जीवनसाथी -3, भाग -40

शाम घिरने लगी थी और लल्लन उन लोगों को बनारस की सबसे खूबसूरत चीज यानी बनारस के घाट और गंगा नदी के किनारे होती गंगा जी की आरती दिखाने ले गया..
हज़ारों की भीड़ उमड़े पड़ी थी, यूँ लग रहा था पूरा बनारस, घाट पर ही मौजूद है…
कली के लिए ये प्रथम अनुभव था, लेकिन शौर्य पहले भी बनारस आ चुका था..
शौर्य की आंखे चमकने लगी थी… बिलकुल वैसे ही जैसे आज से कुछ बरस पहले जब उसके पिता अजातशत्रु, बांसुरी के साथ बनारस आये तब उनकी आंखे चमक रही थी…
हालाँकि कली इतनी भीड़भाड़ मेँ ज़रा असहज हो रही थी.. उसकी कभी इतनी भीड़ में घुसने की आदत ही नहीं थी..।
इसलिए उसे बड़ा अजीब लग रहा था, शौर्य को यह बात जल्दी ही समझ में आ गई।
क्योंकि कली किसी से छू न जाए, यह सोचकर बचती बचाती चल रही थी। शौर्य ने धीरे से अपनी बांह का घेरा कली के चारों तरफ से कर लिया। उसने अपने हाथ को कली के इर्द-गिर्द ऐसे लपेटा कि न उसका हाथ कली को स्पर्श कर रहा था और न ही किसी अन्य का हाथ कली तक पहुँच पा रहा था..।
कली का ध्यान इस बात पर गया और वो हलके से मुस्कुरा उठी..।
ये बावरा सा लड़का धीरे धीरे उसके दिल में जग़ह बनाने लगा था..।
वो दोनों आगे बढ़ रहे थे कि कुछ लड़कियों का झुण्ड जो कॉलेज से सीधे गंगा आरती के लिए घाट पर पहुंचा था, उनके बगल से होती निकली और एक लड़के और लड़की की सुंदर सी जोड़ी को देखते ही आपस में उन पर बात कर हंसने शर्माने लगी…..
लल्लन घाट का जानकारी था। इसलिए लोगों की भीड़ के बीच से भी रास्ता बनाते हुए कली और शौर्य को ठीक सबसे सामने ऐसी जगह पर लेकर पहुंच गया, जहां से उन दोनों को साफ-साफ गंगा जी की आरती दिखाई देने लगे।
गंगा आरती का समय हुआ और सीधी सतर पंक्तियों में खड़े एक जैसे वस्त्र पहने पंडितों ने अपने-अपने दीपक एक साथ जलाकर गंगा जी की आरती लयबद्ध तरीके से शुरू कर दी।
अपने हाथों को एक साथ ऊपर और फिर नीचे पूरी लय मेँ करते हुए उन्होंने ऐसा जीवंत दृश्य प्रस्तुत कर दिया की देखने वाले भावविभोर हो गए….
बनारस के घाट का यह, वह चमत्कारी समय था, जिस वक्त ऐसा लगता था, जैसे घाट पर उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए समय भी रुक गया है!
गंगा जी की आरती के समय तो ऐसा लगता था, स्वयं विश्वनाथ भी अपने सारे काम को छोड़कर घाट पर चले आए हैं….
शत सहस्त्र प्रज्वलित दीपकों की पानी पर पड़ती छाया ऐसा अनुपम सौंदर्य उत्पन्न करती थी कि, देखने वाला सुधबुध खो बैठता था..
सरस सुमधुर मंत्रोच्चार के बीच वहां खड़े साधकों की आरती कदम ताल मिलाती चलती थी..
समझ नहीं आता था कि बनारस के लोग कैसे दिन भर की थकान और सारे कामों के बावजूद संध्या आरती के समय गंगा जी पहुंच ही जाया करते थे..
जब से गंगा आरती शुरू हुई होगी, तब से आज तक में ऐसा कोई समय नहीं गया होगा, जब घाट सिर्फ दो-चार लोगों से भरा मिले।
हजारों की संख्या में पहुंचे लोग गंगा आरती को देखते हुए अपने सनातन पर गर्व कर उठते थे।
कली अपलक नेत्रों से उस आरती को देख रही थी। उसके रोंगटे खड़े हो गए थे। उसे लग रहा था कि आज तक उसने लंदन में रहकर कुछ देखा ही नहीं, लंदन और उसके आसपास वह अपने डैडा सरू और दर्श अंकल के साथ घूमी जरूर थी, लेकिन ऐसा अविस्मरणीय अभूतपूर्व दृश्य उसे आज तक कहीं देखने नहीं मिला था।
अस्तांचलगामी सूर्य और घाट पर चलती आरती के साथ ही शुभ दीप अगरबत्ती की खुशबू पूरे घाट पर ऐसी फैली हुई थी कि लग रहा था अगर स्वर्ग कहीं है तो यही है…। बस यही है..
शौर्य ने पलट कर कली की तरफ देखा, कली की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे। उसके मन की गहराई में छिपे भाव, उसका हिंदुस्तान से प्यार, सब कुछ जैसे आंखों के रास्ते बाहर आने के लिए जगह ढूंढ रहा था।
शौर्य ने कली के घुटनों पर धीरे से अपना हाथ रख दिया। वह दोनों घाट की बनी सीढ़ियों पर बैठे थे। कली ने शौर्य की तरफ देखा, और हल्के से मुस्कुरा दिया।
” प्रिंस मुझे तो पता ही नहीं था कि ऐसा कुछ भी भारत में होता है। इसीलिए तो कहा जाता है भारत चमत्कारों का देश है।
आज मेरे मन का सारा गिल्ट चला गया।”
शौर्य ने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा।
” कौन सा गिल्ट?”
कली ने शौर्य की तरफ देखा और जवाब देने लगी
” तुम्हें पता है मैं अपने डैडा से झूठ बोलकर हिंदुस्तान आई हूं, सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझे हिंदुस्तान आना था। पहली बार मैंने अपने डैडा से झूठ बोला है। मैं जानती हूं कि वह इस बात पर बहुत नाराज होंगे। लेकिन मैं वापस लौटकर उन्हें मना लूंगी। अब तक मैं वाकई गिल्ट में थी, कि अपने इतने प्यार करने वाले डैडा से मैंने झूठ क्यों बोला? लेकिन आज यह सब देखकर लग रहा है, मेरा हिंदुस्तान आना सफल हो गया..।”
“बस गंगा जी की आरती देखकर ही तुम्हें लगने लग गया कि तुम्हारा यहां आना सफल हो गया ? अरे हमारे हिंदुस्तान में और भी कमाल की चीजे हैं।”
” हां जानती हूं और मैं सब कुछ घूमना चाहती हूं। लेकिन मेरे पास वक्त नहीं है। मुझे ठीक ग्यारहवे दिन यहां से वापस लौटना होगा। लेकिन उस बीच जितना सब देखा समझा, ये सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा है।
और फिर तुम भी तो मिल गए हो।”
कली अपनी नासमझी में कुछ तो भी बोल गई, और शौर्य उसकी बात पर क्या प्रतिक्रिया दे, बिना समझे आंखें घुमा कर दूसरी तरफ देखने लगा।
उसी समय घाट पर पहुंची उन लड़कियों में से एक लड़की शौर्य के पास आई और उसने उसे दो गुलाब के फूल पकड़ा कर कली को देने का इशारा कर दिया।
शौर्य ने इशारे से पूछा “क्यों?” तो उस लड़की ने धीरे से अपनी फुलझड़ी छोड़ दी..
वह सारी लड़कियां महाराष्ट्रीयन थी और अकोला से बनारस जाकर पढ़ाई कर रही थी। उस लड़की ने भी जानबूझकर शौर्य को चढ़ाने के लिए मराठी में ही कहा।
“आपल्या बायकोला गुलाबाचे फूल देण्यात किती लाज वाटते?”
“हे हे मराठी मैडम, मुंबई से है क्या आप ?”..
वहीँ मौजूद एक लड़के ने उस लड़की से पूछ लिया..
“नाही… मी अकोला से आयी है.. क्यों.. ?”
“तुम्हारी मराठी सुन कर भैया जी को लगा तुम मुंबई से हो.. वैसे हमारे भैया जी को भी मुंबई से एक ऑफर आया है..।”
उस लड़की ने बहुत चिढ़ा कर उसे लड़के को देखा और अपनी सहेलियों की तरफ मुड़कर आगे बढ़ गई। लेकिन शौर्य के पास बैठे लल्लन को उस लड़के की बात में बड़ा रस आ रहा था।
वह धम्म से कूद कर शौर्य के बाजू में चला आया।
“कौन है? कौन अजय देवगन चला आया भाई? सुन रहे
तुम्हारे भैया जी को मुंबई से आफर ऊफर चला आया.. ?”
” हाँ तो सही ही सुन रहे हो.. कान मेँ मोतियाबिंद नहीं हुआ है तुम्हरे !
भौकाल ही हैं.. गज़ब के.. अरे हमारे कानपुर में का गर्दा मचाते हैं..
जब-जब रामलीला होती है ना तब पूछो मत! भैया जी का नाम लेकर लोग चिल्लाने लगते हैं, जब तक भैया जी का एंट्री नहीं हो जाता.. समझ रहे हैं आप..?”
“रामलीला मेँ बनते का हैं गुरु ?”
“माता सबरी ! माता सबरी बनते है भैया जी.. दूबर पातर हैं न !”
” कौन है प्रभु, जरा दर्शन तो दिलवाई दो..!” लल्लन को बड़ा मजा आ रहा था, इन लफंगो से बतियाने मेँ
वह लड़का और उसके साथ खड़े दो-तीन लड़के बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में एक किनारे होते चले गए और सबसे पीछे खड़े भैया जी एकदम से प्रकट हो गए!
लल्लन और शौर्य ने देखा और लल्लन को जोर से हंसी आ गई!
एक भयंकर दुबला पतला टिटहरी सा लड़का खड़ा था…!
पतले गोरे चिट्टे चेहरे के ऊपर खूब ऊंचा बालों का पफ बना रखा था। पतली पतली मूंछे होठों के ऊपर ऐसे रखी थी, जैसे किसी ड्रामा कंपनी में काम करने वाले कलाकार को नकली मूंछो से टीपा गया हो..।
लड़का कुछ ज्यादा ही दुबला था.. लम्बाई मुश्किल से साढ़े पांच फ़ीट थी और नाम था….
लड़के का नाम था दिलकश, लेकिन उसके चेले उसे प्यार और सम्मान से दुल्लो भैया बुलाते थे..।
“अबे गजब हौव्वा बनाये बे तुम, और ये तो एकदम से खोदा कुआं और निकला चमगीदड हो गया बे !”
लल्लन की हंसी नहीं रुक रही थी, उसने साथ बैठे लड़के की पीठ पर धौल जमाते हुए अपनी बात कही और दुल्लो भैया के चेलों के चेहरों पर भय की रेखाएं दौड़ गयी। बिलकुल जैसे उन लोगो ने ज़मीन पर चक्रासन में उल्टा चलती भूतनी को देख लिया हो..
लल्लन ने मुड़ कर दुल्लो की तरफ देखा, दुल्लो अकड़ कर खड़ा हो गया..
” सुनो बे, हम जहां खड़े हो जाते हैं ना लाइन वहां से शुरू होती है। और क्या समझ रहे हो बे हमको, हम दुबले पतले शरीर के जरूर है, लेकिन हमारे अंदर जो गदर है ना मैया कसम, एक हाथ छोड़ेंगे ना तुम पर, गंगा मैया के पार जाकर गिरोगे समझे…
हम हैं कौन जानते भी हो.. ?
लल्लन को उस हाङ मांस के कल-पुर्जे को छेड़ने में बड़ा आनंद आ रहा था।
उसने अपने हाथ जोड़कर बिल्कुल श्रद्धा से शीश नवाते हुए दुल्लो को वापस छेड़ दिया..
“कौन हो गुरु, तुमहू बताई दो, काहे के बनारस में हमरा जन्म और सकल करम भले हुआ है, लेकिन आज तक कहीं दुल्लो भैया जिंदाबाद का नारा नहीं सुने। कौन से कॉलेज के हो…?”
” गणेश शंकर के विद्यार्थी हैं हम समझे… !”
“वो तो हाई स्कूल है.. हमीरपुर रोड वाला न !”
“हाँ हाँ तो का हुआ.. !”
“पाठशाला के बिद्यार्थी हो.. अबे बच्चे हो बे, और ऐसा भौकाल मचा रहे हो जैसे पता नहीं कितने बड़े नेता हो.. ?”
लल्लन की बात पर दुल्लो भैया के अंध भक्तों की त्यौरियां चढ़ गई। उनमें से दो लोग अपनी बाजू चढ़ाते हुए लल्लन की खबर लेने उस तक पहुंचने वाले थे कि बिल्कुल सरकार के अमिताभ की तर्ज पर दुल्लो भैया ने अपना उल्टा हाथ उठाकर उन लोगों को रोक दिया।
बड़ी कातिल निगाहों से उन्होंने लल्लन की तरफ देखा लेकिन तब तक उनका एक चमचा उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ना शुरू कर चुका था…
” अबे भैया जी स्कूल में अपने सौख (शौक ) के लिए पढ़ रहे हैं समझे..? हर कक्षा एक बार में निकाल चुके होते ना तो अभी कालेज पार करके कालेज ही मा परफेसर हो गए रहते…समझे..?
दिमाग एकदमे गच्चा खाया हुआ है तुम्हारा.. !
अब तक में शौर्य भी उठकर उन लोगों के पास चला आया..
इसी समय दुल्लो भैया ने अपना परिचय देना शुरू किया और तभी दुल्लो भैया की नजर सामने खड़े शौर्य पर चली गई..
ठीक उसी वक्त सीढ़ियों पर सबसे नीचे एक मां और बेटी खड़ी दीपक को नदी में बह रही थी।
मां अपनी सखियों से बातचीत में क्या लगी बेटी धीरे से एक सीढी और उतर गई…।
वह छोटी सी बच्ची अपने हाथ से बनी नाव को पानी में रखकर उसे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन इधर-उधर से आई लहरें उसकी नाव आगे नहीं बढ़ने दे रही थी।
उसे आगे बढ़ाने के लिए बच्ची दो सीढियां और उतर गई, और उसे पानी में आधा डूबा खड़ा देख, और आगे बढ़ते देख घबराकर कली उसे बचाने के लिए सीढ़ियां उतर कर उस तक पहुंच गई..
ठीक उसी वक्त शौर्य पर दुल्लो भैया की नजर पड़ी और दुल्लो भैया कुछ देर तक शौर्य को देखते खड़े रह गए।
ऐसा लगा जैसे दुल्लो को शौर्य में अपने भगवान के दर्शन हो गए। दुल्लो ने अपनी जेब से अपना वॉलेट निकाला और वॉलेट में लगी तस्वीर को देखने के बाद वापस शौर्य को देखने लगा।
उसके दो-तीन बार ऐसा करने पर उसके चमचे भी झांक कर कर उसका वॉलेट देखने लगे। लल्लन भी अचरज में डूबा खड़ा था कि यह क्या माजरा है कि दुल्लो ने आगे बढ़कर शौर्य के पास पहुंचकर अपना सवाल उस पर दाग दिया..
” गुरुदेव अपना नाम बताई जाए..!”
“क्यों… मेरा परिचय क्यों चाहिए ?”
“काहे की आपका चेहरा मुहरा न हमरे भगवान से बहुतै मिल रहा है.. !”
दुल्लो को आज तक उसके चमचों ने किसी से इतनी मुहब्बत से बात करते नहीं देखा था। इसलिए वह लोग भी आश्चर्य से खड़े शौर्य को देख रहे थे..
नीली रंग की डेनिम पर गहरी मैरून रंग की शर्ट पहने खड़ा शौर्य इस वक्त बिल्कुल अपने पिता की परछाई सा लग रहा था। उसे मन ही मन लगा कि यह लड़का कहीं ना कहीं से उसके पिता को जरुर जानता है, शौर्य ने धीमे से अपना नाम बता दिया..
“शौर्य प्रताप सिंह बुंदेला नाम है मेरा.. !”
“परभु आप राजाधिराज महाराज अजातशत्रु सिंह बुंदेला जी के..
“हाँ उन्ही का बेटा हूँ.. !”
शौर्य ने जैसे ही अपनी बात कही दुल्लो लटपटा के उसके कदमो में गिर पड़ा..
प्रलाप के रोगी की तरह वह भी निरर्थक प्रलाप करते हुए शौर्य के कदमों से लिपट गया।
उसके चारों अंध भक्तों ने जब अपने गुरु को ऐसे किसी के चरणों पर लोटपोट होते देखा, तो वह चारों भी शौर्य के सामने दंडवत हो गये।
लल्लन खुद सांस रोके यह सारी नौटंकी देख रहा था। उसने भी अब तक शौर्य को सही तरीके से नहीं पहचाना था। लेकिन इस तरह दुल्लो को उसके पैरों पर गिरे देख वह भी शौर्य की तरफ देखने लगा। शौर्य ने उसे इशारे से कली से कुछ नहीं कहने को कह दिया और लल्लन ने भी बड़ी नफासत से गर्दन हाँ में हिला दी..
शौर्य झुका और उसने अपने चरणों पर गिरे पड़े दुल्लो को उठा लिया..
“भाई माफ़ करना, लेकिन मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूं..!”
शौर्य ने बड़े ध्यान से दुल्लो की तरफ देखते हुए कहा और दुल्लो हल्का सा शर्मा गया।उसने अपना परिचय देना शुरू किया..
” भैया जी आप कैसे हमें पहचानेंगे, आप हमें पहचान ही नहीं सकते। क्योंकि आप हमसे पहली बार जो मिल रहे हैं। मिल तो हम भी आपसे पहली बार रहे हैं, लेकिन आपका चेहरा, हमारे भगवान जी से इतना मिलता है कि हम आपको देखते ही चीन्ह गये कि आप वही है जिनकी सुबह शाम हमारे बाबूजी पूजा प्रार्थना करते हैं।
कुछ साल पहले आपके बाबूजी से हमारे बाबूजी का मिलना हुआ था, मुंबई में।
हमारे बाबूजी का नाम प्रिंस है।
बचपन से हमारे बाबूजी, आपके बाबूजी का इतना कथा कहानी सुनाएं हैं कि हमको एक-एक बात याद हो गया है। यह देखिए फोटो देखें।”
और दुल्लो ने अपने वॉलेट में लगी प्रिंस और राजा की एक साथ की तस्वीर शौर्य को दिखा दी। यह तस्वीर उस वक्त की थी जब प्रिंस अपने गांव के लड़के तुलाराम यादव की शादी में शामिल होने के लिए पहुंचा था। और वहीं मौसमी की तलाश में बांसुरी और राजा पहुंचे थे। उस वक्त उस मुलाकात के बाद प्रिंस राजा का बिल्कुल भक्त हो गया था।
इस तस्वीर में भी राजा और प्रिंस एक साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे। राजा ने प्रिंस को अपनी बाहों के घेरे में लिया, उसके कंधे पर हाथ रखा हुआ था और प्रिंस मुश्किल से राजा के कंधे तक आ रहा था और उसके कंधे से सर टिकाएं मुस्कुरा रहा था।
तस्वीर देखते ही शौर्य के चेहरे पर भी मुस्कान चली आई। उस तस्वीर में भी उसके पिता ने बिल्कुल वही मैरून रंग की शर्ट पहनी थी जो इस वक्त शौर्य ने पहन रखी थी।
बिल्कुल अपने पिता की की तर्ज पर शौर्य की भी एक कलाई पर रुद्राक्ष बांधा था, लेकिन दूसरी कलाई की राडो वह निकाल कर एक लड़के को दे चुका था।
उस तस्वीर को देखकर मुस्कुराने के बाद शौर्य ने उस तस्वीर को वापस वॉलेट में डालकर सामने खड़े दुल्लो को वापस कर दिया।
“करते क्या है तुम्हारे बाबूजी?”
” बस हमारे भगवान की असीम कृपा से बाबूजी अब विधायक हो गए हैं।”
बाबूजी विधायक हो गए हैं, यह सुनते ही शौर्य की एक भौंह उपर हो गई।
मतलब वह किसी ऐसे वैसे लड़के के साथ नहीं खड़ा था। उसके पिता का दोस्त प्रिंस आज कानपुर शहर में विधायक था, और यह बहुत बड़ी खुशी की बात थी।
” तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। कभी हमारे घर भी आना।”
” बिल्कुल आएंगे, हमारे बाबूजी तो कब से आपकी शादी का इंतजार कर रहे हैं। वैसे दो एक बार उनका महल जाना हुआ है। और राजा साहब ने जब सीएम का पदभार संभाला था तब उनके शपथ ग्रहण में भी वह जाना चाहते थे, लेकिन अंदर असेंबली में उन्हें घुसने नहीं दिया गया। बस तभी उन्होंने यह तय कर लिया कि अब वह विधायक बनकर रहेंगे और बस उनकी जिद जीत गई, और हमारे बाबूजी भी विधायक बन गए..।”
“बहुत बढ़िया.. अब मैं चलता हूँ.. शाम गहरा रही है..।”
“भैया जी चलिए न आपको कुछ खवा देते है..।”
उसकी मेहमान नवाजी की इच्छा जान कर शौर्य मुस्कुरा उठा..
“चलो फिर कभी मिलना हुआ तो ज़रूर तुम्हारे साथ बैठ कर खाएंगे… ।”
शौर्य अपनी बात पूरी करते हुए पीछे पलट कर कली की तरफ देखने लगा, लेकिन कली जिन सीढ़ियों पर उतरी थी, वहां उसे नजर नहीं आई।
उसे इस तरह कली को ढूंढता देख दुल्लो भी मुस्करा उठा।
” क्या बात है भैया जी, भौजी नजर नहीं आ रही क्या?”
शौर्य ने उसकी तरफ देखा और हां में गर्दन हिला दी।
“पता नहीं कहां चली गई? यह लड़की भी अजीब है, तस्वीर लेने के पीछे इतनी पागल है कि जहां जो चीज नजर आती है उस तरफ बढ़ जाती है।
बिना यह सोचे समझे कि इतनी भीड़ में अगर गुम हो गई तो मैं उसे ढूंढूगा कैसे ?”
शौर्य के माथे पर परेशानी की बूंदे चमकने लगी थी।
” अरे भैया जी इतना परेशान ना हुई। गंगा घाट में कोई नहीं गुमता और हम भौजाई को ढूंढ लेंगे..।”
कली उस बच्ची को सीढियों से उठा लाई। उसने उसकी मां की बांह अपनी तरफ करके उस बच्चे का हाथ उसके हाथ में पकड़ा दिया। उसकी मां भी बच्ची को देखकर घबरा गई। कली को धन्यवाद देकर उसने उसे प्रसाद दे दिया.. ।
भीड़ का रेला जैसे आरती के पहले घाट की तरफ आया था, वैसे ही आरती खत्म होते ही घाट से बाहर की तरफ निकलने लगा।
कली इस रेले को एक तरफ कर, निकल कर शौर्य की तरफ जाना चाह रही थी, लेकिन वहां ऐसा मजमा था, ऐसा सैलाब था कि लोगों के साथ बहते हुए वह भी लोगों की दिशा में आगे बढ़ती गई।
चाह कर भी वह शौर्य की तरफ नहीं जा सकी। भीड़ की रेलमपेल रुकने को तैयार न थी, और आखिर घाट के सबसे ऊपर पहुंच कर कली थम पाई।
वह मुङी और शौर्य की तरफ बढ़ने को थी कि तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे अपनी तरफ घुमा लिया।
कली जैसे ही उधर घूमी कि उसकी आंखें भय और आश्चर्य से चौड़ी हो गयी…
क्रमशः

यह भाग बहुत अच्छा था, गंगा आरती का बेहतरीन लेखन, ढल्लो का चित्रण, कली को दिया गया सरक्षण, और प्रिंस का पढ़कर पुराना जीवनसाथी याद आ गया जब बांसुरी केस हल करने गई थी और राजा उसके साथ, लेकिन कली किसे देखकर चौंक गई है पढ़ने के लिए तत्पर, बहुत अच्छा भाग दीदी….💐🙏
अच्छा तो ये दुल्लो प्रिंस का बेटा है सच में दुनिया गोल है एक समय ज़ब राजा बनारस आया था तो उसे प्रिन्स मिला और आज शौर्य को दुल्लो। क्या बात है 👏प्रिंस का बेटा भी राजा का भक्त है।
ये कौन आया 🤔जिसे देखकर कली इतना चौंक गयी… वासुकी तो नहीं होगा शायद आपने लिखा भय और आश्चर्य से चौंक गयी फिर कौन 🤔।
इंतज़ार रहेगा… 🙏🏻
बहुत अच्छा भाग 👌👌👌🙏🏻।