अपराजिता -112

अनिर्वान गोलू को साथ लिए वापस लौट आया था….
गोलू के बारे में उसने किसी को मालूम नहीं चलने दिया था, यहां तक की उसका महकमा भी उसके बारे में नहीं जानता था..
अनिर्वान के दोनों खास लोग भाटी और बाबूराव के अलावा फिलहाल किसी को नहीं मालूम था कि अनिर्वान किस केस पर क्या काम कर रहा हैं… ?
और ना ही उसने किसी को मालूम चलने दिया था !
वापस लौटने के बाद उसके काम की लिस्ट में पहला काम डॉक्टर रेशम से मिल कर उस पुराने केस और पंकज के बाबत सारी जानकारी लेना था और दूसरा और इससे भी महत्वपूर्ण काम था धीरेन्द्र की पत्नी गीता से मिलना..
उसने गीता का नंबर पता करवा लिया था..
उसने अगले दिन अपने ऑफिस पहुंचने के बाद गीता का नंबर लगा दिया..
दूसरी तरफ से गीता ने फ़ोन उठाया..
“जी कौन बोल रहे है ? “
“एसीपी अनिर्वान भारद्वाज बोल रहा हूँ.. क्या गीता जी से बात हो सकती है..
“हाँ बोल रही हूँ.. !” एसीपी सुन कर गीता का लहजा बदल सा गया..
“आपसे मिलना था गीता जी, घर आ जाऊं या आप मेरे ऑफिस आना पसंद करेंगी ?”
“जी आपको मुझसे क्या काम है ?”
“अखंड सिंह परिहार को जानती है आप ?”
यह नाम सुनते ही गीता के मन की बेचैनी टेलीफोन के दूसरी तरफ होकर भी अनिर्वान ने महसूस कर ली…
“जी.. !”
“बस उन्ही के बारे में कुछ जानना था !”
“पूछिए ?”
“फ़ोन पर अखंड बाबू के बारे में बात करना सही नहीं होगा शायद… आप चाहे तो हम किसी तीसरी जगह भी मिल सकते हैं.. जैसे किसी कैफे में ?”
गीता बात कर रही थी कि धीरेन्द्र ने उसे आवाज लगा दी..
“क्या है, किससे बात कर रही हो ? सौ बार कहा है जब मैं घर में रहूं तुम अपना फ़ोन टेबल पर पड़ा रहने दिया करो लेकिन नहीं, पति से ज्यादा प्यार तो मोबाइल से है..दिन भार मोबाइल में घुसी रहिये आप.. !”
“आपसे तो बेहतर ही हैं !” तड़प कर गीता ने जवाब दिया और फ़ोन काट दिया लेकिन इसी सब में अनिर्वान ने धीरेन्द्र का उलाहना और गीता की तड़प सब सुन ली…. .
“हुज़ूर फ़ोन तो कट गया !” बाबूराव ने अनिर्वान की तरफ देख कर कहा और अनिर्वान ने हल्के से हामी भर दी..
“ये फ़ोन वापस आएगा बाबूराव… ! देखते रहना !”
अनिर्वान ने मोबाइल टेबल पर रख दिया, उसके दिमाग में अब धीरेन्द्र की बातें चक्कर लगा रही थी..
******
राजेंद्र सुबह शाम आकर यज्ञ को देख जाया करता था, लेकिन पहले दिन के अलावा फिर उसने कुसुम से बातचीत नहीं की… हालाँकि भावना ज़रूर रोज़ अपनी सखी के पास चली आती थी, और घंटो उसके साथ बैठी रहती थी…
कुसुम को भी भावना के आने से राहत थी..
कुसुम में आये बदलाव सभी को नजर आ रहे थे.. अब वो पल भर के लिए भी यज्ञ को अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी..रात में उसे अखंड ने वहाँ रुकने नहीं दिया वरना वो घर लौटती ही नहीं शायद..
यज्ञ की तबियत सुधरने के साथ ही डॉक्टर ने अब उसकी छुट्टी भी कर दी थी..
उसके ऑपरेशन की सफलता के बाद यज्ञ की अम्मा और उसकी सास दोनों को ही बता दिया गया था, और दोनों ने ही कलेजा थाम कर इस खबर को सुना था..
लेकिन आज सब खुश थे आज उनका बेटा लौट रहा था…
आज पूरा ठाकुर परिवार अपने बेटे को लेने आया था..
यज्ञ अपने पलंग से उतर कर चलने को तैयार था, लेकिन वार्ड बॉय व्हील चेयर ले आया..
“अरे इसकी ज़रूरत नहीं है.. हम अपने पैरो पर चले जायेंगे.. !”
“नहीं सर, हम सब जानते हैं कि आप केपेबल है, लेकिन इस वक्त आपको ज्यादा तनाव नहीं लेना है.. जितना हो सके आपको रेस्ट करना है !”
“लेकिन हमारा काम.. ?” यज्ञ के सवाल पर अखंड ने ही उसे डपट दिया..
“कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हे काम पर जाने की, वो सब हो जायेगा.. !! अभी बस आराम करना है तुम्हे!”
राजेंद्र ने हलके से मुस्कुरा कर अखंड की तरफ देखा… अखंड ने यज्ञ को उस कुर्सी पर बैठा दिया, और पीछे से धकेलते हुए बाहर निकल गया..
भावना भी कुसुम के साथ बाहर तक आयी ज़रूर लेकिन कुसुम के साथ गयी नहीं..
भावना ने कुसुम का हाथ थाम रखा था… जब कुसुम अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ने लगी तब उसने धीरे से भावना का हाथ छोड़ दिया..
कुसुम ने पलट कर उसे देखा, भावना हल्के से मुस्कुरा उठी, कुसुम वापस आयी और भावना के गले से लग गयी…
“भावना हमारे घर नहीं चलोगी.. ?”
“आउंगी कुसुम, जल्दी ही आउंगी! अभी तुम अपने पतिदेव का ख्याल रखो और साथ ही अपना भी.. !”
कुसुम ने हामी भरी और निकल गयी…
कुसुम के ससुराल वालो के साथ ही उसके मायके से उसके पिता भी साथ ही थे..
वो लोग कुसुम को ससुराल तक पहुंचा कर वापस निकल गए..
ससुराल में दरवाज़े पर ही कुसुम की सास ने उसे रोक दिया..
आरती का थाल सजाये उसकी सास चली आयी… यज्ञ की आरती उतार कर बड़ा सा रोली का तिलक उसके माथे खींच कर उन्होंने उसकी नजर भी उतार ली…
कुसुम ने अपनी सास और काकी सास के पैर छुए और यज्ञ के साथ अंदर दाखिल हो गयी…
“यज्ञ बेटा सीढ़ी चढ़ने उतरने में दिक्कत होगी अभी तो ऐसा करो नीचे वाले कमरे में ही ठहर जाओ कुछ दिन !”
“नहीं अम्मा जी, काहे दिक्कत होगी, हम है ना ?”
.कुसुम के उतावले से जवाब पर यज्ञ हल्का सा मुस्कुरा उठा..
“हाँ ठीक कह रही हो अम्मा, मिलने जुलने वाले भी तो आएंगे, अब हर किसी को ऊपर अपने कमरे में तो नहीं बुला सकते ना ? ठीक है, हम नीचे वाले कमरे में ही सोयेंगे, हमारा सामान किसी को भेज कर मंगवा लो !”
यज्ञ अपनी फुलझड़ी छोड़ कर आराम से नीचे सोफे पर पसर गया, और कुसुम मन मसोस कर उसका सामान लेने ऊपर चली गयी..
जिस दिन यज्ञ को गोली लगी थी, उसी दिन से वो इस बात की प्रतीक्षा में थी कि कब यज्ञ वापस आये.. उसने कमरे की साजसज्जा भी बड़े सुंदर तरीके से की थी, लेकिन यहां तो यज्ञ ऊपर गया ही नहीं..
उसका उतरा हुआ चेहरा यज्ञ की नज़रों से छिप नहीं सका.. और ये देख यज्ञ को हंसी आने लगी, हालाँकि उसने अपनी हंसी रोक ली..
यज्ञ वापस आ चुका है ये उसके दोस्तों को भी मालूम हो चुका था..एक एक कर के लोग मिलने आने लगे और यज्ञ के साथ अकेले में बात करने का सुनहरा अवसर रात होते तक भी कुसुम को नहीं मिला..
उसके भोजन पानी का जिम्मा वैसे भी उसकी माँ ने अपने सर ले लिया था..
वो कुछ भी पूछने जाती तो उसकी सास पलट कर एक ही रटा रटाया सा जवाब देती.. -” तुम जाओ आराम करो बहु, हम देख लेंगे !”
मिलने वालो का सिलसिला चलता चला जा रहा था… यज्ञ भी बिना कुछ खाये बिना दवा लिए बाहर वाले कमरे में बैठा अपने मित्रो और साथ काम करने वालो के साथ बातों में लगा हुआ था..
.अखंड उसी वक्त वहाँ से उठ कर अंदर जा रहा था कि कुसुम ने उसे आवाज़ लगा दी..
“जेठ जी.. सुनिए !”
“हाँ.. बोलो कुसुम !”
“इनका खाने का वक्त हो गया है, दवाइयों का भी और ये अब तक बाहर बैठे हैं.. ऐसे में कहीं परेशानी बढ़ गयी तो ? इससे तो अस्पताल में भले थे, कम से कम डॉक्टर्स की निगरानी में समय पर खाना पानी दवा हो जाती थी.. !”
“हम भेजते हैं उसे !”
अखंड पलट कर बाहर निकल गया..
और बस दस मिनट में यज्ञ को साथ लिए लौट आया.. उसे आया देख कुसुम मुस्कुरा उठी..
“समय पर खाने सोने का तो ख्याल रखिये !”
कुसुम ने मीठा सा उलाहना दिया..
“हाँ जानते हैं,अम्मा ने ही भैया को भेजा होगा, हमे बुलवाने के लिए.. उन्हेँ हमारी बड़ी चिंता रहती है कि हमने खाया नहीं खाया.. आखिर माँ है, उनका दिल कहाँ मानेगा.. !”
यज्ञ सब कुछ जानता बूझता कुसुम को छेड़ रहा था…
कुसुम ने यज्ञ को घूर कर देखा और रसोई में उसका खाना परोसने चली गयी..
अखंड की माँ ने उसे भी आवाज़ लगायी लेकिन वो भूख नहीं है कह कर ऊपर चला गया..
कुसुम यज्ञ की थाली परस लायी, घर पर जो सब बना था उसने भर भर कर परोस दिया था.. उसने थाली लायी और यज्ञ के सामने रख दी..
यज्ञ उस थाली को देख हंस पड़ा..
“अम्मा…. अरे अम्मा.. कहाँ हो ?”..
“क्या हुआ बाबू ?”
यज्ञ की माँ रसोई से बाहर चली आयी..
“ये कैसी थाली परोसी है आपने ? हम इतना सब खाते कहाँ है ?”
“हम यही तो बोल रहे थे बहुरिया को, लेकिन इसने सुना ही नहीं… !”
अपनी सास की बात सुन कुसुम उनकी तरफ देखने लगी..
“आपने कब टोका ? “
“हाँ तो खुद से भी तो सोच सकती हो ?” अबकी बार चाची सास टोक पड़ी..
“यज्ञ बाबू चुकंदर खाते ही नहीं, और चुकंदर का रायता परोस दिया ? मूली की भाजी कभी नहीं पसंद उसे भी परोस दिया.. आखिर पत्नी हो इतना तो पता होना चाहिए ना तुम्हारा पति क्या खाता है क्या नहीं !”
चाची के इस उलाहने पर कुसुम का खून जल गया.. एक तो अपने स्वभाव के विपरीत जाकर वो जो नहीं है वो बनने की कोशिश कर रही थी, उस पर उसकी मदद करने की जगह उस पर तंज कसा जा रहा था…
एक पल को लगा पैर पटक कर ऊपर चली जाये, लेकिन फिर उसने खुद पर काबू किया और यज्ञ के पास पहुँच गयी..
“क्या क्या निकाल ले इसमें से ?”
यज्ञ के चेहरे पर हंसी खेल रही थी, उसे कुसुम का ये बदला बदला रूप बड़ा भा रहा था..
यज्ञ ने अपनी थाली से तीन चार कटोरियाँ बाहर कर दी..
“अरे आपने तो सब निकाल दिया ?”
“हम्म अभी इतना सब खाने का मन नहीं है.. अगर ठीक लगा तो बाद में खा लेंगे.. !”
कुसुम निकालने लगी की उसकी सास ने उसे टोक दिया..
“ऐसा करो बहुरिया, तुम भी यही अपनी थाली परोस लाओ.. या फिर एक काम करो इसी में बैठ जाओ.. दोनों संग खा लो.. !”
अपनी सास की ये बात सुन कर कुसुम झेंप गयी….
“नहीं अम्मा जी हम बाद में खाएंगे, पहले ये लोग खा ले !”
उसकी इस संस्कारी बात को सुन कर उसकी सास और काकी सास का मुहं खुला रह गया, पर दोनों ने ही अपने चेहरे पर कोई भाव आने नहीं दिए और हामी भर कर चुपचाप काम में लग गयी..
कुसुम बड़े जतन से यज्ञ को खिलाने लगी… यज्ञ भी कुसुम के मजे लेने में पीछे नहीं था। कभी अचार तो कभी पापड़ कभी नमक कभी दही एक एक चीज़ मांग मांग कर उसे भगाता रहा और वो उसकी हर बात को पूरा करने जी जान से जुटी रही..
इतना सब करने के बाद उसके मन में बार बार आ रहा था कि यज्ञ को कैसे भी ऊपर के कमरे में चलने के लिए मना ले, लेकिन संकोच में वो कह नहीं पा रही थी… यज्ञ को ये बात समझ में आ रही थी और इसीलिए वो कुसुम की तरफ ध्यान नहीं देने की एक्टिंग कर रहा था..
यज्ञ की अम्मा उसके पास चली आयी..
“चलो यज्ञ अब सो जाओ बेटा.. तुम्हे आराम करना चाहिए.. नीचे दादी के बाजु वाले कमरे में तुम्हारा बिस्तर लगवा दिए है.. चलो आराम करो.. जाओ बहु तुम भी थक गयी होंगी.. तुम भी ऊपर अपने कमरे में जाओ.. !”
कुसुम मन मसोस कर रह गयी..
वो ऊपर जाने को थी कि अम्मा को वहाँ से नदारद पा कर यज्ञ अपनी ही धुन में गुनगुनाने लगा….
दो दिलों की बीच खड़ी कितनी दीवारें
कैसे सुनेंगे पिया, प्रेम की पुकारें
चोरी चुपके से तुम लाख करो जतन
सजन मिल ना सकेंगे दो मन एक ही आँगन में…
अब के सजन सावन में….
यज्ञ मुस्कुरा कर नीचे वाले कमरे में अपने बिस्तर पर पहुँच कर पसर गया और कुसुम अपना सा मुहं लेकर ऊपर चली गयी..
उसे यज्ञ से जाने कितनी बातें कहनी थी, लेकिन उसे मौका ही नहीं मिल पा रहा था..
अपना सा मन लेकर वो भी ऊपर चली गयी..
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क्रमशः….

बहुत अच्छी कहानी के साथ ही गानों का चुनाव भी बहुत प्यारा है
Aparna Didi finally mujhe mil gayi aap aur sath me ek surprise b Mila aapki Aprajita me Mera naam bhi hai,😍😍
बहुत बहुत धन्यवाद अपर्णा जी समीक्षा ना कर पाने की कठिनाई को दूर करने के लिए 🙏 पहले वाले पार्ट पर भी मैं चाहकर भी कोई समीक्षा नही कर पाई।
बहुत ही सुंदर पार्ट है 👌👌 यज्ञ कुसुम का ये बदला हुआ रूप देखकर खुश हो रहा है और हम उनका ये प्यार भरा रूप देखकर खुश हो रहे है🥰❤️ कुसुम को यज्ञ के पास जाकर बात करने का कोई मौका नही मिल पा रहा है और ना ही अपना प्यार जताने का।
🥰🥰🥰🥰🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻👌🏻🥰🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰👌🏻🥰
बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻।
कुसुम और यज्ञ की जोड़ी लाजबाब है, यज्ञ कोई मौका नहीं छोड़ता बेचारी कुसुम को तंग करने का पर अच्छा लग रहा दोनों को पढ़कर 👌🏻👌🏻👌🏻।
Bahut sundar
Beautiful part 👌👌
यज्ञ का छेड़ना और कुसुम का पूरी जतन से यज्ञ की सेवा करना बहुत बहुत प्यारा लिखा है आपने डॉक्टर साहिबा 😘😘
गोलू अब आ चुका है जानें इंस्पेक्टर भारद्वाज कौन कौन से कैसे सॉल्व करने वाले हैं।
गीता की कहानी और धीरेन्द्र प्रजापति से उसकी शादी का अब राज खुलने ही वाला है।
रेशम के सामने भी़ अब सच जल्द ही आयेगा की अखंड बेकसूर हैं।
Kusum ko bhi niche hi so Jana chahiye ….or thoda yagay ko pareshan bhi karna chahiye …yagay Babu bahot pareshan kar rahe he kusum Kumari ko
bahut interesting mode pr story
thank you Mam for writing it over here