अपराजिता -102
कुसुम जब से राजेंद्र और भावना को चोरी छिपे देख कर आयी थी तब से उसका मन नहीं लग रहा था..
वो दोनों इतने खुश कैसे थे.. ?
क्या राजेंद्र उसे भूल बैठा ? और भावना ? वो कैसे उसे भूल गयी….
कुसुम की समझ से परे था, कि वो क्या करे.. ? उसे लगा था, उसकी ससुराल बिलकुल टीवी सीरियल्स में दिखाई जाने वाली ससुराल की तरह होगी। जहाँ बहुओं पर अत्याचार किये जाते हैं..।
और वो इन अत्याचारों का विरोध कर विद्रोहिणी बहु बन जाएगी और इस तरह उसे उसके ससुराल से छुट्टी मिल जाएगी..।
उसे लगा था उसका पति भी आम ठाकुर परिवार के लड़कों की तरह होगा…
उज्जड, गंवार, बात बात पर अपना हुकुम चलाने वाला, बीवी को पांव की जूती समझने वाला..।
दिन रात शराब के नशे में धुत रहने वाला, लेकिन कुसुम के सारे खयालों पर घङों पानी फेरते हुए यज्ञ बिल्कुल ही अलग किस्म का लड़का निकला।
ना तो वह उज्जड था, ना गंवार, ना ही बिना जरुरत के अपना हुकुम चलाता था।
शराब पता नहीं पीता था या नहीं लेकिन जब से कुसुम इस घर में आई थी, तब से उसने कभी उसे नशे में नहीं देखा।
हां कुछ अलग टाइप का नशा तो करता ही था। पता नहीं किस बात पर वह लड़का इतना खुश रह लेता था, हर समय हंसना चाहे जहां गाने गुनगुनाना, जैसे यज्ञ के लिए यही जीवन था।
कभी-कभी तो उसे बेमतलब मुस्कुराते देखकर भी कुसुम कुढ जाती थी, कैसे कोई इंसान इतना खुश रह सकता है, वह भी बिना बात के…?
ससुराल पहुंचने के बाद कुसुम के पास फुर्सत ही फुर्सत थी। ना उसके घर वाले उसे कोई काम करवाते थे, ना उसका पति। अगर वह खुद से नीचे उतर के न जाए तो उसकी सास उसका नाश्ता खाना चाय भी उसके कमरे में भिजवा दे।
कितने अजीब थे यह लोग। देखा जाए तो ससुराल के नाम पर धब्बा थे।
इतनी अच्छी भी कोई ससुराल होती है ?
वह आज भी वह अपने कमरे में बैठी इन्हीं ख्यालों में गुम थी, क्या होता अगर उसकी और राजेंद्र की शादी हो जाती? राजेंद्र के घर पर उसने भावना को खुद सब कुछ करते देखा था, भावना और राजेंद्र जब पराठे और चाय एक ही थाली से खा रहे थे तब उन पराठों की शक्ल देख कर ही कुसुम को समझ में आ गया था कि पराठे भावना ने ही सेंके थे।
इसका मतलब अगर वह राजेंद्र के घर होती तो उस रात भावना की जगह उसने पराठे सेके होते और वह और राजेंद्र एक ही थाली में बैठकर खा रहे होते।
कितना सुहाना था यह सपना!!
लेकिन इस सपने में अचानक उसे उसकी जगह से ठेल कर भावना आ बैठी और अपने हाथ से पराठा तोड़कर उसके डॉक्टर साहब के मुंह में निवाला धरने लगी।
कुसुम को उन दोनों को यूं मुस्कुराते देखा गुस्सा तो बहुत आया लेकिन पल भर के लिए वह उन दोनों को आपस में हंसते खिलखिलाते देखकर अपना गुस्सा भी भूल कर रह गई।
दोनों एक दूसरे के साथ अच्छे लग रहे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे डॉक्टर साहब के लिए भावना ही बनी है। डॉक्टर साहब के घर पर काम करने के लिए कोई सहायक मौजूद नहीं था, तो क्या भावना सब कुछ खुद करती है?
करती ही होगी। वह वैसे भी बहुत जिम्मेदार लड़की थी। शुरू से काकी की भी कितनी मदद किया करती थी। काकी के पास वैसे तो पैसों की तंगी नहीं थी, लेकिन अपने हाथ में पैसे बने रहे, इसलिए बहुत बार कपड़ों की सिलाई भी करती थी काकी और उन कपड़ों में तुरपाई निकालना, साङियों में फाल लगाने का काम भावना भी कर लिया करती थी।
भावना कितनी समझदार थी। काश उसकी समझदारी का एक प्रतिशत भी हम में आ जाता।
कुसुम अपने दोनों घुटनों पर अपना चेहरा टिकाए खिड़की से बाहर झांकती बैठी थी। आज पता नहीं क्यों उसके मन में बहुत सारी उदासी पसरी हुई थी। उसे ऐसा लग रहा था उसके हाथ से वक्त फिसल कर निकलता जा रहा है ।
उसके डॉक्टर साहब उसे भूलकर अपनी नई जिंदगी में मशगूल हो चुके हैं। भावना के साथ को उन्होंने अपना प्रारब्ध मान लिया है। और उसका हाथ थामे अपनी जिंदगी में कुसुम को पीछे छोड़कर वह बहुत आगे निकल गए हैं ।
कुसुम आज भी वही खड़ी रह गई है, जहां से चंद्रा भैया उसे खींचकर विवाह मंडप में बैठाने लेकर आए थे।
मंडप में बैठने के बावजूद यज्ञ के साथ, सात फेरे लेने के बावजूद, उसके हाथों से अपनी मांग में सिंदूर भरवा लेने के बावजूद क्या आज भी वह वही उसी चौक पर खड़ी नही रह गई है, डॉक्टर साहब की तरफ देखते हुए ।
कुसुम यह सोच रही थी कि तभी उसके फोन से रिंग बजने लगी । उसने देखा उसकी भाभी का फ़ोन आ रहा था..
“कैसी हैं भाभी आप ?”
“हम तो ठीक है आप कैसी हैं, राजकुमारी जी ?”
“अब कहाँ की राजकुमारी ? आप बताएं भैया ठीक हैं ? “
“हाँ वो ठीक हैं, अब तो धीरे से सहारा लेकर बैठने भी लग गए हैं.. !”
“अच्छा है… इस वक्त आपने उनका बहुत साथ दिया है भाभी.. कोई और होती तो शायद ही इतना करती ?”
“क्यों नहीं करती ? हमारे संस्कार ही ऐसे हैं कि, हम क्या कोई और औरत भी होती तो वो भी करती… औरत अपने पति का भले एक बार सम्मान ना करे, उसकी हरकतों के कारण।
लेकिन अपने बच्चे के पिता का हर हाल में सम्मान करती है, उसका ध्यान रखती ही है..।
यही तो हमारे यहां के अरेंज मैरिज की खूबसूरती है.. वैसे आप बताओ दामाद बाबू तो अच्छे हैं ना, आपका ध्यान रखते हैं ना ?”
सुजाता की इस बात पर कुसुम कुछ कह नही पायी..
“कुछ परेशान हो क्या कुसुम !”
“भाभी, डॉक्टर साहब तो हमें भूल ही गए… वो और भावना एक दूसरे के साथ खुश हैं… !”
सुजाता एकदम से कुसुम की उदासी समझ गयी.. उसने अपने माथे पर हाथ मार लिया…
कैसा बचपना कर रही थी उसकी नन्द रानी… ।
अगर अब भी नहीं समझी तो ये सीधा अपने पैर कुल्हाड़ी पर मारने वाली बात हो जाएगी.. किसी भी पुरुष के सहन करने की एक हद होती हैं, अगर उसकी नन्द ऐसे ही अपने बावरेपन में उलझी रही तो अपना रिश्ता खुद अपने हाथों खत्म कर बैठेगी.. उसे समझाना ही होगा..
“बिल्कुल पागल हो कुसुम तुम, बिल्कुल पागल।
माना की तुम डॉक्टर साहब से प्यार करती थी, बहुत प्यार करती थी। उन्हें पाने के लिए तुमने अपना घर द्वार सब छोड़ दिया, लेकिन किस्मत ने तुम्हारा साथ नहीं दिया, और तुम्हारे चंद्रा भैया तुम्हे पकड़ कर वापस ले आए।
उसके बाद क्या हुआ? तुम्हारी शादी हो गई और दूसरी तरफ तुम्हारे डॉक्टर साहब ने भी तुम्हारी ही सहेली से शादी कर ली ।
माना कि यह शादी तुम्हारे चंद्र भैया ने जबरदस्ती करवाई लेकिन ऐसा भी क्या डर था। वो डरा जरूर रहे थे, लेकिन गोली थोड़ी ना मार देते? अगर डॉक्टर साहब अपनी बात पर अड जाते कि उन्हें भावना से शादी नहीं करनी तो तुम्हारे चंद्रा भैया इतने भी बुरे नहीं थे कि उन्हें गोली मार देते।
कहीं ना कहीं थोड़ी सी ही सही लेकिन डॉक्टर साहब की भी मर्जी तो रही होगी। तुम्हे क्यों समझ में नहीं आता कुसुम की भावना तुमसे कहीं ज्यादा समझदार है। आज डॉक्टर साहब को जैसे जिम्मेदार हमराही की जरूरत थी भावना बिल्कुल वैसी ही है।
तुम सोच कर देखो, बचपन से लेकर आज तक तुमने बिना नौकरों के अपने घर में सांस तक नहीं ली। आज ससुराल में इतने आराम से पलंग पर पैर पसारे बैठकर टीवी का रिमोट हाथ में लिए तुम चाय सुडकती रहती हो, क्योंकि तुम्हारे ससुराल में भी दर्जन भर नौकर है, लेकिन क्या डॉक्टर साहब के घर पर भी तुम्हे इतना आराम मिलता, और आराम की छोड़ो, असली बात यह है कि डॉक्टर साहब की बुद्धिमानी और समझदारी के सामने तुम जैसी बेवकूफ लड़की कहीं नहीं टिकती।
भावना और उनकी जोड़ी बहुत सुंदर है। एक दूसरे के काबिल, एक दूसरे के साथ खड़े होकर दोनों ही एक दूसरे के सम्मान को दोगुना बढ़ा देते हैं।
उनके बीच तुम कहीं नहीं दिखती कुसुम। तुम्हारे लिए यही घर बना है। तुम्हारा पति जिसकी तुम आज कदर नहीं करती वो लाखों में एक है। कभी ध्यान से अपने पति को नजर भर कर देखा भी है ?
अरे लाखों नहीं करोड़ों में एक है वह।
आदमी को भूख प्यास सहन नहीं होती नन्द रानी, उन्हेँ इतना भी मत तरसाओ की तुम्हे छोड़ कहीं और आशियाना तलाश ले, तब बैठी रह जाना अपने झूठे सपने पालते हुए..
वो अब भी तुम्हारे नखरे झेल रहे… जानती हो क्यों ? ये मत सोचना की तुम कोई रूप की रानी हो इसलिए इतना सब कर रहे वो, बल्कि ये उनके संस्कार हैं जो वो अपनी शादी और पत्नी को पूरा समय दे रहे, तुम्हे सम्भलने का समय दे रहे…
कम से कम उनके धैर्य का तो मान रख लो !
ऐसा लड़का दिया लेकर तलाशने पर भी नहीं मिलता। अपनी जिंदगी को हवन करने से बेहतर है जो जैसा मिला है उसे स्वीकार लो।”
कुसुम जैसे गहरी नींद से जागी… उसने कुछ दो चार बातें कर फ़ोन रख दिया, और सोचने लगी..
कुसुम अपने ख्यालों में कोई थी तभी दरवाजा ठक से खुल गया…
दरवाजा खोलने की आवाज सुनकर कुसुम चौंक कर पलट गई।
यज्ञ भीतर आया था।
” क्या हुआ कुसुम कुछ परेशान हो क्या?”
यज्ञ के इस सवाल पर कुसुम अचानक कोई जवाब नहीं दे पाई।
” नहीं तो, क्या हुआ?”
” हमने बाहर से दो-तीन बार आवाज लगाई थी, लेकिन तुमने कोई जवाब नहीं दिया। इसलिए हमें दरवाजा खोलना पड़ा।”
” हम कुछ सोच रहे थे, हमें आपकी आवाज सुनाई नहीं दी।”
” चलो ठीक है, कोई बात नहीं। हम अपने ननिहाल जा रहे हैं, दो दिन लग जाएगा हमें आने में ।”
यज्ञ ने कुसुम से कहा और अपना एक छोटा सा बैग निकाल कर अलमारी से अपने कपड़े बैग में डालने लगा। कुसुम चौंक कर खड़ी हो गई।
” क्या हो गया अचानक, आप अपने ननिहाल क्यों जा रहे हैं?”
” हमारी नानी की तबीयत सही नहीं है.. ।
उन्हेँ देखने जाना है..।”
यज्ञ ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और अपना सामान रखने लगा..
“कितने दिन के लिए जा रहे ?”
“बस दो दिन.. आज जायेंगे, कल रुकेंगे और परसों वापस !”
“हम भी चले ?”
जाने कैसे कुसुम के मुहं से निकल गया और वो अपनी जीभ काट कर रह गयी..
पता नहीं ये स्वयं सिद्ध हीरो अब क्या सोचेगा और कौन सा बम फोड़ेगा..
मन ही मन घबराती कुसुम अपनी बात कैसे पलट दूँ ये विचार कर रही थी कि यज्ञ ने चलो कह दिया…
इतनी आसानी से वो उसके संग चलने पे मुहर लगा देगा ये कुसुम ने नहीं सोचा था…
उसे लगा था यज्ञ कोई ना कोई टांट मारेगा, लेकिन उसकी आशाओं पर पानी फेरते हुए यज्ञ ने हामी भर दी और कुसुम झटपट उठकर अपने दो-चार कपड़े समेटने लगी।
यज्ञ के साथ ही कुसुम भी नीचे उतर आई।
यज्ञ अपनी नानी के घर जाने वाला है यह उसकी मां जानती थी, लेकिन यज्ञ के पीछे अपना बैग लेकर उतरती कुसुम को देखकर उसकी मां आंखें फाड़े यज्ञ को देखने लगी।
” क्या हुआ कुसुम को भी लेकर जा रहे हो साथ में?”
” वह खुद जाना चाहती है ।”
यज्ञ के जवाब ने यज्ञ की मां को घोर आश्चर्य में डूबा दिया। पर धीरे से उनके चेहरे पर मुस्कान चली आई।
” अच्छा है जाओ अपनी नानी सास का भी आशीर्वाद ले लो। वह बेचारी उम्र बढ़ जाने के कारण यज्ञ के ब्याह में नहीं आ पाई, जबकि आने का बहुत मन था।
तुम्हें देखने का बहुत मन था, और सच कहें तो अभी भी वह यह चाहती थी कि तुम भी आ जाओ। जिससे वह तुम्हें देख सके। लेकिन हमें लगा गांव देहात में तुम कहां जाना चाहोगी?
इसीलिए तुमसे नहीं कह रहे थे। यज्ञ ने भी कहा कि तुम वहां गांव में गुजारा नहीं कर पाओगी। लेकिन देखो आखिर उसने तुम्हें मना ही लिया।”
अच्छा तो छोटे ठाकुर हमें अपने साथ ले जाना ही नहीं चाह्ते थे ? ऐसा क्या है ननिहाल में जो हमे ले जाने के लिए अम्मा जी को मना कर दिया था..
कुसुम के दिमाग में ये बात घूमने लगी उसने अपनी सास की इस बात पर कोई जवाब नहीं दिया। यज्ञ की माँ ने नौकरों से सामान गाड़ी में रखने को कहा और आरती की थाली उठा, आरती की थाली से हल्दी और कुमकुम कुसुम के माथे पर लगाकर उन्होंने अपने बेटे के माथे पर भी तिलक लगाया और यज्ञ को भर भर कर आशीर्वाद देने लगी।
यज्ञ पैर छूकर उठ गया और आगे बढ़ गया…
कुसुम जाने क्या सोचकर थम कर खड़ी हुई और फिर धीरे से अपनी सास के पैरों पर झुक गई ।
अपनी शादी से पहले वह हमेशा अपने घर में अपनी मां को इसी बात पर टोका करती थी कि क्या रात दिन भाभी से पर छुआती रहती हो, लेकिन आज पता नहीं क्यों घर से निकलते वक्त उसका मन खुद श्रद्धा से अपनी सास के पैरों पर झुक गया।
उनके पैर छूकर वह उठी थी कि उन्होंने धीरे से उसे चाची सास के पैर छूने का भी इशारा कर दिया। हालांकि दिल से कुसुम अपनी चाची सास को आदर नहीं दे पाती थी। इसके पीछे कहीं ना कहीं उसकी चाची सास का कड़वा स्वभाव और उनका अपने बेटे के प्रति अंधा मोह भी था। फिर भी अपनी सास की आज्ञा का पालन नहीं करके वह उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी। चाची सास के पैर छूने के बाद वह दादी सास के पास गई और उनके भी पैर छू लिए।
उन्होंने बड़े प्यार से कुसुम के माथे पर हाथ रख दिया।
“जाओ मिल लो हमारी समधन से, बेचारी कब्र में टांग लटकाए बैठी है। अब गिरी की तब गिरी वाली हालत है उसकी। उम्र में तो हमसे कम है, लेकिन डोकरी हमसे ज्यादा हो गई है।”
उनके इस मजाक पर कुसुम भी मुस्कुरा उठी और चुपचाप खड़े होकर यज्ञ के पीछे बाहर निकल गई।
यज्ञ की गाड़ी में उन दोनों का सामान और यज्ञ के मां द्वारा दिए गए फल और मिठाइयों को रखने के बाद ड्राइवर ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया था, लेकिन यज्ञ ने उसे उतरने को कह दिया और खुद ड्राइविंग सीट संभाल ली।
कुसुम भी यज्ञ को वहां बैठे देख उसके बगल में आ बैठी, और यज्ञ की गाड़ी हवा से बातें करने लगी।
यज्ञ ने अपनी आदत के अनुसार रेडियो चला दिया… मौके पर चौका मारता गाना बजने लगा…
तुझ बिन लब पर कोई नाम नहीं आता,
दिल को तड़पे बिना आराम नहीं आता
दोनों तरफ लगी है आग बराबर ये,
रख देगी बस हमको राख बनाकर ये,
तू भी जल जायेगी, मैं भी जल जाऊँगा!
मैं तेरी मोहब्बत में पागल हो जाऊँगा!
मुझे ऐसा लगता है, तुझे कैसा लगता है?
मैं तेरी निगाहों से घायल हो जाउंगी
मुझे ऐसा लगता है तुझे कैसा लगता है.
क्रमशः
aparna

Inki bhi love story suru ho hi gayi samjho ❤️❤️❤️❤️
एक to यज्ञ और उसके गाने , by God इसकी n ek play list banayenge youtube music par 😅😅, or Aaj apni nanad Rani ko achhi Sikh di hai sujata n, or Sikh dete samay dekh bhi liya k Chandra ko lekar bhi uske man me Maan sanman to hai hi