जीवनसाथी -3 भाग -39

शौर्य और कली को वहाँ के पूड़ी आलू बेहद पसंद आये और लल्लन के चेहरे पर ऐसी ख़ुशी की चमक आयी जैसे उसकी दुल्हन की पहली रसोई हुई हो और शौर्य और कली ने उसे पास कर दिया हो….
गर्व से सीना चौड़ा किये वो उन्हें वहाँ से फिर चाय की गुमटी में ले गया..
कुल्हड़ में चाय देख शौर्य आनाकानी करने को हुआ लेकिन अति उत्साही कली ने तुरंत कुल्हड़ पकड़ कर चाय में मुहं डाल दिया और अपना मुहं जला बैठी..
“आराम से… इतनी हड़बड़ी किस बात की है ? “
“तस्वीरें भी तो खींचनी है मुझे.. मेरे बॉस को भेजना है.. भूल जाते हैं आप ड्राइवर साहब !”
शौर्य और कली को एक साथ बातें करते देख लल्लन शर्माए जा रहा था.. ।
उसको ये सुंदर सी जोड़ी बड़ी लुभावनी लग रही थी..
उन दोनों को साथ देख उसे गुड्डन भी याद आ रही थी..।
“जिज्जी आपको गौदोलिया लिए चलते हैं..! संतुष्टि से बढ़िया एक बनारसी साड़ी खरीद लेना… बनारस का यादगार हुई जायेगा.. !”
“साडी… लेकिन मैं तो पहनती ही नहीं.. और पहनना आता भी नहीं !”
कली ने मुहं बना कर कहा और शौर्य बिना चेहरे पर कोई भाव लाये बोल पड़ा..
“कौन सी बड़ी बात है साड़ी पहनना.. ! आजकल यूट्यूब में बहुत से ऐसे वीडियो मिल जायेंगे जो साड़ी पहनना सिखाते हैं.. ।
आजकल का लेटेस्ट चेंजिंग रूम है यूट्यूब !”
शौर्य अपनी लय में बोल गया और कली आंखे फाडे उसे देखने लगी..
“मतलब.. ?”
“मतलब लल्लन ले चलो गदौलिया, सोच रहा हूँ रानी माॅम के लिए साड़ी ले लेता हूँ.. !”
कली हलके से मुस्कुरा उठी “बेचारा गरीब लड़का अपनी माँ को रानी मॉम कहता है.. अच्छा है, ख्वाब देखने में क्या जाता है !” मन ही मन सोचती कली ने भी लल्लन के प्रस्ताव पर हामी भर दी..
वैसे भी उसे ढलती शाम के समय घाट पर की तस्वीरें लेनी थी.. इसलिए वो तीनो वहाँ से गदौलिया निकल गए.. घाट के काफी पास का इलाका था..।
वहाँ ‘संतुष्टि ‘ पहुंचने के बाद वो लोग साड़ियां देखने लगे..
एक गहरी नीली रंग की बनारसी देख शौर्य ने उसे अपनी रानी मॉम के लिए अलग करवा लिया..
रूपा के लिए साड़ी लेने के बाद उसे बांसुरी का मुस्कुराता चेहरा याद आने लगा और उसके चेहरे के भावो में थोड़ी सी कोमलता आ गयी….
मॉम के लिए तो कोई अच्छा सा कलर लेना होगा, हालांकि उन पर हर रंग खूब जमता है।
उसने दुकानदार से कुछ और स्पेशल साड़ियां दिखाने की बात कही और दुकानदार एक से बढ़कर एक दामी बनारसी साड़ियां दिखने लगा। एक बादामी और मेहरून के कांबिनेशन वाली साड़ी शौर्य को बहुत पसंद आ रही थी। कली इतनी देर से शौर्य का साड़ियों को देखना देख रही थी।
वह समझ गई कि शौर्य अपनी मां के लिए साड़ी पसंद कर रहा है…
यह दूसरी साड़ी किसके लिए कली ने शौर्य से पूछ लिया और शौर्य ने मुस्कुरा कर मॉम के लिए कह दिया।
कली एक बार फिर मन ही मन सोच में पड़ गई कि आजकल के लड़कों पर अंग्रेजियत का भूत सवार है। अपने मम्मी पापा को मॉम डैड ऐसे बोलते हैं, जैसे लंदन रिटर्न हो।
मुस्कुरा कर उसने देखा और शौर्य की पसंद की तारीफ कर दी।
” तुमने दोनों साड़ियां बहुत अच्छी पसंद की है। एक मेरे लिए भी पसंद करने में मदद कर दो ना ।”
शौर्य ने हामी भरी और एक हल्की गुलाबी रेशमी साड़ी उसने निकाल कर सामने कर दी ।
कली ने देखा साड़ी वाकई बहुत खूबसूरत थी। हल्की गुलाबी साड़ी पर सुनहरी जरी का काम था। और आंचल और बॉर्डर रानी कलर में था जो, उस साड़ी को और भी खूबसूरत बना रहा था।
उसके साथ के डिजाइनर ब्लाउज को देखकर कली सोच में पड़ी हुई थी तभी दुकानदार कली से बोल पड़ा
” आप कहेंगे तो आपको साड़ी बांधकर भी दिखा सकते हैं ।”
कली ने हां कहा , और वह दुकानदार तुरंत अपनी जगह पर खड़ा हो गया।
और साड़ी उठाकर खुद पर लपेटने लगा। उसने अपनी कमर पर एक बेल्ट बांधी और साड़ी को बड़े सलीके से फटाफट अपने ऊपर लपेट लिया।
मूंछों वाले दुकानदार के ऊपर साड़ी देखकर कली को हंसी आ गई। उसने पहली बार ऐसा कुछ देखा था। उसे नहीं मालूम था कि हिंदुस्तानी औरतों के लिए यह बहुत आम बात है।
दुकानों पर मौजूद लड़के या लड़कियां अपने ऊपर ही साड़ी लपेटकर दिखाते हैं।
कली ने मुस्कुरा कर शौर्य की तरफ देखा। कली को बहुत हंसी आ रही थी। शौर्य ने कुछ देर तक दुकानदार को देखा उसके बाद दूसरी तरफ देखने लगा।
” क्या हुआ साहब, ये साड़ी पसंद नहीं आई?”
” पसंद तो आ रही है लेकिन अगर तुम अपने ऊपर लपेटने की जगह इन मैडम के ऊपर ही लपेट कर दिखाओ तो ज्यादा सही समझ में आएगा।”
कली चौंक का शौर्य की तरफ देखने लगी।
” तुम क्या चाहते हो, मैं यहां सबके सामने साड़ी पहनूं?”
शौर्य ने उसे देखा और आंखों से ही इशारा कर दिया।
“जैसे इन भाई साहब ने खुद पर पहनी है ना वैसे ही तुम पर भी पहन कर दिखाएंगे।”
” मैं इस भाई साहब के हाथ से क्यों साड़ी पहनूं?”
” अरे तुम्हें पहनाने के लिए किसी लड़की को बुला लेंगे।”
शौर्य ने उस आदमी की तरफ देखा और उसने दूर काम करती एक लड़की को बुला लिया ।वह अपनी एक सहेली को साथ लिए चली आई।
दोनों लड़कियों ने मिलकर कली को दोनों तरफ से घेर लिया और उसे साड़ी पहनाने लगी ।
कुछ 5 मिनट बाद ही वह दोनों लड़कियां हटी और कली साड़ी में मुस्कुराती हुई सामने खड़ी थी।
शौर्य पल भर को उसे देखता रह गया।
उसे आज पहली बार कली में अपनी मॉम की झलक दिखाई दे रही थी। वह बहुत ध्यान से कली को देख रहा था।
उसकी मॉम जैसी ही बड़ी-बड़ी गहरी काली आंखें, वैसे ही छोटी सी पतली सी नाक और मुस्कराने पर वैसे ही एक तरफ को चढ़ते हुए होंठ..।
एक तरफ का तीखा पैना सा केनाइन जो मुस्कुराने पर और भी खूबसूरत दिखने लगता था।
बार-बार चेहरे पर से हटाने के बावजूद माथे पर चली आई जुल्फें।
सब कुछ तो उसकी मां जैसा ही लग रहा था। कली का चेहरा उसकी मां से कितना मिलता था। उसे खुद को ऐसे देखते पाकर कली पहली बार झेंप गई।
” क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो ?”
“नहीं कुछ नहीं।”
कली धीरे से शौर्य के पास आकर उसके कान के पास झुक गई।
” लाइन मार रहे हो क्या मुझे ?”
शौर्य अचकचा कर सीधा बैठ गया।
” पागल हो क्या? दुनिया की आखिरी लड़की भी बचोगी ना तब भी तुम्हारे लिए दिमाग में ऐसा ख्याल नहीं आ सकता।”
” क्यों, ऐसी क्या बुराई है मुझ में?”
कली ने फौरन पलट कर पूछ लिया।
” मतलब तुम चाहती हो कि तुम्हें लाइन मारूं?”
शौर्य ने भी नहले पर दहला मार दिया।
” अरे नहीं नहीं… मेरा वह मतलब नहीं था।”
” फिर, क्या मतलब था ?”
“छोड़ो ,तुमसे तो बात ही करना बेकार है।” कली मुड़कर दुकानदार की तरफ चली गई।
उन दोनों लड़कियों ने कली की साड़ी उतारने में मदद की और कली ने उस साड़ी को पसंद कर लिया..
कली ने एक हल्की पिस्ते के रंग की साड़ी सरू के लिए भी पसंद कर ली, जबकि उसे पता था सारिका भी सिर्फ जींस और टॉप ही पहना करती थी।
लेकिन उसे लगा सारिका को भी साड़ी पसंद आएगी। सब कुछ होने के बाद कली ही ने बिल करने के लिए कह दिया। दुकानदार ने हां में सर हिला दिया और अपनी बिल बुक खोल कर बैठ गया …
दुकानदार ने बिल बनाने के बाद शौर्य और कली की तरफ देखा और बिल उनकी तरफ बढ़ा दिया।
” जी आपका हुआ है लगभग तीन लाख पचहत्तर हज़ार रुपयों का बिल…!”
अमाउंट सुनकर शौर्य और कली दोनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
शौर्य के लिए यह राशि कुछ बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन इस वक्त उसका कार्ड ब्लॉक था। और इसके लिए वह अब तक बैंक जाकर बात नहीं कर पाया था। कली ने अपना कार्ड निकाला और दुकानदार की तरफ बढ़ा दिया…
उसके अकाउंट में उसके डैडा ने ढेर सारे रुपए डाल रखे थे, लेकिन वह जानती थी कि वह जो भी खर्च करेगी उसके डैडा की जानकारी के अभाव में नहीं कर पाएगी। और इंडियन करेंसी में तीन लाख पचहत्तर हज़ार उसने कहां खर्च कर दिए, इस बात का जवाब उसे अपने डैडा को देना ही पड़ेगा। बस इसीलिए वह दुकान दार से पूछने लगी..
“कुछ ज्यादा ही बिल नहीं बना दिया आपने? सही काउंट किया है ना..?”
“हां मैडम बिल्कुल सही काउंट किया है। आप लोगों की पसंद ही ऐसी लाजवाब है। आपके साहब ने जो दो साड़ियां पसंद की उनमें से एक एक लाख बारह हज़ार की थी और दूसरी एक लाख पंद्रह हज़ार की…
आपने जो पसंद की है, उनके भी मूल्य लगभग ऐसे ही है। कली ने हां में सर हिलाया और अपना कार्ड दुकानदार की तरफ बढ़ा दिया..
“इतना बड़ा अमाउंट तो कार्ड स्वाइप से पेमेंट नहीं हो पाएगा। कुछ आपको कैश देना पड़ेगा।”
” लेकिन मैंने तो कैश नहीं रखा है। मतलब इतना सारा कैश नहीं रखा है।”
” कोई दिक्कत नहीं मैडम, यही बाजू में एसबीआई की ब्रांच है। आप लोग वहां चले जाइए। वहां से पैसे निकाल कर दे दीजिएगा।”
” ठीक है आप इन साड़ियों को एक तरफ रखिएगा। हम आकर ले लेते हैं ।”
कली ने शौर्य की तरफ देखा और शौर्य ने हामी भर दी दोनों उठकर दुकान से बाहर निकल गये।
इन दोनों ही रॉयल किड्स का साड़ियां खरीदते समय दाम पूछने की तरफ ध्यान ही नहीं गया था।
जाहिर था जिन लोगों ने आज तक पैसे को पानी की तरह बहते देखा था, उन्हें इतनी आसानी से रुपए की कीमत कैसे पता चलती?
हालांकि आज पहली बार शौर्य को अपना कार्ड नहीं चल पाने का बेहद दुख हो रहा था। अब तक तो वह मस्त मौला लड़का अपने में मग्न था।
लेकिन आज उसे वाकई बुरा लगा था। और वह चाहता था बैंक जाकर बैंक वालों से वह इस बारे में बात कर ले…।
लल्लन को साथ लिए कली और शौर्य बैंक की तरफ बढ़ गए। हालांकि शौर्य के बाकी दूसरे बैंक में भी अकाउंट थे, लेकिन स्टेट बैंक में भी उसका एक खाता मौजूद था…
बैंक में घुसने के बाद वही हुआ, जो अमूमन सरकारी दफ्तरों में होता है, उनका काम किस काउंटर पर होगा यही चार बार में पता चला.. ।
कली अपना कैश निकलवाने के लिए कैशियर की तरफ चली गई कली ने बातचीत की और कैशियर ने उसका कैश निकाल कर उसे दे दिया।
शौर्य और लल्लन दूसरी तरफ चले गए।
आखिर वो लोग उस काउंटर पर पहुँच गए..।
कांच के पतले पटल के पार एक भद्र पुरुष बैठे थे..।
उनके सामने उनके नाम की तख्ती रखी थी, जिस पर उनका नाम लिखा था अमनप्रिय बांकुरा..
नाम पढ़ कर लल्लन की एक भौंह ऊपर चढ़ गयी..
“भाई वाह, नाम तो गज़ब बढ़िया ढूंढ़ कर रखा है..।”
लल्लन की बात सुन कर आंख में चश्मा चढ़ाये सज्जन जो अपने कम्प्यूटर की स्क्रीन पर तो कभी अपने सामने खुले रजिस्टर पर देख रहे थे, लल्लन की तरफ देखने लगे..
“आप की तारीफ ?” उस सज्जन व्यक्ति ने लल्लन से पूछा..
“अब ये भी हमहू से करवाओगे गुरु..? हमरी तारीफ तो सलगा बनारस करता है। कहीं भी किसी से भी जाकर पूछ लेना, शिव शंभू बाजपेई जी के लड़का का नाम क्या है?
उ का है न ज्यादा बोल बच्चन नहीं हैं हमारे..।
हम जो है सो हैं..। हमें ज्यादा चपड़ चपड़ मारने की आदत तो है नहीं..।
बस काम की बात बोलते हैं.. और जहाँ ज़रूरत न हो, हुआ चुप्पे रह जाते है.. !”
लल्लन की बात पर शौर्य में उस पर एक नजर डाली और बोल पड़ा..
” तुम्हारा इंट्रोडक्शन देना यहां पर बहुत जरूरी था।
और अब अगर तुम्हारी बेहद जरूरी बात पूरी हो गई है, तो मैं अपनी गैर जरूरी बात भी कर लूँ.. !”
कांच के उस पार बैठे बैंकर ने शौर्य की बात सुनी और एक भौंह चढ़ाकर अपने चश्मे को जरा नाक पर नीचे करते हुए शौर्य की तरफ देखने लगा..
” इसी बात पर एक शेर फरमाते हैं….
वह आए हैं कुछ जरूरी बातें करने
कुछ हसीन मुलाकाते करने
लेकिन मौसम ऐसा बेईमान हो रखा है
की भरी गर्मी में हमारा एसी खराब हो रखा है…
“अरे गज़ब गुरु.. तुम तो यार सायर निकले ?” लल्लन टप से बोला और अमनप्रिय ने अपनी कॉलर ज़रा ऊँची कर ली..
“हल्का सा शौक रखते है शायरी का
अल्फ़ाज़ बेहिसाब रखते है हम
कभी किसी के सर के ऊपर से गुज़र जाये
तो कह देते है शायरी हर बार समझ में आये
ये ज़रूरी तो नहीं..
बस कुछ मन के भाव है जो
समय समय पर या मौका बेमौका हम
उतार लेते है पन्नो पर और
हमारे चाहने वाले इसे
हमारा छापाखाना कह दिया करते हैं..
एकदम तरोताज़ा अभी अभी लिखा है.. स्वरचित.. ।”
“भौकाल, अरे दादा, गुरु घंटाल कहाँ थे प्रभु..? का गज़ब कबिता लिखे है आप.. आपको दंडवत साष्टांग प्रणाम है.. !”
” लल्लन बाबू और छापाखाना जी अब अगर आप दोनों का यह प्रिय राम भारत मिलाप हो गया हो तो मैं अपने काम की बात करूं?”
अमनप्रिय ने अपने चश्मे को सही करते हुए शौर्य की तरफ देखा।
” फरमाइए, हम क्या सेवा कर सकते हैं आपकी?”
” जी आप ढेर सारी सेवा कर सकते हैं मेरी। यह मेरे कार्ड्स हैं।
क्या आप इन्हें चेक करके बता सकते हैं कि इनमें मनी है या नही?
यह काम नहीं कर रहा है।
जबकि अभी इनकी एक्सपायरी तो नहीं आई है..।”
बड़े अदब से अमनप्रिय ने शौर्य के कार्ड अपने हाथ में ले लिए।
उन्हें उलट पलट कर देखने के बाद उसने शौर्य की तरफ देखा और उसके कार्ड्स धीरे से कांच के निचले हिस्से से बाहर सरका दिए।
” आपके अपने हैं ? या किसी और के मार लिए हैं आपने?”
शौर्य ने अजीब सा चेहरा बना कर अमनप्रिय को देखा। उस वक्त टहलते टहलते कली जरा दूर चली गई थी। अमनप्रिय शौर्य की नजरों से पल भर के लिए घबरा गया।
” नहीं हमारा कहने का मतलब है, यह तो बहुत बड़े प्राइवेट इंटरनेशनल बैंक के प्लेटिनम कार्ड्स हैं।
इन कार्ड्स में तो लाखों रुपए की ट्रांजैक्शन बड़ी आसानी से हो जाती है..।
यह कार्ड जिन बैंक अकाउंट यानी खाता धारकों को दिए जाते हैं, वह कोई सामान्य खाताधारक तो होते नहीं। उनके अकाउंट का मिनिमम बैलेंस लाख रुपए होता है। तो सर अगर यह आपके कार्ड है तो आपके अकाउंट में इस वक्त कम से कम नहीं तो लाख रुपए का मिनिमम बैलेंस तो होगा ही।
क्योंकि आपकी यह कार्ड इंटरनेशनल मानकों वाले कार्ड हैं। और उन कार्ड पर मौजूद खाता मिनिमम बैलेंस भी उतना रखते हैं, जितना हमारे हिंदुस्तान के बहुत से सामान्य वर्ग के लोगों के खाते की कुल जमा राशि होती है। अब समझ लेना हम क्या कह रहे.. ?”
“मैं समझ तो रहा हूं, लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि अगर इतना बैलेंस है तो मेरे कार्ड्स काम क्यों नहीं कर रहे हैं..?”
“हो सकता है आपके कार्ड् ब्लॉक कर दिए गए हैं.।”
“लेकिन मेरे कार्ड्स कौन ब्लॉक करेगा.. ?”
“आप आइये हमारे साथ..।
आपको मैनेजर साहब से मिलवा देते हैं.. ।
आप वहाँ रुकिये, हम आपके कार्ड्स चेक कर लेते हैं।”
अमनप्रिय अपने केबिन से बाहर निकल आया, और शौर्य को लेकर मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़ गया। इसी बीच उसने अपनी सीट के नीचे लगे पुलिस अलार्म को दबा दिया था। अमनप्रिय को शौर्य के पास से मिले इतने महंगे कार्ड देखकर उस पर शक हो रहा था। और इसलिए उसने पुलिस को वहां बुला लिया था, और इसीलिए वह शौर्य को मैनेजर के केबिन में नजर बंद करने लेकर जा रहा था।
शौर्य को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था। वह चुपचाप अमनप्रिय के पीछे चल रहा था कि तभी सामने से आता एक लड़का उससे टकरा गया…
ये वही ऑफिसर विक्रम था…
उसने शौर्य को देखा और उसकी बांह पकड़ ली..
धीरे से उसके कान के पास आकर वो कुछ बोल गया..
” भागो यहां से, इस बैंकर को तुम्हारे कार्ड्स देखकर तुम पर शक हो गया है, और इसने पुलिस बुला ली है। मैं यहां के लोकल पुलिस के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर पाऊंगा, तुरंत निकलो..।”
उसकी बात सुनकर शौर्य एकदम से हड़बड़ा गया ।
उसने सामने चल रहे हैं अमनप्रिय की तरफ देखा। और विक्रम की तरफ देखकर कैसे निकलूं का इशारा करने लगा?
विक्रम ने अपने माथे पर धीरे से अपना हाथ मार लिया। और अमनप्रिय की तरफ देखने के बाद वापस शौर्य की तरफ देखने लगा।
” वह तुम्हारे आगे चल रहा है ,उसका ध्यान नहीं है कि तुम पीछे आ रहे हो या नहीं?
वापस मुड़ जाओ और लंबे-लंबे कदम बढ़ाते हुए आराम से बैंक से बाहर निकल जाओ। अगर वह मुड़ता है, तो मैं उसे संभाल लूंगा।
और सुनो, अपने साथ जो पागलों की फौज लिए घूमते हो, उन्हें भी साथ ले जाना। वरना उन लोगों को पकड़ कर भी तुम्हें पकड़ा जा सकता है अब निकलो फटाफट..
विक्रम के ऐसा कहते ही शौर्य तुरंत मुड़कर बाहर की तरफ निकल गया।
उसने चलते-चलते दीवार पर लगी किसी पेंटिंग को बड़े ध्यान से निहारती कली का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खींच लिया।
उन दोनों को आगे बढ़ते देख लल्लन भी दौड़ लगाकर उन तक पहुंच गया।
वह तीनों बैंक से बाहर निकल गये।
उसी वक्त अमनप्रिय पीछे पलटा और अपने ठीक पीछे खड़े विक्रम को देखकर वह हड़बड़ा गया..
“आप की तारीफ…?”
“तारीफ करूँ क्या उसकी जिसने मुझे बनाया। “‘
विक्रम के सपाट चेहरे से निकले ये शब्द कुछ अलग से लग रहे थे लेकिन अमनप्रिय ने हामी भर दी..
” पुलिस को अभी-अभी आपने ही कॉल किया था ना। कॉल हमारे पास ही आया था, बताइए क्या खिदमत करूं आपकी ?
” जी इंटरनेशनल बैंक्स के कार्ड बरामद हुए हैं। एक लड़के के पास से, बस उस लड़के की जांच के लिए आपको बुलवाया था..!”
“अच्छी बात है.. वैसे आप शायरी बड़ी खूब कहते हैं.. !”
फिजूल की शेरो शायरियां लिखना अमनप्रिय की कमजोरी थी।
अगर उसके लिखे कि किसी ने तारीफ कर दी तो बंदा बिल्कुल ही पिघल जाता था।
इस वक्त भी विक्रम के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर वह शरमा गया..
” बस यूं ही कुछ दिल के अरमान होते हैं,
तो कहीं भी दिल के लव्स होते हैं ।
जो पन्नों पर हम उतारते चले जाते हैं
आप पढ़ते हैं और आपको यूं ही पसंद आते चले जाते हैं।
हम कभी शेर लिखते हैं, और कभी हमारी शायरी खुद-ब-खुद लिख जाती है…।
इत्तेफाक की बात यह है कि वह कभी आपको पसंद आ जाती है,
और कभी आप उन्हें पसंद आ जाते हैं..!”
विक्रम के सपाट सर्द चेहरे पर अब भी कोई भाव नहीं आए।
बिल्कुल बिना भाव के उसने “वाह !!बहुत खूब” कह दिया और मुड़कर बाहर की तरफ निकलने लगा…
सामने से आते एक दूसरे बैंक कर्मी ने उससे पूछ लिया..
” क्या सुनाया आपको अभी-अभी हमारे छाप खाने ने..?”
” पता नहीं, हमें तो समझ नहीं आया।अगर आपकी हिम्मत है तो आप खुद ब खुद पूछ लीजिए..।”
और विक्रम भी तेज़ी से बाहर निकल गया..
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कली और लल्लन पूछते रह गए, लेकिन शौर्य ने उन दोनों को कुछ नहीं बताया।
शाम घिरने लगी थी और लल्लन उन लोगों को बनारस की सबसे खूबसूरत चीज यानी बनारस के घाट और गंगा नदी के किनारे होती गंगा जी की आरती दिखाने ले गया..
क्रमशः

बड़ी मुसीबत फंसे हैं राजकुमार लेकिन विक्रम उसके पास से हर बेताल को दूर कर दे रहा है, क्या राज है विक्रम का, कली का स्वभाव शौर्य को पसन्द है, उसकी बेवकूफियों में सच्चाई है इसलिए उसके साथ वह खड़ा है लेकिन लल्लन के बातूनी रूप को वह पसन्द नहीं कर पा रहा है। फिर भी उसकी नेकनियती को वह भांप गया है लेकिन सवाल एक ही है आखिर इस कहानी का अगला सिरा कहां खुलता है, जानने के लिए पढ़ता रहूंगा, बहुत अच्छा पार्ट दीदी…💐🙏
Aparna…. बनारस शायद ही कभी जा पाऊं मै पर अब बनारस को आप ही की कहानी के जरिये देख रही हूँ,ऐसा लग रहा मै बनारस में ही हूँ अभी,, वो घाट, गंगा आरती, वो कपूर, धूप की की महक आहा.. सब महसूस कर रही हूँ मै 😊धन्यवाद dear, इतना सजीव वर्णन करने के लिए 😘।
SBI के अमनप्रिय बंकुरा को पढ़कर तो मेरी हंसी नहीं रुक रही थी, पुराना कुछ याद आ गया, छापा खाना कुछ भी छापकर चेप देता है,स्वर रचित कुछ भी रच दे चाहे किसी को समझ आए ना आए 😄। मजा आ गया 👏👏।
बहुत लाजबाब भाग 👌👌