Bestseller-20

The Bestseller -20

                     
                            “तस्वीर”

        शीना से सुरेखा और अनिल का इतना बड़ा सच सुनने के बाद नंदिनी के दिमाग में अब तक यही सब घूम रहा था वह अपने कमरे में आ चुकी थी लेकिन अपना दिल दिमाग सब कुछ सुरेखा के घर पर छोड़ आई थी। अब उसे समझ में आ रहा था कि क्यों सुरेखा अनिल से हमेशा कटी कटी रहती थी? तो क्या जैसा सुरेखा सोचा करती थी वैसा ही हुआ था? और अनिल ने ही सिया को अपने रास्ते से हटाया था। लेकिन यह बात पता नहीं क्यों उसका दिल मानने को तैयार नहीं हो रहा था। क्योंकि उसने अनिल में हमेशा एक अच्छा पिता देखा था। अगर शीना आज नहीं बताती तो उसे कभी पता ही नहीं चलता कि अनिल सिया और जिया का असली पिता नहीं था।

     अपने दिमाग से परेशान नंदिनी ने सोचा कि आज शाम को शेखर के साथ बाहर कहीं डिनर कर ले थोड़ा मूड चेंज हो जाएगा। और उसने शेखर को फोन लगा दिया। लेकिन शेखर का फोन लगातार व्यस्त आ रहा था। हर 10 मिनट के अंतराल पर फोन लगाने के बावजूद शेखर का फोन जब लगातार व्यस्त आया तो नंदिनी परेशान हो उठी।
     लगभग घंटे भर बाद शेखऱ को फोन लगाने जा रही थी कि शेखर का ही फोन आ गया।

” बोलो नंदिनी कोई जरूरी काम था?

उसे हमेशा प्यार से नंदू बुलाने वाले शेखर को अचानक हुआ क्या? जो उसे उसके पूरे नाम से बुला रहा था। नंदिनी के लिए यह बहुत बड़ा शॉक था…-” शेखर कोई बात हो गई है क्या? तुम इतना सीरियस क्यों साउंड कर रहे हो?”

   “अरे नहीं यार !!! ऐसा कुछ नहीं है, बस कल से एक केस में उलझा हुआ था… अब लगभग उसकी कड़ियां सुलझने लगी है। बस उसी केस के कारण थोड़ा परेशान हूं।  बाकी ऐसी कोई उलझन वाली बात नहीं है।”

“कौन सा केस ? रायसागर वाला या इंद्रपुरी वाला?”

“इंद्रपुरी वाला केस…. ऑलमोस्ट सॉल्व हो चुका है। मैं इंद्रपुरी जा रहा हूं ।फिलहाल एक आखरी बार उस घर की तलाशी लेना है। और समझो आज ही केस पूरी तरह से सॉल्व हो जाएगा।”

“एंगल क्या है…. कुछ तो बताओ?”

” अभी बस छोटी छोटी कड़ियां जुड़ीं हैं। एक बार पूरी जंजीर तैयार हो जाने दो फिर बताता हूं।”

“ओके!! तो क्या मैं भी आ जाऊं इंद्रपुरी? तुमसे मिलने का भी मन कर रहा था, और मेरे पास भी एक खबर है तुम्हें बताने के लिए?”

“ओके!! आ जाओ मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। फिर यहाँ से साथ ही चलते हैं।”

कुछ देर में नंदिनी तैयार होकर शेखर के थाने पहुंच चुकी थी….. और वहां से शेखर नंदिनी को साथ लिए इंद्रपुरी पहुंच गया।
     एक दिन पहले ही शेखर ने कुलदीप को गांव चले जाने की इजाजत दी थी, और उसे पता था कि वह गांव जा चुका है। उसे यह भी पता था कि घर का सारा निपटारा करने के बाद उसने फिलहाल एक चाबी पड़ोस में दे रखी है, शेखर ने पड़ोस से चाबी ली और सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चला गया।

  “अब किस की तलाशी लेनी है शेखर ? तुमने तो उन दोनों भाइयों का सामान और वह उटपटांग वास और कुछ कुछ मंगवाया था ना थाने में?  तुम कह रहे थे जांच के लिए मंगवाया है? तो उस सब का क्या हुआ?”

“उसी सब की जांच से और कुलदीप की बेटी से बात करने के बाद कुछ नए खुलासे हुए हैं।”

शेखर के चेहरे पर बहुत ही ज्यादा गंभीरता छाई हुई थी। और इसीलिए नंदिनी की भी कुछ ज्यादा कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। शेखर सीधा उन भाइयों के बेडरूम में पहुंच गया। अलमारियों की तलाशी लेने के साथ ही उसने गद्दों को भी अलट पलट करना शुरू किया । तकिए के कवर ,सोफे के कवर सब कुछ इधर से उधर करने के बाद आखिरकार उसे एक छोटी सी फोटो एल्बम मिल गई।
   
      उस एल्बम में कुछ पुरानी तस्वीरें थी।

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शायद उस घर के भाइयों के बचपन की तस्वीरें….. लेकिन कुछ एक तस्वीरों के बाद अंत में एक तस्वीर थी, जो ज्यादा पुरानी नही लग रही थी। जिसमें उनका पूरा परिवार साथ खड़ा मुस्कुरा रहा था। सबसे सामने बीच में शायद घर की बुजुर्ग महिला यानी कुलदीप की मां बैठी थी। उनकी एक तरफ दो बहुएं थी और दूसरी तरफ बड़ी बहू थी।  कुलदीप की मां के ठीक पीछे कुलदीप खड़ा था और उसके एक तरफ उसका एक भाई और दूसरी तरफ दूसरा भाई खड़ा था। सारे बच्चे सामने जमीन पर बैठे हुए थे। सारे ही लोग तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे….. लेकिन दो चेहरे ऐसे थे जो सिर्फ एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे ।
    शायद फोटो खींचने वाले ने कोई ऐसी बात कही थी कि जिस बात पर पूरे परिवार को एक साथ हंसी आई थी, और उस बात पर ही कुलदीप की पत्नी अपने ठीक पीछे खड़े अपने सबसे छोटे देवर को देख कर मुस्कुरा रही थी…
        
     बच्चों के हंसते खिलखिलाते चेहरों के बीच कुलदीप की बेटी शांत और गंभीर बनी हुई थी उसके चेहरे पर ना तो हंसी थी और न मासूमियत।
   तस्वीर को देखते ही शेखर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई और उसने एल्बम अपने साथ रख लिया।

” शेखर प्लीज!! कुछ तो बताओ , तुम इतना सस्पेंस क्रिएट कर देते हो, कि मेरी जान निकलने लगती है। सीरियसली मैन!! तुम ना नहीं सुधरोगे!

” गिरधारी दामाखेड़ा यहां से कितना दूर होगा?”

गिरधारी भी आश्चर्य से शेखर की तरफ देखने लगा।  आज पहली बार शेखर ने उसका सही नाम लिया था, इसका मतलब बात तो वाकई बहुत गंभीर थी। उसने थोड़ा दिमाग पर जोर दिया और जवाब दे दिया….

” हद से हद 110 किलोमीटर के आसपास होगा साहब।”

” इसका मतलब है कि अगर रास्ता हाईवे का हुआ और अच्छा हुआ तो 2 से ढाई घंटा लगेगा और अगर खराब हुआ तो तीन 3:30 घंटा है ना।

” जी साहब!”

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” ऐसा करो दो कॉन्स्टेबल और ले लो, हथकड़ी ले लो। सभी अपनी गन सर्विस रिवॉल्वर ले लो। हम अभी के अभी दामाखेड़ा के लिए निकल रहे हैं।”,

” लेकिन साहब दामाखेड़ा क्यों?”

” इस कुल के दीपक से एक आखिरी मुलाकात करने।”

” अभी दो दिन पहले तो आपने निर्णय लिया था कि कुलदीप बेगुनाह है ! और आपने बेवजह ही उसकी पिटाई कर दी। वह तो बहुत बड़ा दानी है… उसने अपने बच्चों के लिए भी कुछ नहीं रखा और सब कुछ दान कर दिया और गांव चला गया।”

” यार पंसारी तुम सवाल बहुत करते हो बे। गाड़ी निकालो…. अब हम थोड़ा गाड़ी में बैठ कर अपनी नई थ्योरी बनाना चाहते हैं । और हाँ रास्ते में जहां कोई ढंग का ढाबा दिखे, गाड़ी रोक लेना । आज चाय नहीं पीने का मन है आज हम थोड़ी सी बीयर पी लेंगे। तो मोहतरमा दामाखेड़ा निकलते हुए हम आपको रास्ते में आपके घर छोड़ देते हैं। और वैसे संसारी तुमसे किसने कहा कि कुलदीप सस्पेक्ट है? “

” तो आप गिरफ्तार करने किसे जा रहे हैं?”

“साथ चल रहे हो न । पता चल जाएगा।”

” क्यों? मुझे साथ लेकर क्यों नहीं जा सकते?”

” ड्यूटी पर हूं मेरी जान!! लोकल साथ में घूमना अलग बात है, लेकिन मैं गांव कस्बे में जा रहा हूं तुम्हारा साथ चलना तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है। “

” ड्यूटी पर होकर बियर पी सकते हो ? है ना? पर गर्लफ्रेंड को लेकर साथ में जा नहीं सकते।

” वो क्या है कि चाय आजकल हमें पसंद नहीं कर रही है!!! इसलिए हमें देखकर ठंडी हो जाती है…. तो सोचा ठंडी बीयर पी लेते हैं …क्योंकि वह तो हमें देखकर गरम नहीं हो पाएगी।”

    “हो गया कबाड़!  बस आ गए ना अपने असली रंग में! शुरू कर दिया सब। अब चलो निकलो यहाँ से मुझे मेरे फ्लैट पर उतारो और तुम जाओ अपने दामाखेड़ा घूम कर आओ। क्योंकि जाने आने में तो छै सात घंटे लग ही जायेंगे।”

शेखर ने हां में सिर हिलाया और उसे साथ लेकर वहां से निकल गया।
    कुछ देर में शेखर की जिप्सी हाईवे पर दौड़ रही थी और लगभग 2:30 घंटे बाद वह कुलदीप के घर के बाहर खड़ा था। उसने दरवाजे पर दस्तक दी और कुछ पांच से दस मिनट बाद कुलदीप ही दरवाजा खोलने बाहर आ गया। कुलदीप के चेहरे पर शेखर को देखते ही हवाइयां उड़ने लगी….-” साहब आप यहां? आप यहां कैसे? मेरी कोई जरूरत थी तो मुझे बुला लिया होता?”

” नहीं आपने जो काम किया है उसके लिए हमारा आप तक आना ही जरूरी था।”

” जी मैं समझा नही। आप कहना क्या चाहतें हैं?”

” कोई बात नही!!!
         आप मासूम बहुत हैं न !! जल्दी से कोई बात आपको समझ नही आती। “
   अपनी बात कहते कहते शेखऱ अपनी टीम के साथ अंदर हॉल में जाकर पसर गया। गांव के हिसाब से कुलदीप का घर खासा बड़ा था। बल्कि उसे हवेली कहा जाए तो ज्यादा सही होता।
  अंदर की साज सजावट भी उम्दा नज़र आ रही थी। मार्बल का फर्श, रेशमी पर्दे और उस पर शीशम की लकड़ी का बना सारा फर्नीचर।
   हर एक चीज़ बड़े करीने से रखी थी।

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” घर सजाने के बड़ा शौक है आपको? “

” जी नही,  मुझे नही नूपुर को शौक था! मेरी पत्नी नूपुर!!”

” ओह्ह अच्छा !! लेकिन इंद्रपुरी वाला आपका घर तो काफी सामान्य साजसज्जा का ही था बस कुछ एक चीजों को छोड़ दिया जाए तो?”

” जी वहाँ नूपुर के साथ उसकी दो देवरानियाँ भी थीं। और संयुक्त परिवार में कोई एक बहु अपनी मनमर्जी तो नही चला सकती है ना सर?”

” हम्म !! तो जब अपनी मनमर्जी नही चला पाती , बच्चे भी पढ़ने बाहर जा ही चुके थे तो ऐसा क्या रह गया था?  जिसके लिये वो वहाँ रह रहीं थीं। उन्हें तो आ जाना चहिये था।”

“जी ….. आने ही वाली थी…”

“कि उसके पहले ही आपने उन्हें मार दिया?”

   कुलदीप का चेहरा म्लान हो गया, वो एकदम से हड़बड़ा गया..

” सर आप क्यों बार बार मुझ पर शक करके मुझे परेशान कर रहे हैं जबकि आप भी जानते हैं कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।”

” तो तुम बता दो कि किसने किया है?”

” साहब मैं सच कह रहा हूं, मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानता।”

” तो कौन जानता है फिर?  तुम्हारी बेटी?”

  अपनी बेटी का जिक्र आते ही कुलदीप के चेहरे पर घबराहट वाले भाव आ गए। उसने वहीं सामने रखा पानी का गिलास उठाया और एक घूंट में सारा पानी पीकर गिलास नीचे रख दिया…

” कुलदीप अब घबराने से कोई फायदा नहीं है। तुम्हारी बेटी से हमारी बात हुई थी, और उसने सारी सच्चाई हमें बता दी है।”

   कुलदीप ने अपने माथे पर अपना हाथ मारा और अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा छुपा कर सुबकने  लगा।

    शेखर ने उसे कुछ देर रोने दिया उसके बाद वहीं रखे जग से उसी के गिलास में पानी भर कर पानी उसकी तरफ बढ़ा दिया…

” लो पानी पी लो और अब शुरू से सारी बातें बताते जाओ। “

   शेखर ने अपने जेब से एक छोटा सा वॉइस रिकॉर्डर निकाला उसे कुलदीप के ठीक सामने टेबल पर रखकर सेट किया और  कुलदीप की तरफ देख कर उसे इशारे से ही अपनी बात शुरू करने के लिए कह दिया…

“साहब मेरा परिवार एक साथ खुश था। मेरे दोनो छोटे भाइयों की  शादी दो बहनों से हुई थी। वो सब साथ में खुश रहें इसलिये उन चारों को शहर में छोड़ माँ भी मेरे पास गांव ही रहा करती थी।
   फिर धीरे धीरे बच्चों के बड़े होने पर नूपुर उन्हें पढ़ाने के लिए शहर भेजने पर ज़ोर देने लगी… इसी बीच दुकान को लेकर भाइयों में कुछ झिकझिक हुई और कहासुनी इतनी बढ़ गयी कि सुलह कराने मुझे और नूपुर को शहर जाना पड़ा।
    सुलह समझौता करवा कर मैंने कुछ पैसे अपनी तरफ से लगा कर एक और दुकान खुलवा दी और इस तरह दोनों के लिए दो दुकानें हो गईं।
    हम लौटने वाले थे कि नूपुर से उसकी देवरानी ने साथ ही कुछ दिन रुक जाने की गुज़ारिश की। और नूपुर उसकी बात मान कर रुक गयी।
   माँ वैसे भी मेरे पास थी और मेरे घर पर खाना बनाने से लेकर हर काम के लिए नौकर थे तो कोई असुविधा नही होनी थी।
   नूपुर ने वहाँ रहते हुए उस घर को पूरी तरह सम्भाल लिया था। अब भी उसकी सबसे छोटी देवरानी काम्या ज़रा किचकिच किया करती पर ये दोनों एक साथ मिलकर सब कुछ झेल लेतीं।
     फिर एक रोज़ नूपुर मेरे सबसे छोटे भाई के साथ गांव आयीं और माँ और मुझ से इजाज़त लेकर बच्चो को पढ़ाने के लिए अपने साथ शहर ले गयी।
   मुझे क्या मालूम था साहब की इतने दिनों उसने शहर में क्या खिचड़ी पकाई थी।

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  साहब उसका मेरे छोटे भाई के साथ….

आगे कुलदीप कुछ नही कह पाया…

” ठीक है! हम समझ गए। आगे क्या हुआ?”

” साहब फिर बच्चों को लेकर वो अपने साथ चली गयी। मुझ से उसकी कोई नाराज़गी नही थी। मेरे साथ भी वो उतना ही प्यार करती थी फिर पता नही कैसे उसका छोटे के साथ… असल में वो है ही इतनी परफेक्ट की जो उसके साथ रहे वो उसके मोहपाश में बंध जाता है।
  मुझे इन सब बातों का पता बहुत बाद में चला।
मेरे बच्चों के जाने के कुछ महीनों बाद मेरी बेटी ने मुझे एक दिन फ़ोन किया और रोते रोते वापस लौटने की बात कहने लगी।
  मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कुछ सुनने समझने को तैयार ही नही थी।
   फिर माँ के कहने पर मैं उसे समझाने शहर चला गया।
   लेकिन वहाँ मैंने जो देखा…..

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क्रमशः

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aparna….

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