Bestseller-13

 The Bestseller -13

   
                       काली किताब”

      कामिनी के घर से निकलकर नंदिनी और शेखर गाड़ी में बैठकर नंदिनी की घर की तरफ निकल गए।
नंदिनी को अब भी सुरेखा और कामिनी की दोस्ती बड़ी खटक रही थी। वह पिछले छह-सात महीने से सुरेखा की पड़ोसन थी, उसी अपार्टमेंट में रह रही थी और उसने आज तक कामिनी को उसके घर आते जाते नहीं देखा था।

” क्या हुआ नंदू कुछ सोच रही हो?”

” हां कितनी अजीब बात है ना कि मैंने आज तक सुरेखा के घर पर कभी कामिनी को नहीं देखा?”

” इसमें कौन सी अजीब बात है नंदू! तुम तो वैसे भी आधा टाइम अपने ऑफिस में बिजी रहती हो, और बाकी के आधे टाइम अखबारों के लिए खबरें तलाशने में। “

” फिर भी शेखर कभी तो दिखती और खैर यह बात इतनी अजीब नहीं लग रही कि वह मुझे कभी दिखी नहीं उससे ज्यादा अजीब यह लग रहा है कि इतनी फेमस लेखिका सुरेखा की दोस्त है…. और इस बात को सुरेखा ने कभी हाईलाइट नहीं किया!!
    मेरा मतलब आज के जमाने में जब सोशल मीडिया पर लोग धड़ाधड़ पोस्ट डालते हैं चाहे वह कोई भी फालतू पोस्ट हो.. एक कप चाय बना कर उसकी फोटो खींच कर डाल देते हैं…. “गॉर्जियस मॉर्निंग विद गॉर्जियस टी” तो इस जमाने में जहां सब दिखावे पर लगे हुए हैं वहां सुरेखा इतनी बड़ी बात मुझसे छुपा गई।”

” वैसे मैं जितना आज तक सुरेखा से मिला और समझ पाया हूं मुझे वह काफी इंट्रोवर्टेड लगती है।”

” हां!! है तो थोड़ी शांत और गंभीर किस्म की, और वैसे एक बात सही कह रहे हो.. मैं तो खुद उसकी फेसबुक फ्रेंड हूं नहीं तो मैं यह कैसे कह सकती हूं कि उसने अपनी और कामिनी की कोई तस्वीर अपने अकाउंट पर पोस्ट ना की हो। मुझे एक बार चेक करना चाहिए। “
    
   बातों ही बातों में दोनों नंदिनी के घर पहुंच गए। शेखर ने नंदिनी को उसके अपार्टमेंट के सामने उतारा और अपनी गाड़ी घर के लिए मोड़ ली। नंदिनी उसे बाय कर के ऊपर चली गई।
     अपने फ्लैट में पहुंचते ही उसने सबसे पहले जाकर अपना लैपटॉप ऑन किया और सुरेखा का फेसबुक अकाउंट खोल कर चेक करने लगी।
   लेकिन उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि पिछले लगभग डेढ़ दो साल से सुरेखा अपने सोशल अकाउंट पर बिल्कुल भी एक्टिव नहीं थी। उसने सुरेखा के साथ ही अनिल के अकाउंट को भी खंगालना शुरू किया लेकिन अनिल का तो कोई फेसबुक अकाउंट ही नहीं था। या अगर था भी तो किसी अलग प्रोफाइल नेम से उसने बना रखा था।
   उन दोनों के सोशल अकाउंट छानने के बाद भी नंदिनी को कुछ हाथ नहीं लगा….. लेकिन फिर भी नंदिनी को इस तरह सुरेखा और कामिनी से मिलने के बाद मन में कुछ अजीब सा खटका तो हो ही रहा था। लेकिन यह क्या था वह नंदिनी नहीं समझ पा रही ,थी कि तभी उसका ध्यान टेबल पर पड़ी उस किताब पर गया जो वह अनिल के घर से उठा कर लाई थी। पिछले दिनों अपनी व्यस्तताओं में इस कदर खोई हुई थी, कि इस किताब की तरफ का ध्यान ही नहीं दिया था। उसने तुरंत वह किताब उठाई और खोल कर देखने लगी।

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      रहस्य रोमांच जादू टोना वशीकरण मारण मोहन उच्चाटन आदि पर लिखी वह किताब अपने नाम के अनुरूप ही थी और किताब का नाम था काली किताब….

      “आपको आशंका है कि किसी शत्रु ने आप पर कुछ जादू टोना कर रखा है तो एक नींबू को चार भागों में काटकर उस पर कुमकुम छिड़क कर चौराहे पर खड़े होकर चारों दिशाओं में एक–एक भाग फेंक दें। पीछे मुड़कर न देखें और घर आकर हाथ–पैर अच्छे से धो लें। किसी भी तांत्रिक अभिकर्म से मुक्ति मिलेगी।”

     “यदि आपको लगता है कि किसी के किए कराए के कारण आपके व्यवसाय में रुकावट आ रही है, आपका काम अटक रहा है, और घर में गृहकलेश बढ़ गया है, तो इससे बचने के लिए सवा किलो काले उड़द, सवा किलो कोयला को सवा मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से 21 बार वारकर शनिवार के दिन बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।
   आपकी रुकावट दूर हो जाएगी…

   ऐसे ही कुछ अजीबोगरीब नुस्खों को पढ़ती नंदिनी सोच में पड़ी थी कि सुरेखा और अनिल को इस किताब को अपने पास रखने की ऐसी क्या जरूरत थी, क्योंकि उसे यह तो समझ में आ गया था कि अनिल उससे झूठ कह रहा था कि उसके किसी दोस्त की किताब थी।
    उसे लगने लगा कि उसे सुरेखा और अनिल के बारे में आसपास के लोगों से भी बात करनी चाहिए।
  
       काली किताब के पन्ने जल्दी-जल्दी पलटते हुए नंदिनी उसमें कुछ खास ढूंढने की कोशिश करती रही लेकिन उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा। और उसने उस किताब को बंद करके टेबल पर रख दिया लेकिन बंद करते में ही उसे अचानक आखिरी पन्ने पर कुछ नजर आया और उसने किताब वापस खोल ली। उस आखिरी पन्ने पर एक मोबाइल नंबर लिखा हुआ था।
 
  कुछ आधे अधूरे हल्के से शब्दों में मोबाइल नंबर के साथ ही मोबाइल नंबर धारक का नाम भी लिखा था। लेकिन वह साफ लिखा ना होने के कारण ठीक से पढ़ने में नहीं आ रहा था। नंदिनी ने पता नहीं क्यों लेकिन उस नंबर को अपने मोबाइल पर सेव कर लिया। मोबाइल नंबर सेव करते में उसका ध्यान गया कि यह नंबर आधा था यानी 10 डिजिट करना होकर सिर्फ 9 ही डिजिट का ही था, यानी कि नंबर गलत था। नंदिनी ने निराशा से उस किताब को बंद किया और अपने लिए कॉफी बना कर बालकनी में आ खड़ी हुई।
   पास वाली बालकनी में ही पड़ोसन आंटी खड़ी थी। उन्होंने नंदिनी की तरफ देखा और नंदिनी ने पहली बार उन्हें मुस्कुराकर नमस्ते कर दिया। वैसे तो नंदिनी अड़ोस पड़ोस की आंटियों से बचा ही करती थी, लेकिन आज उसके मन में जो चल रहा था उसके लिए उसे अब अपने पड़ोसियों से बातचीत करना बहुत जरूरी था।

” कैसी हैं आंटी ? आप बहुत दिनों बाद नजर आई?”

” हम तो भाई रोज़ तुम्हे ऑफिस आते जाते हुए और यहां बालकनी पर खड़े कॉफी पीते भी देखते हैं । तुम ही कभी हमें देखती नहीं।”

   नंदिनी को कॉफी का स्वाद जरा और कड़वा लगने लग गया। उसे समझ में आ गया कि आज आंटी अपने पूरे रंग में है और उससे पिछले दिनों उसके द्वारा अनदेखा किए जाने को माफ नही किया है।
   वो झेंप कर नीचे देखने लगी और हंसते हुए उसने बात आगे बढ़ाई..

” जी आंटी वो काम के सिलसिले में इतना बिजी हो जाती हूँ ना , कि बहुत बार आजू बाजू ध्यान नहीं जाता।”

” हां जी बेटा जी , लेकिन इतनी भी क्या व्यस्तता की आसपास से ही आंखें मूंद लो”।

   अरे यार यह आंटी तो एक पर एक तोप बरसा रही है। क्या करूं? रुकूं और सुरेखा के बारे में कुछ पूछताछ करूं या चुपचाप अंदर चली जाऊं? नंदिनी सोच ही रही थी कि वापस आंटी ने ही आगे बढ़कर बात शुरू की….

” वैसे कहां की रहने वाली हो ?शादी हो गई तुम्हारी?”
 
            ये आया ऊंट पहाड़ के नीचे। अब आई ना आंटी अपने फेवरेट सवाल पर। जहां कोई कुंवारी अकेली कन्या देखी इन औरतों को पता नहीं क्या हो जाता है इनका पहला ही सवाल होता है… शादी हो गई तुम्हारी? जैसे सारे जमाने की कुंवारी लड़कियां इन्हीं के लड़कों पर आंख गड़ाए बैठी हो।

   अपने मन की भावनाओं को मन में ही काबू कर नंदिनी वापस मुस्कुराने लगी..-” नहीं आंटी अब तक शादी नहीं हुई।”

” उमर क्या हो गई है तुम्हारी?  25- 26 की तो दिख रही हो!”

” जी पच्चीस की हो गईं हूँ।”

“ये आजकल की लड़कियां भी न । पता नही क्या मिलता है बुढ़ापे में शादी कर के।”
 
    नंदिनी से और कंट्रोल करना मुश्किल हो रहा था उसे लगा अपना सर पीट ले …वह कॉफी का कप उठाये मुड़ने को ही थी की उन आंटी ने कुछ ऐसी बात बोल दी कि जाती हुई नंदिनी के कदम रुक गए…-” और वह सुरेखा के क्या हाल-चाल है? उससे तो तुम्हारी  ठीक ठाक बातचीत होती है ना।”

” हां बातचीत होती है आंटी , लेकिन मैं भी उसके बारे में कुछ बहुत ज्यादा नहीं जानती। आप क्या जानती हैं उनके बारे में? मेरा मतलब वह लोग कब से यहां रह रहे हैं। “

” शुरू से ही रह रहे हैं मेरे ख्याल से छह सात साल हो गए उन्हें यहां आए हुए। अपनी दोनों बच्चियों को गोद में लेकर आई थी सुरेखा और मैं तब से उसे जानती हूं।

” क्या तब भी सुरेखा इतनी ही शांत और अपने में खोई हुई सी थी। “

” हां!! वैसे बहुत ज्यादा बातचीत तो सुरेखा कभी किसी से नहीं करती थी, और न किसी के घर बहुत ज्यादा  मिलना जुलना उसका था। लेकिन जब से उसकी एक बेटी अचानक गायब हुई उसके बाद तो उसने निकलना ही छोड़ दिया और कुछ अजीबोगरीब भी हो गई। “

” मतलब आप कहना क्या चाहती हैं।”

” मतलब यह कि पार्क में बैठे-बैठे दूसरे बच्चों को घूरते रहना, हर एक बच्चे से अपने पास बुला कर बातें करते रहना…. वगैरह उसकी आदतों में शुमार हो गया था। आसपास के लोगों को तो डर लगने लग गया था कि यह दूसरे बच्चों को नजर ना लगा दे… इसीलिए कुछ समय के लिए यहां कॉलोनी की औरतों ने अपने बच्चों को जिया के साथ खेलने से भी मना कर दिया। तभी तो उसने जिया को किसी क्लास में डाल दिया क्योंकि बच्चों के साथ न खेलने से जिया उदास सी रहने लगी थी और इसलिए उसे सुरेखा ने कुछ क्लासेस लगा दी और रोज शाम खुद ही जिया के साथ उसको छोड़ने जाती और खुद ही लेकर भी आती।

” अच्छा मुझे तो ऐसा लगता था कि सिया के गायब होने के बाद उसने खुद ने अपने आप को अपने घर पर कैद कर लिया और बाहर निकलना ही बंद कर दिया।”

” हां कुछ समय के लिए तो अपने घर में कैद होकर रह गई थी… लेकिन उसके बाद पार्क में जाने लगी थी। पर वही उसका अजीब नजरों से दूसरे बच्चों को घूरना उन बच्चों की मांओं को कुछ ठीक नहीं लगा… आजकल तो जानती हो यह टोने टोटके अजीबोगरीब चीजें होती हैं संसार में।”

“आप भी मानती यह सब?”

” मानना ही पड़ता है.. अब क्या करें? हमारा तो इतना बड़ा घर है 5 बीएचके हैं ।हमने तो भई बुरी नजर से बचाने के लिए कद्दू की शक्ल बिगाड़ कर घर के मुहाने पर टांग रखा है कि जो देखे उसकी काली नजर उस कद्दू यानी बजरबट्टू पर अटके और हमारा घर सुरक्षित रहे।”

” और अनिल कैसा है?”

” वह ठीक है! मुझे तो सुरेखा ही अजीब लगती है। अनिल तो बेचारा सुरेखा के किए कराए पर पर्दा डालता हुआ नजर आता है।”

” अच्छा मुझे तो समझ नहीं आते दोनों। पिछले छह-सात महीनों से जानती हूं ..लेकिन इतना नहीं जान पाई कि इन दोनों के बारे में कोई राय बना सकूं।

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   नंदिनी अभी उन्हीं से बातों में मगन थी कि तभी उसकी डोरबेल बजने लगी…-” मैं अभी आई आंटी दरवाजे पर शायद कोई है!”

     और नंदिनी उन आंटी से विदा लेकर दरवाजा खोलने चली गयी। दरवाजे पर सुरेखा खड़ी थी..
 
उसे सामने देख कुछ पल के लिए नंदिनी चौक कर खड़ी रह गयी… सुरेखा ने मुस्कुराकर उससे सवाल कर दिया …-“अंदर आ जाऊं या यहीं से लौट जाऊं?

” सॉरी!! आओ प्लीज अंदर आओ।”

  मुस्कुराकर नंदिनी ने सुरेखा को अंदर आमंत्रित किया और दरवाजा बंद कर दिया..-” सुरेखा चाय लोगी या कॉफी?”

” मुझे तो चाय ही पसंद है नंदिनी।”

” ओके मैं चाय लेकर आती हूँ।”

  नंदिनी सुरेखा के लिए रसोई से चाय लेकर आई तो उसने देखा सुरेखा की ही काली किताब सुरेखा के हाथ में थी और वही पिछला पन्ना जिस पर कोई नंबर लिखा था.. उसे वह देख रही थी । नंदिनी को लगा उसकी चोरी पकड़ी गई। उसने चाय की ट्रे सुरेखा के सामने कर दी। सुरेखा ने चाय उठाई और वह किताब वही टेबल पर रख दी…

” देखो ना देने वाले ने भी गलत नंबर दिया। यह नंबर ही पूरा नहीं है।”

  ” अच्छा मैंने तो नहीं देखा कौन सा नंबर? “

   सुरेखा की बात पर नंदिनी साफ झूठ बोल गई। कुछ देर पहले जिस नंबर को उसने अपने मोबाइल पर सेव किया था उसी नंबर के बारे में सुरेखा उससे बात कर रही थी, यह बात सोचते ही नंदिनी को लगा कि कहीं सुरेखा यह बात जान तो नहीं गई कि नंदिनी ने उस नंबर को नोट किया है।

” अरे यह नंबर?”

“किसका है ये नम्बर?”

“मुझे भी कहाँ पता है? ये तो उस दिन कामिनी ने यहाँ लिख छोड़ा था!”

“कामिनी ? अच्छा वो राइटर जो तुम्हारी दोस्त है।”

” हॉं उस दिन वो जब यहाँ बैठी थी, तभी बातों बातों में उसने ये नम्बर इस किताब पर लिख दिया। और उस दिन के बाद मैं उससे पूछ भी नही पायी कि ये किसका नम्बर है ?”

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” क्यों नही पूछ पायीं?”

   सुरेखा के चेहरे पर एक दर्द की रेखा उभर आई..
” उसी दिन के बाद से मेरी सिया मिली नही और बस उसके बाद कुछ समय मुझे उसे ढूंढने में ही लग गया। जब काफी दिन बीत गए और सिया नही मिली तब तक मैं अपने गम में इतना घुलने लगी थी कि इस किताब और इस पर लिखें नम्बर के बारे में भूल ही चुकी थी, और फिर कामिनी का भी तो आना नही हुआ उसके बाद!”

“किसके बाद? मेरा मतलब क्या वो शाम पूरी बता सकती हो?”

” बताने लायक कोई बात हो तो बताऊँ ना। उस शाम कामिनी मुझसे कोई ज़रूरी बात कहने आयीं थी। उसने पहले ही मुझसे पूछ लिया था कि मैं व्यस्त तो नहीं हूं …उस शाम मेरा भी ऐसा कोई खास काम नहीं था। मेरी दोनों बच्चियां यही बैठकर खेल रही थी। जब कामिनी आई तब वह मुझसे कुछ बताना चाहती थी। अपने लिखने के बारे में शायद या अपनी किताब छपवाने के बारे में.. मुझे अच्छे से याद नहीं है।
   असल में जिया तो चुपचाप बैठे ड्राइंग कर रही थी.. लेकिन सिया यहां बैठे अपने पुराने से गिटार को बहुत बुरी तरह से बजा रही थी। बजा क्या रही थी असल में शोर मचा रही थी। वह एक पुरानी से पेन को पकड़कर गिटार के तारों पर जोर जोर से मार रही थी उससे बहुत अजीब से आवाज आ रही थी.. जो मुझे और कामिनी दोनों को ही डिस्टर्ब कर रही थी। मैंने एक दो बार सिया को समझाने की कोशिश भी की क्योंकि मुझे पता था कामिनी को तेज और अजीब आवाजों से एलर्जी है।
    एक्चुअली उसके बच्चे नहीं है तो उसे इस तरह का डिस्टरबेंस पसंद नहीं आता। मैं समझ पा रही थी कि कामिनी शोर से परेशान हो रही है, लेकिन मेरे पास भी और कोई चारा नहीं था और फिर मैं उठकर उसके और अपने लिए चाय बनाने चली गई। मैं रसोई में ही थी… चाय बना ही रही थी कि कामिनी की आवाज आई कि उसे कुछ भूख सी भी लगी है, तो अगर हो सके तो मैं कुछ खाने के लिए बना दूं ..मैं उसकी बात मान कर कुछ बनाने में लग गई।
   पहली बार उसने मुझसे कोई फरमाइश की थी। मैं नाश्ता और चाय बाहर लेकर आई और फिर हम दोनों चाय पीते हुए बातों में लग गए।

” तो फाइनली कामिनी आपसे क्या बात करने आई थी?”

” वह कुछ ठीक से बता ही नहीं पाई.. कुछ थोड़ा बहुत उसने प्रकाशक से हुई बातचीत के बारे में बताया। और उसके बाद उसके घर से फोन आ गया और वो वापस जाने के लिए उठ खड़ी हुई। असल में इस इंसीडेंट के एक डेढ़ महीने पहले ही उसके ससुर जी की डेथ हुई थी। इसलिए भी वह थोड़ा भावुक थी। वह अपने ससुर जी से बहुत जुड़ी हुई थी और उसके ससुर जी भी उसे बहुत माना करते थे। वह अक्सर कामिनी से मिलने उसके घर पर जाया करते थे , उसकी कहानियों में जो छोटी मोटी गड़बड़ियां होती थी उन्हें भी सुधार दिया करते थे। ऐसा कामिनी ने हीं मुझे बताया था। “

” ओके फिर क्या हुआ?”

” फिर बस चाय पी कर वह चली गई।”

” नाश्ता भी तो खाया होगा?”

” नहीं कहां खाया? मैं जब तक में चाय नाश्ता लेकर आई थोड़ी बहुत बातों के बीच ही उसका फोन आ गया और वह चली गई।”

” सिया के गायब होने के बारे में कब पता चला आपको।”

” कामिनी को सी ऑफ करने मैं लिफ्ट से उसके साथ नीचे तक गई थी …वो जब अपनी गाड़ी में बैठ कर निकल गई, तब मैं मुड़कर ऊपर चली आई। घर आकर देखा जिया अपने रूम में ड्राइंग कर रही थी.. मुझे लगा कि सिया भी उसके साथ होगी लेकिन सिया वहां नहीं थी।”

” 1 मिनट आप जब कामिनी को नीचे छोड़ने गई तब सिया और जिया दोनों ऊपर थे..?”

” हां ऊपर ही होंगे असल में जब मैं चाय लेकर हॉल में आई तब सिया भी रूम में चली गई थी।”

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” आपने उसे रूम में जाते हुए देखा था?”

” नहीं जाते हुए  तो नहीं देखा था लेकिन…

” लेकिन आपने अंदाजा लगा लिया कि आप जब रसोई से चाय बनाकर हॉल में आई तब सिया उठकर अपने कमरे में जा चुकी थी जिया के पास।”

” हां!”

” और जब आप वापस आई ऊपर..  घर पर तो अपने बच्चों के कमरे में सिर्फ जिया को देखा सिया तब तक गायब हो चुकी थी।”

” हां।”

” सुरेखा आपने क्या पुलिस से भी यही कहानी बताइ है।”

“कहानी मतलब ?”.

“मतलब सुरेखा, ये भी तो हो सकता है कि जब आप रसोई में थीं तब कामिनी ने सिया को गायब किया हो?”

“व्हाट रबिश!! वो जान छिड़कती है मेरे बच्चों पर।”

” फिर तो सिया के गायब होने का पता चलते ही आपसे मिलने आईं होगी।”

“नही आ पाई थी। उनके कुछ रिचुअल्स बाकी थे जिसके लिए उसके पति को हरिद्वार जाना पड़ा, और ऐसे में अकेले नही आ पाई। लेकिन मुझसे बराबर फोन पर टच में थी।”

“ओके आई एम सॉरी !! पत्रकार हूँ ना लोगों पर शक करने की फ़िज़ूल बीमारी है , क्या करूँ? प्लीज़ आप बुरा मत मानना।”

   सुरेखा के चेहरे पर नंदिनी के माफी मांगने के बाद भी बारह बजे ही रहे, नंदिनी उससे अभी और माफी मांगती की तभी दरवाज़े पर किसी ने बेल बजायी…
   नंदिनी दरवाज़ा खोलने गयी,, सामने अनिल खड़ा था।
   नंदिनी का फिलहाल अनिल को झेलने का बिल्कुल भी मन नही था । पर बिना मन के भी कई बार पड़ोसियों को झेलना ही पड़ता है और एक बार फिर अनिल के आते ही सुरेखा गुमसुम सी अपनी चाय में डूब गई….

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क्रमशः

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aparna….

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Kavita
Kavita
1 year ago

पहले लग रहा था रायचंद को सुरेखा ने कुछ किया होगा अब ट्विस्ट है की कामिनी ने गायब किया सीया को
🥺