The Bestseller -18

“पहला प्यार”
” सुरेखा जब कॉलेज में पढ़ रही थी….
इतना कहते ही वो चोर नज़रों से रसोई की तरफ देखने लगी..
“नंदू यार तुझसे तो मैं वैसे भी बहुत क्लोज हूँ पर वो मेरी बहन है। उसकी ऐसी राज़ वाली बात कैसे कहुँ”
“मुझ पर पूरा विश्वास कर सकती हो शीना। मैं ये सब किसी से नही कहूंगी। पर प्लीज़ मुझे बता दे , हो सकता है हम मिल कर उसकी कोई मदद कर सकें।”
“अब उसकी इस बारे में कोई कुछ मदद नही कर सकता…
वो जब कॉलेज में थी तब वो और आलोक एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे!”
“आलोक?? ये कौन है। मैंने कभी सुरेखा के मुहँ से ये नाम नही सुना?”
“एक शादीशुदा लड़कीं कभी अपने पहले प्यार के बारे में इतनी आसानी से कैसे किसी से बात करे भला?”
“हाँ वो तो है। हाँ तो क्या कह रही थीं तुम शीना?”
” आलोक और सुरेखा कॉलेज के ही ज़माने से एक दूसरे से बेहद प्यार किया करते थे।
.. प्यार इतना गहरा था कि दोनो सारी हदें पार कर गए …
आलोक और अनिल भी गहरे दोस्त थे। अनिल शुरू से दोनो के बारे में सब जानता था। और वो तीनों अक्सर साथ साथ घुमा करते थे। लेकिन जब भी सुरेखा उनके कमरे में आती,अनिल उन दोनों को अकेला छोड़ कहीं बाहर चला जाया करता था। अनिल गरीब था और उसे नौकरी की ज़रूरत थी तब आलोक के कहने पर सुरेखा ने अपने पिता से बात कर उसकी पार्ट टाइम नौकरी लगवा दी थी।
उसी सब के बीच सुरेखा को मालूम चला कि वो माँ बनने वाली है । उसने ये बात आलोक को बताई और इन दोनों ने घर वालों को बता कर शादी करने की सोची… आलोक का घर शहर से लगे एक छोटे कस्बे में था वो अपने घर चला गया घर वालों से बात करने। पर …
“पर क्या…?”
” पर आलोक वापस नही आ पाया। खबर आई कि सुबह सुबह तालाब में नहाने गए आलोक की पानी में डूब कर मौत हो गयी..अनिल सुरेखा के पापा की फैक्ट्री में पार्ट टाइम काम किया करता था। वो उसके घर वालो को अच्छे से जानता था……
वही भागतें भागतें ये ख़बर सुरेखा तक लेकर आया… लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सुरेखा अपने घर में अपने और आलोक के बारे में सब बता चुकी थी। आलोक के बारे में सुनते ही उसके पिता ने उसे एक ज़ोर का चांटा मारा, और बाहर निकल गए ये कहते हुए की दूसरी जात के लड़के से वो कभी उसकी शादी नही करेंगे। और तब सुरेखा ने अपनी हालत के बारे में अपनी माँ को सब बता दिया।
इस सब के बाद जब अनिल उसके घर पहुंचा और आलोक की खबर दी तब दुःख और परेशानी की मारी सुरेखा चक्कर खा कर बेहोश हो गयी। घर वालो ने डॉक्टर को बुलाया तो डॉक्टर ने भी इस बात की तस्दीक कर दी कि सुरेखा का तीसरा महीना लगभग खत्म होने को है, और अब इस हाल में अबॉर्शन करवाना सुरक्षित नही है।
घर वालों के पास सुरेखा की शादी करवाने के अलावा कोई चारा नही बचा था। और उन्हें इस काम के लिए सबसे उपयुक्त अनिल दिखा। अनिल गरीब घर का लड़का था उस पर सुरेखा के पिता के नीचें काम भी किया करता था, उसके मना करने का सवाल ही नही उठता था। उसकी माँ के कैंसर का महंगा इलाज और उसकी बहन की शादी का पूरा खर्च उठाने का लालच देकर सुरेखा के पिता ने इन दोनों की शादी करवा दी।”
” ओह्ह गॉड!! इसका मतलब सिया और जिया अनिल की बेटियां नही हैं..?”
” नही !! और शादी के लगभग आठ साल बीत जाने पर भी सुरेखा ने आज तक अनिल को इस बात के लिए माफ नही किया है..!”
“पर इस सब में अनिल की क्या गलती… बल्कि उसने तो अपनी तरफ से सुरेखा की मदद ही की।”
“पर सुरेखा का कहना है कि आलोक ऐसे मर ही नही सकता था, उसकी मौत के पीछे ज़रूर अनिल का हाथ है। क्योंकि आलोक की मौत से फायदा सिर्फ और सिर्फ अनिल का ही हुआ। उसे इतने बड़े परिवार का दामाद बनने का मौका जो मिल गया।
इसलिए आलोक की मौत का ज़िम्मेदार अनिल ही है। और तो और वो तो सिया के गायब होने के पीछे भी अनिल का ही हाथ मानती है..”
“ओह्ह !! लेकिन आलोक वाला तो हादसा था ?”
“हाँ था। पर सोचने वाली बात यह है कि आलोक चार बार से इंटर स्टेट तैराकी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतता रहा था….अब सोचो वो कैसे गांव के तालाब में डूब कर मर गया.. इस बात पर सुरेखा को विश्वास नही होता.. और इसी बात के कारण उसे अनिल पर भरोसा नही होता। अपनी शादी अनिल से करवा देने के लिए उसने अपने पिता को भी माफ नही किया। उसके पिता ने कुछ समय बाद अनिल के लिए इस शहर में एक छोटी मोटी फैक्ट्री लगवा दी और तब से अनिल उसी काम को सम्भाल रहा है। वो बेहद मेहनती बंदा है। अब आज उसके नीचे लगभग तीस लोग काम कर रहें हैं।
इतने सब के बाद भी आज तक सुरेखा अपने मायके से रूठी बैठी है। पूरे मायके में वो सिर्फ मुझसे और मेरी माँ से ही बात करती है। अब तो खैर उसके पिता भी नही रहे। उनके न रहने पर ही वो एक बार मायके गयी थी, उसके बाद से फिर वही मायके के लिए गुमसुम चुप्पी साध रखी है उसने।”
नंदिनी की आंखें चौड़ी हो गईं वो अभी और भी कुछ पूछने वाली थी कि सुरेखा चाय के साथ नाश्ता भी ले आयी…
“नाश्ता भी बनाने लगी थी तेरे लिए, मशरूम के क्रिस्पी पकौड़े… तुझे पसन्द है ना, इसलिए मुझे वक्त लग गया.. नंदिनी तुम भी खा लो। तुम्हारे लिए भी बनाया है।”
“अरे सुरेखा इतनी तकलीफ की क्या ज़रूरत थी। अब तुम दोनो बहने बैठ कर बातें करो, मैं जाती हूँ।”
“नंदू बैठ न। क्यों इतनी फॉर्मल हो रही है। सुरेखा ये नंदिनी मेरी बहुत प्यारी दोस्त है। “
“हाँ और अब तो मेरी भी अच्छी दोस्त बन चुकी है।”
तीनों बातें करती खाने पीने लगी लेकिन नंदिनी के दिमाग से आलोक अनिल और सुरेखा निकल ही नही पा रहे थे। क्या वाकई अनिल ने ही सिया को गायब करवा कर मार कर कहीं फेंक दिया था। लेकिन अगर वो बच्चियों से चिढ़ता भी था तो दोनो बच्चियों को एक साथ रास्ते से हटाता, सिर्फ एक को ही क्यों?
हो सकता है उसे मौका न मिल पाया हो जिया पर हाथ साफ करने का…
हाँ यही होगा तभी तो सुरेखा जिया को लेकर इतनी ओवर प्रोटेक्टिव है। अनिल के साथ भी उसे अकेले नही छोड़ती..
अपने ही मन में चलते सवाल जवाब के बीच उलझी नंदिनी को अब सारी कड़ियों को सिलसिलेवार जोड़ने के लिए एकांत की ज़रूरत थी और इसलिए वो उन लोगों से विदा लेकर अपने घर चली आयी।
*******
रात भर जागकर आखिर कामिनी ने अपना फाइनल ड्राफ्ट तैयार कर ही लिया…
… खिड़की से बाहर देखती कामिनी बाहर होते उजाले को महसूस करती बैठी थी कि जमना ताई उसके लिए चाय ले आयी..
“अरे आप।इतनी सुबह क्यों उठ गयीं? मैं खुद चाय बना लेती ना! अभी तो बस साढ़े पांच हुआ है।”
“मेमसाब आप रात भर सोई नही हैं…. लगातार लिखते हुए देखिए आप की आंखे कैसी थक गयीं हैं। मुझे तो आप रात में आठ बजे ही फ्री कर देती हैं उसके बाद अपने कमरे में जाकर मैं तो सो ही जाती हूँ पर आप जागती रहती हैं।”
“क्या करूँ जमना ताई… ये अधूरे क़िस्से और अधूरे किरदार हमें सोने कहाँ देते हैं। जब तक पन्नो पर उतर न आएं दिमाग में खलबली मचाये रहतें हैं… बहुत बार तो बिस्तर पर लेटने के बाद ये हमारे दिमाग में ऐसे उथल पुथल मचाते हैं कि आधी रात को उठ कर इन्हें शब्दों का जामा पहनाना पड़ता है।”
“यही तो आपकी खूबी है। वैसे आप बहुत अच्छा लिखतीं हैं!”
“अपने कब पढ़ लिया जमना ताई?”
“यहीं आपकी टेबल की साफ सफाई में आपकी ये डायरी कभी कभार पलट लेती हूं।”
“अरे इसमें तो बस कच्चे ड्राफ्ट भर है। दिमाग में अगर कोई कहानी आयीं तो उसे शुरू कैसे करना है मिडल क्या होगा और अंत क्या होगा। किरदारों का आपस में कोलैप्स और यही सब बस लिखा होता है..
कहानी पढ़नी है तो आप ये पढियेगा..”
और कामिनी ने अपनी एक नॉवेल उठा कर जमना के हाथ में रख दी और मुस्कुरा कर अपनी डायरी पलटती चाय पीने लगी।
******
सुहास अपना ऑफिस का काम निपटाने के साथ ही उस डॉक्टर सुधाकर बिंदल के बारे में भी पता करने की कोशिश में लगा था। उसने उस सामने वाली बिल्डिंग का नाम “ओशेरी” लिखकर गूगल पर डाला और खंगालना शुरू किया…
पहले तो ज्यादा कुछ हाथ आता दिखा नही, क्योंकि भले ही आप गूगल के कितने भी बड़े वाले सच्चे भक्त हों पर वो तो एक नम्बर का सनकी और मूडी ही है। जब उसका मूड होगा वो आपकी सर्च को पहली बार में ही ढूंढ कर सारी जानकारी निकाल कर आपके हाथ में रख देगा…… लेकिन कभी दस बार में भी वो आपके की वर्ड्स नही पकड़ पायेगा या शायद पकड़ना ही नही चाहेगा।
खुद में बड़बड़ करता वो अपनी लैपटॉप की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए बैठा था कि ऑफिस का चपरासी चला आया…
” सर आपकी डार्क फिल्टर कॉफी!”
उसे देख सुहास ने एक भीनी सी मुस्कान दी और कॉफी उठा कर वापस लैपटॉप पर नज़रें गड़ा दी…
“सर आप ये सामने वाली बिल्डिंग के बारे में कुछ ढूंढ रहे हैं क्या?”
“हाँ तुम्हें कैसे पता?”
“वो आप कुछ बोल भी रहे थे, वो गलती से कान में पड़ गया..!”
“ओके ! कुछ जानते हो क्या इस इमारत के बारे में ?”
” हॉं साहब ! आज से लगभग पच्चीस तीस साल पहले यहाँ एक अस्पताल था। काफी पुराना ईसाई अस्पताल था मिशनरी का। फिर मिशनरी ने यहाँ अस्पताल बंद करने का निर्णय ले लिया..!”
“क्यों ? “
“सर इमारत लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी हो चुकी थी। और निगम ने इसे तोड़ने का निर्णय पास कर दिया था वरना इमारत कभी भी ढह सकती थी। इसलिए..
” फिर ! इमारत तोड़ दी गयी?”
“नही सर! उसके पहले एक नया नया डॉक्टर आया था उसी अस्पताल में काम करता था। उसने मिशनरी से ये अस्पताल ले लिया। और फिर अपना काम यहाँ जमा लिया। कुछ जोड़ तोड़ कर निगम वालों को पैसे खिला कर उसने एक्सटेंशन ले लिया और लगभग पांच साल का एक्सटेंशन मिल गया उसे?
अब सुहास को समझ आया कि क्यों उसे उस बिल्डिंग में अस्पताल नज़र आ रहा था, क्योंकि वाकई वहाँ कभी अस्पताल था।
“फिर क्या हुआ उस अस्पताल का।”
“फिर ज्यादा तो कुछ पता नही, पर एक रात बिल्डिंग का एक बड़ा हिस्सा अचानक ढह गया। और काफी मरीज़ों की उसके नीचे दब कर जान चली गयी। फिर वो डॉक्टर वहाँ से रातों रात गायब हो गया सर। फिर उसकी कोई खोज खबर नही मिली। बादबाक़ी निगम पर भी कार्यवाही हुई और तुरंत इस पुरानी इमारत को तोड़ कर गिराया गया।
कुछ समय बाद यहाँ नई इमारतें बन गईं और नए नए ऑफिस खुल गए। “
“उस डॉक्टर का कुछ पता चला?”
“नही उस डॉक्टर का कुछ पता नही चला। पर सर उसने यहाँ से खूब पैसा कमाया था। हो सकता है कहीं और अपनी प्रैक्टिस कर रहा हो।”
हाँ में सिर हिला कर और उसे थैंक्स बोल कर सुहास वापस अपने लैपटॉप पर व्यस्त हो गया…
“तो क्या उस लड़के की आत्मा उसे यही बताने आयीं थी कि ये इमारत गिरने वाली है और वो उसे बचा ले। लेकिन फिर उसके पेट से नीचे पीछे की तरफ लगा चाकू और पेट से बहता खून क्या था। “
सुहास अपने में मगन उस अस्पताल और वहाँ दिखे लड़के के बारे में सोचने लगा।
अब ये सच्चाई तो वो लड़का ही बता सकता है? लेकिन इसके लिए सुहास को एक बार फिर उस भूतिया अस्पताल में जाना होगा।
ठीक है वो इस बात को कई बार नकारने के बाद आखिर मान गया कि उसे आत्माएं नज़र आती है… और उससे मदद की गुहार लगती हैं। पर फिर भी अपने जी को कड़ा कर के उन आत्माओं से मिलने जाना इतना भी आसान नही था ।
एक तो कोई भी आत्मा अपने असल रूप में न आकर अजीब डरावने से रूप में क्यों आती है? ये सुहास की सोच से बाहर था।
फिर भी उसने खुद को उस अस्पताल में जाने के लिए तैयार करना शुरू किया और अपनी छोटी सी हनुमान चालिसा जिसे आजकल वो अपनी डेस्क पर रखने लगा था को एक बार गहराई से प्रणाम किया और हनुमान जी का स्मरण करने लगा।
अब वो अपनी आगे की यात्रा के लिए तैयार होने लगा था..
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क्रमशः
aparna…
