जीवनसाथी -3 भाग -55

महल की बड़ी रानी सब जिन्हें अब उनके पति के अलावा लगभग पूरा महल रानी साहब कहा करता था, आज बेहद खुश थी! आज उनके दोनों लाडले वापस आ रहे थे!
रूपा ने बचपन से ही हर्ष को जितना प्रेम दिया था, उतना ही शौर्य को भी प्रेम किया था। दोनों के प्रेम में उसने कभी कोई भेदभाव नहीं किया था। उनके लिए हर्ष और शौर्य दोनों ही बराबर थे।
शौर्य का वह बचपन जब कुछ समय के लिए उसकी मां उससे दूर चली गई थी, वह हर एक पल शौर्य ने रूपा की गोद में ही बिताया था। ऐसे में रूपा उसे अपना छोटा राजकुमार ही मानने लगी थी। और उसके मन की वह अनुभूति आज भी जस की तस थी..।
शौर्य के प्रति उनके लाड़ के बीच में कभी भी राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी भी नहीं आया करते थे…।
रानी रूपमती ने पूरे महल को बिल्कुल ऐसे सजवा दिया था जैसे दिवाली आ रही है। उनके लिए उनके लाडलो का घर आना हर बार दिवाली ही हुआ करता था। वह शुरू से नहीं चाहती थी कि कभी भी उनके बच्चे महल छोड़कर बाहर निकले, लेकिन रियासत में रहते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त करना मुश्किल ही था। और हर्ष और शौर्य दोनों ही बाहर रहकर ही पढ़ते आए थे..।
यश और परी फिर भी बहुत समय तक महल रहे थे, लेकिन हर्ष और शौर्य बहुत जल्दी बाहर निकल गए थे..। दोनों ने ही विदेश से भी पढाई की थी, और यही वो समय था जब रूपा उन दोनों को याद कर कर के बीमार भी पड़ गयी थी….।
आज उन पुरानी बातों को भुला कर वो अपने लाड़लो के स्वागत में तैयार खड़ी थी..
गाड़ियों का काफिला एक-एक कर महल के मुख्य गेट से होकर अंदर प्रवेश करने लगा। महल के मुख्य गेट पर मौजूद दस फीट की प्रतिमाओं को देखकर कली की आंखें खुली की खुली रह गई थी।
गेट के दोनों तरफ द्वारपाल की आकृति की दस फुट की मूर्तियां खड़ी थी, उन्हें नीचे से ऊपर तक देखी कली उन में खो गयी थी..।
गेट से अंदर जाते ही बड़े से राजसी उपवन में गोलाकार रास्ते को तय करती गाड़ियां आगे बढ़ रही थी….
दोनों तरफ पानी के फव्वारे धीमे धीमे इंग्लिश धुन पर थिरक रहे थे, उस पर रंगबिरंगी लाइट्स का जलना बुझना और भी खूबसूरत लग रहा था..।
दूर दूर जहां तक नजर जा रही थी, एक से बढ़कर एक फूल खिले हुए थे। उस बगीचे को देखकर सहज ही आभास हो सकता था कि राजा महाराजाओं के महल के सामने के बगीचे को उपवन की संज्ञा क्यों दी जाती थी। पेड़ पौधों को इतनी सुंदरता से लगाया गया था कि सारे एक रंग के पौधे और फूल एक तरफ थे, उसके बाद दूसरे रंग के फूल और इसी तरह ऐसा लग रहा था इन रंगीन फूलों को देखकर कि आसमान से इंद्रधनुष उस बगिया में उतर आया है। और इसके साथ ही उन फूलों पर मंडराती तितलियां, पेड़ों पर चहचहाते पंछी, एक अलग ही संगीतमय वातावरण बना रहे थे। कली को यह सब लंदन में देखने नहीं मिलता था।
वह मंत्र मुग्ध सी एक-एक चीज को अपनी आंखों में कैद करती जा रही थी।
एक लंबी परिक्रमा के बाद वह लोग महल के मुख्य द्वार तक पहुंचे, महल के शानदार मुख्य द्वार के ठीक सामने गाड़ियों का काफिला एक-एक कर राजसी परिवार को उतार कर आगे बढ़ने लगा। उनकी गाड़ी भी आगे बढ़ी और वह लोग नीचे उतर गये।
उन्हें उतारने के बाद उनकी गाड़ी वहां से आगे निकल गई। वहां तक पहुंचने के पहले उसने अपने बगल में बैठी मीरा को जगा दिया था….
सम्मोहित सी कली गाड़ी से उतरकर महल को देखने लगी। महल आम हिंदुस्तानी महलों से बहुत अलग बना हुआ था। कुछ कुछ यूरोपियन शैली में बने महल के मीनार ऊपर की तरफ गोलाकार जरूर थे, लेकिन नीचे बने बड़े-बड़े पिलर्स में पुरुष आकृति उकेरी गई थी..
सामने की तरफ दूर-दूर लेकिन एक ही पंक्ति में 10 से 12 खंभे पुरुष आकृति में बने थे। यह ऊंची ऊंची चौड़ी पुरुष प्रतिमाएं अपने कंधों पर ऊपर की छत को थामे हुई थी।
ऐसा लग रहा था दस बारह पुरुष एक सीध में साथ साथ बैठे उस महल को अपने कंधे पर उठाए हुए हैं।
उन अद्भुत कलाकृतियों को देखते कली की नजर ढेर सारी सीढ़ियों के ठीक ऊपर खड़ी बड़ी रानी पर टिक गई।
उन सब को देखकर बड़ी रानी साहिबा नीचे उतरने लगी। उनके साथ उनके सहायकों की फौज थी। हल्की गुलाबी सलमा सितारे जड़ी पोशाक में महारानी रूपा बहुत सुंदर लग रही थी। उनकी सुंदरता में इन कुछ सालों में इंच भर भी फर्क नहीं आया था।
जब बांसुरी पहली बार महल में आई थी, तब रानी रूपा को उसने एक लजीली बहू के रूप में देखा था।आज वह बहू इस महल की महारानी हो चुकी थी। चेहरे पर एक गर्व की भावना जरूर थी, लेकिन आज भी बालों की एक लट भी सफेद नहीं हुई थी, चेहरे पर वही तेज था जो आज से कुछ साल पहले था…
और महारानी रूपा को टक्कर देते महाराज युवराज सिंह बुंदेला खड़े थे। दोनों की जोड़ी एक दूसरे को कॉम्प्लिमेंट कर रही थी…।
महारानी रूपा ने सबसे पहले राजा अजातशत्रु और बांसुरी के माथे पर तिलक किया और उन दोनों की एक साथ आरती उतारने के बाद दोनों का मुंह मीठा करवाने के बाए उनकी नजर उतारी और अपने ठीक पीछे खड़ी सहायिका को वह रुपए देने के बाद आरती की थाली लिए वह मुस्कुरा कर हर्ष की तरफ घूम गई।
राजा अजातशत्रु और बांसुरी, रानी रूपा के पैरों में झुक गए। उन दोनों को आशीर्वाद दे कर रानी रूपा ने उनका स्वागत किया।
रूपा से आशीर्वाद लेने के बाद अजातशत्रु और बांसुरी युवराज सा के पैरों में झुकने लगे। अजातशत्रु को तो युवराज ने पैर छूने दिए, लेकिन बांसुरी को पहले ही हमेशा की तरह टोक दिया, वह कभी भी बांसुरी से अपने पैर स्पर्श नहीं करवाते थे। लेकिन बांसुरी फिर भी हर बार झुकती जरूर थी ।भले ही उसे आधे में रुकना पड़े। बांसुरी ने मुस्कुरा कर अपने दोनों हाथ उनके सामने जोड़ दिये।
अजातशत्रु को उसके कंधों से पकड़ कर उठाकर युवराज ने अपने गले से लगा लिया। कली उन दोनों भाइयों का मिलन अपलक देख रही थी। इन सबके चेहरे कितने ज्यादा मिलते थे।
युवराज और अजातशत्रु आजू-बाजू खड़े रहे तो ऐसा लगता जैसे जुड़वा भाई खड़े हैं। बिल्कुल वैसे ही हर्ष और शौर्य भी नजर आते थे। बस हर्ष, शौर्य से जरा लंबा था। जबकि युवराज और अजातशत्रु में अजातशत्रु लंबे थे।
चारों एक साथ खड़े हो तो साफ समझ में आ जाता था कि एक ही परिवार है।
राजा और बांसुरी युवराज के एक तरफ खड़े हो गए। और अब महल की युवा पीढ़ी सामने खड़ी थी। जिनके स्वागत के लिए रानी रूपा दो दिन से तैयारी में लगी थी। महारानी साहब ने अपने लाडले हर्ष की आरती उतारी उसके माथे पर तिलक किया और उसकी नजर उतारने के साथ ही अपनी आंखों में छलक आई बूंद को भी किसी से छुपा नहीं पाई।
हर्ष ने आगे बढ़कर अपनी मां का चेहरा थाम लिया।
“अब रोने की क्या बात है? अब तो आ गया हूं!”
“कुछ ही दिन के लिए आए हो, जानती हूं।
जाने के लिए ही आए हो।”
” ठीक है अगर आप हुकुम करेंगी, तो अब यहां से नहीं जाऊंगा। यहीं रह जाऊंगा, हमेशा के लिए। लेकिन मां साहब इस बात को भी समझिए कि हम दोनों ही भाई महल में नहीं रह सकते। यह महल में रहकर राज पाट संभालेगा और मैं शहर में रहकर बिजनेस संभालूंगा।”
” सब जानते हैं हम, तुम्हें यह गांव, यह रियासत पसंद नहीं आती।”
” ऐसी बात नहीं है मां साहब! आप सबके बिना वहां भी मन नहीं लगता।”
” बड़े आए, बातें घुमाना तो कोई आपसे सीखे। बिल्कुल अपने काका साहब पर गए हो।”
हर्ष मुस्कुरा कर अपनी मां के गले से लग गया। उसने धीरे से रूपा के पैर छुए और फिर युवराज की तरफ बढ़ गया। युवराज ने पैर में झुकने से पहले ही हर्ष को अपने सीने से लगा लिया। अपने बेटे को अपने सीने से लगाकर युवराज ने आंखें मूंद ली।
जैसे अपने बेटे का सानिध्य महसूस करना चाहते हों।
शौर्य मुस्कुरा कर रूपा के सामने खड़ा था।
” अब मेरी आरती उतारते वक्त रोइएगा मत। मुझे नहीं अच्छे लगते आपके आंसू।”
” जानते हैं हम, आप में से किसी को हमारे आंसू अच्छे नहीं लगते। फिर भी मौका तो आप सभी देते हैं ना।”
रूप ने मुस्कुरा कर शौर्य के माथे पर टीका लगा दिया। शौर्य के पीछे धनुष विक्रम मीठी कली मीरा सभी लोग खड़े थे।
रूपा ने शौर्य के माथे पर तिलक लगाने के बाद थाली सहायिका के हाथ में दे दी ।
रूपा का दिल बहुत बड़ा था और वह अपने बच्चों से बहुत प्यार भी करती थी। बावजूद उसके मन में राज परिवार और राज परिवार के बाहर के लोगों के लिए एक भिन्नता का भाव तो था ही। अपनी राजसी उंगलियों से वह सिर्फ अपने राजसी बच्चों के ही माथे तिलक लगाना चाहती थी।
राज परिवार के बाहर के बच्चों से उन्हें लगाव तो था, लेकिन उनके माथे पर तिलक लगाने के लिए उनकी सहायिकाएं मौजूद थी।
सहायिका को आरती की थाल देकर वह शौर्य की तरफ घूम गई। सहायिका धनुष को तिलक लगाने के लिए आगे बढ़ रही थी कि बांसुरी धीरे से उसके पास गई और उसके हाथ से उसने आरती का थाल ले लिया।
आखिर बांसुरी भी तो कभी साधारण परिवार की ही लड़की थी। वह तो राजा साहब से विवाह के बाद राज परिवार की हुई थी। इसलिए उसके मन में यह भेदभाव जरा सा भी नहीं था। हालांकि रूपा के इस स्वभाव से उसे कोई परेशानी भी नहीं थी। क्योंकि शुरू से ही रूपा के स्वभाव में यह राज परिवार का अहंकार था। और इसमें कुछ गलत भी नहीं था।
बांसुरी ने एक-एक कर धनुष विक्रम मीठी कली और फिर मीरा, रियाल के माथे पर तिलक लगा दिया। सब की आरती उतारने के बाद उसने सबके मुंह में मीठे का टुकड़ा रखा और सबको महल के अंदर चलने का निमंत्रण दे दिया..
अब तक में युवराज और राजा साहब अंदर जा चुके थे। धनुष बाहर से ही अपने घर के लिए निकल गया।
मीठी कुछ देर के लिए खड़ी रह गई, की क्या करें?
उसने सरप्राइज देने के चक्कर में अपनी मां और पापा को वापसी का सही समय नहीं बताया था और इसीलिए वहां इस वक्त प्रेम और निरमा में से कोई भी मौजूद नहीं था।
वैसे भी प्रेम राजा साहब के काम से इंडिया से बाहर गया हुआ था। इसलिए उसका यहां रहने का सवाल ही नहीं उठता था। वरना राजा साहब की वापसी हो और प्रेम और समर ना हो ऐसा मुमकिन नहीं था।
मीठी सोच रही थी कि इस वक्त घर लौट जाए या महल जाए की बांसुरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
” मीठी अब चलो, नाश्ता करके ही वापस लौटना। या थोड़ी देर बाद निरमा को भी फोन करके यहीं बुला लूंगी।”
मीठी जानती थी कि निरमा ऐसे वक्त बे वक्त महल आना पसंद नहीं करती। इसलिए वह थोड़ा सा संकोच में गड़ गई।
” नहीं मासी मैं थोड़ी देर में घर चली जाऊंगी। मां तो वैसे भी जल्दी उठ जाती है। अब तक उठ चुकी होंगी बल्कि मैं यहीं से लौट जाती हूं।”
” नहीं, ऐसे तुम्हें खाली मुंह नहीं जाने दूंगी। धनुष तो ऐसा है कि किसी की सुनता ही नहीं। उसे रोक पाती तब तक वह निकल चुका था ।पर तुम तो नाश्ता करके ही जाओगी। चलो।”
बांसुरी ने मीठी को अपने साथ खींच लिया। मीठी के साथ ही रियाल भी थी। रियाल हर्ष की मां से मिलकर बहुत खुश थी। क्योंकि कहीं ना कहीं रियाल ने रूपा की आंखों में मीठी के लिए एक अलग से भावना देख ली थी। रूपा को मीठी नापसंद थी ऐसा नहीं था, लेकिन हां वह कभी भी हर्ष के बगल में खड़ी मीठी को देख सहज नहीं रह पाती थी, और उस वक्त उनकी आंखों में मीठी के लिए जो भाव जागता था, आज उसी बैर को पल भर के लिए ही सही रियाल ने पकड़ लिया था और वह मुस्कुरा रही थी।
हर्ष भी अपने पिता और काका साहब के साथ सीढ़ियों पर काफी ऊपर तक जा चुका था। ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उसने पलट कर देखा की मीठी आ रही है या नहीं, और जैसे ही हर्ष की नजर मीठी पर पड़ी। हर्ष को देखते ही रियाल ने मीठी का हाथ पकड़ लिया।
मीठी बांसुरी से बातों में लगी थी कि अचानक रियाल ने उसका हाथ पकड़ा और मीठी चौंक गई। बांसुरी ने रियाल की तरफ देखा और फिर मीठी के सामने अपना प्रस्ताव रख दिया।
” तुम्हारी दोस्त भी आई हुई है तो क्यों ना तुम दोनों ही महल में ही रुक जाओ।”
” नहीं मौसी, मां इस बात के लिए राजी नहीं होगी। आप तो जानती हैं उन्हें।”
” अच्छे से जानती हूं, उसके सिद्धांत और वह, कहीं पर भी जरा सा भी समझौता नहीं करना चाहती।
मेरी सहेली है लेकिन क्या कहूं, उसे इस महल में आने में भी संकोच होता है। पता नहीं कौन सी मिट्टी की बनी है।”
” हां इसीलिए कह रही हूं कि हम दोनों नाश्ता करके लौट जाएंगे।”
” ठीक है।”
वह सभी लोग एक साथ ऊपर चले गए। ऊपर पहुंचने के बाद रूपा ने सब की तरफ देखा और उनसे उनके कमरों में जाकर फ्रेश होकर वापस आने का प्रस्ताव रख दिया।
“आठ बजे यहां नीचे डाइनिंग हॉल में नाश्ता लग जाएगा। आप सबको अपने कमरों में ले जाने के लिए आपके साथ आपका सहायक मौजूद है ,जो आपको आपके कमरों में पहुंचा देंगे..।
आप सभी मेहमानों के लिए तो हमारा महल भूल भुलैया ही साबित होगा। इसलिए आपके सहायक आपके कमरों के बाहर मौजूद रहेंगे। जब आपको निकल कर नीचे आना होगा तो यह लोग आपकी मदद करेंगे।”
रूपा ने इतना कहने के बाद हर्ष और शौर्य की तरफ देखा ।
हर्ष ने बड़े प्यार से झुक कर रूपा को प्रणाम किया, रूपा की बात का मान रखते हुए अपने कमरे की तरफ जाने के लिए निकल गया। लेकिन शौर्य रुपा के कंधे सर रखें आंखें मूंदे झूलने लगा ।
रूपा प्यार से उसके गाल थपथपाने लगी।
” तुम नहीं जाओगे अपने कमरे में है ना? क्यों तुम्हें फ्रेश नहीं होना?”
” मैं फ्रेश हूं रानी मॉम। बिल्कुल फ्रेश ।”
“रानी मॉम के बच्चे, जाओ फ्रेश होकर आओ। उसके बाद जी भर कर लाङ लड़ा लेना। जब दिल्ली में पड़े रहते हो, तब अपनी रानी मॉम याद नहीं आती? और जैसे ही सामने पङोगे, हम गुस्सा ना हो जाए इसलिए हमें मनाना शुरू कर दोगे। जाओ जल्दी जाओ, नाश्ता करने के बाद तुम सबको शॉपिंग भी करनी है। तुम सब थके हो इसलिए हमने सारे शॉपर्स का सामान यहीं महल में मंगवा लिया है।
आज शाम की पार्टी के लिए सब की एक ही ड्रेस थीम रखी है। उस हिसाब से अपने कपड़े ज्वेलरी पसंद कर लेना।”
” आज ही हर्ष भाई की शादी करवाने वाली हो क्या आप?”
” चुप करो, कुछ भी बोलते हो? सरप्राइज है, आप सबके लिए?”
” क्या सरप्राइज है ?मुझे तो डर लग रहा है बड़ी मॉम, आपके सरप्राइज से?”
” अच्छा तुम कब से डरने लगे हमसे? एक तुम ही हो घर में जो हमसे बिल्कुल नहीं डरते!”
” तो फिर सच बताइए, क्या सरप्राइज है?”
” तुम्हारे बड़े भाई के लिए एक लड़की देखी है, शाम को उन्हें और उनके परिवार को खाने पर बुलाया है। लॉन में सारी तैयारी करवा रहे हैं। तुम बस गाने बजाने का इंतजाम देख लेना। इसी सब में हमारा मन नहीं लगता। बाकी तो आज सबके सामने हम इस बात की घोषणा कर देंगे कि हमारे हर्ष की होने वाली बीवी का नाम क्या है।”
” वाव, रानी मम आप तो सुपर सोनिक स्पीड से चल रही है। एक बार हर्ष भाई से बात तो कर लेती ? उसके बाद यह सब होता तो बेटर नहीं होता?”
” क्यों हर्ष की जिंदगी में कोई और है क्या?”
” नहीं मेरा कहने का यह मतलब नहीं था। मैं बस यही कहना चाहता था कि पर्सनली आप एक बार हर्ष भाई से बात कर लेती, उसके बाद अनाउंसमेंट करते तो बेटर होता।”
” हमें अपने दोनों बेटों पर पूरा भरोसा है कि हमारी मर्जी के बिना आप दोनों कभी कुछ नहीं करेंगे। सही कह रहे है ना।”
” बिल्कुल सही कह रही है मॉम, आप कभी गलत कहती ही नहीं।”
शौर्य ने प्यार से रूपा के गाल पर किस किया और रूपा ने उसे खुद से दूर करते हुए उसके रूम में जाने के लिए उसे धक्का दे दिया।
इन सब के बीच हर्ष पहले ही बाहर निकल चुका था। और उसके पीछे सहायकों की सेना के साथ सारे मेहमान भी निकल चुके थे।
उस हाल में उस वक्त शौर्य और उसकी बड़ी मां ही मौजूद थे। बांसुरी भी मीठी और कली के साथ निकल गई थी। इसलिए उसने भी इस बातचीत को नहीं सुना था। मीठी और रियाल के लिए भी एक कमरा खोल दिया गया था..
वैसे भी मीठी कभी कभी महल में रुक जाया करती थी, उसका वही कमरा उसके लिए खोला गया था।
उसी कमरे से लगा दूसरा कमरा कली और मीरा के लिए खोल दिया गया था…।
उन कमरों में जाते समय वो गलियारा भी पड़ा जहाँ राजपरिवार के पूर्वजों के तैलचित्र मढ़े हुए दीवारों पर सजे थे….
किसी में मरे हुए शेर पर अपना एक पैर रखे कोई राजपूत बुंदेला अपनी मूंछो पर ताव दिये खड़ा था, तो किसी में जंगली भैंसे के सींग हाँथ में लिए कोई खड़ा था..।
पर उन चित्रों में एक तस्वीर पर जाकर कली की निगाहें अटक गई। उस तस्वीर में खड़े राजा साहब जो राजा अजातशत्रु के दादाजी थे, वह अपनी शान में जोधपुरी लिबास में सर पर पगड़ी रखें, हाथ बांधे तिरछी मुस्कान देते हुए मुस्कुरा रहे थे।
और उनके पैरों के पास दोनों तरफ हाथ जोड़कर दो-दो अंग्रेज बैठे थे।
उनमें से एक अंग्रेज उनके जूते का लेस बांधता नजर आ रहा था।
कली के लिए यह तस्वीर चकित कर देने वाली थी। क्योंकि आज तक उसने कहीं पर भी अंग्रेजों को किसी हिंदुस्तानी राजा के पैरों के पास बैठे नहीं देखा था। वह आश्चर्य से अपने साथ चलती मीठी की तरफ देखने लगी। इतने लोगों में मीठी ही थी जो महल और राज परिवार से पूर्वपरिचित थी।
“यह कौन है मीठी?”
मीठी ने देखा और हल्के से मुस्कुरा उठी
” यह हर्ष के ग्रेट ग्रैंडफादर है।”
” तो क्या वाकई उनके जूते के तस्मे अंग्रेजों ने बांधे थे?”
” नहीं ऐसा नहीं है कि उनके जूते के तस्में हमेशा अंग्रेज बांधा करते थे, लेकिन एक वाकया ऐसा हुआ था जब उस अंग्रेज ने झुक कर उनके जूते बांधे थे। बहुत मजेदार किस्सा है इनका।
कभी हम सब बैठेंगे तो हर्ष खुद ही तुम्हें सुना देगा। हर्ष का फेवरेट किस्सा क्या है, तुम्हें पता है? हर्ष और शौर्य के साथ बातें करने बैठोगी ना वह सबसे ज्यादा अपने ग्रेट ग्रैंडफादर के ही किस्से सुनाया करते हैं। “
“और हर्ष और शौर्य के ग्रैंडफादर और ग्रैंडमदर ?”
” ग्रैंडमदर काफी पहले एक्सपायर हो गई थी। उस वक्त हर्ष भी बहुत छोटे थे और शौर्य शायद पैदा भी नहीं हुए थे। और उनके ग्रैंडफादर अभी दो साल पहले एक्सपायर हुए। काफी बीमार रहने लगे थे वह भी।
हां इनकी ग्रेट ग्रैंड मदर भी बहुत समय तक जिंदा थी। वह भी कुछ समय पहले ही गुजरी है। और अब इस पूरी फैमिली में सबसे बड़े हर्ष के फादर और मदर ही हैं..।
वैसे तुम शौर्य को कैसे जानती हो?”
कली के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान चली आई ।
“क्या बताऊं कैसे जानती हूं? लंदन में पहली मुलाकात हुई थी शौर्य से। “
“वो हां तुमसे वही हमारी भी मुलाकात हुई थी। लेकिन हमारी ज्यादा बातचीत नहीं हुई थी। तुम्हें याद है?”
” हां याद है, तुम सबके साथ एक लड़की भी थी। परी?”
” परी थी वह।”
” हां और मैं उन्ही परी के ड्राइवर के तौर पर शौर्य से मिली थी।”
“व्हाट परी का ड्राइवर, शौर्य ?”
“हां मुझे ठीक से याद नहीं की ऐसी गलतफहमी मुझे हुई थी या ,शौर्य ने ही ऐसा इंट्रोडक्शन दिया था। लेकिन मुझे यही लगा था की परी प्रिंसेस है और शौर्य उसका ड्राइवर है।”
मीठी इस बात पर हंसने लगी।
” शौर्य ना किस्से बनाने में माहिर है। चलो ठीक है जल्दी फ्रेश होना और सुनो.. ।
तुम तीनों लड़कियों ही ध्यान से मेरी बात सुन लो। यहां राजमहल में हर एक चीज कायदे से होती है। टाइम भी। और यहां पर ड्रेस भी कायदे के हिसाब से पहनी जाती हैं। तो थोड़ा सोच समझकर कपड़े पहनना। बहुत शॉर्ट्स ड्रेस नहीं चलती। महारानी साहब को नहीं पसंद।
दूसरी बात आठ बजे के पांच मिनट पहले एक बड़ा घंटा बजता है। वह इस बात का इंडिकेशन है कि हम सबको नीचे नाश्ते के लिए पहुंच जाना है।
पांच मिनट के भीतर हम सब अपने अपने कमरों से नीचे पहुंच जाते हैं। क्योंकि ठीक आठ बजे नाश्ते की टेबल पर नाश्ता स

यह भाग भी पूरा हुआ जिसमें शौर्य को रूपा ने अपनी मन की बात बताई लेकिन हर्ष का क्या रिएक्शन होगा, अंग्रेज ने तस्में बांधे क्या किस्सा है कैसे तैयार होंगी सब, आगे पढूंगा, नाईस पार्ट दीदी…💐🙏
बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️♥️💐💐💐💐⭐⭐⭐⭐⭐⭐