The Bestseller – 12

रायसागर मेंशन
कैफे से निकलकर नंदिनी और शेखर एक बार फिर ऋषिकेश के घर की तरफ मुड़ चले।
“फिलहाल हम ऋषिकेश के कौन से वाले घर पर जा रहे हैं।”
” फिलहाल हम कामिनी के घर पर जा रहे हैं। वैसे भी ऋषिकेश के दोनों घरों का नाम रायसागर मेंशन ही है। पर इसका पहला घर जहां उसकी पहली बीवी बच्चे और बाकी लोग रहते हैं वह शायद उसके पिता के नाम पर था वह घर पर काफी बड़ा है और मेरे ख्याल से उस घर में सात माले हैं। ऋषिकेश और उसका छोटा भाई हृदयेश इन दोनों की फैमिली वहां रहती हैं।”
” ओके तो अब राजऋषि राय सागर यानी कि ऋषिकेश के फादर की डेथ के बाद उन दोनों फैमिली में कोई प्रॉपर्टी ईशु नहीं हुआ?”
” इस बारे में भी मैंने घर के नौकरों से छिपकर पूछताछ की थी और मुझे काफी सारी बातें इनके घर के बारे में भी पता चली है। असल में रायसागर मेंशन काफी बड़ा है। इस मेंशन में लगभग सात माले, तीन गार्डन, दो स्विमिंग पूल एक जिम और एक प्ले रूम है।”
” ओह गॉड यह घर है कि रिसॉर्ट?” नंदिनी घर का लंबा चौड़ा वर्णन सन् चौन्क उठी।
” रईसों के चोंचले हैं सब….. खैर,
घर के काफी पुराने नौकर से मेरी बातचीत हुई उसने बताया कि राजऋषि सर को खुले खुले घर का बेहद शौक था। जब उन्होंने पहली बार घर बनवाया तो सिर्फ ग्राउंड फ्लोर ही बनवाया था। जिसमें उस परिवार के हर सदस्य के लिए कमरे के साथ ही प्ले रूम और जिम अलग से बनवाया था। लेकिन बाद में जब बच्चों का परिवार बढ़ने लगा तब देवरानी जेठानी के बीच चलने वाली चिकचिक से परेशान होकर उन्होंने ऊपर दो अलग-अलग माले बनवाएं… पहला माला ऋषिकेश के लिए और दूसरा माला उसके छोटे भाई ह्रदऐश के लिए।
इसी बीच इनका बिज़नस तो फल फूल रहा ही था साथ ही ऋषिकेश की किताबें भी अच्छी खासी कमाई करने लग गई तो, यह इनका एक तरह से साइड बिजनेस सा हो गया।
सबसे बड़ी बात थी कि राजऋषि सर को विदेशों में भी पढ़ा जाता था… और उन्हें विदेशों में बुलाकर सम्मानित किया गया था। लंदन की यूनिवर्सिटी ने उन्हें “डी लीट” की उपाधि से विभूषित किया था, और इस सब में उन्हें किसी विदेशी प्रकाशक ने अनुबंधित कर लिया था। उस अनुबंध के अंतर्गत राजऋषि सर ने तीन-चार साल तक काम किया था…और उस काम के बदले उन्होंने डॉलर्स में अच्छी खासी मोटी कमाई की थी।
उसी प्रकाशक के पास उन्होंने अपने बेटे ऋषिकेश का नाम भी सजेस्ट किया और उस प्रकाशक ने ऋषिकेश की एक आध कहानियां पढ़ कर उसे भी अपने अनुबंध में ले लिया था… और इसके बाद ऋषिकेश ने लगभग दस साल तक खूब पैसे छापे थे।
एक से बढ़कर एक कहानियां उपन्यास काव्य संग्रह उसने निकाले और उस विदेशी पब्लिशर ने ऋषिकेश की किताबों की ऐसी मार्केटिंग की, कि सालों तक हमारे देश ही क्या विदेशों में भी ऋषिकेश की किताबें बेस्टसेलर रही।
इसके बाद ऋषिकेश का काम बढ़ने लग गया…. प्रकाशकों की घर पर भीड़ जमा होने लगी और पहले फ्लोर पर अपने घर पर ऋषिकेश को थोड़ी असुविधा होने लगी… और तब उसने अपने पिता और भाई से सलाह करने के बाद एक और फ्लोर बनवाया जहां पर उसका चमचमाता ऑफिस और तीन चार बेडरूम और बनवाए गए।
ऐसा नहीं था कि छोटे भाई और बड़े भाई में आपस में प्रेम नहीं था, दोनों भाइयों का आपसी रिश्ता बहुत मजबूत था। ह्रदएश ही ऋषिकेश की किताबों का काम देखा करता था। इसके साथ ही वह अपना बिजनेस भी देखा करता था। दोनों के ही कुल जमा 4 बच्चे हुए। ऋषिकेश के दो लड़के और हृदयेश की एक बेटी और एक बेटा। आगे चल कर इन दोनों भाइयों के तीनों लड़कों ने अपना पूरा ध्यान घर के बिजनेस पर लगा दिया।
ऋषिकेश ने एक अनाथ बच्ची को बाद में गोद भी लिया था जो उसके दोनो बेटों से काफी छोटी थी। और अभी कुछ दो- चार साल पहले सिर्फ बीस की उम्र में उसका ब्याह भी कर दिया।
अब इन के तीनों बेटों को भी अपने अपने कमरे नहीं अपने अपने फ्लोर चाहिए थे तो इसलिए तीन फ्लोर का एक्सटेंशन और हुआ।
अब इस तरह से देखा जाए तो ग्राउंड फ्लोर राजऋषि रायसागर का हुआ। उसके ऊपर के दो फ्लोर ऋषिकेश के थे। और उसके ऊपर का एक फ्लोर हृदयेश का था। और उसके ऊपर के तीन फ्लोर घर के तीनों लड़कों के हो गये।
लेकिन राजऋषि रायसागर की मौत के बाद ग्राउंड फ्लोर पर किस का मालिकाना हक होगा इस बात पर घर परिवार में हल्की से बहस शुरू हुई। बहस की शुरुआत घर की औरतों से हुई थी। ऋषिकेश की पत्नी और हृदयेश की पत्नी दोनों में इस बात को लेकर कहासुनी होने लगी दोनों ही उस हिस्से पर अपना हक जताना चाहती थी।
तब दोनों भाइयों ने मिलकर यह निर्णय निकाला कि ग्राउंड फ्लोर दोनों भाइयों का एक साथ जॉइंट रहेगा क्योंकि वह उनके पिता की यादगार थी।
जब तक ऋषिकेश जिंदा था तब तक उस मामले में उस परिवार में कोई भी बहस या वाद-विवाद की स्थिति पैदा नहीं हुई, लेकिन अब क्योंकि ऋषिकेश जीवित नहीं है तो एक बार फिर हृदयेश की पत्नी ने धीमे शब्दों में उस हिस्से को अपने नाम कर लेने के बात शायद परिवार के वकील से की।
” लेकिन अभी तो ऋषिकेश की बॉडी मिले इतना वक्त भी नहीं हुआ कि घर परिवार में वसीयत के बारे में चर्चा होने लगे?”
” बड़े लोग बड़ी बातें!!! इसलिए कहा भी जाता है ना, कि पैसा इतना मत कमाइए कि जब आप आखरी सांसे ले रहें हों तो, बेटे आप की दवा की पर्ची की जगह आप की वसीयत के कागज ढूंढने लग जाए ।
वैसे भी अभी यह वसीयत वाली बातें घर परिवार के किसी सदस्य ने मुझसे नहीं कही है। यह तो घर के पुराने नौकर ने हृदयेश की पत्नी को उनके वकील से बात करते सुन लिया था, और उसने मुझे बताया है। अभी इस बारे में घर परिवार के लोगों से मुझे चर्चा करनी बाकी है।”
” ओके!!! और कामिनी जिस घर में रहती है उसका क्या?”
” कामिनी जिस घर में रहती है, वह घर पूरी तरह से ऋषिकेश की प्रॉपर्टी थी। ऋषिकेश ने अपनी किताबों से संबंधित कामों के लिए अपने घर पर ही एक ऑफिस बना रखा था…. लेकिन बहुत बार उसे कुछ व्यक्तिगत बातें भी प्रकाशकों आदि से करनी होती थी। और इसी कारण घर परिवार में खुले ऑफिस में असुविधा महसूस करता था । इसलिए उसने अपना एक दूसरा ऑफिस कर्नल रोड पर भी बनवाया हुआ था। बाद में जब कामिनी से उसने शादी की और घर वालों ने उसे और कामिनी को ठुकरा दिया, तब उसी ऑफिस में वह कामिनी को लेकर शिफ्ट हो गया था।
वो ऑफिस भी एक तरह से अच्छा खासा बंगलो ही था, सात कमरों का एक बहुत बड़ा सा घर । उसमें नीचे हॉल किचन लाइब्रेरी दो बैडरूम के अलावा ऋषिकेश का लंबा चौड़ा ऑफिस भी था।
वहीं ऊपर लॉबी और दो कमरों के अलावा एक गेस्ट रूम और एक रिजोइस रूम भी बनाया गया था। जहाँ एक छोटा मोटा सा पब भी था।
अपने प्रकाशकों को और साहित्यकार दोस्तों के साथ वह अक्सर अपनी पार्टी उपरी मंजिल की गैलरी में किया करता था। इसके अलावा ग्राउंड फ्लोर पर नौकरों के लिए भी दो तीन कमरे बने हुए थे। “
” क्या अजीब शौक है इन रईसों के भी….। यहां हम 1BHK अफोर्ड नहीं कर पाते और यह लोग दो-दो घर बनाते हैं, वह भी जाने कितने मालों वाले और रहना इन चार लोगों को ही होता है। फिर क्यों यह लोग इतनी बर्बादी किया करते हैं?”
” यह सब बस पैसों का का दिखावा है बेबी और कुछ नहीं। “
बातों ही बातों में वो लोग कामिनी के घर पहुंच गए.. कामिनी के घर पर भी बाहर कुछ एक गाड़ियां खड़ी हुई थीं।
” लगता है घर पर मेहमान हैं.?” गाड़ियां खड़ी देख नंदिनी ने अपना दिमाग लगाया।
” होंगे ही ना। उसने भी तो अपना पति खोया है।”
” ओह्ह हाँ। मैं तो भूल ही गयी थी। सब मिलने जुलने वाले भी तो आ रहे होंगे।”
दोनों ने गेट पर बैठे गार्ड को अपना परिचय दिया और अंदर चले गए। अंदर कामिनी का प्रकाशक बैठा था, और दूसरे सोफे पर बैठे थे सुरेखा और अनिल।
उन दोनों को वहां बैठे देख नंदिनी चौक गयी। उसे बिल्कुल आभास नहीं था कि सुरेखा उसे कामिनी के घर पर मिल सकती है, वो धीमे कदमों से जाकर सुरेखा के बगल में बैठ गई।
बहुत फुसफुसा कर धीमे से उसने सुरेखा के कान में अपना सवाल डाल दिया..-” तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?
सुरेखा ने बेहद गहरी नजरों से नंदिनी को देखा और धीरे से कामिनी की तरफ देखते हुए जवाब देने लगी….-” मैं कामिनी और अनिल हम एक साथ ही कॉलेज में पढ़ा करते थे कामिनी मेरी बहुत अच्छी दोस्त है।”
” क्या?? लेकिन तुमने कभी बताया नहीं?”
इसमें तुम्हें बताने की क्या जरूरत है ? कुछ ऐसे भाव चेहरे पर लाकर सुरेखा ने नंदिनी की तरफ देखा। और उसके इस भाव से नंदिनी जरा सी शर्मिंदा हो गई। वैसे भी नंदिनी को अभी सुरेखा की सहेली बने कुछ ज्यादा वक्त नहीं बीता था, तो आखिर नंदिनी सुरेखा की सभी सहेलियों को कैसे जानती पहचानती?
उसने धीरे से कामिनी की तरफ नजर उठाई, कामिनी भी आंसू भरी आंखों से उसकी तरफ ही देख रही थी। उसे खुद को देखते हुए पाकर नंदिनी ने मुस्कुरा कर धीरे से हाथ जोड़ दिए । कामिनी ने भी उसकी तरफ हाथ जोड़ें और शेखर की तरफ देखने लगी।
इसी बीच प्रकाशक महोदय अपनी जगह पर खड़े हो गए…-” माफी चाहूंगा मैडम कि आपको इस वक्त कष्ट दिया… लेकिन मेरे पास भी कोई और उपाय नहीं था! हो सके तो आप जरा जल्दी कीजिएगा.. वैसे मैं हफ्ते भर और इंतजार कर सकता हूं। लेकिन आप तो समझती ही हैं।”
प्रकाशक के खड़े होते ही कामिनी भी अपनी जगह पर खड़ी हो गई थी। उसने हाथ जोड़े रखे थे, और नीचे जमीन की तरफ देख रही थी। उसने धीरे से “हां”में सिर हिला दिया और प्रकाशक उसकी तरफ हाथ जोड़कर बाकियों की तरफ एक बार देखकर वहां से बाहर निकल गया।
” हद है!!! यह इंसान है या सिर्फ व्यापारी? अभी भी इसे अपनी कहानी की सूझ रही है ? यह नहीं देख रहा कि उसकी लेखिका की क्या हालत है ? वह ऐसे ही अपने दुख से परेशान है… अब ऐसे में कहानी लिखना कैसे संभव है भला?”
सुरेखा की नाराजगी उसके शब्दों से झलक रही थी लेकिन कामिनी शांत ही बैठी थी। तभी वहां उपस्थित सभी लोगों के लिए जमना ताई एक बड़ी सी ट्रे में कॉफी लेकर चली आई….
सुरेखा के पास बैठी नंदिनी की भी नजरें कामिनी पर ही टिकी थी। कामिनी अपनी जगह से उठकर जमना ताई के पास चली गई । और अपने ही हाथों से उठाकर कॉफी सभी को पकडाने लगी।
कामिनी को नंदिनी और सुरेखा के साथ बातों में व्यस्त देख शेखर उठ कर उसी हॉल के बुकशेल्फ के आसपास टहलने लगा। वहां बुकशेल्फ के एक तरफ दराज को टेबल जैसे आकृति दी गई थी और जिसके नीचे एक पर्याप्त मोटे कुशन वाला रिवाल्विंग चेयर लगा हुआ था। उसके पास एक छोटी सी दराज़ में कलम् पेन पेंसिल आदि वस्तुएं रखी थी…. और उस टेबल के टॉप पर रखी थी एक डायरी!!!
शेखर ने वह डायरी उठा ली और उसे खोल लिया…..
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ऑफिस के अगले दिन सुहास अपने काम में लग गया था उसे वैसे भी रेनबो के ऑफिस से जितनी कुछ डिटेल चाहिए थी वह पर्याप्त मात्र में मिल चुकी थी। वह अपने लैपटॉप पर बैठा हुआ सुबह से अपने काम में डूबा हुआ था। जब कभी सुहास अपने काम में व्यस्त होता था तब उसे समय का पता ही नहीं चलता था । सुबह आठ बजे से लैपटॉप में बैठे सुहास को कब 2 बज गए मालूम ही नहीं चला, सारा उसके पास चली आई…- “कब तक यूं ही काम करने का इरादा है? आज खाना नहीं खाना?”
सुहास ने अपने हाथ में बनी घड़ी की तरफ नजर डाली दोपहर के ढाई बज रहे थे। वह मुस्कुरा कर खड़ा हो गया..-” सॉरी इतना काम था कि खाने का होश ही नहीं रहा।”
“चलो कोई बात नहीं! काम में ही व्यस्त हो। आओ चलो मैं आज टिपिकल साउथ इंडियन टैमेरिंड राइस लेकर आई हूं।”
“वाह तुम्हें कैसे पता कि मुझे टैमरिण्ड राइस बहुत पसंद है।”
” मोस्टली साउथ इंडियन्स को पसंद होता है ….तो बस गैस कर लिया।”
“तुम पंजाबी हो राइट।”
सारा ने “हां” में सिर हिलाया और अपना टिफिन लिए एक तरफ को निकल गई…. उसी के पीछे सुहास भी बाहर निकल गया। ऑफिस की कैंटीन में दोनों शांत बैठे थे। सारा ने हीं सुहास की प्लेट में चावल निकाल कर प्लेट उसकी तरफ सरका दी। सुहास कुछ दो चार निवाले खाने के बाद ही अपनी अम्मा को याद करने लगा…-, लग नहीं रहा एक पंजाबी लड़की के हाथों ने इतने कमाल के टैमेरिंड राइस बनाए हैं।”
सारा जोर से हंस पड़ी…..-” इसमें कौन सी बड़ी बात है? आजकल यूट्यूब में हर चीज अवेलेबल है! बस डिश का नाम सही डालो और प्रॉपर रेसिपी आपके हाथ में होगी।”
सुहास चुपचाप बैठ कर खाना खाने लगा… वो खा तो रहा था लेकिन उसके दिमाग में अब भी यहीं चल रहा था कि अघोरिया बाबा के पास ना जाकर उसने सही किया था या गलत?
सारा दो दिन से उसकी परेशानी देख रही थी… और शायद कुछ हद तक समझ भी रही थी…-” क्या हुआ कुछ परेशान हो सुहास?”
” ऐसी तो कोई खास बात नहीं?”
” लेकिन लगता नहीं कि कोई खास बात नहीं!! तुम्हारे चेहरे पर के बदलते रंग देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे किसी गहरी परेशानी में फंसे हुए हो। सुहास तुम चाहो तो मुझे बता सकते हो।”
” तुम्हें क्या बताऊं सारा? जब मैं खुद नहीं जानता कि मेरी परेशानी है क्या? मुझे खुद समझ नहीं आता कि जो मेरे साथ होता है, वह असल में हैलुसिनेशन हैं या कुछ पैरानॉर्मल?
“पैरानॉर्मल? क्या तुमने कुछ पैरानॉर्मल अनुभव किया है?”
” शायद!”
” मैं मानती हूं कि पैरानॉर्मल भी कुछ होता है …क्योंकि अगर चीजें नॉर्मल है तो एबनॉर्मल भी होती हैं… और अगर नॉर्मल एबनॉर्मल दोनों है तो पैरानॉर्मल क्यों नहीं हो सकती? मैं मानती हूं भूत प्रेत आत्माएं सब हमारे आस पास होती है… लेकिन हम हर कोई उन्हें देख पाए इतनी शक्ति हममें नही होती।
वह हमारे आसपास ही होती हैं , वह भी हमसे बातें करना चाहती हैं… हमें अपनी प्रॉब्लम्स बताना चाहती हैं… यहां तक कि कई बार हमारी प्रॉब्लम से हमें निकालना भी चाहती हैं। लेकिन हम बहुत बार बल्कि कहना चाहिए हमेशा ही उनकी बातों को उनके इशारों को समझ नहीं पाते।
किस्मत वाले होते हैं वह लोग जो उनकी बातें सुन पाते हैं समझ पाते हैं।”
” गलत कह रही हो सारा, जो लोग उस दूसरी दुनिया के लोगों की बातें सुन और समझ पाते हैं , वह कभी किस्मत वाले नहीं हो सकते… मैं तो कहूंगा उनसे ज्यादा बदकिस्मत और कोई नहीं होता।”
” क्या तुम उन्हें देख पाते हो? सुन पाते हो? समझ पाते हो? कि वह आत्माएं तुमसे क्या कहना चाहती हैं?’
आखिरी बात कहते हुए सारा की नजरें अजीब सी हो गई थी………
वो एकटक सामने बैठे सुहास को देख रही थी! उसकी आवाज का टोन उसका लय सब कुछ बदल चुका था। सुहास चौक कर सारा की तरफ देखने लगा…
” तुम्हें कैसे पता चला कि वह आत्माएं मुझे नजर आती हैं ? हालांकि उन्हें सुनने की कोशिश तो मैंने आज तक नहीं की… लेकिन उन आत्माओं ने हमेशा मुझे कुछ ना कुछ बताने की कोशिश जरूर की है
लेकिन आज तक मैं हमेशा डर कर भागता ही रहा। “
‘ तुम्हें उनकी बातें सुननी चाहिए… कोशिश करनी चाहिए.. उनकी बातों को सुनने और समझने की।
सुहास तुम नहीं जानते ऐसे तुम कितने लोगों की मदद कर सकते हो । अच्छा कोई इंसिडेंट बताओ जिसमें तुम्हें ऐसा लगा की तुमने किसी आत्मा को देखा हो या उसकी समस्याओं को सुना और समझा हो लेकिन मदद नहीं कर पाए। “
” वैसे तो ढेर सारे ऐसे इंसीडेंट्स हैं पर मुझे एक याद है । जब मैं अमेरिका में था उस वक्त मैं शायद स्कूल में ही था, हमारे घर से थोड़ा दूर पर एक पार्क था।
गर्मियों के दिन थे बहुत सुहाना मौसम था। बहुत दिनों बाद बर्फ पिघलने से लोग घरों से निकले थे। मैं भी उस पार्क में खेल रहा था। मुझसे कुछ दूरी पर ही अम्मा बैठी थी…. वहीं दूसरी बेंच पर एक औरत बैठी थी! एकदम गुमसुम!! उसके हाथों में सलाइयां थी और वह लगातार उन सलाइयों को चलाते हुए मोजे बुन रही थी।
उसका ध्यान सिर्फ अपनी उंगलियों पर था, उसकी गोद में ही उसका फोन रखा था जो लगातार बज रहा था, लेकिन वह सुन नहीं रही थी। और तभी उसकी बेंच के पीछे से एक 5 साल की छोटी सी बच्ची दौड़ती हुई मुझ तक आने लगी… मैं खेलते खेलते एक बरगद के पास पहुंच गया था। वह बहुत पुराना बरगद था। मैं वहीं थकान उतारने के लिए टिक कर बैठा था। वह बच्ची भागती भागती मुझ तक चली आई, और मेरे देखते-देखते उस बड़े से बरगद के अंदर चली गई।।
मैं देखता रह गया…. मुझे ये बात समझ में नहीं आई कि वह कहां गई? मैंने देखा उस पेड़ के पास एक छोटा सा होल बना था शायद चूहों या गिलहरियों के आने जाने के लिए।
हो सकता है ठंड वाले जीव जंतु वहां हाइबरनेट करते रहे होंगे । और अब ठंड खत्म होने के बाद उस गड्ढे को खोदकर बाहर निकल आये हों, लेकिन यह गड्ढा बाहर से देखने पर इतना बड़ा नजर नहीं आ रहा था, जिसमें एक 5 साल की बच्ची अंदर जा सके । मैंने धीरे से उस गड्ढे के ऊपर पेड़ के ऊपर देख वहाँ हाथ लगाया । वहां पेड़ और उस छेद के पास अजीब सा कोटर झांकता नजर आया। उसके अंदर हाथ डाल कर देखने पर वो अंदर से खोखला था। मैंने धीरे से उसके अंदर हाथ डालने की कोशिश की और यह मेरे लिए बहुत बड़े आश्चर्य की बात थी कि हाथ के बाद मेरा सिर भी उस पेड़ के अंदर चला गया। और वहां मैंने जो देखा कि मेरी रूह कांप गयी। पेड़ के अंदर उस कोटर में एक पांच छै साल की बच्ची का कंकाल पड़ा था।
वैसे तो बाहर से नही पता चल रहा था पर पेड़ की काफी गहरी गहरी जड़े थी, लेकिन अंदर इतनी जगह थी जहां एक पांच साल की बच्ची जाकर बैठ सकती थी।
शायद वह बच्ची वही थी जो कुछ समय पहले दौड़ते हुए उस पेड़ के अंदर गई थी, लेकिन अब उस बच्ची का सिर्फ कंकाल वहां पड़ा हुआ था।
हां वह भागते समय जिस छोटी सी डॉल को पकड़ी हुई थी वह डॉल मैली कुचली से उसके हाथ में मौजूद थी लेकिन वह बच्ची अब जिंदा नहीं थी।
मुझे यह दृश्य देखकर अंदर से झुरझुरी सी दौड़ गई। मैंने तुरंत अपना सर बाहर किया और उस औरत की तरफ देखने लगा। बच्ची शायद उस औरत की बेटी थी। मुझे बिल्कुल समझ में आ रहा था कि मैं क्या करूं ? मैंने अपनी अम्मा को देखा, अम्मा उस वक्त तक यह समझने लग गई थी कि मुझे कुछ समस्याएं हैं। और जिन समस्याओं से मैं अकेले ही जूझ रहा हूं। मेरी अम्मा तुरंत मुझ तक चली आई और मुझे पानी पिला कर वहां से उठाकर ले जाने लगी। जाते-जाते मैं एक पल को रुका वापस लौटा और उस औरत के पास आकर खड़ा हो गया। मैं उसकी बेंच के ठीक पीछे खड़ा था। मैं देख पा रहा था कि वह मोज़े जो वो सुबह से बना रही थी अब उन्हें उधेड़ रही थी… इसके साथ ही उसके मोबाइल पर बार-बार किसी का फोन आ रहा था। और उस फोन के साथ ही उसके मोबाइल पर एक तस्वीर उभर रही थी। वह तस्वीर उसी बच्चे की थी। जाने क्यों मुझे उस औरत को देखकर उसके फोन को देखकर और उस बच्ची की कंकाल को देखकर समझ आ गया था कि शायद कुछ सालों पहले वो औरत अपने बच्चे के साथ यहीं बैठा करती होगी, और वह बच्ची दुर्घटना वर्ष उस पेड़ के अंदर कहीं फंसी रह गई थी…
उसे खोजने की सारी तरकीबें नाकाम हो चुकी थी और आज वह बच्ची नहीं उसका कंकाल अंदर बचा था। उसकी मां आज भी उसी पार्क में उसी जगह पर बैठे अपने बच्चे की राह देखते वही मोजे बन रही थी। दिनभर बनाना और शाम को उधेड़ कर वापस घर चले जाना। अब शायद उसकी यही नियति रह गई थी। इतना सब समझ में आ जाने के बावजूद मुझसे कुछ भी नहीं कहा गया। मेरा डर मुझ पर इतना हावी होने लगा था कि मैं अपनी अम्मा की बांह पकड़ कर घर चला गया और उसके बाद उस पार्क में मैंने भूलकर भी कदम नहीं रखा।”
” काश तुमने थोड़ी सी हिम्मत की होती तो वो औरत अपनी गुमी हुई बच्ची का सच जान पाती। “
” तुम सही कहती हो सारा । काश मुझे उनकी मदद कर पाने की हिम्मत पहले मिली होती पर खैर मौके तो और भी मिलेंगे।”
” वह तब मिलेंगे जब तुम किसी की मदद करना चाहोगे। लेकिन अगर तुम अघोरिया बाबा के पास चले गए और तुम ने वापस वह धागा बनवा लिया तो तुम जैसे किसी की मदद कर पाओगे।”
” तुम सही कह रही हो सारा। मुझे अब हिम्मत से काम लेना होगा । मैं समझ गया हूं कि आत्माएं मेरे पास अपनी समस्याएं लेकर आती हैं और मुझे इन्हें सुलझाने में उनकी मदद करनी चाहिए।”
” बिल्कुल सुहास तुम्हें मौका मिला है, कि तुम उस दूसरी दुनिया के लोगों को भी राह दिखा सकते हो। उन्हें भटकने से बचा सकते हो ,तो तुम क्यों इस मौके का फायदा नहीं उठाते ? आज उनकी मदद करके देखो कल हो सकता है वह कहीं किसी दिन तुम्हारे काम आ जाए।”
“, ऐसा तो कोई लालच नहीं है मुझे… लेकिन तुम्हारी बात मान कर अब मैं कोशिश करूंगा कि अगर मुझे कोई आत्मा नजर आती है तो तसल्ली से बैठकर उसकी बात सुन सकूं थैंक्यू सारा।”
” थैंक्यू मुझे कहना चाहिए तुमसे।”
मुस्कुराते हुए सारा वहां से बाहर चली गई। सुहास भी अपनी कुर्सी पर बैठे मुस्कुराने लगा। उसने बहुत दिनों बाद एक चैन की सांस ली थी। आज उसने तय कर लिया था कि अब वह खुद से मिलने वाली आत्माओं की दास्तान सुनेगा और उनकी समस्याओं को सुलझाने की पूरी कोशिश करेगा। उसने अपने दोनों हाथ सिर के पीछे बांधे और चैन की सांस लेते आंखे बंद कर अपनी रिवाल्विंग चेयर इधर से उधर घूमाते हुए सोचने लगा। वह अपने विचारों में मगन था कि तभी उसके दिमाग में आया कि उसने अघोरिया बाबा और उस काले धागे के बारे में सारा से तो कुछ नहीं कहा था। आखिर सारा अघोरिया बाबा और उस काले धागे के बारे में कैसे जानती थी।
सुहास ने चौक कर आंखें खोल दी। अपनी जगह से उठ कर वो तुरंत सारा के केबिन की तरफ भागा। उसे सारा से ये बात जाननी थी, पूछनी थी, लेकिन सारा का केबिन लॉक था। वह वापस बुझे मन से अपनी क्यूबिकल में आ गया। उसने अपना लैपटॉप बैग के अंदर डाला और कंधे पर टांग कर ऑफिस से बाहर निकल गया…..
क्रमशः
aparna…..
