अपराजिता -94

अपराजिता -94

पिछले भाग में हमारे डेशिंग पुलिस वाले अनिर्वान भरद्वाज जी का नाम गलती से वासुकी लिख गया.. उनका नाम इस कहानी में अनिर्वान ही चलेगा..
अब आगे बढ़ते है..

***

नेहा इठला कर बाहर चली गयी, सीढ़ियों पर उसका सामना थाने में अंदर आते भावना और राजेंद्र से हुआ, और वो जरा आगे बढ़ कर ठिठक गयी .

आखिर पत्रकार थी, उसके अंदर का रिपोर्टर खबर जानने के लिए कुलबुलाने लगा, और वह भावना और राजेंद्र के पीछे वापस अंदर दाखिल हो गई।

भावना और राजेंद्र अनिर्वान के सामने बैठ गये। 
    अनिर्वान के कहने पर उसने दीपक के उसका अकेले का फायदा उठाकर घर पर घुसकर उसके साथ बदतमीजी करने की रपट लिखवा दी।

वह उठकर जा रही थी कि नेहा सामने चली आई..

” एसीपी सर क्या मैं कुछ कह सकती हूं?”

नेहा ने अनिर्वान की तरफ देखकर कहा, और अनिर्वान ने नेहा को देखकर अपने माथे पर हाथ मार लिया।

” आप अब तक गई नहीं?”

” मैं जा ही रही थी सर, लेकिन कुछ काम याद आ गया, और वापस आ गई। और वापस आने के बाद इन मैडम की रिपोर्ट सुनी और इस सिलसिले में कुछ बात करनी है आपसे।”

” कहिए, आप बिना कहे मानेंगी तो है नहीं।”

” नहीं सर, बिल्कुल नहीं मानूंगी। और इतना कहते हुए हंसते हुए कुर्सी खींचकर नेहा वहीं बैठ गई। उसने भावना की तरफ देखा और उससे सवाल कर दिया।

” यह लड़का दीपक जो आपके घर में घुसा था, इसे आप पहले से जानते हैं?”

भावना ने ना में गर्दन हिला दी ।

“मतलब आपने पहली बार उसे देखा है?”

” देखा तो पहले भी है, लेकिन जान पहचान नहीं है।”

” ओके, मतलब आपके गांव, आपकी बस्ती का रहने वाला है। जिससे आपका कई बार आमना सामना हुआ लेकिन आप उसे पहचानती नहीं है।”

” जी।”

” देखिए भावना जी, मैं खुद भी एक लड़की हूं। मैं पत्रकार हूं और एक छोटी सी लेखक भी हूं…।
फाइनल ईयर में रेप एक्यूस्ड पर मैंने एक प्रोजेक्ट तैयार किया था, और उस समय मैं जेल गई थी। उन आरोपियों से मिलने, जिन्होंने रेप जैसा घ्रिणित कार्य किया है।
बहुत सारे लोगों से मै मिली और उन सब से बात की है। मैंने उन सबको देखा है। उनके हाव-भाव देखे हैं। और जो बात मुझे समझ में आई वह मैं आज आपसे शेयर करना चाहती हूं।

एक्चुअली यह सब मैं आपसे इसलिए कह रही हूं कि मेरे इतना कहने के बाद एसीपी सर आप इस केस में ज्यादा खुलकर मदद कर पाएंगे, और शायद इस केस को निपटाने में आपको भी मदद मिलेगी। मैंने जितने भी गुनहगारों को देखा, इंटरव्यू किया, उनसे बातें की, उनके हाव-भाव देखे, उनसे मुझे एक बात साफ-साफ समझ में आई,की इन घृणित आरोपियों में अधिकतर को अपने किये का कोई पश्चाताप नहीं था..

‘ये लोग अक्सर ऐसा कहते मिले, अच्छा हुआ उस लड़की के साथ यही होना था, बड़ा अकड़ती थी, ऐसे कपड़े पहनती थी, वैसे रहती थी, ऐसे बोलती थी.. !’ यानी की ये लोग अपने गुनाहों का ठीकरा विक्टिम के सर पर ही फोड़ते हुए मिले..
जानती है इसका कारण क्या है..
ये लोग खुद को न्यायमूर्ति समझते हैं और जो लड़की इनके मुआफ़िक ना दिखे उसे ये उसकी गलती की सजा के तौर पर रेप करते हैं..

एक युवा वकील का केस था, वो लड़की बड़े बड़े गुनाहगारो को निडर निशंक रूप से सजा दिलवाती थी.. बस उसकी नजर नीची करने कुछ गुंडों जिनके किसी मालिक को उसने जेल करवाई थी ने उसे रेप कर के टॉर्चर किया..

मेरा कहने का तात्पर्य ये है की  रेप करने वाला इंसान कभी भी अपने फिजिकल सेटिस्फेक्शन के लिए रेप नहीं करता…
वह किसी न किसी तौर पर सामने मौजूद विक्टिम से बदला लेना चाहता है!
अब वह किस तरह का बदला लेना चाहता है, यह पूरी तरह से उसकी हिस्ट्री पर डिपेंड करता है..!

मैंने ऐसे ढेर सारे केसेस को पढ़ा है, समझा है, ऐसे केसेस में मुश्किल से पांच से दस फीसदी वह केस होते हैं जिनमें लड़के अपनी उत्तेजना के लिए ऐसा कर बैठते हैं।
वरना ज्यादातर केस में लड़के अपने मेल एगो की संतुष्टी के लिए ऐसा करते हैं।

      कहीं ना कहीं उन लड़कों के अंदर एक अजीब सी कुंठा थी।

    जैसे एक लड़के ने कहा कि वह लङकी कॉलेज में अक्सर शॉर्ट्स पहन कर आती थी, वह लड़कों के साथ घूमती थी, बातें करती थी। मैंने और मेरे दोस्तों ने उस लड़की को समझाया कि लड़की हो, शराफत से रहो, दुपट्टा डालकर कॉलेज आया करो, लड़कों के साथ कम बातें किया करो, बाल कायदे से बनाया करो, लेकिन वह लड़की हमारी सुनने को तैयार नहीं थी। और बस इसीलिए हम सब ने एक रात उसे धोखे से कैंपस में बुलाया और वह कर दिया वह जो नहीं करना था।

तो इन सब बातों का सार यही है कि कहीं ना कहीं इन लड़कों के अंदर इतनी ज्यादा कुंठा भरी हुई है, इतना ज्यादा अपनी मर्दानगी को साबित करने का जज्बा भरा हुआ है कि वह लोग बस लड़की की नजर नीची हो जाये इसलिए इतना घिनौना अपराध कर गुजरते हैं..।

कहीं ना कहीं ये सारे लोग मानसिक रूप से अस्थिर होते हैं.. इनमें गुस्सा इतना ज्यादा भरा होता है कि यह सही और गलत के बीच भेदभाव नहीं कर सकते।

यह सिर्फ रेप करके संतुष्ट नहीं होते, उसके बाद यह लड़की को बुरी तरह से टॉर्चर भी करते हैं। इनके टॉर्चर का लेवल इस हद तक हो जाता है कि बहुत बार लड़की अपनी जान गंवा बैठती है।

मैं बस यह कहना चाह रही हूं, भावना जी क्या आपने दीपक में कोई ऐसी बात नोटिस की।
क्या वह आपको किसी तरह के ताने दे रहा था, या आपकी तरफ बढ़ते हुए उसने कुछ भी ऐसा कहा था जो आपको नोटिसेबल लगा हो…।
आप सही तरीके से याद करके बताने की कोशिश करिये।
   आपको भी इस बात में बहुत मदद मिलेगी कि आखिर वह लफंगा आपके ही घर पर क्यों घुसा?

आप खुद सोच कर देखिए दीपक अगर आपके गांव का रहने वाला है, और उसने पहले भी आपको देख रखा है। तो क्यों आपकी शादी के बाद ही आपकी इज्जत पर डाका डालने घुसा?
क्यों पहले उसने कभी आपके साथ ऐसा नहीं किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी पुरानी बात का आपसे बदला लेने आया हो?
जैसे आपके भाई ने कभी दीपक की बहन को छेङा हो या उसकी बीवी के साथ कोई बदतमीजी की हो?”

” हमारा तो कोई भाई ही नहीं, हम अकेले हैं।”

” ओके, मैं एक एग्जांपल दे रही थी, जिससे आपको याद आ सके। आप याद करके बताइए, उस वक्त दीपक ने क्या-क्या बोला था।”

” हमें ज्यादा कुछ याद नहीं, लेकिन इतना तो याद है कि दीपक हमारे पति का नाम जानता था। उसने हमसे कहा कि डॉक्टर साहब सुबह से हॉस्पिटल गए हैं, और अब तक नहीं लौटे और शायद नहीं लौटेंगे।”

” ओके इसका मतलब वह आपके हस्बैंड को जानता है। जरूर वह आपके हस्बैंड से ही कोई बदला लेने आया था। डॉक्टर राजेंद्र क्या आप इस लड़के को जानते हैं?”

“हां मैं इसे जानता हूं।”

राजेंद्र को अचानक ही याद आ गया। अनिर्वान नेहा दोनों ही उसकी तरफ देखने लगे, लेकिन उन दोनों से ज्यादा भावना आश्चर्य से राजेंद्र को देख रही थी।

” लेकिन डॉक्टर साहब! आप इसे कैसे जानते हैं?”

” भावना तुम्हें याद है, जब पहली बार चंद्रभान के गुंडे मेरे घर पर आए थे। उस समय उनके धमकाने पर सरना ने मुझे अपनी कसम देकर शहर भेज दिया था। जिसके हफ्ते भर बाद ही मैं लौट रहा था, तब रास्ते में तुम और कुसुम मुझे मिल गए थे।”

” हां याद है!”

” और उसके बाद फिर चंद्रभान के गुंडे तुम्हें और मुझे पकड़ कर ले गए थे ।”

“हां हमें याद है।”

“उसके बाद जब मैं सरना के घर पर था, तब यही दीपक अपने दोस्त के साथ वहां आया था। उसने मुझे कहा कि चंद्रभान बहुत ही घटिया आदमी है। वह अपनी बहन को कभी खुश नहीं रहने देगा, और वह अपनी बहन की शादी उसकी बिना मर्जी के किसी बहुत ही घटिया इंसान से करने जा रहा है।
     इसी ने मुझे एक फोन दिया और कहा उस फोन से मैं कुसुम से बातचीत कर सकता हूं। तुम्हें याद होगा चंद्रभान ने मेरा फोन भी तोड़ दिया था ।”

भावना ने धीरे से हां में गर्दन हिला दी।

“उस दिन मुझे एक नया फोन और सिम कार्ड देकर यह चला गया था। लेकिन उसने अपना नंबर मेरे फोन पर डाल रखा था। कुसुम के साथ मेरे भाग जाने की सारी तैयारी इसी ने करवाई थी।”

भावना आश्चर्य से आंखें फाड़े राजेंद्र को देख रही थी ….
“लेकिन डॉक्टर साहब यह दीपक तो चंद्रा भैया के घर पर ही हमेशा नजर आया है। मतलब यह उनके खास लोगों में से एक है। फिर इस ने क्यों आपकी मदद की? हमें समझ में नहीं आ रहा…?”

“एक बात बताइए डॉक्टर साहब आप और कुसुम जब भागे तब इस दीपक ने उस रात भी आप लोगों की कोई मदद की थी?”

” नहीं एसीपी  साहब..
असल में इस दीपक से सिर्फ एक ही बार मेरी मुलाकात हुई थी वह भी शाम के समय..।
उसने काफी सारी मदद की थी, मुझे फोन दिया था और इसके साथ ही यह भी कहा था कि मैं रात में नौ बजे के पहले कुसुम को लेकर किसी भी तरह शहर तक निकल जाऊं..।
इन सब बातों के साथ बस उसने यही एक बात कही थी कि कुसुम की बारात साढे आठ से नौ के बीच चंद्रभान के घर पर लगेगी, और उसके पहले पहले अगर कुसुम घर से निकल गई, तो किसी भी हाल में बारात को वापस खाली हाथ लौटना पड़ेगा। और इस बात से बहुत खुशी मिलेगी।
लेकिन डॉक्टर साहब हमें यह समझ में नहीं आ रहा कि कुसुम की बारात अगर लौट जाती तो उसमें दीपक को किस बात की खुशी मिलती ?”

“कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, दूसरों की तकलीफ में खुश होने वाले।
वैसे यह कुसुम की शादी हुई किस से है? जिससे इस दीपक की इतनी नाराजगी है कि वह चाहता ही नहीं था कि उसकी बारात राजी खुशी वापस लौटे?”

नेहा ने अपना सनसनाता हुआ सवाल पूछ लिया और भावना ने तुरंत बता दिया..

“हमारे दुर्वागंज से लगा हुआ गांव है मानौर, वहां के ठाकुरों के यहां कुसुम का ब्याह हुआ है…।
  मानौर के सरपंच है अखंड सिंह परिहार, उनके छोटे भाई यज्ञ सिंह परिहार से कुसुम का ब्याह हुआ है..।”

“एक मिनट नाम क्या बताया?”

“यज्ञ सिंह परिहार!”

“ना ना.. उसके बड़े भाई का?”

“अखंड सिंह परिहार!”

“ये कहीं वही अखंड तो नहीं, जो यूनिवर्सिटी का पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष था ?”

“हाँ शायद… ठीक से हमें भी नहीं मालूम, लेकिन हां इतना जानते हैं कि उनके बड़े भाई बहुत समय तक शहर में रह रहे थे। अभी कुछ समय पहले ही वापस लौटे हैं। कुछ अजीब सी ही उनकी भी कहानी थी। ज्यादा तो हम नहीं जानते, लेकिन उन्होंने शादी नहीं की है। उनसे पहले उनके छोटे भाई यज्ञ की शादी हो गई।”

यह सारी बात सुनते ही अनिर्वान भारद्वाज ने टेबल पर अपना हाथ मारा और सामने बैठे राजेंद्र भावना की तरफ देखने लगा..

“अब जुड़ रही है कड़ी से कड़ी…
डॉक्टर साहब आप अपना नंबर बाबूराव के पास लिखवा दीजिए और अब आप दोनों जा सकते हैं।
आप भी जा सकते है नेहा जी…।
  अब मैं इस दीपक की जन्म कुंडली निकालता हूं अपने स्टाइल में !”

“छोड़िएगा मत उस मदरबोर्ड को !” नेहा के ऐसा कहते ही भावना ने चौंक कर उसे देखा.. -“क्या कहा आपने ?”

“छोडो.. तुम्हे नहीं समझ आएगा.. !”राजेंद्र ने भावना से कहा और उसे साथ लिए बाहर निकल गया..

दोनों बाइक में वहां से निकल गये।

” भावना रात थोड़ी ज्यादा हो गई है, हमें शहर पहुंचने में वक्त लग जाएगा। ऐसा करते हैं आज रात तुम्हारे घर पर ही रुक जाते हैं ।”

भावना ने हामी भर दी।
दोनों लोग भावना के घर पहुंच गए। घर में पहुंचने के बाद भावना अंदर रसोई में चली गई। रसोई अब भी वैसे ही फैली पड़ी थी। वह धीरे-धीरे एक एक सामान समेटने लगी।
राजेंद्र भी चुपचाप रसोई में चला आया। वह भी चुपके से भावना की मदद करने लगा। वह ऊपर सामान समेटे जा रहा था, भावना ने रसोई में पोछा लगाना शुरू कर दिया। सब कुछ समेट कर भावना हाथ मुंह धोने बाथरूम में चली गई।

    राजेंद्र भी हाथ मुंह धोकर बाहर के कमरे में आकर बैठ गया। भावना ने अपने लिए खाने का कुछ भी बनाया तो था नहीं, लेकिन अब उसे भी हल्की सी भूख लगने लगी थी।
कपड़े बदलकर वह बाहर आई तो देखा राजेंद्र अपने मोबाइल पर कुछ देख रहा था।

” आपके लिए खाना ले आऊँ?”

भावना ने राजेंद्र से पूछ लिया और राजेंद्र ने हां में गर्दन हिला दी।
लेकिन भावना के पास इस वक्त सिर्फ सुबह की कुछ पूरियाँ ही बची थी..
वो उन पूरियों के साथ आलू की सब्जी गर्म करके बाहर ले आई..

“पूरियों के साथ चाय भी मिल जाती, तो अच्छा रहता।”

राजेंद्र ने धीमे से कहा और भावना सर हिला कर अंदर चली गई। लेकिन अंदर दूध तो बचा ही नहीं था?
उसने तो सारा दूध उस कमीने के सर पर बहा दिया था।
कुछ सोचकर उसने फ्रिज खोल कर देखा, और उसे एक कप में दूध नजर आ गया। भगवान का शुक्रिया अदा कर उसने चाय चढ़ा दी।

चाय छान कर वह दो कप में बाहर ले आई।

” तुम अपना खाना भी तो ले आओ?”

” नहीं हमें भूख नहीं है। हम बस चाय पियेंगे।”

” जानता हूं इतनी ही पूरियाँ बची थी अंदर, और अब थकान के कारण तुम्हारा बनाने का मन भी नहीं होगा। इस में से ही आधा-आधा खा लेते हैं।”

” नहीं नहीं आप खाईये ।”

” अच्छा मैं तो भूल ही गया था कि मैं ब्राह्मण नहीं हूं। मेरे साथ एक ही प्लेट में बैठकर नहीं खा सकती ना।
रुको मैं दूसरी प्लेट लेकर आ रहा हूं ।”

राजेंद्र के ऐसा कहते ही भावना तड़प उठी। उसने आगे बढ़कर अपनी जगह से उठते राजेंद्र को रोक दिया, और उसे वापस बैठा दिया।
उसके ठीक बगल में बैठकर उसकी प्लेट से पुरी का एक निवाला तोड़ा और अपने मुंह में रख लिया।

दुबारा एसा कहा तो हम कभी आपसे बात नहीं करेंगे।”

मुस्कुरा कर राजेंद्र चुपचाप खाने लगा, एक ही प्लेट से दोनों खाते हुए चाय पीने लगे..

शाम के वक्त से ससुराल में बैठी कुसुम का मन आज बार बार भावना से मिलने जाने का कर रहा था। शाम में वह जब अपने कमरे से नीचे उतर कर आई, तब उसे पता चला कि उसकी सास और काकी सास पड़ोस में किसी नए बने मंदिर में भजन में शामिल होने चली गई है। इसलिए उसकी दादी सास ने उसे कहीं जाने से मना कर दिया कि घर के पुरुषों को अगर चाय पानी की जरूरत हुई तो घर में कम से कम एक औरत का होना जरूरी है।

मन मार कर कुसुम घर पर ही रुक गई। कुछ देर बाद उसकी सासू मां और काकी सास घर वापस तो लौट आई, लेकिन उनके आते ही उन्होंने कुसुम को भी अपने साथ तरह-तरह की बातों में भरमा लिया।
कुछ देर बाद जब कुसुम ने दोबारा भावना के घर जाने की इच्छा जाहिर की तब किसके साथ जाओगी पर प्रश्न आकर अटक गया ..।
घर के दोनों ड्राइवर काम से गए हुए थे..
आखिर यज्ञ के घर लौटने के बाद कुसुम को भावना के घर जाने का रास्ता मिल गया..

लेकिन सुबह से निकला यज्ञ अभी लौटा था और उससे अपनी मदद के लिए कहना यानी उसके सामने घुटने टेकने जैसा था..
लेकिन भावना के घर जाना भी ज़रूरी था..

आखिर अपने आत्मसम्मान को ज़रा सा किनारे रख कुसुम ने बहाने से यज्ञ के सामने अपने मन की बात रख दी…

“वो हम सोच रहे थे..

उसने बोलते हुए एक नजर कमरे में अपने मोज़े खोलते हुए यज्ञ पर डाली.. यज्ञ बिलकुल अनसुना करता बैठा अपना काम कर रहा था..

“सुन रहे हैं आप ?”

“हाँ.. क्या.. हमसे कुछ कहा ? ” चौंकने का भरपूर अभिनय करते हुए यज्ञ मोज़े धोने वाले बैग में डाल बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए कुसुम को देखने लगा
.

“जाने दीजिये.. आप थक भी तो गए होंगे !” कुसुम को लगा उसकी हर बात का उल्टा जवाब देने वाला यज्ञ जरूर इस बात पर यही कहेगा कि उसे थकान नहीं होती लेकिन कुसुम की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए यज्ञ ने हां में गर्दन हिलाई और बाथरूम में घुस गया।

अंदर घुसकर वह मुस्कुराने लगा मुझे समझ में आ गया था कि यह बिगड़ैल बिल्ली जरूर किसी दही के छींके को फोड़ने का प्लान बना रही है, और वह भी उसकी मदद से।

हाथ मुंह धो कर कपड़े बदलकर यज्ञ बाहर चला आया। इतनी देर में नौकरानी उन दोनों के लिए चाय और नाश्ता लेकर ऊपर चली आई थी। यज्ञ सोफे पर पसर गया उसने चाय का प्याला उठाया और कुसुम की तरफ देखने लगा..

” आज अचानक हमारी थकान का ख्याल कैसे आ गया आपको..?!”

कुसुम का रहा सहा धैर्य चूक गया, इससे ज्यादा अपनी बातों में चाशनी घोलने की उसमें सामर्थ्य नहीं थी। उसने साफ सपाट शब्दों में अपने मन की बात कह दी..

“हम सोच रहे थे कुछ देर के लिए भावना से मिलते हैं..।”

“इतनी रात गए, तुम्हें यह ख्याल क्यों आया..?”

“पता नहीं लेकिन कुछ देर पहले अजीब सा मन घबराने लगा था। भावना की बहुत याद आ रही थी। ऐसा लगा पता नहीं अपनी अम्मा के जाने के बाद वह कैसे दिन काट रही होगी? हम उस दिन के बाद से उससे मिलने भी कहां जा पाए हैं..?”

“ऐसा करते हैं, कल सुबह हम काम पर जाते समय तुम्हें छोड़ देंगे उसके घर..।”

कुसुम मन मसोस कर रह गई।
बहुत जिद करने की उसकी आदत नहीं थी, और फिर यज्ञ पर अभी इतना हक भी तो नहीं पाया था उसने कि हक से उसे कह सके कि नहीं मुझे अभी के अभी ले चलो, और इसलिए बेचारी चुपचाप खिड़की पर खड़ी हो गई।
     दूर बादलों को देखती हुई वह अपनी और भावना की दोस्ती के बारे में सोचने लगी।
यज्ञ सोफे पर बैठा हुआ उसे ही देख रहा था…।

उसे समझ में आ गया था कि उसकी जिद्दी और पागल बीवी मन ही मन बहुत दुखी हो रही है, और अंदर से तड़पती हुई कुसुम अपनी छटपटाहट किसी से व्यक्त नहीं कर पा रही..

अपनी चाय खत्म करके यज्ञ अपनी जगह पर खड़ा हो गया।

” चलिए आपको, आपके दोस्त से मिलवा कर लाते हैं…।”

यज्ञ की यह बात सुनते ही खुशी से कुसुम का चेहरा उद्भासित हो गया। चहकती हुई अपना पर्स उठाये वह भी यज्ञ के पीछे सीढ़ियां उतर गई….

यज्ञ ने फर्राटे से अपनी गाड़ी निकाली और कुसुम के बैठते ही गुनगुनाते हुए गाड़ी आगे बढ़ा दी..।

अब तो कुसुम को भी अपने पति के अंदर छिपे बैठे कुमार शानू को सुनने की आदत पड़ गयी थी..

आज यह क्या हुआ है,दिल नहीं मेरा बस में
इस लिए सोचता हूँ,तोड़ दूँ सारी रस्मे

उम्र भर के लिए तू,आ मेरा साथ दे दे
तेरा हो जाऊँगा मैं, हाथों में हाथ दे दे

हाथों में हाथ सही,तू मेरे साथ ही सही
फिर भी तेरी हाँ है बाकि…

थोड़ा सा प्यार हुआ है,थोड़ा है बाकी..
हम तो दिल दे ही चुके बस तेरी हाँ है बाकी…

क्रमशः

aparna

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Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

अरे पहले तो नेहा जी का शुक्रिया कड़ी से कड़ी जुड़वाने का 👌👏👏🤜🤛 अब अनिर्वाण अपने स्टाइल में कुंडली निकलेंगे दीपू की तो सारी बात सामने आही जाएंगी ।
आय हाय , बिल्ली , चूहा बनी है आज तो , यज्ञ को कितना मजा आता होगा न कुसुम को छेड़ने का!! वाह बिना बोले बीवी की मन की बात जान भी गए और ले भी जा रहे उन्हे मिलवाने को भई वाह !! प्यार में तो अथर्व बाबू को भी पीछे छोड़ दे ये तो , क्या गाना गाए है थोड़ा सा प्यार हुआ है, थोड़ा है बाकी 🥰👍
वैसे राजी भी सब जान बूझ कर करता है खाना एक ही थाली में खाना था पर ताना कैसा मारा जिस से भावना मना भी नही कर पाई , उल्टा साथ बैठ एक ही थाली में खाया खाना 👏👏👏
क्या दीपू का राज़ पता चलेगा यज्ञ को ?? क्या अखंड को फसाया गया है ये राज़ भी खुलेगा सब के सामने?? आगे के इंतज़ार में बेसब्री से !!
और हां वो नेहा की बात, जो भावना नहीं समझी थी , वो मैं भी नही समझी , फिर ज्ञानी लोग से चर्चा करने के बाद पता चला अनिर्वाण को क्या समझा रही थी नेहा 🤭🤭🤭🤭🤭🙈🙈🙈🙈