The bestseller -21

” शक “
शहर पहुंचते ही मुझे घर जाने पर सब कुछ सामान्य ही लगा। मुझे समझ में नही आया कि मेरी बेटी इतना परेशान क्यों थी।
मैंने उससे जानना चाहा लेकिन वो कोई जवाब नही दे सकी। शायद मुझसे कहने में हिचक रही थी।
फिर उसी शाम जब मैं हॉल में बैठा चाय पी रहा था तब मेरी बेटी भी वहीं आ बैठी।
उसने मुझे मेरी कुर्सी के सामने रखे वास की तरफ इशारा किया।
” पापा एक बार उस वास को ध्यान से देखिये।”
वो वास असल में बहुत सारे प्रिज़्म से बना था… ये सारे प्रिज़्म इतनी जटिलता से जोड़े गए थे कि जब तक ध्यान से न देखा जाए उसमें देखने वाले को कुछ समझ नही आता था। इसके अलावा वो प्रिज़्म अलग अलग रंगों से रंगा भी गया था। उसकी बनावट ऐसी थी कि कुछ देर पहले बनी परछाइयां भी उसमें सात घंटों तक अंदर की परतों में नज़र आतीं थी। साहब ये अजूबा वास भी मेरी पत्नी नूपुर ही लेकर आई थी।
मैं उसकी बात समझ नही पाया और वास को देखने लगा। पहले पहल तो समझ ही नही आया लेकिन थोड़ा ध्यान से देखने पर समझ में सब आ गया।
उस वास में वो दोनो एक साथ नज़र आ रहे थे। मेरा छोटा भाई और नूपुर!!!
नूपुर शायद उसके लिए ऊपर चाय लेकर गयी थी, और दोनो में शायद कोई बात हुई होगी जिसमें उसे मनाने के लिए नूपुर ने उसे गलबहियां डाल रखी थी।
वो देखते ही मेरा खून खौलने लगा… मैं अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया कि तभी मेरी बेटी उस वास के सामने आ गयी।
उसने मुझे देखा और मुझे शांत रहने का इशारा किया लेकिन मैं अपना आपा खो चुका था। मैं तुरंत वहाँ से बाहर निकल गया।
मैं इतना परेशान था कि घर वापस लौटने का जी नही किया। अब मुझे समझ आया था कि मेरी बेटी वहाँ क्यों नही रहना चाहती थी।
मैंने उस रात खुद को शराब के नशे में घुला दिया।
अब समझ में आ रहा था कि जब कुछ महीनों पहले ही हम सब दीवाली पर एक साथ थे, तब भी मेरी बेटी चुपचुप सी और गुमसुम क्यों थी? शायद उसे अपनी मां की सच्चाई मालूम हो चुकी थी, लेकिन वह उस समय अपने अंतर्द्वंद से जूझ रही थी… और इसलिए उसने उस वक्त मुझे कुछ भी बताना सही नहीं समझा था। लेकिन अब शायद बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी, और इसीलिए शायद वह वहां से वापस मेरे पास गांव आ जाना चाहती थी।
मुझे उस वक्त उस का साथ देना चाहिए था। लेकिन मैं अपने गुस्से में इतना पागल हो गया था कि मैं वापस चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे गांव लौट के आ गया। मैंने पलट कर घर वालों में से किसी को ना तो कोई फोन किया और ना उनसे कोई बात की ।
रात नूपुर का फ़ोन आया भी तो मेरा उससे बात करने का जी नही किया और मैंने फ़ोन नही उठाया।
अगले दिन मेरी बेटी का ही मेरे पास फोन आया कि क्या मैं गांव वापस लौट चुका हूं? मैंने कहा “हां” तब वो एक बार फिर रोने लगी, फिर कुछ देर बाद उसने खुद को संभाल लिया और बस मुझसे यही कहा कि आप अपना ध्यान रखिएगा। मुझे आपकी जरूरत है पापा!!
काश मैं उसकी बात समझ कर उसके पास चला जाता या ,उसे अपने साथ ले आता। पर मैंने इन दोनों में से कुछ भी नहीं किया। मुझे मेरे भाई से बात करनी चाहिए थी, या फिर नूपुर से।
लेकिन मैं उस वक्त यह भी नहीं कर सका और यही मुझसे सबसे बड़ी गलती हुई।
2 दिन बाद शाम के समय मेरी बेटी का मुझे फोन आया, वह बहुत घबराई हुई लग रही थी। उसने मुझसे कहा जैसे भी हो मैं तुरंत उसके पास पहुंच जाऊं। मुझे समझ में नहीं आया कि, अचानक ऐसा क्या हुआ जो वह बार-बार मुझे बुला रही है। पर मैं यह तो जान गया था कि कोई बड़ी अनहोनी हुई है। मैं तुरंत वहां से शहर के लिए निकल गया। लगभग घंटे भर बाद मैं अपने घर पर मौजूद था। मेरे घर के सभी लोग किसी शादी में शामिल होने पास के ही कस्बे में गए हुए थे। शादी किसी रिसॉर्ट में थी, और इसलिए वह सब लोग वहीं रुकने वाले थे और अगले दिन शाम तक लौटने वाले थे।
उन सभी को घर से निकले हुए बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। घर पर सिर्फ मेरी बेटी रुकी थी और साथ ही रुका था मेरे छोटे वाले भाई का बेटा गोलू और बेटी गोली । दोनों छोटे बच्चों के इम्तिहान चल रहे थे इसलिए उसकी मां ने मेरी बेटी अनन्या को पढ़ाने का जिम्मा देकर उन दोनों बच्चों को मेरी बेटी के भरोसे छोड़ दिया था।
घर से सब के निकलने के थोड़ी देर बाद गोलू पड़ोस में खेलने चला गया और गोली अनन्या के पास रह गयी।
उसी वक्त अनन्या को उसकी माँ का फ़ोन आया और वो अनन्या से हाल चाल पूछने की जगह गोली की बात पूछने लगीं। गोली से बात करने के बाद नूपुर ने फोन रख दिया। अनन्या पहले ही सुलगी बैठी थी। वैसे भी उसे अपनी मां का गोलू और गोली पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटाना बर्दाश्त नहीं होता था। उस वक्त अनन्या मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी कर रही थी और उसका एग्जाम हो चुका था। वह हाल-फिलहाल ही अपनी पढ़ाई से फ्री हुई थी और इसीलिए उसके दिमाग में दुनिया की सारी उल जलूल बातें चलती रहती थी। उसने शायद अपनी मां को अपने चाचा के साथ एक दो बार गलत अवस्था में देख भी लिया था और इसीलिए वह कुछ ज्यादा ही उखड़ी हुई सी रहने लगी थी।
वह अपनी नाराजगी में गुम टीवी पर कुछ देख रही थी , कि गोली ने उठाकर चैनल बदल कर कोई कार्टून चैनल लगा दिया। नाराजगी में उसे घूर कर अनन्या ने वापस रिमोट छीन लिया। कुछ देर तक दोनों की यह छीना झपटी चलती रही। अनन्या को तो इस सब में गुस्सा आ रहा था, लेकिन गोली को बहुत मजा आ रहा था।
अबकी बार अनन्या ने अपना कार्यक्रम लगाकर रिमोट को अपने पास छुपा लिया। गोली जोर-जोर से हल्ला करते हुए अनन्या के कानों में जाकर चिल्लाने लगी। कानों में लगातार तेज़ आवाज सुनते सुनते अनन्या का दिमाग भड़कने लगा और उसने खींचकर गोली को पकड़ा और जोर से धक्का दे दिया।
गोली घूम कर किनारे रखी टेबल से टकराती हुई जमीन पर गिर गई और टेबल की किनारी सिर पर लगने से उसका सिर फट गया। खून की धार बहने लगी और इसके साथ ही एक उल्टी करके गोली वहीं बेहोश हो गई। अनन्या को अचानक कुछ समझ नहीं आया और उसने तुरंत मुझे फोन कर दिया। मेरे घर पहुंचते तक में उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? कुछ देर तक अपना सर पकड़े बैठी हुई अनन्या ने उठकर सारे दरवाजे खिड़कियों को बंद किया। और फिर गोली के पास फर्श पर फैले खून और उल्टी के दागों को साफ कर दिया। उसने फर्स्ट एड किट निकालकर गोली के घाव को साफ किया और पट्टी बांधने की कोशिश करने लगी। लेकिन खून इतना ज्यादा बह रहा था कि रुई भीगती चली जा रही थी। अनन्या बहुत परेशान थी वह लगातार हो रही थी कि उसी वक्त मैं पहुंच गया।
मेरे वहां पहुंचते ही अनन्या मेरे सीने से लग गई…-” पापा मैंने जानबूझकर कुछ नहीं किया। मैंने गोली को जानबूझकर नहीं मारा। वह मुझे बहुत परेशान कर रही थी पापा!! वैसे भी मैं बहुत परेशान थी यहां और उस पर गोली की शरारते!!
मुझसे सहन नहीं हुआ मैंने बस उसे हल्के हाथों से धक्का दिया था और वह इतनी जोर से गिर पड़ी कि उसका सिर फट गया।
पापा मैं आप ही का रास्ता देख रही थी ।चलिए हमें गोली को लेकर अस्पताल जाना पड़ेगा।”
मैंने तुरंत अनन्या से बाकी लोगों के बारे में पूछा तो मुझे पता चला कि बाकी लोग रिसोर्ट गए हुए हैं… जो कल सुबह तक लौटेंगे। और गोलू पड़ोस में खेलने गया हुआ है। मैंने तुरंत गोली को गोद में लिया और उसकी सांसे देखने लगा।
लेकिन गोली को छूते ही मेरे चेहरे का रंग सफेद पड़ गया मैंने अनन्या की तरफ देखा…
” अनन्या!!! गोली मर चुकी है।”
” नहीं!! नहीं पापा नहीं आप ठीक से देखिए, गोली ऐसे नहीं मर सकती। मैंने उसे नहीं मारा है। मैंने बस उसे अपने से दूर किया था, वह अपना बैलेंस बिगाड़ कर खुद गिर गई। मैंने कुछ नहीं किया पापा। प्लीज, प्लीज !! गोली को अस्पताल लेकर चलिए हो सकता है वह जिंदा बच जाए।”
“अब कुछ नहीं हो सकता आनू!! गोली वाकई मर चुकी है।”
अनन्या का रो रो कर बुरा हाल था….. वह बहुत परेशान थी। और उसकी परेशानी देखकर मैं परेशान हो रहा था।
” तो पापा क्या अब मुझे पुलिस पकड़ कर ले जाएगी।”
“नहीं तुम्हें पुलिस नहीं ले जाएगी। मैं इल्ज़ाम अपने सर पर ले लूंगा।”
“नहीं पापा प्लीज!!! आपको मेरी कसम है, मैं किसी भी तरीके से इस नरक से बाहर निकलना चाहती हूं। मैं अब और मम्मी के साथ नहीं रह सकती, और भाई भी। क्योंकि कुछ समय में उसे भी पता चल ही जाएगा कि यहां क्या चल रहा है? और तब हम दोनों को आपकी बहुत जरूरत होगी। मैं जेल जाती हूं तो भी भाई के पास आप तो रहोगे, लेकिन अगर आप जेल चले गए तो जैसे आज मैं साइकोपैथ हो गई हूं वैसे ही मेरा भाई भी हो जाएगा। पापा प्लीज हम दोनों को ही आपकी बहुत जरूरत है। आप हमें अपने से दूर नहीं कर सकते पापा!! प्लीज प्लीज कुछ कीजिए।”
मैंने अनन्या को गले से लगा लिया । हम दोनों ही रो रहे थे हमारे दिमाग काम नहीं कर रहे थे। और फिर उस वक्त मैंने एक फैसला ले लिया मैं जानता था कि मेरा फैसला गलत था। आखिर गोली मेरे छोटे भाई की बेटी थी, मेरी भी जिगर का टुकड़ा थी वह। मैं जब भी शहर जाता था वह सबसे पहले आकर मेरी गोद में चढ़ जाती थी, और मैं हर बार उसके लिए ढेर सारी चॉकलेट ले कर आया करता था। अपने आप को बहुत कठोर करके मैंने गोली के शरीर को एक बैग में डाला और उसे ले जाकर अपनी जीप में पीछे डाल लिया।
उसके बाद मैंने अनन्या से कहा कि वह तुरंत अपनी मां को फोन लगाएं, अनन्या आश्चर्य से मेरा चेहरा देखने लगी, कि मैं क्या कहना चाहता हूं ।मैंने उसे कहा , कि मैं जो कहूंगा , जैसे कहूंगा वही सब तुम अपनी मां से कहोगी और फिर मेरे से कहने पर आने के बाद अनन्या ने नूपुर को फोन लगा लिया…
” मम्मी मैं शाम को गोली को साथ में लेकर पार्क गई थी वह पता नहीं कहां खेलते खेलते चली गई है? मुझे समझ नहीं आ रहा, गोली कहीं नजर नहीं आ रही है।”
उधर से नूपुर ने क्या कहा मुझे नहीं पता लेकिन अनन्या अपनी इसी बात पर अड़ी रही। उसे सब कुछ समझाने के बाद कि वह मजबूती से अपनी बात पर अड़ी रहे, मैं बस जाकर तुरंत वापस आता हूं। वह मुझे छोड़ कर वहां अकेले नहीं रहना चाहती थी, लेकिन मेरी कसम देने पर अकेले वहां रुकने को तैयार हो गई। मैं तुरंत गोली की बॉडी लेकर वहां से निकल गया। मेरे गांव के रास्ते पर एक नहर पड़ती है, उस नहर मैं मैंने जाकर गोली की बॉडी को फेंक दिया। मैं जानता था कि यह नहर आगे चल कर दो और राज्यों को भी पानी देने का काम करती है ।इसलिए मुझे पता था कि बिना किसी रूकावट के गोली की बॉडी किसी दूसरे राज्य में पहुंच जाएगी और अगर और दूसरे राज्य की पुलिस को बॉडी मिलती भी है तो भी सरकारी काम इतना ढीला होता है कि गोली कहां की रहने वाली है? कौन है? यह जानने में ही उन्हें बहुत समय लग जाएगा।
मैं वहां से तुरंत अनन्या के पास वापस लौट गया। रास्ते भर मैं रोता रहा गोली को याद कर कर के भी और अनन्या की दिमागी कमजोरी सोच कर भी।
नूपुर और सुदीप पर मेरी नाराजगी बहुत ज्यादा थी, लेकिन अनन्या की हालत देखकर उस गुस्से की आग में और घी पड़ गया मैं बहुत गुस्से में घर पहुंचा , लेकिन साथ ही मैं सतर्क भी था। क्योंकि अगर घर के बाकी सदस्य पहुंच जाते, तो वहां मुझे यही दिखाना था कि अनन्या ने मुझे भी फोन करके गोली के गायब हो जाने की बात कही है। लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी कि मेरे पहुंचने के पहले परिवार का और कोई सदस्य नहीं पहुंचा था। मैंने पहुंचने के बाद वह जगह जहां गोली गिरी थी उसे एक बार फिर साफ कर दिया। अनन्या से कहा कि तुम थोड़ी देर पार्क में बैठकर और किसी भी आजू बाजू वाली आंटी से कुछ देर कुछ भी बातचीत करके वापस घर आओ। अनन्या ने वैसा ही किया।
मैं जब गोली को लेकर निकला था तब भी मैंने अनन्या से यही काम करने के लिए कहा था। वह उसी वक्त पार्क में जाकर कुछ आंटी लोगों से मिलकर वापस आ गयी थी। और अब फिर एक बार जाकर वह पार्क में गोली को ढूंढने की कोशिश का दिखावा करके कुछ लोगों से बातचीत करके वापस आ गई।
हम दोनों ही उस वक्त एक दूसरे का सहारा बने हुए थे। मैं अनन्या को लगातार ढाँढस बन्धा रहा था। और उसे यही समझा रहा था की वह कोई गड़बड़ ना करें। हम दोनों वैसे ही बैठे थे कि घर के बाकी सदस्य दौड़ते भागते उस शादी को अधूरा ही छोड़कर घर चले आए आते ही मेरे छोटे भाई सुदीप और उसकी पत्नी काम्या ने अनन्या को झकझोर दिया..
” कहाँ है गोली? कहाँ चली गयी वो?”
अनन्या खुद बहुत जोर जोर से रोने लगी। उसके दिमाग पर इतना ज्यादा दबाव था कि रोते-रोते वह बेहोश हो गई। घर में सभी लोग घबरा गए। सब गोली को इधर उधर ढूंढ रहे थे और मैं अनन्या को लेकर अस्पताल चला गया। कुछ देर में अनन्या को कुछ ठीक लगा तो उसने आंखें खोली और फिर घर भर की सवालिया नजरें उसी पर उठ गई।
सुदीप और उससे बड़ा वाला भाई प्रदीप दोनों आस-पड़ोस के सभी घरों में लोगों से पूछताछ करने लगे। नूपुर भी काम्या को साथ लेकर पार्क चली गई। घर के हर एक सदस्य जिनमें मैं भी शामिल था लोगों से पूछताछ कर रहे थे।
क्योंकि अनन्या मेरे कहे अनुसार उन लोगों को फोन करने के बाद पार्क में गई थी, इसलिए लोगों से पूछताछ करने पर सभी लोगों ने घर के सदस्यों को यही बताया कि उन लोगों ने अनन्या और गोली को पार्क में देखा था।
हालांकि उनमें से किसी ने भी गोली को पार्क में नहीं देखा था, लेकिन उन सब ने अनन्या की बात पर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया था, और उन्हें लगा कि हो सकता है गोली भी यहां खेल रही हो। और सभी ने घर के सदस्यों को यही बताया कि गोली खेल रही थी और अनन्या उसके साथ बैठी हुई थी। कुछ समय के लिए अनन्या शायद पानी पीने अंदर गई, और उसके वापस आने तक में गोली गायब हो गई।
यह वही कहानी थी जो अनन्या जब दोबारा पार्क में गई, तब उसने लोगों से मिलकर उन्हें सुनाई थी वही कहानी पूरी की पूरी घर के सदस्यों को भी सुनने को मिल गई। सबको यही लगा कि पार्क से गोली गायब हो गई…..
…” फिर क्या हुआ?”
शेखऱ के सवाल पर कुलदीप ने एक बार फिर पानी का गिलास उठा लिया…
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कामिनी अपनी टेबल पर बैठी अपनी कलम को बहुत ध्यान से देख रही थी कि तभी जमना ताई उसके लिए चाय लिए वहां चली आई…
” क्या हुआ मेम साहब कुछ परेशान है आप?”
” जमना ताई मुझे मेरी इस कहानी का अंत पसंद नहीं आ रहा मुझे इसे बदलना होगा? “
” लेकिन आपने तो पब्लिशर को कल बुलाया है ना?”
” कोई बात नहीं उसे फोन करके मैं मना कर दूंगी या फिर कोशिश करूंगी कि आज रात तक में एक दूसरा अंत तैयार कर सकूं….
“क्या आपको आज मेरी ज़रूरत लगेगी?”
“नही!!! आज आपकी ज़रूरत नही है। बस आप एक बार जाने के पहले मेरा इंक पॉट चेक कर लीजियेगा। इंक खत्म होने से पहले भर दीजिएगा।”
“जी!! मैं देख लेती हूं। और कुछ चाहिए आपको?”
ना में सिर हिला कर कामिनी ने अपनी डायरी खोली और लिखने बैठ गयी….
….
क्रमशः
aparna…
