Bestseller-19

The Bestseller – 19


                             इत्तेफाक

       सुहास ने मन ही मन तय कर लिया कि उसे उस अस्पताल में जाकर ही सारी सच्चाई का पता चलेगा।
उसने एक बार फिर अपना चश्मा लगाया और उस कांच की खिड़की के पास आकर अपनी आंखें सामने वाली बिल्डिंग पर जमा दी। कुछ ही देर में वह उस खिड़की के परे अस्पताल को साफ-साफ देख पा रहा था। आज भी नर्सेज जंक्शन में नर्स अपना अपना काम कर रही थी। कुछ मरीज इधर से उधर चहलकदमी कर रहे थे। और अब वह उस अस्पताल के कॉरिडोर में  खड़ा था। अपने आप को मजबूत करते हुए वह धीमे-धीमे उसके गलियारे में आगे बढ़ने लगा। उसे ध्यान से देखने पर हर एक मरीज थोड़ा पीला सा नजर आ रहा था। उसकी समझ से परे था कि ऐसा क्यों था?  जाहिर है अस्पताल में ऐसे पीले और बीमार से ही मरीज तो नजर आएंगे… आखिर आगे बढ़ते हुए उसने हिम्मत करके उस आखिरी वाले कमरे को जहां से उस दिन वह लड़का भागता हुआ उसके सामने आया था, धीरे से खोल दिया।
    अंदर का नजारा उसके लिए बेहद चौंकाने वाला था। एक औरत मरीज के बिस्तर से लगी एक छोटी सी स्टूल पर बैठी सुबक रही थी। उसके साथ ही एक लड़का खड़ा था, जो उस औरत के कंधे पर हाथ रख उसे चुप करवाने की बेहिसाब कोशिश कर रहा था। सुहास ने अपने दिल को मजबूत करके उस पेशेंट बेड पर नजर डाली। वहां वही लड़का सो रहा था, जो उस दिन उस से मदद मांगने आया था। अपने आप को मजबूती से संभालते हुए सुहास उस लड़के के पास तक पहुंच गया। उसके बेड के ठीक सामने उस लड़के के पैरों की तरफ वह जाकर खड़ा था कि तभी उसके कानों में उस औरत की आवाज पड़ने लगी। वह रो रो कर बार-बार उस साथ खड़े लड़के से कह रही थी….

” जब अस्पताल में लेकर आए तब तो इतना बीमार नहीं था। यहां भर्ती होने के बाद तो इसकी हालत और खराब हो गई है। एक छोटा सा एपेंडिक्स था जिसके कारण इतना तेज पेट में दर्द उठा कि रातों-रात अस्पताल लेकर भागना पड़ा । और आज देखो अपेंडिक्स के ऑपरेशन को चार दिन हो चुके हैं, लेकिन अब भी यह ठीक से होश में नहीं आया। डॉक्टर भी कुछ नहीं कहते ना ही कोई रिपोर्ट हमें दे रहे हैं। हमें तो पता भी नहीं चल पा रहा कि हमारे बेटे का क्या इलाज चल रहा है।”

“, खुद को संभालो काकी!! अस्पताल आकर कोई ज्यादा बीमार कैसे पड़ सकता है भला ? रघु की तबीयत पहले ही खराब रही होगी आपको पता नहीं चला होगा।”

” हमें कैसे पता नहीं चलेगा?  अच्छा खासा था। तुम्हारे साथ ही तो हर जगह आता जाता था। कॉलेज से लेकर मटरगश्ती करने तक हर जगह तो तुम साथ रहते थे। तुम ही बताओ क्या कभी इससे पहले इसकी ऐसी हालत देखी थी?  वह तो अचानक अपेंडिक्स का दर्द उठा, इसे अस्पताल लेकर आए और आज चार दिन हो गया हमें इसे वापस नहीं लेकर जा पाए हैं… अब बताओ क्या करें?

” आप को ऐसा लग रहा है तो मैं डॉक्टर से बात कर देखता हूं।”

   सुहास अपनी नजरों के सामने यह सब देख पा रहा था,  कि उसी वक्त दरवाजा खोल कर एक जवान सा डॉक्टर भीतर चला आया। उसके पीछे दो सिस्टर भी थी। डॉक्टर ने आते ही मरीज का मुआयना करना शुरू किया। और मरीज की मां ने रो-रो कर डॉक्टर से भी वही बात कहनी शुरू कर दी, जो वह कुछ देर पहले अपने साथ खड़े लड़के से कह रही थी। डॉक्टर ने कुछ सुनी अनसुनी करते हुए मरीज की रिपोर्ट देखीं और कुछ दो चार दवाइयां लिखने के बाद बाहर निकलने लगा, कि उस मरीज की मां ने उस डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया….

” ऐसे कैसे?? आप हमें बिना कोई जवाब दिए चले जा रहे हैं ?पढ़े-लिखे ना सही, इतना तो हम भी जानते हैं कि अपेंडिक्स के ऑपरेशन में ऐसे चार चार दिन तक बच्चा बेहोश नहीं पड़ा रहता? डॉक्टर साहब प्लीज हमें बताइए कि बात क्या है? क्योंकि हम जानते हैं हमारा बेटा ऐसा तो पूरा स्वस्थ था, लेकिन बचपन में एक बार बच्चों के डॉक्टर ने हमसे कहा था कि, इसकी एक किडनी जरा कमजोर है ….और इसीलिए हमें इसका ध्यान रखने के लिए कहा था। अभी जब इसे आप के अस्पताल में भर्ती करवाया तब वहां पर जो डॉक्टर थे उन्हें भी हमने यह बात बताई थी। इसीलिए हम थोड़ा घबरा रहे हैं कि कोई किडनी वाला मामला तो नहीं है ना? आप सच बता दीजिए डॉक्टर साहब बच्चे की हालत कैसी है?”

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” आपका बेटा ठीक है घबराने की बात नहीं है कल तो होश आ जाएगा।”
   कहने को तो डॉक्टर ने यह कह दिया लेकिन उसके माथे पर छलक आई पसीने की बूंदों को वह छिपा नहीं सका…. जेब से अपना रुमाल निकाल कर माथा पोंछते हुए वह कमरे से तुरंत बाहर निकल गया।

उसके पीछे एक नर्स उसके साथ चली गई और दूसरी वहीं खड़ी मरीज को चढ़ रही सलाइन ड्रिप को सही करने लगी।

“बेटा तुम ही बता दो इसकी  कैसी हालत है? और क्यों इसे होश नहीं आया।”

“, देखिए मैडम यह सारी जानकारी आपको डॉक्टर साहब ही दे सकते हैं… हमें तो जो डॉक्टर बोल कर जाते हैं , हम बस वही करते हैं ।अगर उन्होंने कहा है तो इसे कल सुबह तक होश आ जाएगा। “

   सुहास को माजरा कुछ कुछ समझ में आने लगा था।
उसने अपनी उंगलियों से अपने दोनों आंखों को मला और आंखें खोली तो वही लड़का उसके सामने खड़ा था। एक पल को चौन्क कर सुहास जरा पीछे हट गया और वह लड़का सुहास से बात करने के लिए आगे बढ़ने लगा । सुहास ने अपना हाथ देकर उसे रोक दिया और फिर धीरे से कहना शुरू किया…

” तुम मुझे कुछ बताना चाहते हो?”
उस लड़के ने धीरे से “हां” में सिर हिला दिया… सुहास ने आगे कहना जारी रखा…

” मैं तुम्हारी बात सुनने के लिए ही यहां आया हूं। तुम मुझे बता सकते हो जो तुम कहना चाहते हो?”

उस लड़के ने बहुत कठिनाई से अपना मुंह खोला और धीरे-धीरे शब्दों को चबाते हुए बोलना शुरू किया…

” घर पर बस मैं  और माँ ही रहा करते थे। बाबूजी तो तीन साल पहले हमें छोड़ गए थे। मैं कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही पार्ट टाइम ट्यूशन पढ़ाया करता था। मां एक आंगनबाड़ी केंद्र में खाना पकाने का काम किया करती थी। बस ऐसा था कि हमारा गुजारा चल रहा था।  कि तभी एक रात मुझे पेट में बहुत जोर का दर्द हुआ। दर्द इतना तेज था कि, मुझसे सहन नहीं हो रहा था। दर्द के साथ ही मुझे उल्टी भी हो गई । मां बहुत घबरा गई, और वो पड़ोसियों की सहायता से मुझे लेकर अस्पताल की ओर भागी। हमारे घर के सबसे पास यही मिशनरी अस्पताल था मिशनरी अस्पताल वैसे तो अब बंद हो चुका था…. लेकिन उसी अस्पताल के एक डॉक्टर ने इस अस्पताल को चलाए रखा था। वह अभी फीस वगैरह कम ही लिया करते थे, इसीलिए हमें लगा यहां दिखाना ठीक रहेगा। मां ने मुझे तुरंत इमरजेंसी में वहां पर भर्ती कर दिया । डॉक्टर ने देखा और कहा कि ..-“कल सुबह ही इसको ऑपरेट करना पड़ेगा। “
        अगले दिन मुझे ऑपरेशन के लिए ले जाया गया डॉक्टर ने ऑपरेशन की फीस मां को बता दी।
  डॉक्टर ने कहा अपेंडिक्स के ऑपरेशन के 10000 रुपये लगेंगे ।  माँ अपने आंगनबाड़ी केंद्र से अपनी सुपरवाइजर से कुछ पैसे उधार मांग ले आयीं और उन्होंने अस्पताल में जमा कर दिया और इस प्रकार मेरा ऑपरेशन हो गया। डॉक्टर ने हमसे कहा था कि ऑपरेशन होने के 12 से 15 घंटे में मुझे होश आ जाएगा। लेकिन वह पूरा दिन बीत गया और मुझे होश नहीं आया। अगला दिन भी बीत गया और ऐसे एक-एक करके पूरे 4 दिन बीत गए। मुझे होश नहीं आया।
उस दिन जब डॉक्टर अपने राउंड पर मुझे देखने आए तब माँ ने उन्हें बातों ही बातों में  बताया कि बचपन में मेरी एक किडनी में इंफेक्शन हुआ था और जिसके कारण वह किडनी जरा कमजोर काम किया करती थी। और तब वो डॉक्टर एकदम से घबरा गया क्योंकि उसने मेरी दूसरी किडनी पहले ही निकाल ली थी।
    इस डॉक्टर सुधाकर बिंदल का काम ही यही था। यह तुरंत ही अपनी पढ़ाई पूरी करके आया था। पैसे और सफलता पाने के लिए यह इस कदर जुनूनियत से भरा था कि वह सही गलत के बीच अंतर करना भूल गया था। सारी दुनिया डॉक्टरों को भगवान का दर्जा देती है लेकिन यह शैतान था। इसके लिए लोगों की जिंदगी कोई मायने नहीं रखती थी। जब मिशनरी अस्पताल को निगम का नोटिस मिला तब उसने मिशनरी वालों से खूब गुजारिश करके उस अस्पताल को कुछ दिन के लिए अपने आप को देने की बात कही बदले में उसने कहा कि मिशनरी ट्रस्ट को वह हर महीने एक अच्छा चंदा दिया करेगा। इसके साथ ही उसने निगम वालों को भी मोटे पैसे खिलाएं। और अपना अस्पताल वही चलने दिया। असल में आसपास के इलाकों में उस मिशनरी अस्पताल का बहुत नाम था क्योंकि वहां पर बहुत कम खर्च में काफी अच्छा इलाज हुआ करता था। लोग अभी भी इस बात से अनजान थे कि अब मिशनरी वाले उस अस्पताल को छोड़ कर जा चुके हैं। इसलिए लोग अब भी वहां जाया करते थे। और इस बात का डॉक्टर सुधाकर बिंदल ने खूब फायदा उठाया। उसने अपनी फीस तो कम ही रखी….
     लेकिन ज्यादातर वहाँ आए मरीजों को वह कोई ना कोई बड़ी व्याधि बताकर ऑपरेशन के लिए सजेस्ट किया करता था। ऑपरेशन भी सिर्फ दस या ग्यारह हजार के मामूली खर्चे पर कर दिया करता था और इस ऑपरेशन में वह ज्यादातर लोगों की किडनी निकाल लिया करता था।
   उसके पास ज्यादातर गरीब मरीज ही आया करते थे। ऐसे मरीज जो या तो मजदूरी किया करते थे या झुग्गी झोपड़ियों में रहा करते थे। उन्हें किसी भी बड़ी बीमारी का नाम बता कर डराना बहुत आसान होता था ।  ऑपरेशन का खर्च वह कहीं से उधारी करके या जैसे तैसे वहन कर लिया करते थे, डॉक्टर उनसे फीस भी लेता था और बदले में उनकी किडनी निकाल कर बड़े बड़े अमीर अस्पतालों के रईसजादों को बेच दिया करता था । इसकी बेची हुई किडनियों की कीमत 50000 से लेकर 400000 के बीच होती थी जैसे इसके कस्टमर होते थे वैसे ही यह अपना मूल्य तय करता था।
  इसके ऑपरेट किए मरीज एक किडनी के साथ सामान्य जीवन जीने लगते थे। वैसे भी मजदूर वर्ग ऐसा नहीं होता कि वह अपने स्वास्थ्य के लिए बहुत फिक्रमंद हो। एक किडनी के साथ होने वाली थोड़ी बहुत परेशानियों को यह डॉक्टर सामान्य परेशानियां बता कर शुरू से ही प्रिकॉशन बता दिया करता था।

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यह भोले मरीज भी अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में वापस लौट जाया करते थे। इन्हें कौन सा जाकर साल में एक बार अपना रूटीन चेकअप कराना होता था? या सोनोग्राफी करानी होती थी? कि उन्हें यह पता चल सके कि उनकी एक किडनी गायब हो चुकी है। कमर पर बने निशान को भी डॉक्टर कभी अपेंडिक्स का ऑपरेशन कभी पेट में भरे पानी को निकालने का ऑपरेशन आदि अलग-अलग बहानों से ढक लिया करता था।
    लगभग पांच साल इसने जमकर कमाई की । यह तो 1 महीने में ही 8 से 10 किडनी बेच लिया करता था। वह भी बहुत ऊंचे दामों पर ।
    5 साल में तो इसने महल बनाने लायक की कमाई कर ली थी । इसकी शादी हो चुकी थी और एक बेटा भी था। इसी सब के बाद एक समय की बात है जब मेरे साथ उसने ऐसा किया और इसे पता चला कि मेरी एक किडनी पहले से ही कमजोर है और इसने दूसरी किडनी निकाल ली है तब उसका माथा ठनका। क्योंकि लोग एक सामान्य किडनी के साथ तो आराम से रह सकते हैं लेकिन एक बीमार किडनी के साथ जिंदगी गुजारना मुश्किल होता है। मेरी मां ने उसे पहले ही बताया था कि मेरे दाएं तरफ की किडनी कमजोर थी और उसने मेरी बाई किडनी निकाली थी कितना अजब इत्तेफाक था यह।
   उस रात वो डॉक्टर पहली बार बहुत परेशान था क्योंकि सिर्फ मेरा ही एक ऐसा केस नहीं हुआ था। बल्कि एक और ऐसा ही केस  था। जिसमें उसने एक 15-16 साल के लड़के के लीवर के टिशूज निकाले थे। किसी मरीज के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए। और वह बच्चा रिकवर नहीं कर पा रहा था। बच्चा वैसे अनाथ आश्रम से लाया गया था। और इसीलिए उस डॉक्टर ने बिना किसी डर के उसका ऑपरेशन कर दिया था। लेकिन उस अनाथ आश्रम की ट्रस्टी बहुत ही समझदार और सुलझी हुई महिला थी, वह सिर्फ नाम के लिए अनाथ आश्रम नहीं चला रही थी, बल्कि वहां के बच्चों से दिल से जुड़ी थी।
     उस बच्चे को भी 4 दिन हो चुके थे और होश नहीं आया था। शायद उसे भी बहुत ज्यादा कमजोरी थी। उन्होंने उसे डायरिया और डिहाइड्रेशन की शिकायत पर अस्पताल में भर्ती करवाया था, तो इस हिसाब से एक सामान्य सलाइन के साथ ही एंटीबायोटिक का कोर्स करने पर बच्चे को 2 दिन में ठीक हो जाना चाहिए था। इतनी सब सामान्य जानकारियां उन ट्रस्टी महोदया को थी और उन्होंने जब 4 दिन तक बच्चे को होश में आते नहीं देखा तब डॉक्टर से सवाल किया। लेकिन डॉक्टर कोई ढंग का जवाब नहीं दे पाया। उसी दिन शाम को जब नर्स उस बच्चे को स्पंज कर रही थी तब उन्होंने उसके पेट में स्टिचेस के निशान देख लिए। और उनका माथा ठनका वह तुरंत डॉक्टर के केबिन में गयीं और उनसे सवाल जवाब करने लग गई।
    डॉक्टर ने उस वक्त तो उन्हें जैसे तैसे समझा-बुझाकर वहाँ से बाहर भेज दिया। लेकिन उस रात वाकई वह बहुत घबरा गया। क्योंकि उस बच्चे के ट्रस्टी के साथ साथ मेरी मां भी डॉक्टर के पीछे पड़ी थी और ऐसे दो तीन केस नहीं थे उस रात उस अस्पताल में ऐसे 15 केसेस थे जो उस डॉक्टर ने अपने अति आत्मविश्वास में बिगाड़ दिए थे।
    लगभग 5 साल से किडनी और अन्य आंतरिक अंगों की हेराफेरी करते हुए डॉ सुधाकर बिंदल इतना आत्मविश्वास से भर गया था कि, अब वह ऑपरेशन के पहले होने वाली सामान्य खून की जांच करना भी जरूरी नहीं समझता था। और और उसका यही घमंड उसे ले डूबा।

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     कहा जाता है ना पाप का घड़ा भी एक दिन भर कर फूट जाता है सुधाकर बिंदल के साथ भी वही हुआ।
    उसे लगने लगा कि अगर वह ट्रस्टी मेरी मां से मिलेगी और फिर बाकी मरीजों से मिलेगी तो उसका भंडाफोड़ हो जाएगा और उसने उस रात एक बहुत बड़ी चाल चली।
   उसे पहले से ही मालूम था कि वह बिल्डिंग निगम ने सस्पेंड कर रखी थी यानी कि निगम की तरफ से उस बिल्डिंग को नोटिस भेजा जा चुका था कि उसे गिराना है । वह तो सुधाकर बिंदल के रिश्वत देने के कारण निगम ने कुछ सालों का एक्सटेंशन बढ़ा दिया था, हालांकि उस बिल्डिंग की हालत बहुत ही जर्जर थी और वह कभी भी गिर सकती थी। बस इसी बात का सुधाकर बिंदल ने फायदा उठा लिया।
      उस रात उसने अपने कुछ भरोसेमंद आदमियों से बेसमेंट में जाकर वहां पर बने स्तम्भो को गिराने का आदेश दे दिया। उसके आदमी बुलडोजर लेकर बेसमेंट के पीछे तरफ से इमारत पर चढ़ पड़े।
   इमारत तो पहले ही कमजोर थी एक धक्का लगते ही ढह गई और उन 15 मरीजों के साथ अस्पताल का कई सारा स्टाफ, उन मरीजों के परिजन और जाने कितने लोग उस इमारत के साथ कहानी बनकर वही दफन हो गए।
    डॉक्टर सुधाकर बिंदल के खिलाफ पुलिस कार्यवाही के लिए चार्ज शीट तैयार होने लगी लेकिन वह रातों-रात अपने परिवार को लेकर यहां से कहीं दूर भाग गया। कहां भागा यह मैं नहीं जान पाया शायद आत्माओं की भी सरहदें होती है। मैं इस अस्पताल की सरहद से बाहर कहीं नहीं जा पाता हूं। और इसीलिए तुम्हें सिर्फ तभी नजर आता हूं जब तुम इस अस्पताल में आते हो।”

  सुहास को अब उस आत्मा से यानी रघु से डर नहीं लग रहा था। फिर भी वह एक निश्चित दूरी बनाए खड़ा था । पूरी बात सुनने के बाद उसे समझ में आया कि रघु ने सबसे पहली बार में उसे सब कुछ अपनी आंखों से देखने को दिया था कि कैसे उसकी मां ने उस डॉक्टर को रोका और उससे बात की , और उसके बाद एक एक बात खुद सुना दी।
     शायद रघु यह चाहता था कि वह उस डॉक्टर का चेहरा भी देख ले जो सुहास ने देख लिया था और अब सुहास को यह जानना था कि फिलहाल रघु क्या चाहता था?

” तुम यही सोच रहे हो ना कि, आखिर मैं ऐसा क्या चाहता हूं जो मैं तुमसे मदद मांग रहा हूं?

” हां सोच तो मैं यही रहा था?”

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” डॉक्टर आज भी नहीं पकड़ा गया है। तुम सोचो उसने 5 साल में कितने लोगों की जिंदगी खराब की होगी?  हम गरीब क्या इतने गए गुजरे होते हैं? क्या हमें एक अच्छी जिंदगी जीने का हक नहीं होता? हम तो नहीं जा रहे अमीरों के सामने हाथ फैलाने?
फिर ये अमीर लोग कैसे इतनी छोटी सोच वाले हो जाते हैं ?अगर उस डॉक्टर को किसी चीज की कमी रही होती तो समझ भी आता वो तो  हम से कहीं बेहतर ही खाना खाता होगा, हमसे तो बेहतर गद्दे पर ही सोया करता होगा।  फिर भी उसके लालच ने उसकी आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी कि उसे इंसान और मच्छर में फर्क नहीं नजर आया|  जैसे हम मच्छर अपनी त्वचा पर बैठे तो बिना सोचे समझे उसे मार कर मसल के फेंक देते हैं, वैसे ही उसने हम लोगों को समझ लिया। हमारी झोपड़पट्टी और आसपास रहने वाले गरीब जो उसके पास इलाज के लिए जाया करते थे उस पर आंख मूंदकर भरोसा किया करते थे, उन सभी को उसने कितना बड़ा धोखा दिया। और उस धोखे से उसने रुपयों का महल तैयार कर लिया। और आज भी जाने कहां बैठा वह तो सुकून की सांस ले रहा है और हम यहां भटकती आत्मा बने भटक रहे हैं। उस रात मेरी मां भी मेरे साथ अस्पताल में रुकी थी, और हम दोनों ही लोग एक साथ इस दुनिया से चले गए। निगम वालों ने अगले दिन जिन लाशों को खोज कर निकाल लिया उनका तो अंतिम संस्कार हो गया, लेकिन जो लाशें वे खोज नहीं पाए वो यही दफन रह गई । मैं भी नहीं जानता कि उनमें से कितनी लाशें थी। लेकिन मैं यह जानता हूं कि मैं यही दफन रह गया था। हो सकता है मेरा भी अंतिम संस्कार हो चुका होता तो शायद मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाने के लिए यहां तुम्हारे सामने नहीं खड़ा रहता। “

” तो तुम क्या चाहते हो कि, मैं तुम्हारा अंतिम संस्कार कर दूँ?

” नहीं!!   मैं यह चाहता हूं कि तुम कहीं से उस डॉक्टर को खोज कर एक बार मेरे सामने ला दो.. मैं उसके मुंह से उस का माफीनामा चाहता हूं। मैं यह चाहता हूं कि वह किसी तरह अपनी सारी कारस्तानी खुद कबूल करें , और उस डॉक्टर को कानून के द्वारा सजा सुनाई जाए क्योंकि अगर तुम उसे यहां लाओगे तो मैं चाह कर भी उसे नहीं मार पाऊंगा, क्योंकि मैं एक भटकती हुई आत्मा जरूर हूं लेकिन उसके जैसा शैतान नहीं हूं। जो उसे मार पाऊं… उसे सजा कानून के दायरे में रहकर तुम ही दिलवा सकते हो। जिस डिग्री के बलबूते पर उसने इतना काला धन कमाया है , उसकी वही डिगरी कैंसिल हो जाए। जिस परिवार, जिस बच्चे के लिए इतना कुछ किया है, वह परिवार वह बच्चा उससे दूर हो जाए । जेल में घुट घुट के अपनी मौत की भीख मांग मांग कर वह जिंदा रहे………… यही उस ज़लील इंसान  की सबसे बड़ी सजा होगी। “

सुहास सोच में पड़ गया… अब भी उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि सुधाकर बिंदल ही पूरब का पिता है या नहीं? और क्या पूरब से मिलकर उसे सुधाकर का पता ठिकाना मिल सकता है।
   खैर अब जो भी हो अगर वह यहां तक रघु की मदद करने आया है, तो उसे आगे भी मदद करनी ही पड़ेगी सुहास ने एक बार रघु की तरफ देखा और आंखें बंद कर ली…

   ” साहब आपकी सुपर स्ट्रांग सिंगल फिल्टर कॉफी?”

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अपने पियून की आवाज सुनते ही सुहास ने चौक पर आंखें खोल दी ……….वह अपने ऑफिस के अपने क्यूबिकल में बैठा था।।    खिड़की पर से उसकी आंखें हट चुकी थी और अब वह अपने सामने खड़े पियोन को देख रहा था…

” थैंक्यू !!! वैसे नाम क्या बताया तुमने अपना?”

” साहब इतने दिन में आपने कभी मेरा नाम पूछा ही नही। इसलिए मैंने बताया भी नही,  वैसे मेरा नाम रघु है।”

  गरम कॉफी से सुहास का मुहँ  एकदम से जला और चौक पर वो सामने देखने लगा ……………….

.       कुछ सोचते हुए वापस वह अपनी कॉफी में मगन हो गया….

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क्रमशः

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aparna ….

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