह था कि पीछे से उसे दोनों तरफ से दो मज़बूत बाहों ने पकड़ा और सामने पड़े बिस्तर पर पटक दिया।
अब तक उसे वहाँ कोई नज़र नही आया था… लेकिन जैसे ही उसे बिस्तर पर पटका गया, उसने डर से आंखें बंद कर ली। कुछ अजीब सी आवाज़ों से डर कर उसने जैसे ही आंखें खोली उसके सामने ढेर सारे लोग खड़े थे।
ढेर सारे लोग ,एक जैसी मुर्दानी शक्ल वाले पीले पीले से चेहरों वाले लोग उसकी तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। किसी के पेट पर से खून निकल रहा था तो किसी के कमर के पास से खून बह रहा था। लेकिन उन सभी में एक बात समान थी कि ..
सभी की आंखों से खून जरूर बह रहा था।
शायद इसे ही खून के आंसू रोना कहा जाता होगा।
सुधाकर बिंदल इन सभी को अपनी तरफ बढ़ते देखकर घबरा गया। डर के मारे वह बिस्तर पर पीछे की तरफ खिसकने लगा। तभी पीछे से 2 लोगों ने उसे कसकर पकड़ लिया। सामने आते लोगों में भी दो लोगों ने उसके पैर पकड़ कर उसे सीधा कर नीचे बिस्तर पर लिटा दिया।
कुछ अजीब सी घर घर की आवाज आई उसने घबरा कर इधर-उधर देखा तो उन्हीं में से एक दुबला पतला सा लड़का एक मोटी वायल से इंजेक्शन भर रहा था।
उसने जैसे ही सुधाकर की तरफ देखा, सुधाकर की चीख निकल गयी, क्योंकि उस लड़के की आधी शक्ल बुरी तरह से बिगड़ी हुई थी । ऐसा लग रहा था ढेर सारी ईंटे उसके चेहरे पर गिर पड़ीं थीं। और उन्हीं ईंटो से चोट खाकर उसका चेहरे का एक तरफ का हिस्सा बुरी तरह से कुचला गया था।
आंखें अंदर की तरफ धंस गयी थीं, और पूरे चेहरे पर मांस कर लोथड़ा झूल रहा था और उस लोथड़े में जगह-जगह इंट और सीमेंट का चुरा भरा हुआ था। चेहरा इतना विभक्त लग रहा था कि सुधाकर ने अपनी आंखें बंद कर ली। लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि किसी ने उसकी पीठ पर रीढ़ की हड्डी की तरफ से पकड़कर उसे सामने की तरफ झुका दिया है। वह कुछ समझ पाता कि तभी उसकी रीढ़ की हड्डी के बीच की जगह पर किसी ने एक इंजेक्शन घुसा दिया। उस निडिल की चुभन से हुए दर्द से वह बौखला कर चीखने वाला था कि दो लोगों ने कंधे पकड़कर उसे झुकाए रखा और पीछे से किसी ने इंजेक्शन पूरा का पूरा उसके अंदर डाल दिया…..
वह जोर से चीख उठा….
” कौन हो तुम लोग ?और चाहते क्या हो? इंजेक्शन की दवा डाली जाती है रीढ़ की हड्डी में कोई इंजेक्शन थोड़ी ना घुसा देता है।”
“हमें नहीं पहचाना डॉक्टर साहब? मैं बेड नंबर b7 की पेशेंट नंबर 17 हूं। मेरा नाम आनंदी है। मैं सिर्फ 16 साल की स्कूल जाने वाली बच्ची थी। मुझे 2 दिन से पेट साफ नहीं होने के कारण पेट में भयानक दर्द हो रहा था। और सिर्फ वही दिखाने मेरी मां मुझे आपके पास लेकर आई थी। और आपने कहा मेरे पेट में पथरी है, जिसको ऑपरेट करके निकालना पड़ेगा। मेरी बेचारी माँ समझ नहीं पाई, और उन्होंने जैसा आपने कहा वह मान लिया। हमारी गरीबी रेखा के कार्ड पर ही आपने मेरा निशुल्क ऑपरेशन करके मुझे डिस्चार्ज भी कर दिया। घर जाने के बाद मुझे बहुत ज्यादा कमजोरी लगने लगी थी। ना तो मैं अपनी सहेलियों के साथ दौड़ भाग पाती थी। ना ही खेलकूद पाती थी। और एक दिन ऐसा ही हुआ। स्कूल में मैंने रेस में भाग लिया था । मैं अपनी हिम्मत जोड़ कर 400 मीटर तक दौड़ती चली गई , दौड़ती चली गई। वो भी बिना पानी के। मुझ नहीं पता था कि मेरी एक किडनी नहीं है। और मुझे सिर्फ एक किडनी का ही सहारा है।
मैं अचानक से बेहोश हो गई। हो सकता है मैं शारीरिक रूप से कुछ ज्यादा ही कमजोर थी। क्योंकि जब तक मुझे अस्पताल वापस लेकर लीग गए, मैं नहीं बची।
आपके अस्पताल में ही मैं ने दम तोड़ा था और आपने बाहर निकल कर मेरी मां से कहा कि मेरी कंडीशन बहुत सीरियस है, मुझे होश आने में तीन-चार दिन लग जाएंगे।
आपने मेरी मां से क्यों झूठ बोला डॉक्टर साहब? मैं तो मर चुकी थी, मैं अपनी मां को देख रही थी… मेरे कमरे के बाहर बैठी रोती बिलखती.| आप उसे मुझसे मिलने भी नहीं दे रहे थे। सिर्फ यह कह कर कि मैं आईसीयू में हूं… बाहर से जो भी मुझसे मिलने आएगा उसका इंफेक्शन मुझे भी लग सकता है… और इस तरह मेरी मां से झूठ बोलकर आपने मेरा शरीर उन्हें नहीं सौंपा। और उसी दिन अपने लोगों से अस्पताल की बिल्डिंग को गिरवा दिया। मैं तो चलो पहले ही मर चुकी थी, लेकिन मेरी मां का क्या कसूर था डॉक्टर साहब जो उस बेचारी की भी आपने जान ले ली।
मिलना नहीं चाहेंगे मेरी मां से? “
डॉक्टर सुधाकर बिंदल के रोंगटे खड़े हो चुके थे। आनंदी का यह सवाल उन्हें एक अजीब से झुरझुरी दे गया। आनंदी ने उनके चेहरे पर से नजर हटाते हुए ठीक उनके बगल में अपनी आंखें घुमा ली। डरते डरते सुधाकर बिंदल भी उसी तरफ को मुड़ गया जिस तरफ आनंदी ने नजरें की थी।
एक बुरी तरह से क्षत-विक्षत शरीर उसके पास खड़ा था। पूरा शरीर ऐसा लग रहा था जैसे रोड रोलर के नीचे आकर पिचक चुका है । नाभि के पास से आंतें बाहर झूल रही थी। उसे समझ में आ गया कि शायद उसने जो गाड़ी चलवाई थी उसके नीचे भी कई लोग दबकर मारे जा चुके थे।
उस औरत ने अपने अध पिचके चेहरे से डॉक्टर सुधाकर बिंदल की तरफ आंखें उठाई उसकी एक आंख पूरी तरह से कनपटी पर बनते दबाव के कारण बाहर को निकल चुकी थी। बिंदल को उसे देखकर उल्टी आने लगी और वह औरत बहुत ही वीभत्स तरीके से हंसने लगी।
” अपने ही किए कराए को देखकर खुद ही को घिन आने लगी सोचो हम सब ने क्या-क्या झेला होगा डॉक्टर?”
” तुम सब हो कौन? और मुझसे चाहते क्या हो?”
सुधाकर बिंदल के ईस बेवकूफ़ाने सवाल पर अब रघु सभी को पीछे करते सामने चला आया….
” हम सब वही मरीज हैं, जो स्वस्थ थे। और जिन्हें तुमने बीमार कर दिया। तुम्हारे इलाज के बाद हम सभी किसी न किसी कारण से मारे गए। कोई तुम्हारे अस्पताल में मर गया, तो कोई अपने घर पहुंच कर तिल तिल तड़प कर मर गया। कोई तो सिर्फ तुम्हारे षड्यंत्र के तहत मारा गया। इसी जर्जर अस्पताल की बिल्डिंग के नीचे दबकर।
हम सब का क्या कसूर था डॉक्टर बिंदल? हम गरीब थे यह हमारा कसूर था? या हम एक गलत डॉक्टर के पास पहुंचे यह हमारा कसूर था? हम सब ने तो हमेशा डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया था। और देखा जाए तो डॉक्टर भगवान कहलाने के लायक होते भी हैं, पर तुम जैसे भी कुछ लोग होते हैं , जो इंसान भी कहलाने के लायक नहीं होते। तुम जैसे कुछ एक लोगों के कारण समाज पूरी डॉक्टर बिरादरी को शक की नजर से देखने लगते हैं। किसी भी प्राइवेट अस्पताल में जाने में लोगों को आजकल डर लगता है। उन्हें लगता है मेडिकल अब धंधा बन चुका है। और डॉक्टर सबसे बड़े व्यापारी। जबकि यह सच नहीं है। सिर्फ तुम जैसे कुछ लालची और घटिया गिरे हुए लोगों के कारण समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैल चुकी हैं….
रघु अभी और भी कुछ कहता उसके पहले ही डॉक्टर सुधाकर बिंदल ने अपने हाथ जोड़ दिए…
” मैं मानता हूं मुझसे गलती हुई.. मुझसे गलती नहीं बल्कि पाप हुआ है। और बहुत बड़ा पाप हुआ है। और उसकी सजा भी मैं आज तक भुगतता चला आ रहा हूं।
इस मिशनरी अस्पताल में मैंने बहुत सारे काले कारनामे किए । जाने कितने मरीजों की बेवजह किडनी निकाल कर जरूरतमंद रईसों के पास मुंह मांगे दामों पर बेची हैं। और उसके बाद जब मुझे लगा कि अब काफी सारे मरीजों की हालत खराब है ,और यहां इस जगह पर मेरा भांडा फूट सकता है। मैंने इस इमारत को ही गिरा दिया। और उस दुर्घटना में भी कई सारे मरीज और उनके परिजन मारे गए। मैं इन सब की जिम्मेदारी लेता हूं। और मैं इस सभी के लिए तुम सब से माफी मांगता हूं ।पर मैं सच कहता हूं मुझे मेरे किए की सजा तुम से पहले भगवान ने दे दी।
इस बिल्डिंग को गिराने के बाद मैं यहां से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर काफी दूर चला गया था।
अपने छोटे से परिवार के साथ मैंने एक नई जगह पर आशियाना बनाया। मेरी डिग्री और अनुभव के आधार पर एक बड़े अस्पताल में मुझे नौकरी भी मिल गई। मुझे लगा यहां अब मुझे कोई नहीं पकड़ सकता, लेकिन कहतें है ना कि इंसान के कर्म कभी उसका पीछा नहीं छोड़ते । वहां रहते हुए मुझे साल भर भी नहीं बीता था कि, मेरी पत्नी को किडनी में शिकायत रहने लगी। मैं खुद नेफ्रोलॉजिस्ट था मैंने उसकी जांच पड़ताल की और मैंने देखा कि उसे किडनी में कैंसर हुआ था। उसकी हालत बहुत खराब थी उसे मेरे कारनामों के बारे में भी सब कुछ पता था और पता नहीं क्यों इसीलिए उसके मन में यह बैठ गया कि मेरे कारनामों की सजा भगवान उसे दे रहा है। क्योंकि वह मेरी पत्नी है।
उसकी एक किडनी पूरी तरह से खराब हो चुकी थी, मैंने उससे कहा कि मैं किडनी ट्रांसप्लांट कर दूंगा और अगर उसे मुझ पर विश्वास नहीं है, तो हम इंडिया से बाहर जाकर भी बेहतरीन सुविधाएं ले सकते हैं। पर वो किसी बात के लिए राजी नहीं हुई।
वह मुझे सजा देने के लिए खुद तड़पती थी, पर उसे तड़पता देख कर भी मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता था। मेरा बेटा जो उस समय 10- 11 साल का था…. उसे धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि उसके माता-पिता के संबंध अच्छे नहीं है । और इस सब के पीछे कारण उसके पिता है। जब वो थोड़ा समझदार हुआ वह मुझे छोड़ कर चला गया। वह अपनी नानी के पास रहकर पढ़ाई करने लगा । उसके जाने के बाद तो उसकी मां और भी टूट गई। मैं उससे भी कहता था कि तुम भी मुझे छोड़ कर चली जाओ, लेकिन उसका कहना था अगर मैं चली गई तो तुम्हारी तकलीफ भी चली जाएगी।
असल में बहुत पहले अनजाने में मैंने उसकी एक सहेली की बेटी का भी ऑपरेशन करके किडनी निकाल ली थी। और जिसके बाद वह बच्ची जिंदा नहीं बची थी। उसकी मां अपनी बेटी के गम में पागल हो गई थी, और जब मेरी पत्नी को पता चला कि इस सब के पीछे मैं हूं तो उसी दिन से वह मेरे पीछे पड़ गई थी कि मैं यह सारे काले धंधे बंद कर दूं। वह हमेशा मुझे अपनी कसम खिलाया करती थी , कि यह सब काम छोड़ दूँ…
” तुम जिस नोबल प्रोफेशन में हो, उसमें तुम ईमानदारी से भी बहुत पैसा कमा सकते हो। तुम्हें यह सब करने की जरूरत ही नहीं है सुधाकर! क्यों किसी की जान की कीमत पर तुम अपने सपनों का महल खड़ा कर रहे हो?”
पर पता नहीं क्यों? क्या लालच मेरे सर पर सवार था कि मैं उसकी कोई बात नहीं सुनता और ना समझता था।
आखिरकार एक दिन ऐसा हुआ कि मुझे खुद को वह सारे काले धंधे बंद करके भागना पड़ा… और वहां से भागने के बाद मेरी बीवी खुद बीमार पड़ गई । मैंने 10 साल उसे तड़पते देखा और आखिर तड़प तड़प कर वो मर गयी। पर मैं शायद वाकई पत्थर से बना इंसान था कि मुझे उसके मरने से एक तरह की खुशी मिली कि चलो मेरे सर से बोझ हटा लेकिन ऐसा मेरा सोचना था।।
मेरी मुसीबतें उसके जाने के बाद और भी बढ़ गई।
मेरी याददाश्त कमजोर होने लगी , मेरे साथ ऐसा होने लगा कि मैं मरीजों को देखकर उनके लक्षणों को देखकर भी उनके रोग पहचानने में असमर्थ होने लगा। और उसी समय मुझे दिमागी बीमारी के साथ ही एक त्वचा का रोग भी हो गया। मेरी त्वचा जगह-जगह पर से गलने लगी और इसके कारण मेरे मरीजों की संख्या भी घटने लगी। अब लोग मुझे देखकर मुझसे घिनाते थे और मेरे पास नहीं आना चाहते थे। कोई भी मरीज ऐसे डॉक्टर के पास नहीं जाना चाहेगा जो दिखने में खुद ही लिजलिजा और विभत्स हो।
अगर डॉक्टर खुद साफ सुथरा और सुंदर है तब तो मरीज खुद खुशी से अपना हाथ उसकी हथेली में पकड़ा देते हैं लेकिन अगर डॉक्टर खुद अच्छा नहीं दिखता तो मरीज भी उससे दूरी बना लेते हैं।
मैं प्राइवेट हॉस्पिटल में काम करता था उस अस्पताल ने मुझे शुरुआत में काफी मोटी रकम देना शुरू किया था लेकिन जैसे-जैसे मेरे मरीज कम होने लगे मेरा परसेंटेज भी उन लोगों ने घटा दिया और एक दम से मेरा पैकेज आधे से भी कम कर दिया।
मेरी पत्नी मर चुकी थी। मेरा बेटा मुझे छोड़ कर जा चुका था। और अब मेरे पास मरीज भी नहीं थे। मेरी वह डिग्री मेरा वह हुनर जिस पर मैं घमंड किया करता था कि मैं सारी दुनिया बदल सकता हूं ।उसी घमंड ने मुझे तोड़ दिया मुझे चूर चूर कर दिया। मेरी डिग्री मेरे पास होते हुए भी मेरे दिमाग ने मेरा साथ देना छोड़ दिया। और तो और मेरी त्वचा ने भी मेरा साथ देना छोड़ दिया। मैं अपने इलाज के लिए जाने कहां-कहां नहीं भटका। एक से एक बड़े स्किन एक्सपोर्ट को दिखाया, महंगी से महंगी दवाइयां करवाई ,लेजर ऑपरेशन करवाएं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
मेरी सारी जमा पूंजी मेरे ही ईलाज में धीरे-धीरे खर्च होने लगी। उसी वक्त मुझे किसी ने बताया विदेश में कहीं कोई एक बहुत बड़े डॉक्टर है जो स्किन एक्सपर्ट है । मैं उनके पास भी चला गया। लेकिन कोई फायदा ना हुआ, बल्कि उल्टा मेरी सारी जमा पूंजी बह गई मैं खाली हाथ बिना किसी लाभ के वापस लौट आया ।
इतनी लंबी छुट्टी लेने के कारण अस्पताल वालों ने भी मुझे निकाल कर एक दूसरे डॉक्टर को नौकरी दे दी थी। सरकारी नौकरी में घुसने का सवाल ही नहीं होता था। क्योंकि मेरी उम्र निकल चुकी थी। प्राइवेट अस्पताल वाले मुझे जैसे डॉक्टर को देखकर ही दूर से राम-राम कर दिया करते थे ।मेरी हालत बहुत खराब रहने लगी।
लेकिन मेरा लालच था कि अब भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। आखिर मैंने एक सोनोग्राफी वाले डॉक्टर से सांठगांठ करके उसी के अस्पताल में पीछे एक छोटे से रूम में अपना काम करना शुरू कर दिया। और एक बार फिर मैं अपने उसी गोरखधंधे में डूबने के लिए तैयार खड़ा था ।जो मैं पहले करता रहा था। लेकिन इस बार फिर मेरी किस्मत ने मेरा साथ नहीं दिया। मैंने दो या तीन ऑपरेशन किये और वह सारे के सारे बिगड़ गए।
किडनी निकालते साथ ही वह तीनों डोनर वही टेबल पर मारे गए और मुझे जिन रेसिपीएंट को किडनी पहुंचानी थी उन्होंने एन मौके पर किडनी लेने से मना कर दिया मतलब ना मेरे हाथ यश लगा और ना ही पैसा।
मुझे एक बार फिर उस जगह से भागना पड़ा और मैं वापस इसी शहर में लौट आया ।लेकिन मैं जानता था कि अब मिशनरी अस्पताल बंद हो चुका है। और यहां एक नई बिल्डिंग बन चुकी है ,जहां ढेर सारे ऑफिस खुल चुके हैं। मुझे यह भी पता हो चुका था कि मेरा बेटा यही एक ऑफिस में काम किया करता है। मैंने कई बार उसे छुपकर देखने की कोशिश की , उससे मिलने की कोशिश की। लेकिन कभी हिम्मत नहीं कर पाया कि उसके सामने जा सकूं। मैं पैसे पैसे को मोहताज होने लगा था। और इसलिए मैंने अपना चेहरा छुपा कर एक बार फिर एक छोटी सी क्लीनिक डाल दी, और मरीजों को देखने लगा।
आखिर अपना पेट पालने के लिए भी तो मुझे कुछ करना ही था।
कि इसी बीच मुझे मेरे बेटे का फोन आया कि वह मुझसे एक बार आखरी बार मिलना चाहता है, यही ईसी जगह।
मैं बस उससे मिलने की आस में आया था क्योंकि अब मैं खुद अपनी जिंदगी से लाचार हो चुका हूं। इतने सालों में मेरी समस्या बढ़ती ही जा रही है। मेरी त्वचा ऐसी हो गई है कि अगर मैं थोड़ी देर भी पानी में हाथ डाल दूं तो वहां से मेरी त्वचा फटने लगती है। और फटती भी ऐसे है कि खून बहने लगता है।
मैं खुद अपनी उंगलियों से अगर अपने चेहरे को छू लेता हूं तो मेरा चेहरा कट जाता है ।
भगवान ने जाने कैसी सजा दी है मुझे ? तिल तिल मर रहा हूं मैं।
जिन उंगलियों से जाने कितने पाप किये वही उंगलियां अब मुझे खुद को छूने से मुहताज कर रही हैं।
हर एक सुबह सो कर उठने के बाद मैं भगवान से यही दुआ मांगता हूं कि मुझे मौत दे दे, लेकिन आज तारीख तक मुझे मौत नहीं आई।
ऐसे जीने का भी क्या फायदा? और मैं तुम सब से भी दिल खोल कर माफी मांगता हूं, कि मुझे मेरे किए के लिए माफ कर दो …हो सकता है तुम लोगों के माफ कर देने के बाद मुझे भगवान इस सजा से मुक्ति दे दे और मुझे अपने पास बुला ले।” “
डॉक्टर सुधाकर बिंदल अपनी आप बीती सुनाता रहा और वही पास में रखें एक कंप्यूटर पर सब कुछ अपने आप टाइप होता रहा। सुधाकर बिंदल ने अपनी आपबीती उन सभी को सुनाने के बाद वही रखी एक सर्जिकल नाइफ उठाई और अपने गले पर तेजी से चला ली।। लबलबा कर खून की धार उसके गले के किनारे से बहती हुई उसकी कमीज को भिगोने लगी। वो झट से बिस्तर पर गिर गया कुछ देर को उसका शरीर अजीब सा ऐंठने लगा और पांच मिनट में सब कुछ एकदम शांत हो गया।
सुधाकर बिंदल का तड़पता शरीर कुछ देर में एक झटके के साथ शांत हो गया और उसी के साथ कंप्यूटर से लगे प्रिंटर में घर घर की आवाज शुरू हो गई एक प्रिंट किया हुआ लेटर प्रिंटर से निकलकर नीचे गिर पड़ा……
क्रमशः
aparna…
