The Bestseller -22

“प्लान”
सुहास अब इसी उहापोह में था, कि किस तरह वह सुधाकर बिंदल को सजा दिलवाए।
सोचते सोचते आखिर उसके दिमाग में एक आईडिया आ ही गया।
अपनी पूरी प्लानिंग के साथ वो एक बार फिर सामने स्थित रेनबो के ऑफिस पहुंच गया। अब चूंकि वो पहले भी उस ऑफिस में जा चुका था इसलिए उसे अंदर प्रवेश करने में कोई दिक्कत नही हुई।
उसमें सीधे रिसेप्शन पर पूरब बिंदल से मिलने की इच्छा जाहिर की और गेस्ट एरिया में जाकर उसका इंतजार करने लगा..
कुछ ही देर में एक लगभग उसी की उम्र का लड़का वहाँ चला आया।
“हेलो !! मैं पूरब हूँ।”
खिड़की से बाहर नज़र गड़ाए सुहास ने अंदर नज़र की और सामने खड़े लड़के को देख खड़ा हो गया…
” हेलो !! मैं सुहास हूँ…. पी सुहास श्रीराम !!”
हल्के से गर्दन को झुका कर पूरब वहीं उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया।
सुहास ने जानबूझ कर अपना पूरा नाम बताया था बावजूद उस लड़के ने अपना नाम पूरा नही लिया..
अगर वो अपना पूरा नाम ले लेता तो सुहास को बात शुरू करने में इतना सोचना नही पड़ता।
सुहास ने एक बार उसे देखा और फिर धीमी सी आवाज़ में कहने लगा…
” हेलो पूरब ! मुझे आपका एक फेवर चाहिए था।आप सोचेंगे जान न पहचान और मैं आपसे फेवर मांगने आ गया!”
पूरब वाकई आश्चर्य वाली आंखों से सुहास को देखने लगा।
सुहास ने एक तरफ गर्दन हिलाई और फिर अपनी बात कहने लगा…..
” मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं और मेरे ख्याल से तुम भी कोडिंग ही करते हो। मेरा भी फेवरेट काम कोडिंग ही है । लेकिन मेरे फादर चाहते थे कि मैं उनकी तरह डॉक्टर बनूँ।
सुहास ने डॉक्टर शब्द पर जरा ज्यादा जोर दिया था और उस शब्द को सुनते ही नीचे देखते बैठा हुआ पूरब आंखें उठाकर सुहास की आंखों में देखने लगा…. पर उसने कहा कुछ भी नहीं।
” मेरे फादर इसी शहर में एक मिशनरी हॉस्पिटल में डॉक्टर थे। बल्कि वहीं काम करते करते बाद में वह सीएमओ बन गए थे । उनके अंडर में ही एक नए आए डॉक्टर साहब, डॉक्टर सुधाकर बिंदल काम करते थे। शायद तुम उन्हें जानते हो…”
“मेरे फादर हैं वो!” बहुत गहरी और सर्द आवाज में पूरब ने कहा यह कहते हुए उसके चेहरे पर एक दर्द छलक आया…
” ओह ग्रेट!!! मेरे फादर काफी पहले यह शहर छोड़ कर चले गए थे।”
अभी जब मेरी जॉब यहां लगी तब मेरे फादर ने मुझसे कहा कि डॉ सुधाकर बिंदल को किसी भी तरह मुझे ढूंढना होगा। असल में वह दोनों काफी अच्छे दोस्त हैं मेरे फादर आज भी डॉक्टर बिंदल को बहुत मिस करते हैं। लेकिन यह बड़ी अजीब बात है कि आज के मोबाइल युग में भी इन दोनों का आपस में कोई कांटेक्ट नहीं है। मैंने मेरे फादर से कहा भी कि किसी सोशल मीडिया की सहायता से हम डॉक्टर बिंदल को ढूंढ सकते हैं, लेकिन ना तो मेरे फादर किसी सोशल मीडिया में है और मुझे लगता है डॉक्टर बिंदल भी किसी सोशल मीडिया पर एक्टिव नहीं है। क्योंकि मैंने अपने प्रोफाइल से उन्हें खोजने की बहुत कोशिश की थी।
सुहास ने देखा पूरब अब भी गहरी और सर्द आंखों से ही उसे घूर रहा था…..
” अगर उन्हें या तुम्हें प्रॉब्लम ना हो तो क्या तुम मुझे उनका फोन नंबर या एड्रेस कुछ भी दे सकते हो?”
” मैं अब उनके साथ नहीं रहता हूं एक्चुली मेरे, मेरे फादर के साथ रिलेशन अच्छे नहीं है। मैं ट्वेल्थ स्टैंडर्ड में ही घर छोड़कर अपनी नानी के पास रहने चला गया था। फिर वहीं से आगे की पढ़ाई के लिए हॉस्टल चला गया और इस तरह पापा से मेरा कोई कांटेक्ट नहीं रहा । “
” ओह्ह !!आई एम सॉरी!! तो इसका मतलब इतने सालों से तुम्हारी अपने फादर से कोई बातचीत नहीं हुई?”
” हुई थी जब मॉम की खबर आई तब मैं घर गया था। मॉम को आखिरी विदाई देने, बस उसी समय उनसे भी आखिरी बार मिला हूं।”
” ओह्ह और इस बात को कितना समय बीत गया?”
सुहास को बोलते ही साथ और पूरब को सुनते साथ यह एहसास हो गया कि यह कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत सवाल हो गया। और पूछते साथ ही सुहास ने माफी मांग ली । लेकिन पूरब ने इस सवाल का भी जवाब दे दिया……
” मैं जब घर छोड़कर नानी के पास गया था, उसके 2 साल बाद ही मां दुनिया छोड़ कर चली गई।”
“ओह्ह !! आई एम सो सॉरी। क्या वो बीमार थी?”
एक बार फिर अपने ही सवाल पर सुहास झेंप गया।
पूरब ने आंख उठाकर एक बार फिर ध्यान से सुहास की तरफ देखा और हां में सर हिला दिया…..
“उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर था।”
अपनी बात पूरी कर पूरब सुहास की तरफ देखने लगा। उसे भी शायद लग रहा था कि अब पता नहीं सुहास अगला कौन सा सवाल पूछ ले, लेकिन सुहास ने मजबूती से अपने आप को रोके रखा और आगे कोई भी ऐसा व्यक्तिगत प्रश्न नहीं पूछा। जिससे पूरब को बुरा लगे लेकिन इतनी देर की बातचीत में सुहास को यह अच्छे से समझ में आ गया कि, पिता और बेटे के बीच अच्छे संबंध नहीं थे। हो सकता है इसका कारण कहीं ना कहीं उसके पिता का स्वभाव या उनका किया कांड रहा हो। और हो सकता है इसी कारण उनकी पत्नी भी उनसे नाराज रहा करती हो। और शायद इसीलिए उनकी पत्नी को “मैनियक डिप्रेशन” की शिकायत भी हो गई हो।
हालांकि यह सारी बातें सुहास के अपने दिमाग की सोची हुई बातें थी, जो उसने पूरब से बातचीत करके तय की थी। पूरब ने अब तक ऐसी कोई जानकारी नहीं दी थी, कि उसकी मां उसके पिता के कारण ही बीमार पड़ी थी।
सुहास अपने विचारों में खोया हुआ था कि पूरब वापस कुछ कहने लगा…
” वैसे उनका स्वभाव ऐसा था तो नहीं कि उनके ज्यादा दोस्त बनते पर हो सकता है… आपके फादर उनके पुराने दोस्त रहे हो। आजकल तो बहुत अकेले हो गये हैं। ना कोई दोस्त ना कोई रिश्तेदार।
मैं जानता हूं, समझता भी हूं, कि उन्हें अब मेरी जरूरत है। लेकिन पता नहीं क्यों खुद को तैयार ही नहीं कर पाता कि उनके पास जाकर रहूं।
मन ही नहीं करता मेरा। “
सुहास के पेट में खलबली मची हुई थी कि तुरंत उससे पूछ ले कि ऐसी क्या बात हो गई कि वह अपने पिता के साथ नहीं रह सकता? लेकिन यह कुछ ज्यादा ही व्यक्तिगत सवाल हो जाता। और ऐसा सवाल पूछना कारपोरेट वालों के लिए कर्टसी नहीं कहलाती। इसीलिए जैसे तैसे करके सुहास ने खुद को काबू में कर लिया।
” आपको एड्रेस चाहिए या टेलीफोन नंबर?”
” वैसे तो दोनों ही दे देंगे तो अच्छा है । पर आपको जिस में भी सुविधा हो वही दे दीजिए।”
” उन्हें आजकल अकेले रहना पसंद है । इसलिए पता नहीं वह कैसा रिएक्ट करेंगे अगर आप उनसे मिलने पहुंच जाते हैं तो।
इसलिए मैं ऐसा करता हूं कि, फिलहाल मैं उनका कांटेक्ट नंबर दे देता हूं। आप एक बार उनसे बात कर लीजिएगा और उसके बाद अगर वह मिलना चाहेंगे तो अपना एड्रेस खुद ही बता देंगे।”
” हां यह सही रहेगा।”
पूरब ने सुहास को एक नंबर लिखवा दिया। नम्बर नोट करने के लिए फ़ोन निकालने पर सुहास ने अपने फ़ोन पर की वॉइस रिकॉर्डिंग को चुपके से बंद किया और डॉ बिंदल का नम्बर लेकर वहाँ से पूरब को धन्यवाद देता निकल गया।
*****
कामिनी अपने कमरे में बैठी लिख रही थी कि जमना ताई ने कमरे में प्रवेश करने के लिए पूछा, कामिनी के हाँ कहते ही वो एक इंक पॉट और कुछ और सामान लिए अंदर चली आयीं।
उन्होंने कामिनी के सामने टेबल पर सब कुछ रखने के बाद उसका इंक पॉट खोल दिया।
कामिनी ने अपनी पेन को रीफिल किया और वापस लिखने बैठ गयी….
न उसने जमना ताई से कुछ कहा और न जमना ने कामिनी से…
दोनो खामोशी से अपने काम में लगी रहीं। कामिनी लिखती रही और जमना कमरे की बत्तियां बुझा कर कामिनी के लैम्प बस को जलता छोड़ कर शांति से बाहर निकल गयी….
*********
अपने ऑफिस में पहुंचने के बाद सुहास ने देखा ऑफ़िस लगभग खाली था। अपने क्यूबिकल से निकल कर उसने एक बार सारा के कमरे में झांका ,सारा बैठी थी। वो उसके पास पहुंच गया।
“सारा अगर तुम्हें दिक्कत न हो तो क्या मैं अपना एक पर्सनल काम यहाँ कर सकता हूँ?
सारा की सवालिया नज़रों पर सुहास ने पूरब से मुलाकात से लेकर सारी बातें बता दी..
“कर सकते हो पर तुम करने क्या वाले हो?”
सुहास ने उसके केबिन का दरवाज़ा बंद किया और अपने फ़ोन पर सुधाकर बिंदल का नम्बर डायल कर दिया।
उधर से कुछ दो चार रिंग जाने के बाद ही फ़ोन उठा लिया गया।
एक थकी हुई सी आवाज़ में हेलो सुन कर सुहास ने धीमे से कहा….- “कैसे हैं आप?”
“पूरब …?”
“हाँ !!! आपसे एक बार मिलना चाहता था!!”
“सच!! तुम सच में मुझसे मिलना चाहते हो। मुझे यकीन नही हो रहा… आ जाओ बेटा घर आ जाओ। ये घर तुम्हे बुला रहा है…मैं तुम्हें बुला रहा हूँ। तुम दोनो कें लिये ही सब किया और तुम दोनो ही मुझे अकेला छोड़ गए।”
“आपने सब कुछ अपने खुद के लिए किया,मैंने या मॉम ने कभी आपसे कोई चीज़ नही मांगी।”
“चलो मान लिया कि मैंने मेरे लालच में सब किया, पर आज के ज़माने में कौन लालची नही है, एक दूध बेचने वाले से लेकर सोना बेचने वाला तक मिलावट करते हैं… फिर?”
” ये सब कह कर आप अपने गुनाह कम नही कर सकते… दूध बेचने और खून बेचने में अंतर है। मैं एक आखिरी बार आपसे मिलना चाहता हूं फिर मैं अमेरिका चला जाऊंगा। आ सकें तो आज शाम मैं जो एड्रेस भेजूंगा उस पर आ जाइयेगा।”
” कहाँ का एड्रेस है ये?”
“मेरे ऑफिस का?”
और सुहास ने फ़ोन रख दिया… सारा आश्चर्य से उसे देखती रही….
” ये डॉक्टर अपने बेटे की आवाज़ नही पहचानता क्या? और नम्बर?”
” दोनो पहचानता है। इसलिए मैंने जब पूरब से बात की थी तब अपने फ़ोन पर वॉइस रिकॉर्डिंग ऑन रखी थी। बाद में बिंदल को फ़ोन करते हुए मैंने अपना वॉइस मॉड्यूलेशन एप ऑन कर रखा था, और उस में पूरब के आवाज़ का फिल्टर ऑन किया हुआ था। तो मेरी कही सारी बात पूरब की ही आवाज़ में वहाँ पहुंच रही थी। और नम्बर का तो ये है कि आपको एक हैकर से ये सवाल पूछना ही नही चाहिए कि मेरा नम्बर उसने पहचाना क्यों नही?…
… मेरे नम्बर को वीपीएन की सहायता से बदल लिया और जिसके कारण उन्हें पूरब का नम्बर शो होने लगा…..
सारा के चेहरे पर मुस्कान खेल गयी…
” तो क्या सोचा है तुमने? “
सुहास ने रघु से हुई मुलाकात से लेकर अपने प्लान के बारे में भी सब कुछ सारा को बता दिया…
“रघु तो चाहता था कि मैं उस डॉक्टर को कानून के हवाले कर दूं, लेकिन ये इतना आसान नही है। उसके खिलाफ मेरे पास कोई सबूत नही हैं। इसलिए मैंने बहुत सोचा और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि मैं बिंदल को पूरब के ऑफ़िस तक किसी तरह ले आता हूँ… हो सकता है उसे देख रघु और वहाँ मारे गए बाकी मरीज़ भी सामने चले आये…फिर देखा जाएगा कि वो लोग उसके साथ क्या करतें हैं?”
“हम्म!! सही है।”
“पर सारा इस प्लान में एक प्रॉब्लम आ सकती है…
” क्या?”
” मैंने सोच रखा है कि बिंदल को देखते ही रघु और बाकियों की आत्मा तड़प उठेगी, और वो लोग बदला लेने उसके सामने आ जाएंगे, लेकिन अगर वो लोग नही आये तो न अस्पताल आएगा और न रघु। और तब वहां उसे रेनबो का ऑफ़िस ही नज़र आएगा… ऐसा हुआ तो मेरा प्लान फेल….
” नही होगा…. डोंट वरी!!”
सुहास मुस्कुरा कर रात गहराने का इंतेज़ार करता रहा….
ऑफ़िस बंद होने के समय पर वो रेनबो के ऑफ़िस वापस पहुंच गया। रेनबो के ऑफिस बाहर केवल एक पियोन के अलावा कोई नही था। सुहास उसे देख कर वहीं बाहर के कॉरिडोर में टहलता खड़ा रह गया। कुछ देर बाद ही लिफ्ट उसके ठीक सामने आकर रुक गयी।
लिफ्ट के खुलते ही एक अधेड़ सा थोड़ा झुका हुआ आदमी बाहर निकाला। उसके चेहरे पर की त्वचा कही कहीं पर झुलसी हुई सी लग रही थी। धीमे कदमो से वो सुहास की तरफ बढ़ने लगा…
सुहास उसे देख कर उस तक आ गया…
” डॉ सुधाकर बिंदल?”
उस आदमी ने धीमे से हाँ में सिर हिलाया..
” आइये इधर मेरे साथ। मैं पूरब का दोस्त हूँ।
वो पियोन को गर्दन से इशारा कर उसे अपने साथ ऑफिस के अंदर ले जाने आगे बढ़ गया। पियोन दो तीन बार उसे देख चुका था इसलिये बिना किसी आपत्ति के उसने उन्हें जाने दिया, और खुद आकर ऑफ़िस का मुख्य द्वार खोल दिया।
उस द्वार के बाद एक हल्की रोशनी वाला गलियारा था। वो पार करते हुए सुहास का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था कि पता नही अंदर क्या होगा। वो सिर्फ और सिर्फ अपने अति आत्मविश्वास में सुधाकर को वहाँ ले तो आया था, पर कहीं अंदर आत्माएं उसके स्वागत के लिए नही आयीं तो फिर क्या करेगा?
धड़कते दिल से उसने गलियारे के पार उस दरवाज़े को खोल दिया….
क्रमशः
aparna…..
