जीवनसाथी -3 भाग -72

जीवनसाथी -3 भाग -72

जीवनसाथी by aparna

    कहते हैं मुहब्बत की राहें आसान नहीं होती…
मुहब्बत में पड़े लोगों के लिए सब कुछ ही कठिन हो जाता है.. पहले खुद स्वीकार करना की उन्हेँ मुहब्बत है, उसके बाद जिससे हैं उसके सामने स्वीकार करने में तो मौत आती है..

और कहीं यहां तक का रास्ता आसानी से निपट गया, तब आती है घर वालों को मनाने की पारी….
पहले दो मोड़ कठिन होते हुए भी पार हो जाते हैं, लेकिन इस तीसरे मोड़ पर अक्सर प्यार करने वालों की गाड़ी यू टर्न ले लेती है….

राजमहल की नयी जनरेशन के मुहब्बती किस्सों में अब यूटर्न की बारी आ गयी थी…

******

मंदिर से लौटने के बाद महल की राजसी औरतें साथ बैठी शाम की चाय पी रही थी..
वैसे तो अमूमन जया की सास यानी युवराज और राजा साहब की बुआ इस बैठक का हिस्सा नहीं होती थी, लेकिन इधर कुछ दिनों से वो बराबर उन सब के साथ बैठने लगी थी…

महल के सारे रॉयल किड्स अपने अपने काम में व्यस्त थे… हर्ष मीठी को छोड़ने उसके घर गया हुआ था.. शौर्य और धनुष यश के साथ राजा साहब के ऑफिस के दूसरे हिस्से में जहाँ हर्ष का ऑफिस था, में बैठे कुछ कर रहे थे..
विक्रम भी उनके साथ था..
कली वहीँ बैठना चाहती थी, लेकिन मीरा उसे अपने साथ खींच कर ले गयी..
मीरा उस महल के सौंदर्य में डूबी हुई थी.. उसे ऱोज़ महल का हर एक हिस्सा चमत्कृत करता रहता था….

ना महल के सुस्वादिष्ट भोजन से उसका मन भर रहा था, और ना महल की अलियो गलियों  से..
उसका बस चलता तो वो रात दिन बस घूमती ही रहती..

आज भी कली को साथ लिए वो खींच कर अपने साथ ले गयी..

“चल न यार, तू भी कहाँ उन बोरिंग कम्प्यूटर हैक्स को देखने बैठी है.. ये धनुष तो पता नहीं कम्प्यूटर खोल कर रात दिन क्या करता रहता है..
मेरा तो इन लोगो की बातें सुन कर ही दिमाग घूम जाता है.. !”

“वो लोग हर्ष सर की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों का पता लगा रहे हैं ! मुझे तो अच्छा लगता है उन लोगो का इतनी शिद्दत से अपने भाई की सुरक्षा के लिए काम करना !”

“वो सब छोडो कली, आओ मैं तुम्हे कुछ दिखाती हूँ..

वो कली का हाथ थामे उसे तेज़ी से एक तरफ ले चली..

महल के अलग अलग हिस्सों के अलग अलग नाम भी थे..
जिस हिस्से की तरफ फ़िलहाल मीरा कली को लिए जा रही थी, वो हिस्सा मुख्य महल से अलग था..

महल की पिछली तरफ बनी ये पन्द्रह बीस कमरों की इमारत पूरी तरह से सफ़ेद संगमरमर से बनी थी…
रंगीन कांच की बेहतरीन कारीगरी के साथ ही हर दीवार पर लगे कांच के बड़े छोटे टुकड़े हर तरफ खुद का प्रतिबिम्ब दिखाते खुद के ही हर तरफ होने का आभास करवाते थे..

मीरा तेज़ी से उस मीनार की तरफ बढ़ रही थी.. साथ ही बीच बीच में कली का हाथ खींचती चल रही थी..

“यहां क्या है मीरा ?”

“अरे आओ तो सही…. इतना सुंदर है ये महल… अपने कमरे से देखा था मैंने, कल भी शाम को आयी थी इधर.. तब एक दुष्ट औरत ने भगा दिया था, अंदर नहीं जाने दिया था..

“तो अब क्यों जाना चाहती हो.. डाँट खाने का भी तुम्हे गजब शौक है मीरा !”

साथ साथ रहते मीरा और कली में ठीक ठाक बातचीत होने लगी थी..

“मुझे ये महल ज़रा रहस्यमयी लगता है… !”

“क्या.. लेकिन क्यों ?”..

“कल जब मैं इस तरफ आयी थी, तो उस महल की खूबसूरती देख मैं अंदर जाने की सोच ही रही थी कि पता नहीं कहाँ से एक गार्ड धमक पड़ा.. वो तरह तरह के सवाल कर रहा था कि तभी अंदर से एक दबंग महिला बाहर चली आयी..
वो मेरी बात सुने बिना ही मुझे यहां से जाने कहने लगी.. मैंने बस इतना कहा कि मुझे अंदर जाकर देखना है। कैसा है ये महल, तो कहती है बाकी महलों जैसा ही है.. कुछ खास अंतर नहीं है.. !”

“और उसके ऐसा बोलने और तुमको यहां से भगाने के बाबजूद तुम्हारे अंदर यहां आकर घूमने की इच्छा और प्रबल हो गयी.. है ना ?”

मीरा ने शैतानी से हाँ में सर हिला दिया..

और कली का हाथ थामे उस महल की सीढ़ियां तेज़ी से  चढ़ने लगी…

वो लोग अभी आखिरी सीढ़ी पर पहुंचे थे कि वही जेलरनुमा शक्ल वाली औरत जाने कहाँ से प्रकट होकर उन दोनों के सामने चली आयी..

“तुम फिर वापस आ गयी ?”

“वो बस हमे.. देखना था.. !”

“क्या देखना था ?”

“ये महल !”

“एक बार में समझ नहीं आता क्या ? जैसे बाकी के महल हैं, वैसा ही ये महल भी है.. कुछ अंतर नहीं है इसमें और बाकियों में..
आपको दक्षिण की तरफ बालमहल में जाना चाहिए.. इस महल के बच्चे जब छोटे थे, तब उनके लिए बनवाया गया था..।
राजा साहब, युवराज सा और राजकुमारी भुवनमोहिनी वहीँ खेल कर बड़े हुए हैं… उसे फिरोज़ी महल की संज्ञा दी गयी है.. बिलकुल इसी महल की तरह वहाँ खूब सारे रंगीन कांच से दीवारों को सजाया गया है.. ।

एक बार उस महल को देखने के बाद आप बाकी जहाँ की खूबसूरती भूल जायेंगे !”

मीरा बड़े ध्यान से सब सुनने का अभिनय कर रही थी। और अपने चेहरे को ऐसे बना रही थी जैसे उस लठैत की बातों से अभिभूत हो चली हो..।

“वाकई.. ? हम वहाँ भी जायेंगे.. लेकिन इस महल..!”

“नहीं यहां अतिथियों का जाना मना है !”

उस औरत के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
पथरीली सी आवाज़ में वो उन लोगो से बात कर रही थी, लगभग पांच फ़ीट आठ इंच की लम्बाई के साथ बदन भी कसरती था..।
सपाट चौरस चेहरे को कस कर पीछे बांध रखे बालों ने और चौरस कर दिया था..।
सख्ती से भिंचे होंठ जैसे सिर्फ काम की बात बोलना चाहते थे..
वो औरत गार्ड की वर्दी में थी.. और उसकी पेण्ट पर लगी बेल्ट से झांकता उसका गन कवर साफ़ देखा जा सकता था..

कली ने धीमे से उस तरफ मीरा का ध्यान दिलाना चाहा, लेकिन किसी ज़िद्दी बालिका सी मीरा उस महल को घूमने की ज़िद पर अड़ी थी..
तभी सीढ़ियों के बगल में बनी लिफ़्ट खुल गयी..

वो लिफ़्ट बाहर से नजर ही नहीं आ रही थी.. यूँ लग रहा था दीवार का ही एक हिस्सा है..
उसके खुलते ही अंदर से एक दुबली सी लड़की बाहर चली आयी..
उसने सफ़ेद कोट सा ऊपर डाला हुआ था.. वो उस दबंग महिला तक आयी और अपने जेब से निकाल कर एक पर्ची उस औरत को थमा दी..

“ये सब सोल्यूशन ख़त्म हो गया है, दो इंजेक्शंस भी मंगवाने पड़ेंगे..

अपनी बात खत्म कर वो वापस रोबोट की तरह मुड़ी और चली गयी.. एक बार फिर वो लिफ़्ट में समा गयी..

“हैं… इसका मतलब यहाँ कोई रहता भी है ?”

मीरा के इस सवाल पर उस औरत ने क्रूरता से मीरा की तरफ देखा और उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया..

“माफ़ कीजियेगा लेकिन महल के अतिथियों से हमे गुस्ताखी करने का अधिकार नहीं है वरना अब तक.. ।”

“आप तो सरेआम धमका रही हो मुझे ?”

मीरा ने उस औरत से कहा..

“हाँ धमका रही हूँ.. तो ? क्या कर लेंगी आप.. अब आप दोनों से करबद्ध प्रार्थना है, जाइये यहां से !”

उस औरत ने एक तरह से मीरा को हल्का सा धक्का देकर एक सीढ़ी उतरने पर मजबूर कर दिया..

कली इतनी देर से भयत्रस्त खड़ी थी.. उसे मीरा का इस कदर अंदर घुसने की चेष्टा करना पसंद नहीं आ रहा था.. वो तेज़ी से सीढ़ियां उतर कर वहाँ से निकल गयी..

“अरे रुको तो.. सुनो.. मेरी बात तो सुनो.. ” की पुकार लगाती मीरा भी कली के पीछे वहाँ से निकल गयी….

****

महल की रॉयल लेडीज़ बैठी चाय पी रही थी कि जया ने ही बात छेड़ दी..

“रानी सा… अब क्या सोचा है हर्षवर्धन के लिए  ?”

रूपा का चेहरा बुझ गया..
वो प्रियदर्शिनी और हर्षवर्धन के विवाह के लिए जितनी उत्सुक थी, अब उतनी ही विरक्त नजर आने लगी थी.. ।
हमेशा की हंसती चहकती रूपा का ऐसे शांत बुझा बुझा सा रहना महल की किसी महिला को पसंद नहीं आ रहा था..

“वक्त आने पर इसका भी कोई हल मिल ही जायेगा !”

बांसुरी ने कहा..

“हाँ, लेकिन उम्र भी तो बढ़ रही है…. कायदे से इस उम्र तक राजकुंवर का विवाह होकर उनका राज्याभिषेक हो जाना था ! अब राजा साहेब के बाद हर्ष या शौर्य ही तो गद्दी पर बैठेंगे !”

अबकी बार ये बात बुआ जी ने कही…
उनकी बात बांसुरी को पसंद नहीं आयी..

“लेकिन हर्ष की मर्ज़ी भी तो होनी चाहिए… बिना उनकी मर्ज़ी जाने उनका कहीं भी विवाह कर देना या उन्हेँ राजगद्दी पर बिठाना कितना उचित है ? जब वो पहले ही अपना मन बता चुके है ?”

बांसुरी का कहने का तात्यपर्य हर्ष की बिना मर्ज़ी की शादी से था, लेकिन बुआ जी ने बात को जानबूझ कर गलत तरीके से तोड़ मरोड़ दिया..

“हाँ हम समझते हैं, शौर्य भी राजगद्दी में बैठने योग्य है.. वैसे पहले की परिपाटी देखी जाए तो राजा का बेटा ही राजगद्दी पर बैठने का उत्तराधिकारी होता था। वैसे  राजा अजातशत्रु के बाद शौर्य ही राजगद्दी में बैठने का असली हकदार है।  लेकिन जैसा अजातशत्रुऔर युवराज आपस में अपना प्रेम दिखाते हैं, उसके अनुसार तो इस महल के बड़े राजकुमार को ही राजगद्दी मिलनी चाहिए।
    और उस हिसाब से हर्षवर्धन ही राजगद्दी के उत्तराधिकारी होते हैं..।
बाकी मैं भले ही इस घर की बेटी हूं, लेकिन मुझसे कहीं ज्यादा हक अब तुम सभी का है। इसलिए तुम सब जो भी निर्णय लोगी वही मान्य होगा..।”

” नहीं फुफू साहब, आपने गलत समझा। मेरा कहने का वह मतलब नहीं था। मेरे लिए तो हर्ष और शौर्य दोनों ही बराबर है। दोनों में से जो भी राजगद्दी पर बैठेगा, मुझे बराबर ही खुशी मिलेगी। मैं तो सिर्फ हर्षवर्धन की इच्छा की बात कर रही थी। उसके विवाह की बात कर रही थी। मुझे ऐसा लगता है कि अगर भाभी साहब अनुमति दें तो एक बार मैं निरमा से बात कर सकती हूं..!”

“निरमा से ?” बांसुरी की बात पर रूपा उसे चौंक कर देखने लगी…

” भाभी साहब,ये पूरी तरह से मेरे मन की बात है। हो सकता है आपको यह बात कम पसंद आए, लेकिन मुझे इतना विश्वास तो है कि आप मेरी बात को सिरे से नहीं नकारेंगी। मुझे शुरू से ही हर्षवर्धन के लिए मीठी बहुत पसंद है।
    आपने प्रियदर्शनी का रिश्ता पहले ही चुन लिया था। इसलिए मैं कुछ कह नहीं सकी। लेकिन तब भी मेरा मन मीठी पर ही लगा हुआ था। आप कभी ध्यान दीजिएगा, हर्षवर्धन जितना सहज मीठी के साथ रहता है उतना और कहीं नहीं..।”

बांसुरी की बात वहां बैठी किसी महिला को पसंद नहीं आयी..
सभी राजपरिवार की महिलाएं थी..।

उनके लिए राज परिवार के सबसे बड़े राजकुमार का रिश्ता किसी राजसी परिवार में ही होना उपयुक्त था.. भले ही प्रेम और निरमा आज धनाट्य लोगों में से एक थे बावजूद प्रेम का ओहदा हमेशा ही राजा साहब के सिक्योरिटी गार्ड का ही रहेगा, और इस लिहाज से रूपा की नजर में प्रेम हमेशा ही राजा के अधीन काम करने वाला सेवक था। और किसी सेवक की पुत्री से अपने लाडले राजकुमार का ब्याह वो नहीं कर सकती थी। रूपा के चेहरे पर भी असमंजस के भाव थे।

बांसुरी ने हर्ष और मीठी के बचपन में उन लोगो के रिश्ते की बातों को कितनी गंभीरता से अपने दिल में बैठा लिया था। लेकिन आज जब उसने इस बात को वापस कहा तो यह सभी महिलाएं एक दूसरे को देखने लगी थी। जैसे आपस में एक दूसरे से पूछ रही हो कि बांसुरी को क्या हो गया है?
सबसे पहले जया ही बोल पड़ी,

” ऐसा कैसे संभव है बांसुरी?”

” क्यों ?”

बांसुरी चौक कर बोल बैठी।

” मीठी राज परिवार की नहीं है।”

अबकी बार रेखा ने जवाब दिया।

” ऐसे तो मैं भी राज परिवार की नहीं हूं ना रेखा,।”

बांसुरी ने प्रति उत्तर दिया।

” तुम्हारा मामला अलग था बांसुरी, राजा साहब तुमसे प्रेम करते थे। और तुमसे विवाह के लिए भी उन्हें पूरे घर से और अपनी मां साहब से भी बगावत करनी पड़ी थी। तुम्हें क्या लगता है, तुम इतनी आसानी से महल में प्रवेश कर गई? राजा साहब को पता नहीं कितने पापड़ बेलने पड़े थे तुमसे विवाह की मंजूरी के लिए..।”

रेखा के इस जवाब पर बांसुरी कुछ नहीं बोल पाई।
उसने तड़प कर रूपा की तरफ देखा, उसे एक उम्मीद थी कि रूपा शायद उसकी बात समझ पाए…

“तुम राज परिवार की नहीं होना, बांसुरी इसीलिए तुम यह बात कह पा रही हो..।”

रूपा का यह जवाब बांसुरी का हृदय कचोट गया। लेकिन उसने भी हिम्मत नहीं छोड़ी।
आखिर ऐसे ही थोड़े ना वह जिलाधीश के पद पर विराजमान रही थी, सालों काम कर चुकी थी..।

“मैं मानती हूं कि मैं राज परिवार से नहीं हूं। आप लोगों के खून में और मेरे खून में अंतर है, यह भी मान लिया। लेकिन इतने सालों की शादी में कभी आपको ऐसा लगा की मेरी वजह से आपके महल का कतरा भर भी बिगड़ा हो..
डेढ़ साल की कड़ी मेहनत के बाद पाया प्रशासनिक पद भी मैंने महल के कारण छोड़ दिया।
वरना आज ठाठ से सचिवालय में किसी बड़ी पोस्ट पर काम कर रही होती।लेकिन मैंने अपने व्यक्तिगत उत्थान की जगह महल को प्रमुखता दी। क्या अगर मेरी जगह आपमें से कोई रॉयल लेडी होती तो, वह भी यही करती? मैं बस यह जानना चाहती हूं कि क्या मैं एक आम लड़की थी इसलिए मैंने यह निर्णय लिया ?
मुझे तो लगता है आप में से भी कोई अगर प्रशासनिक पद पर पहुंचता, और उस समय महल या अपने करियर में से किसी एक को चुनना होता तब, आप भी यही निर्णय लेती। लेती ना?”

सारी औरतें एक दूसरे का मुहं देखने लगी..

    ” तो अब  यह बताइए कि जब निर्णय क्षमता में, सामाजिक सरोकारों में, अपनी कर्तव्यों के पालन में, मैं कहीं भी कोताही नहीं बरतती तो एक आम लड़की रॉयल लेडिस से अलग कैसे हो गई?
आप लोग मीठी पर भरोसा क्यों नहीं कर सकते? जब मुझ पर भरोसा कर लिया रूप भाभी साहब!

आप तो शुरू से मेरे साथ जुड़ी है..
मेरे जीवन की हर तकलीफ में आप साक्षी रही है! आपने देखा है कि कैसे मैं और राजा साहब ने अपने जीवन की कठिनाइयों को एक दूसरे के प्यार से भर दिया। इसके बाद भी क्या आज भी आपके मन में है कि मैं एक आम लड़की हूं, और इस राज परिवार का हिस्सा होने के योग्य नहीं हूं..?”

“हमारे कहने का यह मतलब नहीं था बांसुरी। हम बस इतना कहना चाहते हैं कि जो भी कह लो, लेकिन आखिर मीठी प्रेम और निरमा की बेटी है..।”

रूपा ने दुखी मन से कहा..

“प्रेम भाई साहब तो बचपन से ही इस महल का हिस्सा रहे हैं..
बल्कि मेरे हिसाब से तो वह भी राज परिवार का ही एक हिस्सा है। उनकी परवरिश भी बिल्कुल राज परिवार के और बच्चों की तरह हुई है। और इसलिए मुझे तो वह राजसी ही लगते हैं..।
निरमा और प्रेम भाई साहब का जीवन भी कोई आम जीवन नहीं है। उनके घर पर भी नौकरों की फौज है। निरमा काम जरूर करती है, लेकिन पैसों के लिए नहीं। अपनी स्वयं की स्वतंत्रता और अपने अस्तित्व के लिए प्रेम भाई साहब चाहते थे कि निरमा अपने पैरों पर खड़ी रहे।
   निरमा खुद भी यही चाहती थी, और इसलिए वह नौकरी करती है, वरना उसे पैसों की कोई कमी नहीं। उसके घर का खान-पान भी बिल्कुल हमारे घर के खान-पान जैसा है। मीठी की कोई ऐसी इच्छा नहीं रही होगी जो उसके माता-पिता ने कभी पूरी नहीं की। उसे भी बिल्कुल लाड प्यार से राजकुमारी की तरह पाला है उसके माता-पिता ने..।”

बांसुरी की इस बात पर बुआ धमक कर खड़ी हो गई..

“तुम्हें बात समझ में ही नहीं आ रही है बांसुरी। ठीक है आज तुम राजा अजातशत्रु की पत्नी हो, रानी हो महल की। इसका मतलब यह नहीं कि मीठी के लिए भी महल के द्वार खोल दिए जाए..
जितना भी तुम बातों से मिश्री घोलने की कोशिश कर लो, लेकिन प्रेम महल का नौकर ही है,और हमेशा रहेगा…
हां अगर मीठी, प्रेम की नहीं सिर्फ निरमा की बेटी होती तो एक बार यह सोचा जा सकता था!
यहां तक की प्रेम का एक भाई भी था ना प्रताप ! उसकी भी बेटी होती मीठी तो भी हम सोच सकते थे, लेकिन प्रेम की बेटी, एक नौकर की बेटी इस महल के राजकुमार की पत्नी नहीं बन सकती..!

यह इस राज परिवार का नियम है कि नौकर का बच्चा राजशाही का हिस्सा कभी नहीं बन सकता! और अगर उस नौकर की लड़की से हर्षवर्धन की शादी हुई तो हर्षवर्धन को महल से निकाल दिया जाएगा..

यानी हर्षवर्धन को महल छोड़ना होगा !!

क्रमशः

aparna…

5 2 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

3 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Abhishek kr singh
Abhishek kr singh
1 year ago

बांसुरी पड़ गई औरतों की पंचायत में ये सब राजसी महिलाएं अपने मन की चलाने वाली औरतें हैं, बड़ी धमक से उठ के फुफू साहब कहती है महल छोड़ना पड़ेगा, जैसे उसके पति का घर हो, दूसरे के घर मे ठाठ से घूम रही है, चंट है टोटल सीजन वन के सेकेंड हीरो को नौकर कह रही है, मूढ़ बुद्धि, लड़का तो पहले ही हामी भर दिया है, क्या करेगा काज़ी।
और उस महल में क्या हो रहा है, हमें जानना है, तब तक नाइस पार्ट दीदी…💐🙏

Manu verma
Manu verma
2 years ago

फाइनली हर्ष और मीठी ने अपने दिल की बात एक दूसरे से कह दी, ना कोई तोहफा, ना ही फूल बस मन के भाव और आंसूओ की बरसात बेहद खूबसूरत पल 👌👌👌पर क्या इनके प्यार की राहें इतनी आसान होंगी 🤔रूपा भाभी क्या इनके रिश्ते क़ो स्वीकार करेंगी …. ये सब शायद ही इतना आसान है पर फिर भी …. देखते है आगे क्या होता है।

दूसरी तरह धनुष और शौर्य भी कोशिश में लगे है कैसे भी वाणी क़ो भड़काने वाले बंदे का पता लगाने के लिए… बहुत जल्दी वो भी सामने आ ही जाएगा।
चलो देखते है हर्ष और मीठी के रिश्ते में कौन राज़ी होता है और कौन नाराज़ 😊इश्क की राहें इतनी आसान कहाँ।
बहुत खूबसूरत भाग 👌👌👌🙏🏻।

नीलम मिश्रा

बहुत ही अच्छा लगा जीवन साथी का अगला भाग पाकर धन्यवाद अपर्णा जी