अपराजिता -99
यज्ञ रेशम और बाकी औरतों को लेकर अंदर की तरफ बढ़ रहा था, गलियारे में खड़ा अखंड सांस रोके खड़ा था। उसकी समझ से बाहर था कि वह रेशम का सामना कैसे करेगा?
बिना किसी गलती के वह बेकसूर, जिंदगी भर की सजा पा चुका था। बावजूद उसकी रेशम के सामने जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह अपनी सफाई में शायद ही कुछ बोल पाता, लेकिन उसके पहले ही रेशम ठिठक कर खड़ी हो गई।
उसने यज्ञ की तरफ देखा और उससे कह दिया,
” आप अंदर चलिए हम लोग आते हैं।”
यज्ञ ने हामी भरी और थोड़ा आगे बढ़कर दरवाजे तक जाकर खड़ा हो गया।
उसे समझ में आ गया था कि रेशम शायद बाकी औरतों से कुछ बातचीत करना चाहती है।
रेशम मुड़कर अपने गांव की औरतों के पास पहुंच गई।
” आप लोगों को क्या लगता है, जिसका छोटा भाई खुद नशे में धुत होकर घर पहुंच रहा है, और घर आई महिलाओं के साथ तमीज से बात नहीं कर पा रहा, उसका बड़ा भाई आप लोगों की बात सुनकर कुछ कर पाएगा?
और चलिए मान लिया कि मानौर के सरपंच बहुत भले आदमी है। उन्होंने आप सब की शिकायत सुन भी ली, लेकिन जो आदमी अपने छोटे भाई की नशे की लत नहीं छुड़ा पाया, वह आपके पतियों की नशे की लत क्या छुड़ा पाएगा?
मैं तो यही कहूंगी कि, अपनी लड़ाई खुद लड़ने की आदत डालिए। दूसरों की जब तक मोहताज बनी रहेंगी हम औरतें हमेशा हारती ही रहेंगी।
क्या जरूरत है किसी का भी सहारा लेने की?
बल्कि हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम किसी का सहारा बन सके।
चलिए मुझे मानौर के सरपंच से नहीं मिलना।”
रेशम के दृढ़ कदम वापसी की ओर थे ,लेकिन वह औरतें अब भी पसोपेश में थी। वह सब अखंड का विनम्र स्वभाव जानती थी, और वह लोग जानती थी कि अखंड के आकर बोलने का उनके पतियों पर अलग ही प्रभाव पड़ेगा। लेकिन इस वक्त रेशम को समझाना मुश्किल था।
रेशम ने उन लोगों से एक बार फिर वापस चलने को कहा और खुद अखंड की उस हवेली से बाहर निकल गई। वह औरतें भी मन मार कर रेशम के पीछे बाहर निकल गई।
दूर खड़ा यज्ञ सारी बातें समझ चुका था।
यज्ञ और अखंड वीर को समझा समझा कर थक चुके थे, लेकिन वीर कुछ भी मानने को तैयार नहीं था।
यज्ञ ने एक ठंडी सी सांस भरी और अंदर अखंड को बताने चला गया। अखंड सांस रोक दरवाजे पर होने वाली दस्तक का इंतजार कर रहा था कि तभी यज्ञ दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया।
” अखंड भैया वह औरतें वापस लौट गई। शायद वह कुछ कागज लाना भूल गई थी। उनका कहना था कि वह सारे पेपर लेकर आपसे मिलने आएंगी।”
अखंड के चेहरे पर राहत चली आई। लेकिन यज्ञ जो अब तक अखंड को यह बताने में संकोच महसूस कर रहा था कि वह औरतें बिना अखंड से मिले चली गई, अखंड के चेहरे पर आने वाली राहत के भावों का मतलब नहीं समझ पाया।
उसे तो लगा था कि शायद अखंड को बुरा लगेगा, लेकिन यहां अखंड मुस्कुरा रहा था।
” कोई बात नहीं। वह महिलाएं जब भी आएंगी हम मिलेंगे।”
यज्ञ ने धीरे से हामी भरी और अपने काम से बाहर निकल गया…
आज फिर यज्ञ को हॉस्पिटल ही जाना था। इत्तेफाक से यह वही अस्पताल था जहां राजेंद्र काम किया करता था, और जहां आज से काफी दिन पहले यज्ञ राजेंद्र से टकरा चुका था।
शादी की वह पहली रात जब कुसुम और यज्ञ अपने कमरे में मौजूद थे, और कुसुम ने अपनी सारी आप बीती यज्ञ को कह सुनाई थी और उसे बता दिया था कि कुसुम कुमारी किसी और से प्यार करती है।
उसके बाद जब यज्ञ ने कुसुम का हाथ पड़कर उसे अपने घर से बेदखल कर दिया था.. और उसके बाद अपने बड़े भाई के कहने पर वह कुसुम के पीछे-पीछे चला गया था और उसे साथ लेकर वापस आ गया था।
लेकिन उस रात वह सो नहीं पाया और दो चार दिन बाद वो डॉक्टर राजेंद्र के अस्पताल पहुँच गया था..।
पता नहीं क्या सोच कर गया था वो वहाँ, लेकिन वहाँ डॉक्टर राजेंद्र को बड़ी लगन से अपना काम करते देख वो सोच में पड़ गया था..
उसे अपनी तरफ देखते पाकर डॉक्टर राजेंद्र खुद उसके पास चला आया था..
“कहिये.. ? किसी से मिलना है ?”
और राजेंद्र के इस सवाल पर यज्ञ ने हाँ में गर्दन हिला दी थी..
“डॉक्टर राजेंद्र कहाँ मिलेंगे ?” यज्ञ के सवाल पर राजेंद्र ने उसे हैरत से देखा..
“मैं ही हूँ.. कहिये ?”
“आप से कहीं बैठ कर बात हो सकती है ?”
“आइये.. “और राजेंद्र उसे साथ लेकर अस्पताल के कैफे एरिया में चला आया..
“कहिये.. मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ?”
“हमारा नाम यज्ञ सिंह परिहार है.. कुसुम की शादी हम ही से हुई है !”
यज्ञ के ऐसा कहते ही राजेंद्र चौंक कर उसे देखने लगा….
“आप.. यहाँ.. ?”
राजेंद्र एकदम से खड़ा हो गया.. उसे कुसुम का स्वभाव पता था।
वह पागल सिरफिरी कुछ भी कर सकती थी। पता नहीं ससुराल पहुंचकर उसने क्या बवाल कर दिया था? राजेंद्र को इस तरह घबराए देख यज्ञ कुछ पल के लिए कुछ कह नहीं सका..।
डॉक्टर राजेंद्र से मिलने के पहले तक यज्ञ के दिल दिमाग में बेहद गुस्सा था। जिस दिन कुसुम ने यज्ञ को राजेंद्र के बारे में बताया था, उस दिन यज्ञ को ऐसा लग रहा था कि पूरी दुनिया को जला दे।
लेकिन कहते हैं ना गुस्सा भी एक वक्त के साथ धीरे-धीरे कम होने लगता है। अगर यज्ञ इस समय राजेंद्र से मिलने जाता तो शायद कुछ का कुछ बोल जाता, लेकिन अपने बड़े भाई की बात मानकर वह ठहर गया और दो-चार दिन बाद जब उसका गुस्सा थोड़ा कम पड़ा, तब वह राजेंद्र से मिलने आया।
इसीलिए आज राजेंद्र को सामने देखकर भी वह भड़का नहीं..।
बल्कि राजेंद्र की बेचैनी और उतावलापन देखकर यज्ञ उसे सहज और सामान्य करने की कोशिश करने लगा।
” अरे आप घबराएं नहीं डॉक्टर साहब, आप बैठिए।”
राजेंद्र वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया।
“कहिए क्यों मिलना चाहते थे आप मुझसे?”
राजेंद्र ने सामने बैठे यज्ञ से सवाल कर दिया।
यज्ञ ने राजेंद्र की आंखों में देखा और अपने मन की बात बोल दी
” कुसुम ने हमसे आपके बारे में सब कुछ बता दिया है। आप दोनों के बीच क्या था, क्या नहीं? हम सब जानते हैं। उसने यह तक बता दिया कि हमारी बारात उनके घर पर लगी थी और वह आपके साथ भागने की तैयारी में थी।
तैयारी में क्या थी घर से भाग ही चुकी थी। वह तो चंद्रभान भाई साहब ने..”
कहते-कहते यज्ञ की आंखें झुक गई और वह नीचे देखने लगा।
राजेंद्र का दिल कसमसा कर रह गया।
उसे यज्ञ में एक थका हुआ सा पति नजर आ रहा था।
” आप आंखें नीचे किये क्यों बैठे हैं ठाकुर साहब? आपको नज़रे नीचे करने की कोई जरूरत नहीं। आपको मैंने उस दिना अस्पताल में देख लिया था जब चंद्रभान का एक्सीडेंट हुआ था, और आप कुसुम के साथ अस्पताल पहुंचे थे..।
अस्पताल की सबसे पहली सीढ़ी पर जब कुसुम अकड़ कर खड़ी हो गई, कि उसे अंदर नहीं जाना है, तब आपने उसकी बांह पकड़कर उसे अंदर चलने के लिए खींचा था। और उस वक्त मुझे समझ में आ गया था कि कुसुम किन्हीं गलत हाथों में नहीं बल्कि बहुत सही हाथों में पहुंच गई है…।
कुसुम बावली है ठाकुर साहब.. ।
उसके अंदर बचपना कूट-कूट कर भरा है। जब कुसुम से पहली मुलाकात हुई, तब मैंने कभी नहीं सोचा था कि कुसुम मेरी जिंदगी को ऐसे बदल देगी।
पता नहीं मेरी बातों पर आप विश्वास करेंगे या नहीं, लेकिन सच्चाई यही है कि कुसुम के प्यार में बचपना मिला हुआ था। उसके अंदर एक जिद्दी लड़की बैठी है, जो अपने आप को साबित करना चाहती है.. !
कुसुम को काफी करीब से जाना है मैंने…
उसके घर में बचपन से उसके और उसके बड़े भाई के बीच भेदभाव किया जाता था। खासकर उसकी दादी के द्वारा।
एक तो कुसुम लड़की पैदा हुई दूसरा सांवली थी। इसलिए हर जगह कुसुम की परवरिश पर उसके भाई की परवरिश भारी पड़ी। बचपन से यह सब सुनते और देखते हुए उसके अंदर एक जिद भर गई थी कि उसे अपने मन का कुछ करना है।
हालांकि बचपन से आज तक कभी उसे घर पर किसी भी तरह का विद्रोह करने का मौका ही नहीं लगा।
हां अगर पढ़ना लिखना चाहती तो इसके लिए विद्रोह कर सकती थी, लेकिन उसका खुद का मन पढ़ाई लिखाई में लगता नहीं था। पहनने ओढने की जहां तक बात है, वह जो कहती उसकी मां आगे बढ़कर उसके लिए वह बनवा देती।
बाइक चलाने के लिए भी उसने अपने पिता से विद्रोह किया था, और यह उसके विद्रोह की पहली चिंगारी थी। जिसके बाद वह बहुत खुश थी। लेकिन यहां पर भी उसका पासा पलट गया। क्योंकि वह चंद्रभान की बाइक चलाना चाहती थी, और चंद्रभान ने उसे अपनी बाइक से कहीं ज्यादा महंगी बुलेट खरीद कर राखी के तोहफे के तौर पर दे दी।
वह इंसान जो विद्रोह करना चाहता है, लेकिन उसे विद्रोह का मौका नहीं मिलता, वह हर वक्त सिर्फ अपने अंदर उस चिंगारी को जलाए रखना चाहता है, जिसके कारण वह प्रज्वलित है। खुद जीवित है।
कुसुम के अंदर बगावत तो थी, लेकिन उसे कभी मौका नहीं मिला और उसे वह मौका अनजाने ही मैंने दे दिया.. ।
यहां पर भी आपको एक बात स्पष्ट कर दूं ठाकुर साहब, अगर यह प्रेम प्रस्ताव मेरी तरफ से जाता तो शायद कुसुम मुझे इनकार कर देती।
लेकिन यह प्रस्ताव उसकी तरफ से था। उसकी बगावत की सबसे शानदार चिंगारी था मैं।
उसे मुझे देखकर ही समझ में आ गया था कि मेरे लिए उसके घर परिवार वाले कभी नहीं मानेंगे। और बस यही से उसके बचपन का जुनून जिद में बदल गया। उसके अंदर की नटखट लड़की ने एक अंगड़ाई ली और अपने मन की इच्छा को अपनी जिद में बदल दिया।
मैं उसे हमेशा समझाता था कि हमारा परिवेश अलग है, हमारे संस्कार अलग है। हम दोनों कभी नहीं जुड़ सकते। लेकिन वह कुछ सुनने को ही तैयार नहीं होती थी।
ठाकुर साहब प्यार ऐसे नहीं होता।
यह नहीं कहूंगा कि मुझे कुसुम से प्यार नहीं था। उस सिरफिरी पागल सी लड़की ने दिल तो मेरा भी चुरा लिया था। क्या करूं वह है ही ऐसी।
उसके साथ जो दो दिन रह लेगा ना, वह उसे टूट कर प्यार करने लगेगा। क्योंकि उसके जैसा साफ मन इतनी आसानी से देखने को नहीं मिलता।
मैं ही क्या उसकी सहेली भावना भी उसे टूट कर प्यार करती है।
हां शारीरिक रूप से मेरे और कुसुम के बीच कभी कुछ नहीं था। और इतना तो मैं भी कुसुम को जानता हूं कि वह कितनी भी बावली हो, लेकिन अपनी मर्यादाओं से वह कभी समझौता नहीं करेगी।
आपसे पता नहीं उसने क्या कुछ कहा है, मैं नहीं जानता। लेकिन हां आपसे हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करना चाहता हूं कि उस बावली सी लड़की की भूल चूक माफ कर दीजिएगा।
उसे संभाल लीजिए।
बहकने मत दीजिएगा। सच कहूं तो उसे सामजिक सूझ बूझ है ही नहीं…।
उसे बंधन पसंद नहीं है। लेकिन अगर आप प्यार से उसे बांधना चाहेंगे ना तो वह सारे संसार को त्याग कर अपना सर्वस्व आपके चरणों में समर्पित कर देगी।
लेकिन कहीं अगर उससे ज्यादती करने की कोशिश की गई तो वह सारे संसार को आग लगा कर चली जाएगी। कुसुम के अंदर अब भी भोला सा बच्चा है और कुसुम को संभालने के लिए उस भोले बच्चे को ही प्यार से संभालने की जरूरत है…।
उसकी भूल चूक माफ करके उसे अपना लीजिये ठाकुर साहब..।
कुसुम सी सच्ची और ईमानदार लड़की आपको कहीं नहीं मिलेगी..”
यज्ञ पहले ही कुसुम का स्वभाव थोड़ा बहुत समझ चुका था, लेकिन आज राजेंद्र से मिलकर उसे स्पष्ट हो गया कि कुसुम क्या थी… ?
यज्ञ ने खड़े होकर राजेंद्र के जुड़े हुए दोनों हाथ पकड़ लिये।
“हमें माफ कीजिएगा डॉक्टर साहब! हम यहां यह सोच कर आए थे कि अगर आप कुसुम को उसके ब्याह के बाद भी अपनाना चाहे तो हम उसे छोड़ने के लिए तैयार है ।
लेकिन आपकी बातों से समझ में आ गया है कि आपने कुसुम के ब्याह को तन और मन से अपना लिया है। लेकिन फिर भी हम यही कहना चाहते हैं कि अगर आपके मन में एक पल के लिए भी यह बात आती है कि आप कुसुम के साथ सारी जिंदगी बिताना चाहते हैं, तो हम कुसुम को छोड़ने के लिए तैयार है..।”
“नहीं ठाकुर साहब सच कहूं तो मैं भगवान की बहुत ज्यादा पूजा पाठ नहीं करता। लेकिन एक अनंत शक्ति पर विश्वास जरूर करता हूं। इतना जरूर मानता हूं कि हमारे साथ जो कुछ भी होता है, वह सब उस शक्ति के अधीन है। वहीं परमपिता हमें अपने इशारों पर नचाता है और हम बस उसके मनोरंजन के लिए नाचने वाली कठपुतलियां हैं।
अगर कुसुम की शादी मुझसे ही होनी होती, तो जिस दिन हम दोनों भागे, मेरा दिल इतनी जोर से नहीं कांप रहा होता।
चंद्रभान की गाड़ी मुझे काफी दूर से नजर आ गई थी, अगर कुसुम से ब्याह होना ही होता तो मैं कच्ची सड़क पर गाड़ी उतार कर शॉर्टकट से भी अपने शहर के लिए भाग सकता था।
अगर हम दोनों की शादी होनी ही होती तो चंद्रभान कभी हम दोनों को नहीं रोक सकते थे।
इन सारी बातों का सार यही है कि कुसुम का ब्याह आपसे ही होना था। वैसे हम दोनों को ही यह हक नहीं है कि हम एक लड़की से बिना पूछे यह तय करें कि हम में से कौन उसका पति हो सकता है?
इसलिए हमें यह सब कुछ किस्मत पर छोड़ देना चाहिए।
और इस सबके बावजूद मुझे यही लगता है कि कुसुम के लिए आपसे बेहतर मैं नहीं हूं। और कभी नहीं हो सकता।
कुसुम अगर शादी करके मेरे घर आ भी जाती तो शायद उतनी सुखी नहीं रह सकती थी, जितनी सुखी वह आपके साथ रह पाएगी। दूसरी बात आप तो कुसुम को मुझसे शादी के लिए छोड़ देंगे, लेकिन अगर मैं भी भावना को छोड़ दूंगा तो उसका क्या होगा…? “
” चिंता मत कीजिए डॉक्टर साहब! कुसुम कुमारी अब पूरी तरह से मेरी है। उसकी जिम्मेदारी अब उसकी आखरी सांस तक मेरे कंधों पर है।
मैं रहूं या ना रहूं उसके जीवन भर का इंतजाम करके ही जाऊंगा। कुसुम ने जब से आपके बारे में बताया था, मन में एक बेचैनी सी थी। किसी काम में मन नहीं लग रहा था। और इसीलिए सोचा एक बार आपसे मिलकर सारी बातें कर लूं। लेकिन आज आपसे मिलने के बाद मन से बहुत बड़ा बोझ हट गया है। अब मुझे अपनी जिंदगी का आगे का रास्ता कुछ दूर तक का तो साफ-साफ नजर आ ही रहा है।
कम से कम मुझे यह समझ में आ गया है कि मुझे कुसुम को कैसे मनाना है। कैसे समझाना है।
अब आप निश्चिंत रहिए, बहुत जल्द श्रीमती कुसुम यज्ञ सिंह परिहार आपसे मिलने आएगी..।”
” बस उस घड़ी का इंतजार रहेगा, हम दोनों की भूल चूक माफ कीजिएगा, ठाकुर साहब!”
मुस्कुरा कर यज्ञ अस्पताल से बाहर निकल गया था।
और उसी दिन से उसने तय कर लिया था कि अब कुसुम कुमारी को पूरी दुनिया में कोई उससे नहीं छीन सकता।
और वह बड़े मजे ले लेकर उसे छेड़ने लगा था।
आज अपने सामने एक धीर गंभीर डॉक्टरनी को देखकर उसे उस दिन के अस्पताल के धीर गंभीर से डॉक्टर साहब याद आ गए थे।
क्या सारे डॉक्टर इतने गंभीर होते हैं?
सोच कर मुस्कुराते हुए वह अपने काम पर निकल गया था..
***
राजेंद्र की आज छुट्टी थी। इसलिए वह घर पर ही मौजूद था। भावना ने उसे चाय नाश्ता दिया और कपड़े लेकर धोने बैठ गई।
बहुत दिनों से इस घर में टंगे पर्दे नहीं धुले थे। उसने सारे पर्दे निकाल लिए थे और उन्हें धोने बैठी थी..।
राजेंद्र बाहर वाले कमरे में बैठा चाय नाश्ता करते हुए मोबाइल पर अखबार की खबरें पढ़ रहा था कि तभी उसे लगा कमरे में आज उजाला थोड़ा ज्यादा है। और तब उसका ध्यान गया कि कमरे के पर्दे गायब है। वह भावना से पूछने के लिए उठकर अंदर के कमरे में गया, लेकिन हर कमरे से पर्दे गायब थे।
बाथरूम से कपड़े धोने की आवाज आ रही थी।
राजेंद्र ने धीरे से भावना को आवाज दी, और बाथरूम में झांक लगाने लगा। कपड़ों के ढेर के बीच बैठी हैरान परेशान सी भावना अपने दो दुबले पतले नाजुक हाथों से पर्दों को घिस कर धो रही थी।
उसकी हालत देख राजेंद्र को तरस आने लगा।
” यह क्या पसारा लेकर बैठ गई हो? धोबी घाट खोल लिया तुमने तो आज?”
राजेंद्र के सवाल पर भावना उसे देखने लगी.. ।
“तो क्या करते, हमें तो लगता है जिस दिन से यह पर्दे टंगे थे, उस दिन से कभी धुले ही नहीं।”
भावना की बात पर राजेंद्र को याद आया कि बात तो सही थी। जिस दिन से यह पर्दे टंगे थे, उस दिन से धुले ही नहीं। उसे ध्यान ही नहीं था कि पर्दे धुलने भी होते हैं।
” सॉरी भावना, लेकिन मेरा इस बात पर ध्यान ही नहीं गया। “
“हम जानते हैं आपका ध्यान नहीं गया। लेकिन हमारा तो ध्यान जाता है ना। इसलिए निकाल लिए।”
” लेकिन सुनो, तुम इतने सारे पर्दे धो कैसे पाओगी ? हाथ नहीं दुखेंगे?”
” हाथ क्यों नहीं दुखेंगे? हाथ तो अभी दुखने लगे, लेकिन धोना तो पड़ेगा ना!”
” आओ मैं भी तुम्हारी मदद कर देता हूं।”
” अरे नहीं नहीं, डॉक्टर साहब आप सारा दिन तो अस्पताल में काम ही करते हैं। एक दिन तो छुट्टी का मिला है। आप जाइए आराम कीजिए।”
” सुनो तुम टिपिकल हाउसवाइफ मत बनो कि पति काम पर जा रहा है, तो पत्नी घर के हर काम खुद कर ले। लाओ मैं तुम्हारी मदद कर देता हूं ।”
भावना समझ गई राजेंद्र से बहस करना कठिन है।
वह चुपचाप एक तरफ हो गई और राजेंद्र भी वहीं चला आया।
ढेर सारे झाग के बीच दोनों एक साथ कपड़े धोने लगे।
राजेंद्र जितना पर्दों को कूट रहा था, उससे ज्यादा झाग उड़ा उड़ा कर खेल रहा था। उसका यह बचपना देख भावना को हंसी भी आ रही थी, और वह अपनी हंसी रोकने की कोशिश भी कर रही थी।
झाग उड़ कर पूरे बाथरुम में हर तरफ फैला हुआ था। कुछ झाग भावना के बालों पर लगा था तो कुछ राजेंद्र के। राजेंद्र का पूरा चेहरा झाग से तर-बतर हो गया था। तभी राजेंद्र ने थोड़ी सी झाग उठाई और उसे फूंक कर भावना की तरफ देखने लगा।
भावना ने उसे देखा और फिर उसे एक मिनट रुकने के लिए कहा।
“रुकिए हम अभी आये !” भावना ने कहा और राजेंद्र आश्चर्य से उसे देखने लगा। भावना उठकर धीरे से बाथरूम के बाहर गई और राजेंद्र का मोबाइल उठा ले आई।
उसने राजेंद्र को अपनी तरफ देखने को कहा और तुरंत उसकी तस्वीर खींच ली।
राजेंद्र कुछ बोल पाता उसके पहले ही हंसती खिलखिलाती भावना ने फोन की स्क्रीन राजेंद्र की तरफ घुमा दी…।
राजेंद्र के बालों पर सफेद झाग ऐसी लग रही थी जैसे राजेंद्र के बाल सफेद हो गए।
तस्वीर दिखाकर भावना को हंसी आने लगी और उसे हंसते देखकर राजेंद्र “अभी सबक सिखाता हूं” कहकर उसे बाथरूम में खींच लिया और खूब सारी झाग उसके बालों पर रखकर उसकी तस्वीर उतार दी।
दोनों के इस हंसी मजाक में ढेर सारी प्यारी प्यारी रंगीन झाग भरी यादें राजेंद्र के मोबाइल पर कैद हो गई..
क्रमशः
aparna…

जाग समाज आ गया dr साहिबा 🙈🙈🙈 बड़े प्यार से समझती हो आप 🤣🤣🤣🤭🤭🤭🙈🙈🥰😘
ohh तो ये राज है यज्ञ बाबू पहले दिन तो भुनभुना गए थे फिर बाद में कैसे गाने गा कर छेद दिया करते थे , सारी समझदारी डॉक्टर साहब की थी ,आज तो बच गए अखंड बाबू , रेशम से मिलने से पर एक दिन तो आमना सामना होना ही है , तब क्या करेंगे । 😊🤨और भावना और राजी का जाग वाला गेम खेलना पसंद आया 🤭🤭🤭♥️♥️ कॉफी का न सही , पाउडर का ही सही 🤭🤭🤭🤭🙈🙈🙈