The Bestseller -15

The Rainbow
बगीचे में बैठी कामिनी को समझा बुझा कर जमना उसके लिए चाय लेने चली गयी। वहीं अपनी डायरी पर प्यार से हाथ फेरती कामिनी की आंखे वापस बहने लगीं…..
डायरी के पन्ने फड़फड़ा रहे थे जैसे उसे अपनी तरफ बुला रहें हों…
उसने उन पन्नो पर ममता से हाथ फेरना शुरू कर दिया…
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सुहास अगली सुबह ऑफ़िस पूरे जोश के साथ पहुंचा , अब उसे अपना काम भी शुरू करना था। पिछले दो दिन में उसने जो झेला था अगर उसकी जगह कोई कमज़ोर दिल आदमी होता उसका अब तक हार्ट फेल हो जाना था।
जाने भगवान ने उसका दिल किस मज़बूत सीमेंट मिट्टी से बनाया था जो इतने झटके खाकर भी धड़क रहा था।
उसने अपनी टेबल पर मौजूद हनुमान जी की तस्वीर को प्रणाम करने के बाद अपना लैपटॉप खोला और रेनबो के सात रंगों की चीरफाड़ करनी शुरू कर दी।
रेनबो में काम करने वाले सभी लोगों का कच्चा चिट्ठा खंगालते हुए आखिर में उसने चार लोगों के नाम अलग निकाल लिए..
सुरवीन, रूही, पूरब बिंदल और प्रिंस …
इन चारों के ही प्रोफ़ाइल पर उसका अलग से ध्यान गया। ये सभी लोग बाकियों से कुछ अलग थे।
उसने अब अपना पूरा ध्यान इन्ही चारो पर लगा दिया था और दोपहर तक इन्हें जांचने परखने के साथ ही उसने थोड़ी बहुत जानकारी निकाल ही ली थी। लंच के बाद उसे सारा से मिल कर उसे सारी बातें बतानी थी।
उसके पहले ही सारा उसकी टेबल पर चली आयी..
” हेलो सुहास ! कितनी प्रोग्रेस है आज?”
” काफी कुछ मिला है सारा। तुम लंच कर लो फिर बताता हूँ।”
” ओके !!तो चलो साथ में ही लंच कर लिया जाए। मेरे केबिन में आ जाओ, वहीं खाते हैं।”
मुस्कुरा कर सुहास ने हाँ कहा और अपना टिफिन लिए सारा के केबिन में पहुंच गया…
सारा के सामने बैठे उसने अपना टिफिन खोला, उसके टिफिन को देखती सारा मुस्कुराने लगी…
” यार सुहास एक बात बताओ! तुम साउथ इंडियंस इतनी इडली कैसे खा लेते हो। आई मीन रोज़ रोज़ इडली!! बोर नही हो जाते।”
“नही बिल्कुल नही। हम वैसे ही इडली रोज़ खा सकते हैं जैसे तुम रोज़ पराठे खा सकती हो। बोर होती हो क्या?”
” नो वेज ! पराठे भी कोई बोर होने की चीज़ है? कभी पनीर तो कभी गोभी के कभी मेथी के और मेरे सबसे फेवरेट आलू के पराठे यार मैं तो सच्ची रोज़ खा सकती हूं। ये देखो आज भी मम्मी ने पराठें ही दिए हैं।”
उसने अपना टिफिन सुहास की ओर बढ़ा दिया… सुहास ने मुस्कुरा कर एक पराठा उठाया और रोल कर के खाने लगा..
” बस ऐसे ही हम इडली से बोर नही होते। और तुम्हे मालूम है इडली स्टीम और फर्मेंटेड फूड है सो ये हमारे पाचन तंत्र के लिए…
इतना बोलते ही अचानक सुहास को कुछ याद सा आ गया। और वो उठ कर अपने क्यूबिकल में जाने को हुआ कि सारा ने उसे रोक लिया…
” अरे बैठो तो सहीं अपना खाना तो फिनिश कर लो। हुआ क्या? ऐसा क्या अर्जेन्ट याद आ गया?”
” सारा वो लिस्ट मैंने निकाल ली है। उस पूरे ऑफ़िस में से चार लोगों की प्रोफाइल थोड़ी मिस्टीरियस लगी इसलिए अभी उन चारों पर ही फोकस कर रहा हूँ … उनमें से एक लड़का है पूरब बिंदल !!
” क्या हुआ उस लड़के में ऐसा क्या खास है?”
” उस लड़के की मेडिकल रिपोर्ट्स कुछ सही नही थी। और साथ ही उसका नाम भी… मेरा मतलब उसके फादर का नाम मुझे लग रहा है मैंने कहीं तो देखा है.. हां याद आ गया…
“कहाँ देखा है सुहास?”
” वो मैं बाद में बताता हूँ अब पहले बाकियों की बात डिस्कस कर लेते हैं…..
ये आतंकवादी संगठन भी आजकल आधुनिक होते जा रहे हैं… हैकिंग, स्पाई कैमेरा, स्पाइवेयर के बारे में ये लोग भी बहुत कुछ जानने समझने लगे हैं। अब ये लोग उतने पढ़े लिखे तो होते नही की इस सब के बारे में पूरा नॉलेज इकट्ठा कर सकें इसलिए ये लोग अपने बीच से कुछ बच्चों को पढ़ाते लिखाते हैं या फिर ये लोग कुछ पढ़े लिखे लोगों के दिमाग में आज़ादी का फितूर जगा कर उनसे अपने सारे काम करवाते है…
ये बकायदे अपने संगठन के लिए इन पढ़े लिखे लोगों को रिक्रूट करतें हैं।
इन लोगों की फील्डिंग भी ये बहुत पहले से करना शुरू कर चुके होतें हैं… मेरा कहने का मतलब है जब ये लड़के लड़कियां अपनी कॉलेज की पढ़ाई कर रहे होते हैं तब इन संगठनों के बच्चे या कॉलेज के प्रोफेसर आदि ऐसे लोगों को चुन कर शुरू से ही उनके दिमाग में गलत बातें डालना शुरू कर देते हैं। अब जो लोग सही गलत को ठीक ठीक पहचानतें है वो इनके झमेले में नही फंसते पर कुछ कमज़ोर दिल लोगों को इनकी बातें सुन सुन कर लगने लगता है कि ये लोग बहुत कष्ट में हैं गुरबत में जी रहें हैं और वो लोग इनकी मदद को तैयार हो जाते ही और यहाँ से शुरू होती है इन पढ़े लिखे लोगों के आतंकवादी बनने की ट्रेनिंग।
अब ये लोग अपनी शिक्षा और ज्ञान का फायदा उठा कर इन संगठनों का लाभ करवाने लगते हैं।बदले में इन्हें मिलती हैं फॉरेन ट्रिप्स, विभिन्न तरह के वी आई पी बैजेस और अन्य सुविधाएं। पैसे तो ये वैसे भी किसी सॉफ्टवेयर कंपनी में घुस कर कमा ही लेते है …
ये हैकर्स आतंकवादी समूह से जुड़े होतें है और अपनी सारी बुद्धिमता का प्रयोग इनके फायदे के लिए करने लगते हैं… इन्होंने काफी सारी चीज़ें बना कर इन संगठनों को दी हैं उसी में से एक है एंड्रोइड स्पाइवेयर (संक्रमित सॉफ्टवेयर) …
ये स्पाइवेयर थर्ड पार्टी एप से टेलीग्राम, थ्रीमा, वीमैसेज जैसे मेसजिंग एप डाउनलोड/अपडेट करने पर मोबाइल में आ जाता है। यह यूजर्स के मोबाइल में स्क्रीन रिकॉर्डिंग, स्क्रीन शॉट,एसएमएस पढना, नोटिफिकेशन पढऩा, फाइल डिलिट, कॉल रिकॉर्डिंग, कॉल लॉग, करना जैसे कार्य करके सूचनाएं चुरा लेता है।
व्हाटसएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम सहित समस्त सोशियल मीडिया मैसेजिंग एप में किए जाने मैसेज/ऑडियो/वीडियो कॉल को भी ये आसानी से पढ़ लेता है।
इससे यूजर्स की व्यक्तिगत सूचनाओं के साथ बैंकिंग संबंधी जानकारी भी चोरी हो सकती है,बल्कि होती ही है।”
“हम्म सही कह रहे हो! इन चारों की प्रोफाइल में ऐसा क्या लगा जो इन पर तुम्हें डाउट हो रहा है?”
” बहुत कुछ! पहला तो इनमें से उस बिंदल को छोड़ कर किसी के भी नाम तक असली नही है। इन लोगों ने अपने जितने दस्तावेज़ जमा किये है सभी फ्राड है?”
“तो कंपनी कैसे इन्हें पकड़ नही पायी?”
” कम्पनी पकड़ लेती तो फिर तुम मुझे क्यों काम देती यहाँ? इन लोगों ने अपने सारे दस्तावेज़ इतनी बारीकी से तैयार किये हैं कि कोई भी इन्हें पकड़ नही सकता। इनके पेपर्स को खंगालते समय ही तो मुझे इन चारों पर शक हुआ। एनिवेज़ अब मैं चलता हूँ ….. अभी काफी सारे काम बाकी हैं। इन चारों के खिलाफ कुछ पुख्ता सबूत मिल जाएं तब हम इन पर हाथ डाल पाएंगे न।”
“ओके !! ” मुस्कुरा कर सारा ने अपना टिफिन समेट लिया। सुहास भी उठ कर जाने को हुआ कि सारा ने उसे वापस आवाज़ लगा दी..
” सुहास!!! अच्छा काम कर रहे हो तुम और बहुत फ़ास्ट भी हो। मुझे खुशी है मैंने तुम्हें इस काम के लिए चुना।”
सुहास ने एक नज़र पलट कर उसे देखा और मुस्कुरा कर अपनी डेस्क पर चला गया..
पूरब बिंदल ये नाम उसके दिमाग में खलबली मचाये था और इसी लिए उस नाम की तह तक जाने के लिए उसने सारा और बाकी लोगों से छिपा रखे अपने स्पेशल लैंस निकाले और अपने चश्में पर सेट कर एक बार फिर खिड़की के पास चला आया।
खिड़की के कांच से अपनी आँखे सटाते ही उसे सामने खड़ी बिल्डिंग का चौथा माला दिखने लगा….
वही पुराने से अस्पताल की डॉरमेट्री… नर्सेज स्टेशन पर बैठी3-4 नर्सेज.. जिनमें से कोई कुछ लिख रही थी तो कोई फोन पर थी। वही एक तरफ आईसीयू का इंडोर जहां परदों की ओट में कई सारे मरीज मशीनों से लैस सोए पड़े थे…. पीली मरघिन्नी सी रोशनी जिसके कारण दिन में अंधेरा सा छाया हुआ था।
अब सुहास अस्पताल की डोरमेट्री में खड़ा था अपने आप को मजबूत कर वह धीरे-धीरे कॉरिडोर में आगे बढ़ने लगा। हर एक कमरे के बाहर एक नेमप्लेट लगी थी जिसमें अंदर भर्ती मरीज के साथ ही उसे देखने वाले उसके सलाहकार डॉ का नाम भी लिखा हुआ था…
सुहास ध्यान से हर एक कमरे के बाहर के दरवाजे पर लिखे नाम को पढ़ने लगा ….
एक कमरा दूसरा कमरा और ऐसे करते-करते सभी 10 कमरों के बाहर एक ही सलाहकर डॉक्टर का नाम लिखा हुआ था… डॉ सुधाकर बिंदल !!!
सुहास ने उस नाम को पढ़ने के बाद तुरंत अपनी आंखों से चश्मा हटा दिया अपने टेबल पर रखे लैपटॉप के सामने वह अपनी दोनों आंखों पर उंगलियां रखकर बैठ गया और सोचने लग गया….
यही तो वह नाम था जो उसने पूरब बिंदल के 10वीं की मार्कशीट में उसके पिता की जगह लिखा देखा था तो क्या इन दोनों नामों में आपस में कोई कनेक्शन था…
या सिर्फ इत्तेफाक था कि यह दोनों नाम एक से थे। पर जो भी था इस नाम ने उसके मन में खलबली मचा दी थी और अब उसे इस पूरब बिंदल की जन्मकुंडली निकालनी थी…
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शेखऱ ने नंदिनी से बात करने के बाद फ़ोन रखा और कुलदीप के सामने जा बैठा। अब तक में कुलदीप के साथ बैठे लोगों की उससे बातचीत भी हो चुकी थी…
“तो कुलदीप जी अब जरा हमसे भी इनका परिचय करवा दीजिये !”
कुलदीप के चेहरे पर कुछ रंग आये और चले गए….
” क्या हुआ? कुछ ऐसे खास लोग हैं क्या जिनसे मिलवा नही सकते? “
” नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं… ये जोगी कपूर जी है और ये हैं सुखलाल पांडेय !! “
शेखऱ ने उन दोनों की तरफ देखा, दोनो ने उसके सामने हाथ जोड़ दिए…
” साहब मैं अब इस घर में नही रह सकता । आप सोच भी रहे होंगे कि अभी महीना नही बीता और मैं ये घर द्वार छोड़ कर चला जाना चाहता हूँ। पर क्या करूँ सर, इस घर में हर तरफ ढेर सारी यादें बिखरी पड़ी हैं। इन्हें समेटते समेटते कहीं मैं भी न बिखर जाऊँ।
अगर यहाँ रहा तो सबकी यादों के साये में मैं पागल हो जाऊंगा…
कुलदीप अभी अपनी बात कह ही रह था कि उसकी कामवाली बाई सबके लिए वापस चाय लिए चली आयी..
वो हर एक के सामने चाय की ट्रे रखती जा रही थी। शेखऱ चाय उठाने को था कि उसे नंदिनी की बात याद आ गयी…
” नही मैं नही लूंगा । चाय नही पीता हूँ।” शेखऱ के ऐसा कहने पर गिरधारी उसे देखने लगा, शेखऱ ने आंखों के इशारे से उसे शांत रहने कहा और उस बाई से सवाल कर लिया..
” आप कब से यहाँ काम कर रही है?”
” साहब पंद्रह सोलह साल हो गया होगा साहब!”
” कुछ ऐसा अजीब लगा था क्या उस दिन जिस दिन ये वारदात हुई? “
“साहब मेरी भाभी की बेटी को बच्चा हुआ था गांव में। मैं दो दिन पहले से वहाँ चली गयी थी साहब और इस घटना के चार दिन बाद लौटी तो पता चला कि इतना बड़ा हादसा …
अपनी बात पूरी करने से पहले ही उसकी आँखे छलक आईं। उसका तेज़ आवाज़ में रोना सुन शेखऱ ने लेडी कॉन्स्टेबल को इशारा किया और खुद कुलदीप की तरफ घूम गया..
“हाँ तो कुलदीपक जी क्या कह रहे थे आप? “
” सर कुलदीप नाम है !”
“हॉं भाई वही !! क्या कह रहे थे आप?
कुलदीप कुछ और कह पाता उसके पहले ही अपने आंसू पोंछ अंदर की ओर जाती उसकी नौकरानी एक नया बम फोड़ गयी…
“साहब आप चाहें तो कुलदीप साहब से पूछ लीजिये मैं इस दुर्घटना के ठीक दो दिन पहले ही अपने गांव घर चली गयी थी। साहब ने तो खुद मुझे आने जाने के टिकट किराए का पैसा दिया था और वहाँ दवा दारू के लिए भी….
वो अपनी बात कह ऑंसू पोंछती अंदर चली गयी, और शेखऱ घूर कर कुलदीप को देखने लगा जिसने इस घटना के पंद्रह बीस दिन पहले से घर वालो से सम्पर्क में न होने की बात कही थी…
क्रमशः
aparna…..
