अपराजिता -96
कुसुम और यज्ञ के जाते ही राजेंद्र ने एक गहरी सी साँस ली और गेट पर ताला डालने निकल गया..।
लेकिन भावना अब भी सहज नहीं हो पा रही थी..
ये सब क्या बोल गए थे डॉक्टर साहब ?
उसकी समझ से परे था ? क्या सच में उसका होना डॉक्टर साहब के लिए इतना मायने रखता था? क्या वह अकेली उनके परिवार की कमी वाकई पूरी कर पा रही थी? पता नहीं यह सब सच था, या नहीं। लेकिन एक सच तो था कि उन दोनों के जीवन में जो रिक्तता आ गई थी, उसे वह दोनों ही बङी आसानी से भर पा रहे थे।
भावना ने अपने घर पर एक नजर डाली, इस घर में क्या बिना अम्मा के घंटे भर भी रहने की वह सोच सकती थी? लेकिन आज डॉक्टर साहब के साथ दिन भी बीत रहा है, और रात भी बीत रही है।
बल्कि बातों बातों में कभी-कभार उसके चेहरे पर एक मुस्कान भी चली आती है। पता नहीं उन दोनों के बीच प्यार है या नहीं, लेकिन कोई एक रिश्ता तो बन ही गया है।
बड़ा अजीब सा रिश्ता, जिसमें जुड़े रहने की कोई बाध्यता नहीं है,कोई बंधन नहीं है । फिर भी जुड़े रहने का मन करता है।
यही सोचते हुए वह अपनी मां के कमरे में चली आई। आज बार-बार राजेंद्र की बातें याद कर उसकी आंखें भीगती जा रही थी।
इतना प्यार उस पर उसकी अम्मा के अलावा आज तक किसी ने नहीं लुटाया था। इतना ढेर सारा प्यार और सम्मान पाकर गदगद था उसका दिल, और उसके दिल में उमड़ते जज्बात ठौर नहीं पा रहे थे।
अपनी अम्मा की अलमारी का कपाट खोले, वह खड़ी थी। उसने अपनी अम्मा की रोज पहनी जाने वाली एक साड़ी निकाल कर उसे अपने गालों से लगाकर अपनी अम्मा को महसूस करती, भावना ने आंखें बंद कर ली, और फिर तभी उसे ध्यान आया कि अम्मा ने उसके लिए एक पोटली छोड़ी थी जो उसने आज तक खोलकर ही नहीं देखी।
उसका ध्यान आते ही उसने तुरंत इधर-उधर ढूंढना शुरू किया और उसे वह बक्सा दिख गया।
उसे लेकर अपनी अम्मा के पलंग पर बैठकर उसने वह बक्सा खोल लिया….
बक्से में रखे ढेर सारे रुपए, सोने के कंगन और एक चिट्ठी देख भावना की आंखें खुली रह गई। अम्मा ने इतने सारे नोट छोड़ रखे थे। उसने चिट्ठी खोली और पढ़ना शुरू कर दिया…
“बावना, मुझे नहीं पता मेरी डेस्टिनी मुझे कहाँ लेकर जाएगी.. लेकिन ये अमानत तुम्हारी ही थी, जो तुम्हे दे रहा हूँ…।
तुम्हारे बाबूजी ने तुम्हारे लिए कुछ रुपए जोड़े थे और जब से मुझे पता चला था कि वह तुम्हारी शादी के लिए इतना परेशान है, कुछ रुपए मैंने भी जोड़े लिए।
यह सारे रुपए एक साथ तुम्हारे लिए रख दिए हैं। तुम्हारे लिए बहुत मन से यह कंगन तैयार करवाए थे। यहां पहुंच कर पता चला की…..
खैर, वह शायद हमारी डेस्टिनी नहीं थी। बस इतना कहना चाहता हूं कि कभी तुम्हें ऐसा लगे कि तुम्हें एक दोस्त की जरूरत है, तो मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं।
मै तुमसे बहुत प्यार जरता हूँ बावना और शायद तुम भी !
अगर तुम्हें कभी भी यह लगे कि तुम मेरे साथ अपना फ्यूचर देखती हो, तो बस मुझे एक बार कॉल कर लेना। मैं इंडिया से जाने के पहले एक बार तुमसे मिलने आऊंगा।
मैं बस स्टॉप पर उसी जगह तुम्हारा इंतजार करूंगा, हो सके तो मुझसे मिलने आ जाना। नीचे अपना नंबर लिखकर जा रहा हूं, क्योंकि तुम्हारे बाबूजी के बाद अब उनका सिम और उनका फोन इसी बॉक्स में नीचे छोड़ दिया है।
मेरा नया नंबर तुम्हारे पास रहेगा। तुम जब चाहो मुझसे बात कर सकती हो, और अगर तुममे इस दुनिया से लड़ने की ताकत है, और मुझ पर भरोसा है, तो तुम जब कहोगी, तब तुम्हारा टिकट करवा दूंगा। तुम हमेशा हमेशा के लिए मेरे पास चली आना ! मै तुम्हारा इंतज़ार करूँगा..
निनाद..”
निनाद ने नीचे अपना नंबर भी लिख दिया था..
चिट्ठी पढ़कर भावना कांप उठी, उसके रोंगटे खड़े हो गए। तो यह सब निनाद ने उसके लिए किया था। वह दोनों कंगन अपने गालों से लगाए सिसक उठी।
चिट्ठी को अपने सीने में भींच कर भी उसका मन नहीं भर रहा था। यह कैसा खेल रचा था ऊपर वाले ने उसके साथ?
वह क्या करें क्या नही?
कुछ समय पहले ही डॉक्टर साहब की बातों से भीगी सी थी भावना, अब निनाद की भावनाओं से भीग रही थी।
उसने आंखें पोंछी और एक बार फिर चिट्ठी खोल कर देखी।
इत्तेफाक से अगले दिन वही तारीख थी, जिस पर निनाद वापस आने वाला था….।
भावना ने वो बक्सा बंद कर के रखा और चिट्ठी को साथ लिए ही पलंग पर पीछे दीवार से टेक लगा कर बैठ गयी..
वैसे ही बैठे बैठे उसे नींद लग गयी..।
राजेंद्र बाहर के कमरे में ही काफी देर बैठा रह गया..।
वह खुद अपने बोले शब्दों पर चकित था। लेकिन कुसुम को समझाने के लिए उसके इतने कड़क शब्दों का प्रयोग करना भी जरूरी था। हालांकि अब वह खुद भावना के सामने जाने में शर्मा रहा था। कैसे बेशर्मी से उसने भावना को खींचकर अपने सीने से लगा लिया था। पता नहीं वह बेचारी क्या सोच रही होगी?
लेकिन उसके पास कुसुम के दिल से खुद को हटाने का कोई और उपाय नहीं था..! कुसुम जब तक उससे नफरत नहीं करेगी वो अपनी ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ेगी..।
उससे नफरत के साथ ही कुसुम को ये यकीन दिलाना भी ज़रूरी था कि वो भावना के साथ खुश है..।
वो जानता था कुसुम उसे खुश देख कर आज नहीं तो कल खुद को समझा ही लेगी..।
बस वो यज्ञ के सामने कुसुम का उपहास हो, ये नहीं सहन कर सकता था.. और इसीलिए यथासंभव अपनी आवाज़ नीची किये वो बोल रहा था.. !
लेकिन इस सब में भावना का क्या?
वह इतनी सीधी भी तो है। इतना सब कुसुम से बोलने के पहले एक बार उससे पूछ लेना चाहिए था। लेकिन कुसुम ने इतना वक्त ही नहीं दिया कि भावना से पूछ कर या उसे बता कर कुसुम पर यह बम फोड़ता।
सोचते सोचते वह खुद वहीं कुर्सी में टेक लगाये सो गया था। लगभग आधी रात के वक्त प्यास से गला सूखने लगा और उसकी नींद खुल गई।
उठकर वह रसोई से पानी लेने चला गया। पानी लेकर निकलते वक्त भावना की मां के कमरे के खुले दरवाजे पर उसकी नजर पड़ी। दरवाजे पर एक पन्ना फड़फड़ा रहा था। उसने आगे बढ़कर झुक कर उसे पन्ने को उठा लिया। पन्ने को उठाते समय उसकी नजर पड़ी, भावना पलंग पर ही बैठे-बैठे एक तकिए को बाहों में लिए सो गई थी।
राजेंद्र ने वह पन्ना हाथ में लिया और कमरे के दरवाजे को खींचकर बंद करते हुए बाहर निकल गया। उसे नहीं मालूम था कि यह पत्र निनाद ने भावना को लिखा है। उसने सरसरी तौर पर देखना शुरू किया और एक बार में ही अनजाने में पूरा खत पढ़ गया..।
वो सन्न रह गया..।
वैसे उसने निनाद को देखा तो था, लेकिन जान पहचान नहीं हो पायी थी..।
निनाद का इतना बेलौस लिखना देख कर राजेंद्र को समझ आ गया कि भावना की तरफ से भी निनाद के लिए कुछ तो ज़रूर था..।
उसने चुप चाप उस खत को वापस भावना के पलंग के पास ले जाकर छोड़ दिया..।
****
अगली सुबह इत्तेफाक से छुट्टी थी, राजेंद्र अपने मोबाइल पर कुछ आर्टिकल पढ़ रहा था कि भावना चाय ले आयी..
सुबह दूध वाले के आने पर राजेंद्र ने ही दूध लेकर रख लिया था..
उसे देख एकबारगी राजेंद्र को लगा कि उसे अगले दिन से दूध लाने मना कर दे। लेकिन फिर उसे निनाद की चिट्ठी याद आ गयी.. और वो चुप रह गया..।
भावना ने चाय का कप राजेंद्र की तरफ बढ़ा दिया..
“भावना सुनो..कुछ बात करनी है तुमसे !”
“जी कहिये !”
“कल जो भी हुआ वो बहुत ज़रूरी था..। कुसुम का स्वभाव तो तुम जानती ही हो, अगर मै इस तरह कठोरता से उससे पेश नहीं आता, तो वो कभी अपनी रूहानी दुनिया से निकल नहीं पायेगी..!
मुझे भी उससे ये सब कहते अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन मेरे पास और कोई चारा नहीं था भावना.!
मुझे पता नहीं, तुम्हे कैसा लगा होगा..?
मुझे तुमसे बात कर लेनी थी, लेकिन कुसुम ने इतना वक्त ही नहीं दिया..।
मै खुद उसका दिल नहीं तोडना चाहता था, लेकिन उसकी ज़िंदगी खुशहाल बनी रहे, उसके लिए मेरे पास और कोई उपाय नहीं था भावना.. ।
उसके पति को देखा तुमने, कितना समझदार है….
कुसुम अगर अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएगी तो आखिर कब तक उसका पति उसका साथ देगा..?
ऐसे में एक न एक दिन वो भी उसे छोड़ जायेगा.. फिर क्या करेगी ये पागल लड़की ?”
“हो सकता है कुसुम के लिए आप तक पहुंचने का यही एकमात्र साधन हो..। जब यज्ञ बाबू उसे छोड देंगे तब वो शायद आपके पास चली आना चाहती हो !”
राजेंद्र भौचक सा भावना को देखता रह गया..।
वो भावना की इस बात को काट देना चाहता था, लेकिन फिर उसे अचानक निनाद की चिट्ठी याद आ गयी.. और वो एकदम से चुप रह गया..
ज़रूर भावना के मन में कहीं न कहीं निनाद बस चुका है। और वो ज़रूर उसके साथ चली जाना चाहती है..।
इसीलिए तो वो भी चाहती है कि कुसुम अपने पति को छोड़ कर उसके पास चली आये…।
रात भर से राजेंद्र के दिमाग में यही सब घूम रहा था, और शायद इसी वजह से उसे नींद भी सही ढंग से नहीं आयी थी.. सर फटने लगा था..।
इधर भावना ने उस चिट्ठी को सुबह उठते ही अलमारी खोल कर उसमे डाल दिया…
आज निनाद आने वाला था, लेकिन निनाद से मिलने जाना मतलब एक बार फिर कमजोर पड़ जाना था..।
भावना जानती थी कि भले ही डॉक्टर साहब ने कल की कही अपनी बातों पर सफाई पेश कर दी, लेकिन सारी बातें बिलकुल ही बेसार और निरर्थक नहीं थी..।
सारी बातें सिर्फ कुसुम को बहलाने के लिए ही बस नहीं कही गयी थी.. कुछ प्रतिशत सच्चाई तो थी उन बातों में..।
और बाकी जो भी हो, लेकिन आखिर वो अब डॉक्टर साहब की पत्नी थी…।
जब जब उसका कठिन समय आया, डॉक्टर साहब ने एक पल गंवाए बिना उसकी मदद की और आज वो उनकी बातों में छिपे एहसासो को कैसे दरकिनार कर उस अनजान लड़के के बुलाने पर चली जाये…?
अब जो भी हो, माता रानी ने उसका रिश्ता डॉक्टर साहब से करवाया था और उसे यही निभाना था..।
आज बड़े दिनों बाद वो कुछ गुनगुनाते हुए नाश्ता बना रही थी… और बाहर बैठा राजेंद्र भावना के ख़ुशी से गुनगुनाने को उसके निनाद से मिलने जाने का कारण माने बैठा था…।
****
सुबह कुसुम सो कर उठी और नहा कर जैसे ही आईने के सामने आयी.. आइने में यज्ञ की लिखी लाइन नजर आ गयी..
“क्या मिलेगा आज खाने में ?”
उसे हल्की सी हंसी आ गयी.. बेसब्रा जरा भी धैर्य नहीं..
तैयार होकर वो नीचे चली गयी.. उसे रसोई में आते देख उसकी सास ने खाना बनाने वाली लड़की को कुसुम को चाय देने का ईशारा कर दिया…
उस लड़की ने चाय के साथ एक पर्ची भी कुसुम को पकड़ा दी.. कुसुम ने पर्ची खोली -“क्या बनाओगी ?” कुसुम मुस्कुरा उठी..
उसने अपनी सास की तरफ देखा..
“अम्मा जी हम कह रहे थे..
“हाँ बोलो बहु.. क्या बात है ?”
“आज हम कुछ बना दे ?”
उसकी बात सुनते ही उसकी सास ने आंखे फाडे अपनी देवरानी की तरफ देखा, वो भी आश्चर्य से उन्हीं की तरफ देख रही थी..
वहीँ बैठी बुआ जी बोल पड़ी..
“का हुआ कुसुम.. तबियत तो ठीक है.. ?आज तुम्हरे चरण कमल रसोई में कैसे पड़ गए.. ?”
“अरे जिज्जी.. आप भी ना.. हाँ बोलो बहु का बनाओगी?”
“छोले बना दे अम्मा जी ?”
“पर बेटा उसके लिए एक दिन पहले भिगोना पड़ता है ना ?”
“अच्छा बिना भिगोये नहीं बनते ?” कुसुम की सास ने ना में गर्दन हिला दी..
“फिर राजमा ?”
“नहीं वो भी भिगोने पड़ते ?”
“अच्छा.. ढोकला बना दे ?”
“उसके लिए एक दिन पहले दाल चावल भिगो कर पीस कर रखना पड़ता, बेसन से भी बनते, लेकिन थोड़ा तो उसे भी रखना पड़ता !”
“अच्छा गाजर का हलवा ?”
“अभी गाजर नहीं है घर में !”
कुसुम की सास हल्के से मुस्कुरा रही थी और उसकी बुआ सास अपने सर पर हाथ दिए बैठी थी..
“अरे ठकुराइन हो.. बकरा बनाओ, ये का साग भाजी गिना रही ?”
कुसुम ने बड़ी बड़ी आँखों से अपनी सास को देखा उन्होने हाँ में गर्दन हिला दी..
“हाँ वो कटवा कर तुरंत मंगा लेते हैं.. बना लोगी… ?”
“आप बताती जाएँगी ना ?”
कुसुम की सास ने बड़े प्यार से उसके सर हाथ रख दिया..
और फिर ठाकुर परिवार की नैकी बहु की असली पहली रसोई का शुभारम्भ हुआ..।
बड़े मजे से बोटियाँ उड़ाने वाली कुसुम कुमारी ने कभी कच्चा कटा मांस देखा ही नहीं था, जब उसके सामने ये सब लाया गया तो उसे उबकाई सी आ गयी.. दो रुमाल नाक मुहं में बांध कर घर भर की औरतों को हंसी के कुंड में डुबकी लगवाते हुए आखिर कुसुम ने गोश्त पका ही लिया..
अपना काम ख़त्म कर भागते हुए वो अपने कमरे में गयी और मुहं में खूब पानी डाल कर उसने अच्छे से हाथ मुहं धो लिया..
दोपहर के खाने पर सब बैठे.. यज्ञ भी काम से वापस आ गया था..।
खाने की टेबल पर जाते हुए उसने एक नजर कुसुम पर डाली.. कुसुम अपनी अकड़ में खड़ी थी..
उसने धीरे से उस डोंगे की तरफ आंखे घुमा दी, जिसमे उसका बनाया गोश्त रखा था…।
यज्ञ मुस्कुरा उठा.. मतलब उसकी बिगड़ैल बिल्ली ने आखिर उसके लिए कुछ बना ही दिया..।
वो बड़ी ख़ुशी से उस डोंगे का ढकना हटाने जा रहा था की उसकी अम्मा चीख पड़ी..
“अरे हाथ ना लगाना तुम, तुम्हारे खाने की चीज़ नहीं है वो.. तुम्हारे लिए हम आलू गोभी बना दिए हैं !”
.अपनी सास की ये बात सुनते ही आश्चर्य से कुसुम आंखे फाडे अपनी सास को देखने लगी..
“काहे अम्मा जी ?”
“अरे अब का बताएं दुल्हन, हमरे दुनो लड़का मांस मच्छी कहाँ खाते हैं ? ना अखंड कुछ छूता और ना ये यज्ञ !”
कुसुम ने अपने माथे पर हाथ मार लिया..
“हमने इन्ही के लिए तो बनाया था !”
वो धीमे से गुनगुना उठी.. लेकिन उसकी बात बिना सुने ही समझ जाने वाला टेबल पर बैठा गोभी खा रहा था, और उसके आलावा बाक़ी सब उसके बनाये गोश्त के मजे ले रहे थे..
वैसे नाम के लिए ही उसने बनाया था, मसाले उसकी सास ने ही तैयार करवाए थे, लेकिन अब तक खुद चखने के लिए उत्साही कुसुम का अचानक गोश्त ही क्या अब कुछ भी सामिष भोजन से मन ही उचट गया था..
खाने की टेबल पर घर की औरतों के साथ बैठी कुसुम ने भी आखिर गोभी ही बस खायी.. बड़े मन से बनाया गोश्त थाली में एक तरफ उपेक्षित सा पड़ा रह गया !
बाक़ी कुछ उससे भी खाया ही नहीं गया..।
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नेहा के रहने का प्रबंध अनिर्वान के घर की ऊपरी मंजिल में हो गया था… वैसे तो वहाँ सबको पता था, लेकिन बाबूराव ने उसे अपने रिश्ते की दूर की बहन बोल कर घर दिलवा दिया था..
सुबह ऑफिस निकलने से पहले अनिर्वान अपनी बगिया में बैठा चाय पीता अख़बार की खबरे पढ़ रहा था, तभी एक खबर पर उसकी नजर अटक गयी..
उसने फटाफट खबर पढ़ी और झांक कर ऊपर नेहा की छत पर देख ही रहा था कि गेट खोल कर कुछ गुंडे किस्म के लोग अंदर दाखिल हो गए..
“रिपोर्टर नेहा.. ?”
अनिर्वान ने खुद के सीने पर ऊँगली रख ना का इशारा किया और ऊँगली ऊपर छत की तरफ घुमा दी..
वो लड़के वहीँ से नेहा का नाम पुकार उठे…
और नेहा सीढ़ियों पर प्रकट हो गयी..
“क्या हुआ किसी ने याद किया मुझे ?” उसकी आवाज़ सुनते ही अनिर्वान ने अपने माथे पर हाथ मारा और अपना अख़बार समेट कर अंदर चला गया..
क्रमशः
aparna…

एक तो ये की dr साहब जो भी अपने मन में है वो सब भावना को बता दिए , की कुसुम को दिखाने के लिए उन्होंने ऐसा किया था , पर लड़की को पता चल ही जाता है कोन उस से किस निगाह से देख रहा है , तो क्या राजी के साथ रहकर पेचान नहीं पाती??
वो निनाद से मिलने तो जायेगी शायद कंगन वापिस करने , समीक्षा अधूरी है
हा तो कहा थी मैं, हां की भावना मिलने तो जाहि सकती है आखिर निनाद का क्या दोष इसमें , और फिर भावना को पसंद भी नहीं आएगा की निनाद उसके पैसों से लिए कंगन अपने पास रखती। देखते है।
वैसे कुसुम की हाथो का बना खाना खाने के लिए तो घने बेताब है यज्ञ बाबू , पर ये क्या सामिष खाना ही खाते है ,सासुमा को बताना चाहिए था न 😔 बेचारी ने जिनके लिए मेहनत की , वोही नही चख पाए !! पर हाए ये ठाकुर तो घने पसंद आयो मुझे , वेज भी है , नकली एना भी नही रखता , बीवी से प्यार भी करता, ऐसे भी ठाकुर होते है देख लो गांव वालो 😅🤣🤣👌👌👌👌