अपराजिता -97
“रिपोर्टर नेहा.. ?”
अनिर्वान ने खुद के सीने पर ऊँगली रख ना का इशारा किया और ऊँगली ऊपर छत की तरफ घुमा दी..
वो लड़के वहीँ से नेहा का नाम पुकार उठे…
और नेहा सीढ़ियों पर प्रकट हो गयी..
“क्या हुआ किसी ने याद किया मुझे ?” उसकी आवाज़ सुनते ही अनिर्वान ने अपने माथे पर हाथ मारा और अपना अख़बार समेट कर अंदर चला गया..
अंदर जाकर उसने दरवाज़ा बंद कर लिया..
नेहा को सीढ़ियों पर खड़ा देख वो लड़के चिल्ला उठे..
“साली कमी#$ तू खुद को समझती क्या है… ?
तू दाऊ साहब के परिवार वालो पर हाथ डालेगी, उनका विडिओ बनायेगी.. ? अभी तुझे मजा चखाते हैं !”
“एक मिनट… ! वहीँ खड़े रहो सब…!
ये पुलिस विभाग की कॉलोनी है.. और जिसके घर के आंगन में खड़े होकर तुम लोग मुझे गालियां दे रहे हो ना, उसका नाम अनिर्वान भारद्वाज है और पुलिस विभाग में प्यार से जल्लाद के नाम से जाना जाता है.. !”
” हमसे बड़ा जल्लाद कोई नहीं होगा समझी, ज्यादा होशियारी मत दिखा! शांति से नीचे आ और चल दाऊ साहब और उनके साले साहब से माफ़ी मांग ले.. ! वरना तेरा वो हाल होगा जो तूने सोचा भी नहीं होगा !”
उनमे से एक गुंडा चीखा..
“ऑब्वियस्ली…!
कोई भी अपने बुरे हाल के सपने थोड़े न देखता है…. ज़ाहिर है, तुम्हारे दाऊ साहब भी मेरा मर्डर करने का ही प्लान बना रहे होंगे !” नेहा ने भी जांबाजी से कहा..
“मर्डर तो बाद में होगा तेरा, उसके पहले तेरी बोटी नोचेंगे उनके कुत्ते !”
“बड़ा जिगर है तुम में.. खुद को कुत्ता बोल कर भी तन कर खड़े हो..!”
“साली जबान कतरनी की तरह चलती है तेरी.. !”
“मेरी कलम भी चलती है कुत्तों… अभी तुम सब पर लिखूंगी न, तुम लोगो का जीना खाना मुहाल हो जायेगा.. !”
“तू ऐसे नहीं मानने वाली !”
उनमे से एक नेहा को पकड़ने उसकी तरफ भागा, और जैसे ही वो नेहा जिस सीढ़ी पर खड़ी थी, उसके ठीक नीचे वाली सीढ़ी में पहुंचा, अपने हाथ में पीछे छिपा रखी क्रिकेट बैट से नेहा ने उसके चेहरे पर एक तेज़ बैट मारा, वो लड़खड़ा कर सीढ़ियों से नीचे गिर गया..
उसका लहूलुहान चेहरा देख दूसरा गुंडा नेहा की तरफ भागा, और इस बार नेहा ने अपनी जींस में लगा रखी बेल्ट खोल कर उसके चेहरे पर निशाना साध कर जोर की बेल्ट मारी… उसके चेहरे से खून बलबला कर निकलने लगा..।
अबकी बार दो गुंडे एक साथ नेहा की तरफ बढे और नेहा एक छलांग लगा कर किनारे की रेलिंग से नीचे कूद गयी..
उन दोनों ही गुंडों पर उसने पीछे से ताबड़तोड़ बैट से वार करना शुरू कर दिया..
चारों के चारों धराशायी से उधर उधर पड़े थे..
नेहा ने बैट एक तरफ फेंका और ऊपर जाने को थी कि वो चारों लड़खड़ाते हुए उठ गए..।
वो चारों एक साथ नेहा की तरफ बढ़ रहे थे कि नेहा पलट गयी..
उसने घूर कर एक बार चारों को देखा और चारों पल भर को थम कर खड़े हुए और फिर चिल्लाते हुए नेहा पर टूट पड़ने को आगे बढ़ गए..
नेहा इधर उधर देखती अपना बैट ढूंढने लगी.. कि तभी उसके सामने हवा में उसकी बैट चली आई..
अनिर्वान अपनी यूनिफार्म में तैयार होकर उसके ठीक बगल में खड़ा उसे उसका बैट पकड़ा रहा था..।
अपना बैट उसके हाथ से लेकर वो वापस उन राक्षसों पर टूट पड़ी…..
वो चारों गिरते पड़ते भागे…।
उनके भागने के बाद नेहा पलटी और एक नजर अनिर्वान को देखने के बाद ऊपर जाने लगी कि अनिर्वान ने उसे आवाज़ लगा दी..
“एक कप चाय पिओगी ?”
जाते जाते नेहा के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गए.. उसने भौंह चढ़ा कर पीछे पलट कर पूछ लिया..
“आप मुझसे पूछ रहे हैं ?”
“हम्म… यहाँ तो और कोई है भी नहीं ?”
“ठीक है पी लूँगी..मैं वैसे भी फ्री के खाने पीने को मना नहीं करती!”
अनिर्वान हल्का सा मुस्कुरा कर अंदर चला गया…
उसके पीछे नेहा भी अंदर चली आई..
“इन गुंडे मवालियों से डर नहीं लगता तुम्हे ?” अनिर्वान ने पूछा..
” नहीं.. बिलकुल नहीं.. ये कोई पेशेवर गुंडे तो होते नहीं.. न इनकी फॉर्मल मार्शल आर्ट्स की कोई ट्रेनिंग होती है..। यह सब लुच्चे ही तो होते हैं। इनसे क्या डरना?
वैसे भी मुझे यह लगता है कि यह बड़े-बड़े नेता गुंडे यह लोग इस तरह के टुच्चे गुर्गो को रखकर सिर्फ अपने पैसे बर्बाद करते हैं।
इन लोगों को खिलाना पिलाना, इनकी सैलरी देना, इन्हें महंगी गन देना, बुलेट देना, सिर्फ अपने स्वयं के वित्तीय भार को बढ़ाना ही है।
इससे तो ज्यादा सही रहे कि वह नेता मंत्री खुद मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले ले..।”
“हम्म बात तो सही है.. !”
” वैसे एक बात बताइए भारद्वाज जी, आपने मुझे चाय पर क्यों बुलाया? सुना है, पुलिस वालों की चाय बड़ी महंगी होती है..!”
” आपसे कुछ दो बातें करने का मन हो रहा था!”
एक भौंह चढ़ाये नेहा ध्यान से अनिर्वान को देखने लगी।
” सच में? आपका मुझसे बात करने का मन कर रहा था..?”
“हम्म.. आइये न !”
अनिर्वान दो कप में चाय लेकर नेहा को साथ लिए बाहर बैठक में चला आया।
बैठक में नेहा जिस कुर्सी पर बैठी, उसके ठीक सामने चाय रखते हुए अनिर्वान ने अखबार का वह पन्ना भी खोलकर तह करके रख दिया।
चाय उठाते हुए नेहा की नजर उस खबर पर पड़ गई। और उसे पढ़ते ही नेहा सब समझ गई।
नेहा ने अनिर्वान की तरफ देखा,
” तो यह कारण था, मुझे चाय पर बुलाने का? मैं तो कुछ और ही सोच बैठी थी।”
” क्या सोच बैठी थी आप?”
“वह क्या कहते हैं, वह गाना है ना?”
” कौन सा?”
” शायद मुझसे शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिए पुलिस वाले ने मुझे, देखो चाय पर बुलाया है..।”
“उफ़ तुम फिर शुरू हो गयी.. ये सब कर के क्या मिलता है.. ?”
“मजा आता है, तुम्हे सॉरी, आपको छेड़ने में भारद्वाज जी..।”
“ओके फाइन.. अब बताओ.. ।”
“क्या बताऊँ.. ?”
“यही.. जो यहाँ लिखा है ये सब.. !”
“ओके.. फिर मै शुरू से बताती हूँ…।
मैंने पत्रकारिता में पढ़ाई की है, और मैं इसी क्षेत्र में आगे पढ़ना चाहती थी। मेरे पापा के एक दोस्त है उनकी बहन का अखबार था, जहां उन्होंने मुझे भेजा…।
मैंने वही काम सीखना शुरू कर दिया।
आप तो जानते ही होंगे, छोटे-छोटे पत्रकारों को बहुत ज्यादा काम नहीं दिया जाता। हमारा काम होता है बस रोड पर इधर से उधर घूम कर खबरें इकट्टा करना, और एडिटर तक पहुंचाना।
हमारे ऊपर बैठे जो लेखक पत्रकार होते हैं ना, वह खबरें तैयार करते हैं। उनके अलग-अलग कॉलम होते हैं, जिस पर वह अपनी एक्सक्लूसिव खबर छापते हैं।
पर क्या आप जानते हैं, सच्चाई क्या होती है? मेरे जैसे छोटे पत्रकार खबर ढूंढते भी हैं, उसे लिखते भी हैं। और कच्चा ड्राफ्ट तैयार करके अपने ऊपर बैठे पत्रकारों की तरफ पहुंचा देते हैं।
वह लोग हमारे उस ड्राफ्ट में एकाध लाइन को ऊपर नीचे करके एडिट करते हैं, और एडिटर कहला जाते हैं। इसके बाद उनके नाम से वह खबर अखबार का हिस्सा बन जाती है..।
मतलब मेहनत तो हमारी होती है लेकिन मिठाई कोई और खाता है।
खैर यह हर जगह होता है। जूनियर्स के सर पर पैर रखकर ही सीनियर ऊपर की सीढ़ियां चढ़ता है। और हम इसमें कुछ कर भी नहीं सकते। मुझे ऐसा लगता था मैं काफी अच्छा लिखती हूं। लेकिन मेरे लिखे हर लेख को बस लाइंस को ऊपर नीचे करके मेरे एडिटर सर अपने नाम से छापते जा रहे थे। फिर भी मैंने सोचा कुछ दिन की बात है, इंटर्नशिप पूरी हो जाएगी फिर इस बात के लिए बोलूंगी।
और शायद मेरी सुनवाई भी हो जाए।
एक दिन शाम के समय मैंने अपना ड्राफ्ट देने के लिए अपने एडिटर के केबिन को नॉक किया, उन्होंने मुझे अंदर बुला लिया। और मुझसे उलजलूल बातें करने लगे। कहने लगे, तुम्हे 6 महीने हो चुके हैं फिर भी तुम वही की वही हो, तुम चाहो तो मैं तुम्हें आगे बढ़ा सकता हूं।
मैंने कहा मैं ऐसा कुछ नहीं चाहती कि मैं आपकी मदद से आगे बढूं, जब मेरा वक्त आएगा मैं बढ़ जाऊंगी। उन्होंने ऊपर से नीचे तक मुझे घूरा और फिर मेरे कपड़ों पर कमेंट करने लगे। उन्होंने मुझसे कहा कि नेहा सोच समझ के कपड़े पहना करो, तुम जींस और टॉप पहन कर इतनी बेबाकी से घूमती हो तुम्हे डर नहीं लगता। रात के वक्त तुम यहां से अपने घर तक जाओगी।
मैंने कहा मुझे डर नहीं लगता सर, मैं अपनी सुरक्षा का सामान साथ लिए चलती हूं। ये सुन कर वो हंसने लगा, उसने मुझसे कहा तुम खुद अपने आप में ही बवाल हो। थोड़ा संभल के कपड़े पहना करो, कहीं तुम्हारा रेप हो गया तो रोती धोती कैंडल मार्च करती नजर आओगी।
सच कह रही हूं भारद्वाज जी, उस वक्त दिमाग तो इतना खराब हुआ कि लगा टेबल पर रखे पेपर वेट को उठाकर इसके सर पर दे मारूं, लेकिन मैं चुप हो गई।
मैंने उनकी तरफ देखकर कहा कि इसका मतलब अगर मैं कुछ अलग कपड़े पहनूंगी तो लड़के रेप नहीं करेंगे ?
तो उन्होंने जवाब दिया तुम इतनी खूबसूरत हो कि इस वक्त तो मेरा ही मन कर रहा है कि मैं ही कुछ कर जाऊं। फिर मना मत करना, सोच लो।
मैंने उनकी तरफ देखा और कहा सोच लिया सर अब तो आप ही आप हर जगह छा जाएंगे।
उसे वक्त मेरी बात का अर्थ नहीं समझ पाया । मैं पलटी और उसके कमरे से बाहर निकल गई। वह बेवकूफ एडिटर यह भूल गया था कि मैं रोड पर घूम कर, खबरें तलाश करने वाली पत्रकार हूं। उसकी तरह एयर कंडीशन कमरे में लग्जरी सोफा के ऊपर बैठकर अपनी मैकबुक पर खबरें नहीं बनाती मैं।
वह जो सब बोल रहा था, वह मेरी पेन के वीडियो रिकॉर्डर में रिकॉर्ड हो गया था..।
मै बाहर गयी और अख़बार के ऑनलाइन सेक्शन में इस वीडियो को अपलोड कर दिया..
इसके बाद मैं अपने घर के लिए निकल गई। कुछ देर में ही मेरे साथी पत्रकारों के कॉल आने लगे, सब मुझे कहने लगे कि यह क्या खबर तूने अखबार के ऑनलाइन कॉलम में डाल दी है।
उसे तुझे हटाना पड़ेगा, लेकिन जब तक मैं इन बातों को समझ पाती, यह खबर हल्ला मचा चुकी थी। ऑनलाइन क्षेत्र की खबरों में ये खबर सिर्फ दो घंटे में एक लाख व्यूज पर कर चुकी थी। और यह खबर उतनी ही तेजी से वायरल हो रही थी।
कुछ देर बाद ही मेरे पापा के उन परिचित का भी फोन आ गया जिनका यह अखबार था। और उन्होंने मुझसे कहा कि मैंने कैसे बिना सोचे समझे, बिना उनसे पूछे, इस खबर को यहां डाल दिया।
मैंने उनसे सारी बातें सच-सच कह सुनाई। उन्होंने कहा यह सारी बातें तो मैं खुद वीडियो में देख चुकी हूं। इसलिए यह सच्चाई तुम्हें मुझे बताने की जरूरत नहीं। इससे बड़ी सच्चाई यह है कि वह आदमी एमएलए का साला है। और अब उसकी इस खबर को हटाना बहुत ज़रूरी है..।
मैंने उस खबर को हटाने से मना कर दिया। तुरंत ही मुझे उन्होंने ऑफिस में वापस बुला लिया। अब वह मेरी बॉस थी, इसलिए उनकी आज्ञा मानना मेरे लिए भी जरूरी था।
लेकिन मैं भी तो मेरे मन की मालिक हूं, मैंने आधी रात के वक्त ऑफिस जाने से मना कर दिया, और फोन को स्विच ऑफ करके सो गई। अगली सुबह जब मैं उठी और फोन ऑन किया तो उसमें ढेर सारे मिस्ड कॉल अलर्ट आने लगे।
खैर मैं तैयार होकर ऑफिस पहुंची। ऑफिस पहुंचते ही मुझे समझ में आ गया था कि ऑफिस में आज मेरा आखिरी दिन है ।
कुछ लोग मुझसे नाराज नजर आ रहे थे। लेकिन वह सिर्फ गिनती के दो चार थे। बाकी तो ज्यादातर लोग खासकर लड़कियां मुझे खुश ही नजर आ रही थी। सब धीमी सी मुस्कान देकर मेरा उत्साह बढ़ा रही थी। उनमें से कुछ दोस्त मेरे समर्थन में आगे भी आ गए, लेकिन मैं जानती थी कि बॉस के सामने खड़े होने की इनमें से किसी की हिम्मत नहीं।
लेकिन मैं किसी से क्यों डरती, जब मैंने कोई गलती की ही नहीं थी ।
मैं बेधड़क अपनी बॉस योगिता बब्बर जी के केबिन में दाखिल हो गई…
योगिता जी मुझे देखते ही मुझ पर बरस पड़ी..
” क्या बेवकूफी है यह, तुम्हें अक्ल है या नहीं? ऐसे कैसे तुमने उन एडिटर के खिलाफ यह वीडियो पोस्ट कर दिया? तुम जानती भी हो कि वह कौन है..?”
” जानती हूं, मैम कल ही आपने मुझे बताया था कि वह एमएलए के साले हैं..।”
“और कल मैंने तुम्हें रात में ऑफिस में भी बुलाया था।”
” हां मैम आपने बुलाया था, लेकिन उस वक्त मुझे ऑफिस आना सही नहीं लगा। और फिर मेरी ड्यूटी आर्स भी खत्म हो चुके थे।”
” अच्छा तुम्हे अपने अधिकारों और अपने कर्तव्यों का बहुत ज्ञान है।”
” बिल्कुल है, मैंने आपके भी लिखे हुए कई लेख पढे हैं। बहुत ज्वलंत और क्रन्तिकारी विचारों को लिखती हैं आप…
आपके अनुसार तो लड़कियों को कभी चुप नहीं बैठना चाहिए। अपने कर्तव्य और अधिकारों के लिए जागरूक होना चाहिए। उन्हें लड़ना चाहिए ।
तो आज जब मौका आया है, तब आपने एक लड़की का साथ देने की जगह एक एमएलए का साथ देना क्यों चुना?
” तुम मुझसे जबान लड़ा रही हो? तुम जानती हो ना मैं क्या कर सकती हूं?”
” मैं तो जानती हूं कि आप क्या कर सकती हैं। लेकिन आप तो देख चुकी हैं कि मैं क्या कर सकती हूं।
सोच लीजिए, मैं कल इसी तरह से उन एडिटर साहब से भी मिलने गई थी,
जब उन्होने मुझसे बात की थी, उन्हें पता भी नहीं था कि मेरा पेन उनका वीडियो बना रहा है।”
” तुम साफ-साफ मुझे धमका रही हो?”
” नहीं मैम, आप बड़ी है। मुझसे बहुत बड़ी। मैं आपको कैसे धमका सकती हूं।
“देखो नेहा एक औरत की हैसियत से तुमसे कह रही हूं, औरत होना इतना आसान नहीं होता। उस वीडियो को डिलीट करो, और इसके साथ ही एक अपॉलिजी भी डाल दो।
बस तुम्हें इतना ही करना और कुछ नहीं।”
” और अगर मैं ऐसा ना करूं?”
” तो तुम दाऊ साहब को नहीं जानती। दाऊ साहब उन एडिटर के जीजा लगते हैं।और वह एमएलए हैं। अगर उनके गुंडे तुम्हारे पीछे पड़ गए ना तो तुम पाताल में भी छिप जाओगी ना, तो तुम्हें वहां से भी ढूंढ लेंगे ।”
“ऐसा कुछ नहीं कर पाएंगे, मैम, क्योंकि इस खबर के साथ ही मैंने अपनी फेसबुक लिंक अटैच कर रखी है। और उसमें भी मैंने यह सारी बातें डाल दी हैं कि मेरी जान को खतरा है। तो अगर मुझे कुछ भी होता है, तो उसकी सारी जिम्मेदारी इन एडिटर साहब और उनके दाऊ साहब दोनों के ऊपर जाती है। आप चाहेंगी तो आपका नाम भी ऐड कर देती हूं मैं।”
” नेहा तुम सच में पागल हो गई हो। अगर तुमने वह वीडियो नहीं हटाया तो मुझे मजबूरन तुम्हें सस्पेंड करना पड़ेगा।”
” मैडम मैं अभी इंटर्नशिप कर रही हूं, और इंटर्नशिप में आप मुझे सस्पेंड या टर्मिनेट नहीं कर सकती।
यह मेरी पढ़ाई का हिस्सा है मेरी नौकरी का नही.. ।”
“लेकिन मैं तुम्हें ट्रांसफर जरूर कर सकती हूं। “
“बेशक कर सकती हैं। वह आपके हाथ में है ।आप कर दीजिए।
वैसे भी आप नारीवादी महिला के तौर पर जानी जाती हैं ,जो महिलाओं की मुक्ति के लिए, महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाती है।
जाहिर है मुझे यहां से स्वतंत्र करके आप मेरी मुक्ति की दिशा में, और अपने फेक फेमिनिज्म की दिशा में एक और नया कदम उठाएंगी। “
“तुम हद से ज्यादा बोलती हो नेहा। यह है तुम्हारा ट्रांसफर लेटर। यहां से बहुत दूर एक छोटा सा गांव है, दुर्गागंज, वहां पर तुम्हें फेंक रही हूं।
अगले 6 महीने गांव की सैर करके आओ, तुम्हारा दिमाग भी खुल जाएगा और आंखें भी..।”
“दिमाग और आंखें तो आप जैसी औरत को देखकर ही खुल गई है मैम, थैंक यू फॉर दिस लेटर..।”
और बस मैंने अपना बैग उठाया और यहां चली आई…
” हम्म… अच्छा किया.. ! पर एक बात बताओ तुम्हें डर नहीं लगता तुम सीधे ऐसे पंगे ले लेती हो..!”
” डर क्यों नहीं लगेगा भारद्वाज सर। मैं भी एक कोमल हृदय लड़की ही हूं। डर मुझे भी लगता है, लेकिन मैं यह जानती हूं कि मुझे अपने डर को दुनिया को दिखाना नहीं है।
दुनिया नहीं जानती ना कि मैं डर रही हूं। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, यह दाऊ साहब के आदमी आकर मुझे मार डालेंगे।
बस इतना ही ना, और जब मर ही गई रहूंगी, तो फिर तो किसी बात की अनुभूति ही नहीं होगी।
और तब तो सारा डर भी मेरे साथ ही मर जाएगा ना..।
क्रमशः
भाग ज्यादा लम्बा हो गया और अब एडिट करने की हिम्मत नहीं है.. बस इतना ही एडिट कर पायी जो पोस्ट कर रही हूँ.. शेष भाग कल सुबह पोस्ट कर दूंगी..
पढ़िए और बताइये कैसा लगा ये भाग..
aparna…

Lajwab story ❤️
Super part mam 👌👌👌👌👌
नेहा की जन्म कुंडली बताई अच्छा लगा अब पता चला ये बवाल कहा से आई है और अब तो भारद्वाज सर की छात्रा छाया मिली है बेट तो क्या घुसे लाते भी बरसानी है गुंडे मवालियो पर , एडिटर की तो धज्जियां उड़ गई होंगी , इस खबर के चर्चे पर , ओर दाऊ साहब भी , देखते है कोन है इनके दाऊ साहब , और माथे पर हाथ पटक कर अनिर्वाण जी चले गए तब तो लगा की ये साहब तो बदल गए!!
पर जब बेट हवा में उछाल कर नेहा के हाथ में आई तो सिटी बजाने का मन हो गया इस सीन पर तो आज की सिटी भारद्वाज जी के नाम 🌬️🌬️🌬️
शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है , इसी लिए चाय पी बुलाया है , वाह वाह , वाह वाह ! 🤣🤣😂😂😂👏👏👏👏👏👏