जीवनसाथी -3 भाग -48

उसका दिमाग बार-बार उसे शौर्य से दूर चले जाने की सलाह दे रहा था। वह इसी पसोपेश में थी कि तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
एक मीठा सा खुशबू भरा हवा का झोंका उसे फिर एक बार छूकर गुजर गया..।
वह पलटी और आश्चर्य से सामने खड़े उस चेहरे को देखती रह गई…..।
कितना जाना पहचाना सा था वो चेहरा, जैसे कहीं देखा है..
लेकिन कहाँ.. ?
वो हलकी बादामी सी ऑंखें, वो खुशबु.. बहुत जानी पहचानी थी, लेकिन कब और कहाँ..?
कली आश्चर्य से आंखे फाडे सामने खड़ी बांसुरी को देख रही थी..
.और बांसुरी का अलग ही हाल था..
उसे यूँ लगा रहा था बीस साल पहले की वो खुद अपने सामने खड़ी है..।
इस लड़की का चेहरा उससे खुद से कितना मिल रहा था..
बिलकुल उसी के जैसी आंखे, नाक….
बस होंठ अलग थे और रहन सहन पहनावा !!
दोनों एक दूसरे को देखते खड़े थे…
उसी वक्त विक्रम अपने लम्बे लम्बे डग भरता वहाँ चला आया..
आते ही उसने बहुत सम्मान से बांसुरी को प्रणाम किया और फिर कली से उसका परिचय करवाने लगा..
“हुकुम… ये कली हैं.. लिटिल मास्टर की दोस्त हैं…।
और जिस वक्त उन पर गोली चली, ये वहीँ मौजूद थी… यही लिटिल मास्टर को अस्पताल लेकर आयी है ! कली ये लिटिली मास्टर यानी प्रिंस की माँ साहब हैं !”
बांसुरी ने कली के हाथ पकड़ लिए…. बांसुरी की आंखे भावुकता से भर आयी, कली की आंखे पहले ही भरी हुई थी..
“किन शब्दों में आपका आभार व्यक्त करूँ….. ?
नाम जानने के लिए बांसुरी चुप हो गयी और कली ने धीरे से अपना नाम ले लिया..
“कली.. !”
कली का नाम सुनते ही बांसुरी वापस उसके चेहरे को देखने लगी..
“कली ? बहुत प्यारा नाम है, बिलकुल आप ही की तरह, मुझे ये नाम बहुत पसंद है !”
कली को कोई सम्बोधन ही समझ नही आ रहा था कि बांसुरी को क्या कह कर पुकारे ? उसे राजसी तौर तरीके से हुकुम या साहब बोलना बड़ा अजीब लग रहा था..। उसके मुहं से आंटी निकलने वाला था लेकिन बांसुरी किसी एंगल से आंटी नजर नही आ रही थी..।
कली को उससे बमुश्किल दो चार साल ही बड़ी लग रही थी बांसुरी.. ऐसे में क्या बोले यही सोच रही थी..।
उसके लंदन में कोई कितना भी बड़ा हो, नाम लेने का ही रिवाज़ था…।
वो खुद वहाँ के लोगो का नाम ही लिया करती थी.. लेकिन यहाँ क्या करे उसे समझ नही आ रहा था..।
“आप मुझे आप कह कर मत बुलाएँ.. तुम ही कहिये !”
बांसुरी हलके से मुस्कुरा उठी..
“शौर्य ने इतनी ख़राब हालत के बावजूद कहा कि तुम्हे मिल कर थैंक्स बोल दूँ..।
उसे लगा कहीं तुम चली ना जाओ.. !”
कली कैसे कहती कि वो खुद शौर्य से एक बार मिलने के लिए मरी जा रही है..।
लेकिन सामने जो खड़ी थी वो शौर्य की ही तो माँ थी..। उनसे तो ऐसा कहा नही जा सकता था, लेकिन एक बात थी, बांसुरी को अपने पास खड़ा देख कली सम्मोहित हुई जा रही थी..।
शौर्य वाला स्पर्श उसकी माँ में था..।
शौर्य की मासूमियत, उसका मुस्कुराना, और उसका बात करने के बीच में अपने कानो को छूते रहना उसकी माँ की ही देन थी..
वो भी बिलकुल शौर्य की तरह बात बात में अपने कान छू लिया करती थी..
कली का मन किया बांसुरी के गले लग जाये…
लेकिन संकोच में वो खड़ी रही..।
उसी समय पुलिस के कुछ अधिकारी वहाँ पूछताछ के लिए चले आये..
वो लोग विक्रम बांसुरी से पूछताछ करने लगे..
कली चुपचाप खड़ी रही..
पुलिस वाले उसकी तरफ घूम गए..
“आप उस वक्त साथ थी…?”
“जी.. !”
“कुछ देखा आपने ? मतलब क्या देखा ? गोली किधर से चली ? “
“नही सर… ध्यान ही नही गया !”
“अच्छा.. आप कब से शौर्य प्रताप के साथ थी… ?”
“लगभग चार दिन से.. !”
” क्या प्रिंस शौर्य, साथ ही रह रहे थे आपके ? या वो कहीं और थे और आप कहीं और ?”
बांसुरी के सामने इस सवाल का जवाब देने में वो संकोच में गङ गयी..
“साथ ही रह रहे थे.. !”
“आप उनके फ्लैट में थी या वो आपके फ्लैट में ?”
“हम लोग यहाँ बनारस के होटल में ठहरे थे.. मेरा कुछ काम था यहाँ, जिसके लिए हम लोग आये थे..!”
“किस होटल में रुके थे, उसकी डिटेल्स लिखवा दीजियेगा, वहाँ भी पूछताछ करनी होगी..।
क्या आपने किसी ऐसे इंसान को नोटिस किया जो लगातार आप दोनों पर नजर रखे हुए था..।
या हर कहीं आपको मिल रहा था या आपसे टकरा रहा था.. !”
कली ने ना में गर्दन हिलायी लेकिन तभी उसकी नजर विक्रम पर पड़ गयी.. वो विक्रम की तरफ देखने लगी..
“मैंने जहाँ देखा, इन्हे ही देखा है… जिस वक्त प्रिंस को गोली लगी तब भी ये सबसे पहले वहाँ पहुंचे !”
कली ने विक्रम की तरफ देख कर बोल दिया…
विक्रम की तरफ पुलिस वाले ने देखा और विक्रम ने अपना आई कार्ड निकाल कर पुलिस वाले के हाथ रख दिया..
“मैं लिटिल मास्टर का सीक्रेट बॉडीगार्ड हूँ… दरअसल हमारे लिटिल मास्टर भी इस मामले में अपने पिता साहब जैसे हैं….! उन्हेँ आम आदमी बन कर रहना पसंद है..। जब हर्ष सर, धनुष और यश अपने प्रोजेक्ट के लिए पेरिस जा रहे थे, तब उन लोगो ने लिटिल मास्टर को भी चलने कहा लेकिन हुज़ूर जाना नही चाह्ते थे..।
उसी वक्त उनके फ्लैट में रिनोवेशन भी चल रहा था इसीलिए उसे बंद कर दिया गया था…।
लिटिल मास्टर पहले भी अपनी सिक्योरिटी को चकमा देकर अकेले घूमने जा चुके हैं, इसलिए इस बार समर सर ने मेरी अलग से इसी काम में ड्यूटी लगा रखी थी…।
मैं साथ रहता तो वो किसी ना किसी तरीके से मुझे भगा कर ही दम लेते, इसलिए चुपके से उन पर नजर रखे हुए था….।
वो जहाँ जाते, वहाँ पहुंच जाता..
बनारस के घाट पर भी मैं मौजूद था, लेकिन थोड़ा दूर था.. जब इन पर गोली चली, मैंने तुरंत गोली चलने की दिशा में देखा और मुझे यही समझ आया की कुछ स्थानीय छुटभैये नेता जैसे लोगो की आपसी रंजिश चल रही थी..।
जिसमे एक लड़के ने बस सामने वालो को डराने के लिए हवाई फायर करने हाथ ऊपर उठाया था। लेकिन तभी किसी अन्य से उसके हाथ में धक्का सा लगा और गोली चल गयी.. इत्तेफाक से लिटिल मास्टर जिस तरफ खड़े थे, गोली उसी दिशा में चली और उन्हेँ लग गयी..
“आप ये सब इतने विश्वास से कैसे कह सकते हैं ?”
“मैं जब घाट पर खड़ा था, इस वक्त आसपास चारों तरफ नजर रखे हुए था.. वो दोनों गुट वहाँ बहस करते हुए नजर आ रहे थे.. ।.
उनकी बहस बढ़ने पर मैं उन्हेँ रोकने भी गया था, लेकिन उनकी बहस और बढ़ गयी थी..
उनमें से एक गुट का लड़का बार बार अपनी गन हवा में लहरा लहरा कर दिखा रहा था.. तब भी मैंने उन लोगो को चेतावनी दी थी.. लेकिन उस वक्त वो मुझे नही जानते थे, इसलिए लगे पड़े थे….
उन लोगो को समझा कर मैं लौटा ही था कि गोली चल गयी..
“आप उन लोगो को पहचान लेंगे !”
“जी हाँ पहचान लूंगा !”
विक्रम की बात सुनती कली चकित खड़ी थी.. कितना बड़ा आदमी था शौर्य.. उसका बॉडीगार्ड उससे छिप कर उस पर नजर रखे हुए था और वो झल्ली इतने बड़े राजकुमार को आज तक ड्राइवर समझती आयी थी..।
बांसुरी कली को देख रही थी…
बांसुरी को कली की मासूमियत भा गयी थी..
“क्या हुआ कली ? तुम कुछ परेशान सी लग रही ?”
“नही मैम… कुछ नही…
“कुछ तो है.. ?”
“बस… ऐसे ही.. शौर्य अब कैसा है ? क्या मैं उससे एक बार मिल सकती हूँ.. ? उससे मिल कर फिर मैं दिल्ली वापस लौट जाउंगी.. !”
“ठीक है वो.. हाँ चलो मिल लो ! और उसके बाद तुम्हारे दिल्ली लौटने की व्यवस्था करवा देंगे ! आओ !”
बांसुरी उसे अपने साथ लिए शौर्य के कमरे की तरफ बढ़ गयी..
****
ये सब होने से दो दिन पहले…
पेरिस में..
मीठी ने पहली बार शराब पी थी और उसे सुरूर हो गया था…
हर्ष इस बात को जानता था, इसलिए वो खुद पार्टी से निकल कर मीठी को उसके रूम तक छोड़ने आया था..
मीठी के मन में कोई बात थी जो अटक रही थी और जिसे वो किसी से बताने को आतुर थी। पर संकोच में बता नही पा रही थी..
हर्ष इस बात को समझ गया था..
वो मीठी के पास ही बैठा था और मीठी अपने मन का गुबार निकाल रही थी..
“हर्ष तुम्हे मैं जो बताउंगी.. उसे सुन कर तुम मुझे गलत तो नही समझोगे ना ?”
“नही मीठी.. हम बचपन से दोस्त हैं.. मानता हूँ कि महल में रहते हुए भी हमारा मिलना जुलना बहुत कम हुआ है.. बावजूद हम दोस्त तो अच्छे है ही..।
तुम मुझ पर पूरा भरोसा कर सकती हो !”
“सच में ?”
“हम्म… बोलो तो सही ! क्या बात है ?”
” तुम किसी से कहोगे तो नही ना ?”
“नही.. बिलकुल नही कहूंगा, लेकिन एक बात जानना चाहता हूँ, की तुम ने इस बारे में अपनी मॉम को क्यों नही बताया कुछ..
तुम और निरमा काकी तो बहुत क्लोज़ हो आपस में !”
“माँ समझेंगी नही.. ! मैंने एक बार कोशिश की थी लेकिन… छोड़ो ना.. अगर तुम्हे नही जानना तो मैं तुम्हे भी नही बताउंगी.. !”
“अरे.. मेरे पूछने का ये कारण नही था.. चलो बताओ, क्या बात है ? और सुनो यकीन रखो, मैं किसी से कुछ नही कहूंगा !”
“हर्ष… मैं एक रिलेशनशिप में हूँ.. !”
हर्ष को अब तक उम्मीद हो चुकी थी कि मीठी ऐसा ही कुछ बोलने वाली है..।
वो मन ही मन जाने कब से मीठी को पसंद करने लगा था.. लेकिन उसकी चाहत उसने कभी मीठी पर ज़ाहिर नही होने दी थी..।
मीठी गंभीर लड़की थी.. अपने काम के लिए और पढाई के लिए समर्पित थी..।
वो जो करती उसे पूरे मन से निभाती.. लेकिन इसी सब के साथ वो बहुत भावुक थी..
हर्ष को याद था एक बार जब वो लोग छोटे थे, उस वक्त महल के बगीचे में एक तरफ रूपा ने डिनर स्पेस तैयार करवाने के लिए कारीगर बुलवाये थे..।
वहां अक्सर महल निवासियों के घरेलु आयोजन हुआ करते थे.. एक तरफ तंदूर, गैस चूल्हा सब लगा हुआ था..
वहाँ स्थायी रूप से लगभग चालीस लोगो के बैठने के लिए अंडाकार टेबल और उसके चारों और राजसी कुर्सियां लगी थी..।
ऊपर शानदर झाड़फानूस और रंगबिरंगी चुनरियों और बिजली के झिलमिलाते लट्टुओं की सजावट थी.. लेकिन रूपा इस एक सी सजावट से तंग आ गयी थी.. उसे वैसे भी बदलाव करते रहना पसंद था..
उसने उस लम्बे चौड़े सेंटर टेबल को हटवाया और उसके बदले पांच छैः लम्बे लम्बे टेबल डलवा दिए.. लेकिन इस व्यवस्था को बनाने के लिए वहाँ एक किनारे लगे एक पुराने पेड़ को कटवाना पड़ा..
पेड़ काफी ज्यादा पुराना हो चुका था और महल में किसी को भी उस पेड़ के कटवाने पर एतराज नहीं था, सिवाय बांसुरी काकी के।
लेकिन वहां मौजूद मीठी उस पेड़ को ना काटने के लिए ज़िद पकड़ कर बैठ गयी..
रूपा ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन मीठी किसी की सुनने को तैयार नही थी..
रूपा ने पहले उसे प्यार से मनाना चाहा फिर थोड़ा कड़े शब्दों में भी मीठी को फटकारा लेकिन मीठी मानने को तैयार ही नही थी.. उसने एक ही रट लगा रखी थी कि पेड़ नही काटा जायेगा..
अपनी बात न मनती मीठी ने पेड़ को जाकर अपनी बाहों में भर लिया था…
वह उस पेड़ को छोड़ने को तैयार नहीं थी। आखिरकार प्रेम काका और निरमा काकी को बुलवाना पड़ा..
प्रेम काका को आकर मीठी को गोद में उठाकर उस पेड़ से दूर करना पड़ा। और मीठी रोती-रोती अपने पापा की गोद में ही घर वापस लौट गई थी..
उसके बाद मीठी लगभग हफ्ते भर तक महल वापस नहीं आई थी। उन लोगों को पता चला था की रोती-रोती मीठी बीमार पड़ गई थी। उसे बुखार आ गया था।
निरमा काकी हमेशा उसे थोड़ा मजबूत बनने की सलाह दिया करती थी, लेकिन मीठी ऊपरी तौर पर कितनी भी मजबूत हो अंदर से बहुत भावुक थी।
बाद में भी बहुत समय तक वह उस जगह पर गई ही नहीं, जहां का पेड़ काटा गया था। वो तो फिर भी बचपन की बात थी, लेकिन अब बड़ी हो जाने के बावजूद उसकी भावुकता और बचपने ने कोई अंतर नही आया था!
इतनी बड़ी होने के बावजूद मीठी का अब भी वही हाल था..
मीठी के मन की बात सुनकर हर्ष को बुरा तो बहुत लगा, लेकिन वह मीठी से पूरी बात जानना चाहता था।
क्योंकि उसे यह बात बड़ी अजीब लग रही थी कि मीठी अपनी रिलेशनशिप में होने वाली बात को बताते हुए उतनी उत्सुक और खुश क्यों नजर नहीं आ रही।
इस उम्र में अगर वह किसी से प्यार करती है तो, यह उसकी खुशी का कारण बनना चाहिए ना कि इस तरह से अवसाद और दुख का।
हर्ष मीठी की बात सुनकर चुप हो गया था। जमीन पर नज़रें गड़ाये वह अपने ख्यालों में गुम था कि तभी मीठी ठीक उसके बगल में आकर उसी के काउच पर बैठ गई। उससे एकदम सट कर..
उसके इस तरह बैठने से हर्ष चौंक गया..
वह दोनों दोस्त जरूर थे, लेकिन आज तक इतनी करीबी उनके बीच में कभी नहीं हुई थी। मीठी ने हर्ष के पैर पर अपना हाथ रखा और उसके चेहरे की तरफ देखने लगी।
मीठी हर्ष के बहुत करीब थी। हर्ष भी मीठी के मासूम से चेहरे को देखता खो सा गया था, उसकी आंखों को वो बड़े ध्यान से देख रहा था।
मीठी भी हर्ष को ही देख रही थी..
हर्ष मीठी की बड़ी-बड़ी पानी भरी आंखों को देखते हुए उन आंखों में खोता जा रहा था..
वह मीठी के चेहरे की तरफ झुकने को था कि तभी मीठी ने कुछ बोला और हर्ष की तंद्रा भंग हो गई।
” हर्ष मैं रिलेशनशिप में हूं। लेकिन उसके बारे में मैं किसी से कुछ कह नहीं सकती..।
“लेकिन क्यों मीठी ?
” अगर तुमने पसंद किया है तो जाहिर है वह लड़का अच्छा ही होगा। पर तुम क्यों किसी से कह नहीं सकती?”
“क्यूंकि.. कोई समझेगा नही.. लेकिन शायद तुम समझ जाओ…
हर्ष…
क्रमशः..

हर्ष बाबू अपनी दिल की दुनिया मे मीठी को बसा चुके हैं और मीठी किसके प्यार का गुड़ खाए बैठी है, वह भी संकोच से भरी, बांसुरी कली का मिलन हो गया अब शौर्य से मिलना भी हो जायेगा, दिल की लगी कब तक छुपेगी, वह जुबां पर आकर एक दिन बरस ही जायेगी… नाईस पार्ट दीदी…💐🙏
शायद ही इससे खूबसूरत शब्द होते होंगे जैसे आप अपनी कलम से संजोती है। निशब्द हो जाती हूँ मै हर बार आपकी कलम की जादूगरी देखकर और सोचती रह जाती हूँ कि क्या समीक्षा लिखू इसलिए बस यही लिख देती हूँ,.. बहुत खूबसूरत, लाजबाब भाग 👌👌👌👌👌🤔♥️♥️♥️।
बांसुरी और राजा भी पहुंच गए अपने बेटे के पास 😊अब अपूर्व की नहीं चलेगी। शौर्य ने क्या कहा बांसुरी से जिसे सुनकर बांसुरी
बाहर चली गयी ऐसा लग रहा वो कली के पास गई है अरे हाँ देखो तो कली की मासी माँ कली तक पहुंच गयी 😊। इनकी पहली मुलाक़ात देखने वाली होगी।
लाजबाब भाग 👌👌👌।