अपराजिता -87
यज्ञ चाय पीता हुआ खिड़की से बाहर देख रहा था.. तभी उसका ध्यान कार से लड़खड़ा कर उतरते वीर पर गया…
वीर को देखते ही कुछ बातें उसके ज़हन में कौंध गयीं..
पिछली बार ज़मीन के एक सौदे के वक्त वीर उसके साथ गया था..।
सारी बातचीत यहाँ तक की पैसो के लेनदेन के वक्त भी वो था… वहाँ सब तय करने के बाद एडवांस में मिली धनराशि लेकर उसने यज्ञ को घर भेजा था, और खुद किसी दूसरे टेंडर की मीटिंग के लिए चला गया था..।
उस समय लगभग साढ़े आठ लाख रूपये उसने यज्ञ के हाथों घर भेज दिए थे..।
उसे बाबूजी को उसी वक्त फ़ोन करना था, लेकिन एक के बाद एक लगातार उसके फ़ोन पर किसी ना किसी का फ़ोन आने के कारण वो उन्हेँ फ़ोन नहीं कर पाया था..।
उस दिन रात के खाने में भी उसका मिलना बाबूजी से नहीं हो पाया था..।
रात को बाबूजी एक आध गिलास पीने के बाद नौ बजे तक खाना खा कर अपने कमरे में चले जाते थे, उसके बाद उन्हेँ कोई डिस्टर्ब नहीं कर सकता था…
इसीलिए उस दिन की छूटी बात फिर वो पूछ ही नहीं पाया..
उसे यक़ीन था रूपये मिलते ही बाबूजी ने अपनी डायरी में लिख लिए होंगे.. लेकिन उन्हेँ रूपये मिले कितने ?
वो उठ कर नीचे जाते जाते रुक गया..
उसे लगा अब एक अनुमान तो है ही कि शायद वीर ने अपनी किसी ज़रूरत के लिए रुपये रख लिए हों और उसे बताना भूल गया हो.. यही सोच कर उसने बाबूजी से सुबह पूछने का सोचा और फ़िलहाल हिसाब किताब समेट कर रख दिया..
लगातार हिसाब में नजर गड़ाए गड़ाए उसकी भी आंखे दुखने लगी थी, वो खिड़की पर पहुंचा उसे बंद किया और वापस पलंग पर आकर लेट गया..
कुसुम ने उसे खिड़की बंद करते देखी और धमक कर खिड़की पर पहुँच गयी.. उसने धीरे से खिड़की खोल दी, और खुद ही खुद में बड़बड़ाने लगी..
“बताओ, अजीब लोग हैं.. औरत की इज्जत करना नहीं जानते.. यहाँ एक लड़की हाथ पांव सिकोड़ कर सोफे पे सोने की कोशिश कर रही और जनाब पूरे पलंग पर फैले पड़े हैं.. हुंह !”
पलंग पर लेटे यज्ञ ने एक नजर कुसुम पर डाली और करवट बदल कर सामने लगा टीवी चला लिया…
यज्ञ के कोई जवाब ना देने पर वो पैर पटकती हुई सोफे पर चली गयी.. अपनी चादर से खुद को अच्छे से लपेट कर वो भी टीवी देखने लगी तभी यज्ञ की आवाज़ उसके कानो में पड़ी..
“अच्छा सुनो, तुम्हारा फ़ोन आज गलती से उठा लिया था हमने.. तुम्हारी सहेली का फ़ोन था.. क्या नाम था.. वो.. क्या बोला था, हम नाम भूल रहे..
“भावना !”
“हाँ.. भावना ! कल सुबह नाश्ते के बाद तैयार हो जाना, उससे मिलने जाना है !”
“हमे नहीं जाना !”
“क्यों ?”
“बस..नहीं जाना, उस धोखेबाज के पास !”
“तुम बचपन से ही पागल हो, या शादी के बाद दिमाग के कलपुर्जे ढीले पड़ गए ?”
यज्ञ की बात पर कुसुम चुप बैठी रही, कोई जवाब नहीं दिया…
यज्ञ ने घूर कर कुसुम की तरफ देखा, कुसुम नीचे चेहरा झुकाये बैठी थी.. ऐसा लगा जैसे उसके आंसू टपक रहे हैं… भावना के नाम से ही जैसे उसकी दुखती रग पर किसी ने हाथ रख दिया था..।
यज्ञ चौंक गया…।
आज तक उसने इस शेरनी की आंख में आंसू नहीं देखे थे, लाख उलझने हो वो किसी के सामने रोती नहीं थी..। आज अचानक उसकी आँखों से गिरते आंसू देख वो समझ गया, भावना कोई ऐसी वैसी दोस्त नहीं, बल्कि कुछ खास ही है..
यज्ञ ने वही बैठे बैठे आगे का फरमान सुना दिया..
“तुम्हारी दोस्त भावना का फ़ोन था, उसका कहना था कि उसकी अम्मा बीमार है और उन्हेँ सरकारी अस्पताल में भरती किया है !”
“क्या हुआ काकी को ?”
कुसुम की पीड़ा भरी आंखे यज्ञ पर टिक गयी..
“हमे नहीं पता.. हमने नहीं पूछा !”
“पूछना चाहिए था ना, पता नहीं क्या बीमारी हो गयी जो बेचारी अस्पताल में पड़ी है.. !”
“ओहो मैडम.. और भी काम है हमारे पास। आपके पर्सनल असिस्टेंट नहीं हैं, समझी ? और इतना ही जानना था तो फ़ोन अपने पास रखा करो ना, कि अगर किसी का ज़रूरी कॉल आये तो बात कर सको..
और इतनी ही परेशान हो तो लगा लो फ़ोन, बात कर लो ! कोई ज्यादा पैसा नहीं लग जायेगा !”
कुसुम ने वक्त देखा, और फिर फ़ोन एक तरफ रख दिया
यज्ञ ने उसे देखा और वापस उसे सुना दिया..
“क्या बात है, वक्त देख कर फ़ोन करती हो ? हम तो तुम्हे एकदम ही गंवार सोच लिए थे.. !”
यज्ञ हल्का सा हँस दिया..
“अपनी औकात में रहिये !” दाँत पीसती कुसुम एक बार फिर पहले वाली कुसुम बन गयी..
“हमारी औकात तुम्हे नहीं पता, समझी.. कभी हमारे साथ घूमने चलना, तब देखना हमारी औकात.. !”
“क्यों जाएँ.. हमें नहीं जाना !”
.”तुम्हे ले जा भी कौन रहा है ? कल सुबह अगर जाना चाहो तो अपनी सहेली से मिलने अस्पताल चलना.. ना जाना चाहो तो हमे कोई परेशानी नहीं, हम काम पर निकल जायेंगे..
“हम्म.. चलेंगे !”
बस इतना सा जवाब देकर वो ओढ़ कर लेट गयी, भावना के बारे में सोचते सोचते उसे नींद आ गयी..
****
अगली सुबह रेशम की नींद खुली और अपने बाजु में उसने अथर्व को सोते पाया और उसके चेहरे पर एक गहरी सी मुस्कान चली आयी.. वो धीरे से अथर्व के चेहरे पर झुकी और उसने अथर्व के गाल चूम लिए..
वो उठ कर बाहर का ताला खोलने चली गयी.. सुबह गुड्डी के आने का वक्त भी हो गया था..
ताला खोल कर अख़बार हाथ में उठाये वो अंदर चली आयी.. उसी के पीछे गुड्डी भी अंदर आ गयी..
“दीदी चाय चढ़ा दे ?”
“हम्म, चढ़ा दे.. !”
“भैया जी उठ गए ?”
“नहीं.. उन्हेँ सोने दे.. उनके लिए मैं बना लूँगी.. तू फटाफट काम निपटा ले.. !”
“आज अस्पताल नहीं जाओगी क्या आप ?”
“हाँ.. सोच तो रही थी, लेकिन आज एक नर्स ड्यूटी ज्वाइन करने आने वाली है.. उनकी जोइनिंग लेने जाना ही पड़ेगा… !”
“हाँ फिर वहीँ से कहीं घूमने चले जाना आप दोनों !”
रेशम ने मुस्कुरा कर गुड्डी की तरफ देखा..
“यहाँ है कौन सी जग़ह, घूमने के लिए ?”
“हैं ना दीदी.. बहुत जग़ह हैं.. दूर्वागंज से आगे बढ़ेंगी, तो बस कुछ दूर बहुत सुंदर जलप्रपात है, डैम है, जंगल है गुफाये हैं.. बहुत कुछ है देखने के लिए.. ! आपके घूमने के हिसाब से कुछ बना दूं क्या ?”
“क्या बनाएगी ?”
“आप नहाने जाओ.. मैं आपकी पिकनिक की तैयारी करती हूँ.. अच्छा दीदी सुनिए, गाँव की कुछ औरतें बोल रही थी, कि जलसो के लोग आपको तंग कर रहे तो आप एक बार मानौर के सरपंच से मिल लीजिये.. उनकी दबंगई चलती है जलसो और आसपास के गांव में.. वो एक बार जलसो जाकर लोगो को बोल आये ना फिर आपको परेशान करने कोई नहीं आएगा.. !”
गुड्डी की बात पर रेशम ने उसे चुप रहने का इशारा किया और पलट कर देखने लगी कि कहीं अथर्व ने सुन ना लिया हो …
वो जानती थी अगर अथर्व को उसकी इस परेशानी के बारे में मालूम चला तो वो किसी कीमत पर उसे यहाँ काम नहीं करने देगा…
इसलिए उसने गुड्डी को चुप करवा दिया.. चाय पीकर वो नहाने चली गयी.. उसके नहा कर निकलते में अथर्व भी सोकर उठ गया था..
उसे भी गुड्डी चाय पकड़ा चुकी थी..
बाहर बगीचे में रखी कुर्सी पर बैठा अथर्व अख़बार के पन्ने पलटता चाय सुड़क रहा था..
रेशम भी अपने गीले बाल झटकती वहीँ चली आयी…
“नाश्ता लेकर आऊँ ?”
“नहीं.. पहले तुम यहाँ बैठो तो.. !!
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रेशम वहीँ बैठ गयी..
“अरे तुम तो नहा कर चली आयी, मैंने तो सोचा था साथ में ही..
रेशम ने अथर्व की बात पूरी होने से पहले उसके होंठो पर अपनी उँगलियाँ रख दी..
“छी कोई सुन लेगा !”
“तो क्या हुआ ?”
“अरे.. मेरा मतलब है यहाँ का बाथरूम इतना बड़ा नहीं है.. !”
“अच्छा.. मतलब बड़ा होता तो तुम रेडी हो जाती ?”
अथर्व ने बड़ी भेदभरी नजर से उसे देखा और वो उसके देखने भर से पानी पानी हो गयी..
“सुनिए.. आज मैं ग्रेसी सिस्टर की जोइनिंग बस लेने जा रही हूँ.. मेरे वापस आते तक में आप तैयार हो जाना.. उसके बाद कहीं आसपास घूमने चलते हैं !”
“वाओ.. मेरी वाइफी ने पिकनिक प्लान किया है.. पर मुझे तुम्हारे साथ सारा वक्त घर पर ही रहना है !”
“नहीं.. हम घूमने जायेंगे.. प्लीज़.. !”
रेशम ने इतने प्यार से पूछा की अथर्व मना नहीं कर पाया..
“ठीक है… तो फिर तुम थोड़ा वेट करो.. मैं नहा कर रेडी होता हूँ.. तुम्हारी डिस्पेंसरी से होते हुए ही निकल जायेंगे.. ठीक है ?”..
“ठीक है !” रेशम ने हामी भरी और तैयार होने चली गयी….
अथर्व भी अपने फ़ोन को चार्जिंग में डाल कर नहाने घुस गया…
ये सुबह जहाँ रेशम और अथर्व के लिए मीठी सी थी वहीँ भावना के लिए कभी ना भूल सकने वाला दर्द लेकर आने वाली थी..
****
भावना सोने के लिए लेट तो गयी थी पर जल्दी ही उसकी नींद खुल गयी..
वो सोफे पर उठ बैठी.. उसने देखा राजेंद्र भी जाग रहा था..
“सुनिए.. !”
“हम्म !”
राजेंद्र ने उचटती सी आवाज़ में कहा..
“एक बार माँ से मिल कर आ जाये ?”
“हम्म.. चलो !”
भावना को लगा था राजेंद्र मना कर देगा लेकिन राजेंद्र तैयार हो गया..
भावना और राजेंद्र भावना की माँ के पास पहुँच गए..
वो आंखे मूंदे शांति से लेटी थी.. उन्हेँ देख भावना को सुकून सा लगा उसने धीरे से उनका माथा सहला दिया.. और उन्होंने आंखे खोल दी..
“कैसी हो अम्मा ?”
उन्होंने कष्ट से मुस्कुरा कर हामी भर दी…
“कुछ बोलो ना, हम तुम्हे सुनना चाह्ते हैं !”
भावना की माँ ने राजेंद्र की तरफ देखा और इशारे से उन्हेँ अपने पास बुला लिया..
बहुत धीमे से उन्होने बोलना शुरू किया..
“डॉक्टर साहब.. हमे कुछ हो गया तो आप हमारी बच्ची को अकेले मत छोड़िएगा.. गांव का माहौल अकेली लड़कियॉं के लिए सुरक्षित नहीं है.. जब तक इसके बाबूजी ना आये इसे अपने ही साथ रखियेगा.. हम जानते है आपके पास वो सुरक्षित हैं.. !”
इतना बोलने में ही उनकी साँस उखड़ने लगी थी.. ऐसा लग रहा था कितने कष्ट से उन्होंने इतना बोला था..
“ऐसी बात क्यों कर रही हो अम्मा.. डॉक्टर साहब तुम्हे एकदम ठीक कर देंगे.. है ना ?”
उसने राजेंद्र की तरफ देख कर पूछा..
लेकिन राजेंद्र झूठी हामी नहीं भर पाया…
“चलो अब उन्हेँ आराम करने दो… !”
“जाओ भावी.. हम ठीक है बेटा.. जाओ तुम आराम करो !”
भावना को चूँकि आईसीयू में रुकने की मनाही थी इसलिए बड़ी मज़बूरी में वो वहाँ से निकल कर राजेंद्र के साथ उसके केबिन में चली आयी…।
रात भावना को नींद लग तो गयी थी, लेकिन कच्ची सी नींद में उसे अच्छे सपने नहीं दिख रहे थे..
कुछ ना कुछ भयानक सपना देखते हुए उसकी नींद बार बार टूट रही थी, और इसी सब में सुबह के चार बजे उसकी नींद किसी भयानक सपने के बाद एकदम से उचट गयी.. वो उठ कर बैठ गयी….।
कमरे में इधर उधर नजर दौड़ाने पर उसे डॉक्टर साहब नजर नहीं आये..
वो चौंक कर उठ बैठी..।
सुबह के चार बजे डॉक्टर साहब कहाँ चले गए..
वो कुछ देर सोफे पर बैठी इंतज़ार करती रही.. उसे लगा बाथरूम में होंगे.. लेकिन जब पांच दस मिनट बीत गए और बाथरूम का दरवाज़ा नहीं खुला तब वो उठ कर दरवाज़े तक चली आयी..।
दूर से नजर नहीं आया था, लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था.. फिर भी एक निरर्थक सी पुकार लगा कर वो वापस अपनी जग़ह लौट आयी..
अचानक उसका माथा ठनका और वो कमरे से निकल कर अपनी माँ के कमरे की तरफ भागी..
उसकी माँ को फ़िलहाल आईसीयू में रखा गया था..।
वो कांच के दरवाज़े के पार पहुँच कर ठिठक कर खड़ी हो गयी.. अंदर राजेंद्र और दो सीनियर डॉक्टर्स नर्सेस के साथ उसकी माँ को बचाने की जद्दोजहद में लगे थे…
पता नहीं कैसे लेकिन भावना को समझ में आ गया कि अब उसकी माँ नहीं बच पाएंगी..।
उसने एक गहरी सी साँस भरी और कांच पर से अंदर अपनी आंखे फाङ कर देखती रही…
एक नर्स की नजर भावना पर पड़ गयी उसने राजेंद्र को इशारा कर दिया..
“सर, मैडम बाहर खड़ी हैं !”
राजेंद्र ने पलट कर देखा और भावना की पथराई सी आंखे देख उसका दिल पसीज गया..।
बेचारी लड़की.. पता नहीं भगवान ने किस स्याही में कलम डूबा कर इसकी किस्मत लिखी थी…
“सर.. शी इज़ सिंकिंग !”
दूसरी नर्स ने बोला.. बीपी लगातार नीचे जा रहा था..
राजेंद्र ने तुरंत एक जीवनरक्षक इंजेक्शन तैयार किया और उन्हेँ लगाने की तैयारी करने लगा..।
लेकिन मॉनिटर में ह्रदय की रेखा का चढ़ना उतरना खट से बंद हो गया.. रेखा सीधी सपाट हो गयी..।
जीवन का पंछी उड़ कर अपने बसेरे को चला गया.. अब उसे रोकने के साधन करना फ़िज़ूल था..
लेकिन इंसान का लालच कब खत्म हुआ है.. जब तक कर सकता है वो जाने वाले को रोकने का प्रयास करता ही है…!
इसीलिए राजेंद्र भी नहीं रुका..!
क्रमशः
aparna..

ओह! आज मन उदास कर दिया मुझे लगा था की भावना की मां तीखी जायेगी , इलाज के दोरान ये दोनो एक दूसरे को अच्छे से जान पाएंगे । 😔 पर.. नियति और dr साहिबा ने तो कुछ और ही लिख दिया ।😔😔
सच में भावना को देख कर दिल पसीज गया, क्या लिखा है किस्मत में , बाबा नही रहे, फिर निनाद से साथ छूट गया , एक लौटी दोस्त से भी नाता छूटा हुआ ही है , और अब मां… मां का साथ छूट गया , लिखने भी नही हो रहा मुझसे 😔
और यह रेशम को मनौर के सरपंच यानी अखंड बाबू से मिलने की तैयारी हो रही है , अथर्व बाबू और रेशम चले पिकनिक पर वाह ! आगे का भी अभी भेज दिजियेना । वैसे बाथरूम बड़ा नही था , नही तो क्या मान जाती ?? ये अथर्व भी जानता था जवाब क्या ही आने वाला था 🤣🤣🤣👌👌
पर आज के समाचार दुखी थे 🙏🙏🙏Om Shanti 🙏