जीवनसाथी -3 भाग -37

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“मेरा काम है समाज से गंदगी को हटाना, मैं एक चिंगारी हूँ जो सच का दीपक जलाने आया है..!
और मैं इसी तरह उन बड़े बड़े नामों के पीछे छिपे काले सच को सामने लाता रहूँगा..!
इस कहानी में अभी और भी बहुत कुछ बाकी है।
बने रहिये सनंत के साथ, इस सच्चाई के अगले किस्से में हम जानेंगे कि कैसे राजा साहब, गलत को सही साबित करते हैं !”
टेलीविज़न पर उस कार्यक्रम का अगला भाग प्रसारित होने जा रहा था..
कार्यक्रम के पहले भाग में सनंत कस्तूरिया ने जिस तरह से राजा साहब के खिलाफ कहानी बनाकर सुनाई थी, कार्यक्रम रातों-रात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंच गया था।
वैसे भी सच की गूंज अपने दर्शकों के बीच अच्छी खासी ख्याति बटोर चुका था..
सोने पे सुहागा वाली बात ये हो गयी कि राजा साहब के जीवन पर किसी कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा था…
राजा साहब का अपना नाम इतना ऊँचा था कि उनके चाहने वाले उनसे जुडी हर एक बात जान लेना चाहते थे, इसलिए उनके चाहने वालों ने टूट कर कार्यक्रम का इंतज़ार किया था।
वहीँ राजा साहब से जलन रखने वालों की भी कमी ना थी..
वो लोग राजा साहब का क्राइम शो से वास्ता देखना चाह्ते थे…
और इन जलनखोरो की ख़ुशी इनके हर ओर छोर से फूटी पड़ रही थी…।
राजा साहब के खिलाफ इतना कुछ सुन कर इन घटिया लोगों की बांछे खिल गयी थी..
इनमे से ज्यादातर को ये उम्मीद थी कि राजा साहब इस कार्यक्रम का अगला भाग प्रसारित होने नहीं देंगे..
अपने रसूख और रुतबे से वो उस भाग का प्रसारण रुकवा देंगे और हो सकता है इस पत्रकार को भी गायब करवा देंगे..।
अमूमन अगर किसी नेता मंत्री का कोई जज्बाती पत्रकार इस तरह का कार्यक्रम बना कर पेश कर दे, तो या तो पत्रकार रातों रात गायब करवा कर मरवा दिया जाता है। या फिर उसकी हालत ऐसी कर दी जाती है कि वह गुमनामी के अंधेरों में समाज के चित्र पटल से पूरी तरह गायब हो जाता है..।
लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ!!
कार्यक्रम के पहले भाग के प्रसारण के साथ ही लोगो ने जो सोच रखा था, उसके अगले भाग के प्रसारण की तिथि भी चली आयी और एक बार फिर अपने तयशुदा समय पर सनंत कस्तूरिया मौजूद था…
कार्यक्रम ने एक ही रात में टीआरपी की रेस में पहला स्थान पा लिया था, और कार्यक्रम की कामयाबी का यह हाल था कि और किसी कार्यक्रम की जगह वह चैनल सुबह से सिर्फ कार्यक्रम के अगले भाग के झलकियां दिखा रहा था…
अगले भाग को देख लेने की लोगो की उत्सुकता ऐसे चरम पर पहुँच गयी थी कि दुकानदारों ने नौ बजे वाले उस कार्यक्रम को देखने के लिये दुकानें अपने समय से पहले ही बढ़ा दी थी..।
गुमटी और ठेले वाले भी अपना-अपना सामान समेट कर घरों के लिए निकल गए थे। यहां तक की दफ्तर में काम करने वाले भी जल्दी-जल्दी अपनी मेट्रो पकड़ कर अपने घर के लिए प्रस्थान कर चुके थे।
ऐसा लग रहा था पूरा शहर ही नहीं पूरा राज्य बल्कि पूरा देश नौ के बाद सांस रोके टेलीविजन पर अपने राजा साहब के जीवन के अगले किससे को सुनने के लिए बेकरार बैठा था।
टेलीविजन पर कार्यक्रम का अगला भाग शुरू हुआ और सनंत कस्तूरिया वापस स्क्रीन पर आकर ऊलजलूल लफ्फाजियां करने लगा…
“ध्यान से देखिये.. यही है आपके प्यारे राजा साहब..
इनकी नेक नियति, ईमानदारी, सच्चाई, इनके मुहब्ब्ती दिल के किस्से सुन सुन कर आप सब इस भरम में आ गए थे कि कलियुग में भगवान अवतरित हो गए हैं। लेकिन ये सच्चाई नहीं है.. सच्चाई इसके बिलकुल उलट है..
ये वो आदमी है जिसने हमेशा गलत बातों को सपोर्ट किया है..।
इसका भाई विराज सिंह जब जहाँ मर्ज़ी जो चाहे वो करता है, और ये अपना भाई होने के कारण उसे सजा देने कि जग़ह उल्टा बड़ी बड़ी पोस्ट पर बैठा कर उसका कल्याण करने में लगा रहता है..।
क्या जरूरत थी विराज जैसे आदमी को मायानगरी जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी का कार्य भार सौंपने की? लेकिन भाई भतीजावाद तो हर जगह चलता ही है। इन्होंने हर जगह अपने लोगों को ही घुसाया है।
यहां तक की अपने मंत्रालय में भी अपनी पत्नी की पोस्टिंग करवा ली थी। इनकी सोच इतनी गिरी हुई है कि यह चाहते हैं हर तरफ उनके महल के लोग, उनके करीबी, रिश्तेदार मित्र आदि हर एक लाभ के पद पर बैठे रहे। और हर तरफ से लक्ष्मी इन्हीं के महल में आए।
तरह-तरह के व्यापार होने के बावजूद यह लगातार अपने व्यापार में वृद्धि कर रहे हैं। लेकिन कहने को यह बात हो जाती है कि यह एक बहुत ईमानदार मंत्री हैं। क्या आज के ज़माने में कोई इतना ईमानदार भी हो सकता है.. ?
नहीं!!
और उसका सबूत मैं आपको दिखाने जा रहा हूँ..
उसके ऐसा बोलने के साथ ही टीवी पर एक क्लिप नजर आई, जिसमें सनंत राजा साहब से हाथ मिला रहा है। हालांकि वहां की सारी बातचीत म्यूट कर दी गई थी। लेकिन उस हाथ मिलाने के दृश्य को अलग-अलग एंगल से लगभग आठ से दस बार कैमरा की स्क्रीन पर दिखाया गया, और इसके साथ ही सनंत की आवाज बैकग्राउंड में गूंजती रही।
“यह आप लोग देख रहे हैं ना राजा साहब एक अदना से पत्रकार से हाथ मिला रहे हैं। आप जानते हैं क्यों? क्या आपको लगता है कि सनंत कस्तूरिया की इतनी औकात है कि वह राजा साहब से हाथ मिल सके?
नहीं! बिल्कुल नहीं! यह तो कल के पहले एपिसोड के प्रसारण के बाद राजा साहब ने 2 करोड रुपए की पेशकश की थी कि उन 2 करोड़ रूपयो को रखकर मैं उनसे हाथ मिला लूं और उनके कार्यक्रम का अगला भाग प्रसारित ना करूँ….।
लेकिन मैंने भी कसम खा रही है कि ईमानदारी की राह पकड़ कर चलनी है…।
आज भले ही बाकी के चैनल और बाकी के कार्यक्रम सस्ता मनोरंजन पेश करके ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोर रहे हैं, लेकिन मैं भी कसम खाई है कि मुझे सिर्फ सस्ता मनोरंजन नहीं देना है। मुझे अपने दर्शकों को समाज की सच्चाई से अवगत कराना है। और मैं अपने इस लक्ष्य में धीरे-धीरे ही सही कामयाब भी हो रहा हूं। अगर एक किसी के दिल में भी मैंने बगावत की चिंगारी भड़का दी तो मैं मान जाऊंगा कि मेरा प्रयास सार्थक हुआ।
आप देख सकते हैं राजा साहब मुझ जैसे अदना से आदमी से हाथ मिला रहे हैं और उसके पीछे का कारण अब आप सबको मालूम चल गया है…।”
और भी ढेर सारी फिजूल बातों के साथ सनंत कस्तूरिया ने अपना कार्यक्रम बंद किया। देखने वालों ने देख कर अलग-अलग भावनाएं अपने मन में बना ली।
राजा साहब के चाहने वालों को सनंत कस्तूरिया में एक निहायत ही बददिमाग ओछी और घटिया मानसिकता का ज़लील इंसान नजर आ रहा था।
वहीँ जो सनंत के चापलूस थे, उन्हें सनंत की बात सौ टका खरी लग रही थी और वो लोग जोर शोर से उसके कार्यक्रम की वाहवाही में लगे थे..।
चैनल के मालिक का हाल बेहाल हो रखा था..।
सनंत तो मात्र एक पत्रकार था, उसका कहीं इस चैनल से खात्मा हो भी गया तो वो कही और अपना आटा दाल निकाल ही लेगा, लेकिन कही राजा साहब की कुदृष्टि चैनल के मालिकों पर पड़ गयी तो उनके चैनल को समूल उखड़ने से कोई नहीं बचा सकता था..
इस कार्यक्रम के प्रसारण के साथ ही चैनल का मालिक चिंतित सा भागता हुआ स्टूडियो पहुंच गया…
लेकिन उसके पहुंचने तक में सनंत अपना काम कर चुका था..
हरा थका सा वो समर का नंबर लगा कर राजा साहब से व्यक्तिगत तौर पर मिल कर माफ़ी मांगने की ज़िद करने लगा, लेकिन अपने राजा साहब को अच्छे से जानने वाले समर ने फिलहाल राजा साहब से मुलाकात के लिए मना कर दिया…
जैसा की बहुत से लोगों को लगा था कि अब सनंत कस्तूरिया की पत्रकारिता समाप्त हो जाएगी। यहां तक की सनंत खुद किसी अंधेरे कुएं में जा छिपेगा, क्योंकि राजा साहब भले उसे माफ कर दे लेकिन समर और प्रेम उसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे।
लेकिन सबकी आशाओं के विपरीत ऐसा कुछ नहीं हुआ। राजा अजातशत्रु ने समर और प्रेम को भी कुछ भी करने से रोक दिया।
यही तो मुख्य अंतर था एक सामान्य आदमी की सोच और राजा अजातशत्रु की सोच में।
सामान्य इंसान अपने ऊपर हुए गलत काम का बदला लेने के लिए खुद कूद पड़ता है, लेकिन राजा साहब को अपने ईष्ट पर पूरा भरोसा था।
इसलिए उन्होंने सनंत पर कोई कार्यवाही नहीं की और चुपचाप पहले की तरह ही अपने काम में लग रहे। समर और प्रेम के साथ ही उन्होंने महल के बाकी लोगों और बांसुरी को भी समझा बुझा दिया और सभी लोगों ने राजा साहब की तरह सनंत कस्तूरिया को माफ कर दिया।
लेकिन इस संसार को बनाने वाला भी तो सनंत कस्तूरिया की करनी को देख रहा था।
आखिर वह कैसे उसके किये गलत काम पर आंखें मूंद लेता?
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शौर्य को ज़बरदस्ती अपने साथ खींच खाँच कर कली अंदर ले गयी…
मंदिर और उसके अंदर का पवित्र वातावरण ऐसा जादुई होता ही है कि शायद ही कोई बिरला होगा जिसके प्रभु के सामने हाथ ना जुड़े..
शौर्य अलग स्वभाव का तो था लेकिन घमंडी ना था..
उसके भी हाथ भगवान की मूर्ति के सामने स्वतः जुड़ गए..
दोनों ही लोग हाथ जोड़े खड़े थे।
सामने पंडित जी ने दोनों का नाम पूछ कर पूजा करवाई और दोनों के हाथ में प्रसाद रख ने के बाद रक्षा सूत्र बांधने पूछ लिया..?
कली ने बंधवा लिया लेकिन शौर्य ने अपना हाथ झटक दिया..
“इनका मुझे पहले ही पता था पंडित जी, ये शुरुआत में किसी भी बात को मना करने की एक्टिंग करने में माहिर है.. बाद में भले ही मान जाये !”
“अच्छा.. और मैंने ऐसा कब किया ?”
“मुझे पता था भूल जाओगे.. रास्ते में वो बूढ़े बाबा मिले थे याद है? जो हमारे ढाबे पर रुकने के बाद गाड़ी से कहीं चले गए थे.. उनकी सीट पर एक रुद्राक्ष मिला था, याद है ?”
“हम्म याद है.. तो ?”
“और वो क्या बता रहे थे वो, याद है या भूल गए.. ?”
शौर्य ने ना में गर्दन हिला दी..
“वो कह रहे थे ना कि मुश्किलें आ सकती है, तुम्हे तैयार रहना होगा.. मुझे लगता है ये रुद्राक्ष भी उन ज्ञानी बाबा जी ने तुम्हारे लिए ही छोड़ा होगा..
अपनी बात बोलते हुए कली पंडित जी की तरफ देखने लगी..
“क्या ये रुद्राक्ष आप इन्हे बांध देंगे ?”
पंडित जी को बाकी भक्तो को भी प्रसाद बाँटना था, उन्होंने एक तरफ खड़े लड़के की तरफ इशारा कर दिया और शौर्य को साथ लिए कली उस लड़के की तरफ चली गयी..
वो शायद पंडित जी का बारह तेरह साल का बेटा था, जो कभी अपनी स्कूल की छुट्टी वाले दिन मंदिर चला आया करता था..।
उसे ज्ञान कितना था मालूम नहीं, लेकिन चेहरे पर भाव ऐसे थे जैसे उसने सारे धर्मग्रंथो का पाठ कर रखा है…
“छोटे पंडित जी.. ये रुद्राक्ष इन्हे बांध देंगे क्या ?”
कली ने बड़े प्यार से अनुनय की और वो छोटे पंडित जी जो ज़मीन पर गलती से थोड़े से गिरे हुए घी को सींक से फैला फैला कर पूरी तन्मयता से फूल बनाने में व्यस्त थे ने आंखे उठा कर कली की तरफ देखा फिर शौर्य को देखने लगा..
” मेरे हाथ में तो ऑलरेडी बंधा है.. आप इन्हीं के हाथ में बांध दीजिए ,कली मैडम आप अपने हाथ में बंधवा लीजिये.. !”
कली ने भी हामी भर दी… और अपने अधखिले फूल को प्यार भरी नजर से देख कर पंडित जी कली के ही हाथ में रुद्राक्ष बांधने लगे..
कली ने भी बंधवा लिया….
बंधवाने के बाद कली ने पर्स से कुछ पैसे निकाले और वहाँ रखने जा रही थी कि छोटे पंडित जी चीख पड़े..
“हम नहीं लेते ये सब.. ये दान दक्षिणा सब मंदिर के कोषालय के लिए है, और ये वहीँ प्रभु के सामने बनी दान पेटी में डालिये..
कली ने शौर्य की तरफ देखा, इसकी जेब तो खाली थी..
“मेरे पास तो कुछ भी नहीं है, क्या दूँ डालने के लिए ?”
उस छोटे पंडित ने एक बार शौर्य की तरफ देखा और कली को देख मुस्कुरा उठा….
“जब खुद राजा ऐसा बोले की उसका हाथ खाली है तो प्रजा क्या करेगी ?”
कली को छोटे पंडित की बातें बड़ी अच्छी लग रही थी..
“अरे छोटे पंडित जी कन्फ्यूज़ मत रहिये.. ये सिर्फ शक्ल से रईसजादा दिखता है, असल में बेचारा गरीब घऱ का लड़का है..
जिस दिन काम करता है उसी दिन खा पाता है.. अभी काम पर नहीं जा रहा, इसलिए इसके पास पैसे भी नहीं है.. !”
“अच्छा ! फिर एक बात बताइये की आप इस गरीब की मदद क्यों कर रही भला ? आपका इसमें क्या फायदा ? क्या ये आपका रिश्तेदार है या होने वाला रिश्तेदार ?
इस सवाल का कोई जवाब कली के पास नहीं था…
वो और शौर्य दोनों ही एक दूसरे की तरफ देखने लगे..
“अरे हाँ.. मुझे बैंक जाना था, यहाँ कहीं आसपास कोई बैंक होगा क्या ? ” शौर्य ने उस छोटे पंडित से पूछ लिया..
“एक गरीब ब्राम्हण से बैंक का पता पूछ रहे हो? कोई बात नहीं, वैसे हमें पता है.. आप लोग घाट से ऊपर जायेंगे, वही दाहिनी ओर थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो आपको ब्रांच मिल जाएगी..।
पर पहले ही बता रहे हैं वहाँ एक से बढ़ कर एक भौकालिया मिलेंगे, और दूसरी बात आप थोड़ा टेम से पहुँच जाना, क्यूंकि हर डेढ़ घंटे में बैंक वालो का लंच ब्रेक हो जाता है.. !”
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उसकी बात सुन कली हंसने लगी और शौर्य बाहर निकल गया..
उसी के पीछे कली भी बाहर चली आयी..
उन लोगों के साथ ही लल्लन भी आगे बढ़ गए..
“दीनानाथ चले गुरु.. ?”
“पहले मुझे ज़रा बैंक जाना है !”
“पहले तनिक पेट पूजा तो कर लीजिये मालिक, बैंक जाने के लिए तो पूरा दिन पड़ा है। और वैसे भी एक बार बैंक में घुसे ना तो वहाँ जो ग़दर कटता है की जी कलबला जायेगा..
साला कोनो को बात करने की तमिजे (तमीज़ ही ) नहीं है… जिसको देखो ऐसन खाने को दौड़ता है, जैसे हम साला उसकी भैंस चुरा के ले गए।
इसलिए खा पीकर आराम से जाइएगा, जिससे उनकी जली कटी सुनने का थोड़ा बल रहे..!”
शौर्य ने कली की तरफ देखे बगैर ही आगे कदम बढ़ा दिए..
और उसके पीछे लल्लन भी दौड़ पड़ा, जाते जाते वो कली के कान में गुनगुना गया..
“मेहमान जी तनिक गुस्सा वाले लगते हैं, पर एक बात है दिखते गज़ब भौकाल है.. अइसन लगता है जैसे हालीवुड से साक्षात् कोई हीरो उतर आया है.. नै ?”
कली ने हामी भारी और उन दोनों के पीछे पीछे दीनानाथ की तरफ बढ़ गयी..
दुकान के बाहर तक चली आती आलू की गरम मसाले वाली तरी और विशुद्ध घृत में तली जा रही पूड़ियों की जानलेवा खुशबु अच्छे अच्छे साधकों का मन डुला जाती ..
शौर्य जिसकी अब तक खाने में कोई विशेष रूचि नहीं थी, भी वहाँ जाकर खुद को रोक नहीं पाया..
उसने लल्लन की तरफ देखा, और लल्लन खुद भाग कर एक बेंच उन दोनों के लिए तैयार करने लगा..।
अपना रुमाल निकाल कर उसने हल्का सा इधर उधर मार कर सफाई कर ऐसा दृश्य बना दिया जैसे उसने टेबल और कुर्सियों को पोंछ कर बिल्कुल शीशे की तरह चमका दिया हो।
कली और शौर्य को वही बैठा कर उसने वहीँ से हांक लगा दी..
“अरे कोई है… पतरी उतरी लगाओ यार..।
बाहर से गेष्ट आये है, और तुम लोग साला लोकल भीड़ को ठुंसाने में लगे हो..।
उधर से एक बालक कंधे पर झाड़न और हाथ में परोसा लेकर जा रहा था, उसने लल्लन की बात बिलकुल ही अनसुनी कर दी और लल्लन ने पीछे से उसे पकड़ लिया..
“काहे बे.. आंख में मोतियाबिंद हो गया है का? तुमको छह फुटिया हम दिखाई नहीं दे रहे है ? कान में बिलकुल सीसा पिघलाए बैठे हो बे?
हमारा बकालत का तीसरा साल चल रहा है, एक बार पास कर लिए ना, इस दुकान का लीज़ वूज़ सब निकलवा देंगे.. समझे !”
“हां तो पांच साल से आप थर्डे ईयर में तो हैं, पास तो नहीं न हुए आप?” वह लड़का भी फुलझड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया
“अरे शांत हो जाओ लल्लन साहब.. अभी तो हम आये हैं.. अभी तो वेटर्स को पता भी नहीं चला कि हम कस्टमर है.. इतना क्यों नाराज़ हो रहे !”
शौर्य ने पहली बार लल्लन से ठीक से बात की और इसी बात पर लल्लन के कंधे और ऊँचे हो गए..
उसे ये विदेशी सी दिखती जोड़ी बड़ी भा गयी थी और कहीं ना कहीं इन पर अपना प्रभाव ज़माने के लिए लल्लन एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए पड़ा था..
उसी समय एक दूसरा लड़का आया और अपने झाड़न से दो तीन बार टेबल को झटका मार कर पहले से साफ टेबल को थोड़ा सा गन्दा कर के चला गया..।
उसके जाते ही दूसरा लड़का आया और पानी का जग और तीन ग्लास रख गया..।
उसके जाते ही पहले वाला वापस आया और एक छोटी स्टिल की ट्रे रख गया.. जिसमे तीन छोटी डिब्बिया थी जिनमे एक में तली मिर्चे, एक में निम्बू आम का अचार और एक में प्याज के छल्ले थे..
इसके बाद वापस दूसरा लड़का आया और तीन प्लेट लगा कर चला गया और इसके साथ ही एक लड़के ने आकर आलू की सब्जी भर भर कर परोसी.. और उसके पीछे आये लड़के ने गर्मागर्म पूड़ियाँ डाल दी…
पहला निवाला मुहं में लेते ही शौर्य को लगा जैसे अमृत चख लिया हो..
कली ने तो पहला निवाला लेते ही आंखे बंद की और उस स्वाद को महसूस करने लगी..
“वाह वाह.. लल्लन भाई.. मजा आ गया.. !”
लल्लन के चेहरे पर ऐसी ख़ुशी की चमक आयी जैसे उसकी दुल्हन की पहली रसोई हुई हो और शौर्य और कली ने उसे पास कर दिया हो..
क्रमशः
aparna..

बहुत ही अच्छा लगा पढ़के दी, लल्लन भईया जमाए बैठे हैं मज़ा और अब शौर्य भी उसका साथ दे रहा है, कली और शौर्य को कब गंभीरता से एक दूसरे को समझेंगे यह पढ़ना भी रोचक होगा, सनंत का क्या हुआ यह जानना जरूरी है, और पढ़ना अच्छा लगेगा, अच्छा पार्ट दीदी…💐🙏
😊मुझे पता था राजा समर और प्रेम को कोई एक्शन नहीं लेने देंगे उस झूठे पत्रकार के खिलाफ, पर भगवान तो सब देख रहें हैना उससे कैसे कोई बच सकता है, न्याय तो होगा, जरूर होगा उस पत्रकार को ईश्वर सज़ा देंगे। इंतज़ार रहेगा।
बनारस जा तो नहीं पाऊँगी पर आप मेरी संजय बनकर मुझे हर चीज हर जगह दिखा रही हो 😊😘। आलू पुरी… 😫अपर्णा… मुझे आलू पुरी वाली भूख लगने लगी यार। वो स्वाद आहा खा वो रहे थे मुँह मेरा खुल गया 🤦♀️ऐसे लगा मेरे मुँह में…. 😃।
चलिए अब आगे चलते है…।
बेहद खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻🙏🏼😘।