अपराजिता -91

अपराजिता -91

गांव में ये ऱोज़ का हाल था, इसलिए भावना आले में से मोमबत्ती निकाल कर जलाने लगी..

मोमबत्ती जला कर वो पलटी ही थी कि सामने खड़े दीपक को देख उसकी चीख निकल गयी..।

दीपक ने आगे बढ़ कर उसका मुहं ढक लिया..
भावना के हाथ से जलती मोमबत्ती नीचे गिर गयी….

बाहर चाँद अपनी पूरी रौशनी में चमक रहा था, उसकी रौशनी कमरे में भी छिटकी पड़ी थी..
भावना अपने सामने खड़े दीपक को देख घबरा गयी..

“कौन हो तुम.. क्या चाहिए? चोरी करने आये हो.. ? लेकिन मेरे पास कुछ नहीं.. क्या ले जाओगे ?”

“अरे अरे एक-एक करके सवाल करो, तब तो जवाब देते बनेगा..
वैसे हम कौन हैं इससे तुम्हें फर्क नहीं पड़ता! शायद तुमने कभी हम पर ध्यान ही नहीं दिया और देखो हमारा तुमसे कभी ध्यान ही नहीं हटा…
जहां पर भी तुम दिखी वहां बस तुम्हें ही देखते रहे..।”

दीपक ने अपना हाथ भावना की तरफ बढ़ाया और उसकी कलाई को पकड़ने की कोशिश की लेकिन भावना ने उसकी कलाई झटक दी। और जरा पीछे की तरफ बढ़ गई। दीपक मुस्कुराता हुआ उसके पीछे बढ़ने लगा..

“हम सच में नहीं जानते तुम कौन हो, तुम यहां से चले जाओ..।”

“जाने के लिए थोड़ी ना आए हैं जानेमन! हम तो किसी और काम से आए हैं, और उस काम को पूरा करके ही जाएंगे। अगर तुम चाहो तो तुम हमारे साथ हमारे घर पर भी रह सकती हो, बीवी की तरह रखेंगे..।

उसने वापस अपना हाथ भावना की तरफ बढ़ाया और भावना ने जोर से उसका हाथ झटक दिया।

“हम कह रहे हैं, जाओ यहां से वरना हम शोर मचा देंगे। ऊपर वाले कमरे में चाचा जी हैं, और साथ वाले कमरे में हमारे पति हैं, दोनों आ जाएंगे..।”

“तुम्हारे पति डॉक्टर बाबू हैं जो सुबह अस्पताल जाने के बाद से अब तक वापस नहीं लौटे। और उनके लौटने की उम्मीद भी नहीं है। तुम्हारे पति वही डॉक्टर बाबू है जो कुछ दिन पहले कुसुम कुमारी के साथ भागने वाले थे..। अब उनके साथ तुम्हारा क्या और कैसे संबंध होंगे यह तो हम अच्छे से जानते हैं।
और रही बात तुम्हारे चाचा जी की, तो उन्हें हरिद्वार की ट्रेन चढ़ते भी हम देख चुके हैं। हम अच्छे से जानते हैं भावना रानी, इस पूरे घर में तुम अकेली ही हो। और  आधी रात के वक्त दरवाजा खुला छोड़ कर तुम हमारा ही इंतजार कर रही थी।
हम जानते हैं तुम्हारा ब्याह डॉक्टर साहब से हुआ है, और हमें इस बात पर कोई एतराज भी नहीं।
हम तो बस सुहागरात मनाना चाहते हैं, वह तुम हमारे साथ मना लो…।”

भावना अब तक समझ चुकी थी कि दीपक इस घर में क्यों घुसा था। वह धीरे-धीरे पीछे सरकती हुई रसोई के उस आले तक पहुंच गई थी जिसमें एक तरफ चाकू छुरियां और दूसरी तरफ मसाले का डिब्बा था।

   उसने दोनों हाथ पीछे कर रखे थे। धीरे से उसने मसाले के डिब्बे में हाथ फिराया और लाल मिर्च के डिब्बे को अपना हाथ पीछे किए हुए ही खोल दिया।
सामने खड़ा दीपक अपनी बातों में मग्न था। रसोई में चांदनी का उजाला ही था, इसलिए भी शायद दीपक का ध्यान भावना के हाथों पर नहीं जा पाया था। वह नहीं जानता था कि उसे अपनी बातों में उलझा कर भावना उसके लिए क्या इंतजाम कर रही है।
भावना ने दीपक की आंखों की तरफ देखा, और अपने हाथ में पकड़ रखे डिब्बे को सामने लाकर दीपक की आंखों में पूरे जोश से फेंक के मारा।
लाल मिर्च की तीखी कड़वाहट आंखों में जाते ही दीपक अपने दोनों हाथों से चेहरा थामे चिल्लाते हुए नीचे की तरफ झुकने लगा..।

“यह क्या कर दिया साली, उफ़ इतनी जलन हो रही है….।”

वह आंखें मिचते हुए नीचे की तरह झुक कर दूसरे हाथ से पानी ढूंढने की कोशिश कर रहा था। भावना ने मिर्च के डिब्बे से उसके सिर पर ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया। हालांकि डिब्बा छोटा था, लेकिन भावना इतनी ताकत लगा कर उससे वार कर रही थी कि दीपक को सर पर चोट लग गयी..
     और झुंझलाया हुआ दीपक गुस्से में बंद आंखों के बावजूद हाथ से टटोलकर भावना की तरफ हाथ बढ़ा बैठा। उसने उस डिब्बे को खींचकर भावना के हाथ से छीन लिया, लेकिन अब भी वह आंखें खोल पाने में असमर्थ हो रहा था…।

लेकिन इतनी देर में दीपक को भी समझ में आ गया था कि भोली सी दिखने वाली भावना इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। वो कोमल जरूर थी लेकिन कमजोर नहीं थी।
    एक झटके में वह उठा।

   जिस वक्त वह उस रसोई में दाखिल हुआ था, उसका ध्यान सिंक की तरफ गया था। इसलिए अंदाज़ से उसने टटोलकर सिंक को पकड़ा और उसके पानी की धार को खोल दिया। आंखों में तेजी से पानी डालता हुआ वह भावना को भद्दी और बेहूदी गालियां भी देता जा रहा था..।

पिछले 5 मिनट से भावना ने गैस जला दी थी। इस बात का भी इल्म दीपक को नहीं था।

आंखों में ढेर सारा पानी डालने के बाद वह जैसे ही भावना की तरफ पलटा, भावना ने पीछे रखा गरम भगोना जिसमें दूध खौलने लगा था, उठाकर पूरा का पूरा दीपक के चेहरे पर दे मारा।

   दीपक कलबला कर रह गया। उसे आज तक यह एहसास नहीं हुआ था कि दूध की जलन क्या होती है?

दूध की मलाई उसकी त्वचा में जहां पर भी चिपकी वह कसमसा कर रह गया। एक भद्दी सी गाली भावना को देकर उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाए वो आगे बढ़ने लगा। उसने हाथ इस तरह रखा था कि वह सीधा भावना की गर्दन पकड़ेगा।
   अबकी बार जैसे ही उसका हाथ सामने आया, भावना ने पीछे कर रखा अपना हाथ सामने किया और चाकू से उसकी हथेली पर जोर से काट दिया।
एक बार फिर तिलमिलकर दीपक ने अपने उस हाथ को दूसरे हाथ से पकड़ा और पीड़ा से कलपता हुआ जमीन पर झुक गया।

   उसके हाथ से बलबला कर खून बहने लगा था।
एक तरफ आंखों में मिर्च की जलन, दूसरी तरफ पूरे चेहरे पर दूध की जलन के साथ ही हाथ में काटने के कारण घाव की तकलीफ शुरू हो गई थी। वह लगातार भावना को गालियां देता जा रहा था।

लेकिन अपनी पीड़ा में इस कदर खो गया था कि उसका ध्यान ही नहीं गया कि अब भावना उसके ऊपर सिलबट्टे के पत्थर से वार करने वाली है।

   वही स्लैब पर सिलबट्टा पड़ा था। उसके बट्टे को भावना ने दोनों हाथों से उठाया। कम से कम 4 किलो का पत्थर का टुकड़ा था वह, और भावना उस पत्थर को उठाकर तेजी से चिल्लाते हुए दीपक के सिर पर वार करने वाली थी कि, किन्हीं दो मजबूत हाथों ने जाकर उसके हाथ से उसे पत्थर को थाम लिया…

भावना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। रोते-रोते उसने उस तरफ देखा, जिसने उसे रोकने की कोशिश की थी।
सामने राजेंद्र खड़ा था। राजेंद्र फटी फटी आंखों से भावना को देख रहा था। जैसे भावना के अंदर स्वयं रण चंडी उतर आए थी.. ।

जिस वक्त राजेंद्र ने भावना को देखा था, उस वक्त भावना ने अपने दोनों हाथों में उस पत्थर को मजबूती से ऊंचा उठा रखा था और चिल्लाते हुए वह नीचे जमीन पर घुटनों के बल बैठे दीपक पर वार करने जा रही थी।

   राजेंद्र को लगा जैसे साक्षात महिषासुर मर्दिनी महिषासुर का मर्दन करने जा रही है।

     बहुत धीरे से बड़े आराम से उसने भावना के हाथ से  वह पत्थर लिया, एक किनारे रखा और भावना को अपने सीने से लगा लिया…।

वो धीरे धीरे उसके बालों को सहलाता उसे सामान्य करने की कोशिश करने लगा..।
उसका पूरा ध्यान भावना पर ही था…..
उसने सोचा भी नहीं था कि अकेले में भावना के साथ कोई दानव ऐसा भी कर सकता है..।
वो तो यही सोच रहा था कि चाचाजी उसके साथ हैं..।

वो तो अच्छा ही हुआ कि उसका फ़ोन का चार्जर यहीं भावना के घर पर छूट गया था…।.

दिन भर व्यस्तता के कारण उसका ध्यान गया नहीं और शाम को जब चाय पीते बैठा तब फ़ोन देखा तो मुश्किल से दो प्रतिशत बैटरी बची थी..।
फ़ोन पर भले ही वो कुछ ज्यादा वक्त नहीं गुज़ारता था लेकिन आज के समय को देखते हुए फोन उसकी भी जरूरत तो था ही।

अस्पताल के सारे लोगों से कांटेक्ट करने का जरिया यही फोन था  और फिर अगर भावना को उससे बात करनी हो तब भी भावना के पास सिर्फ इसी मोबाइल का नंबर था। वह फटाफट सारे घर में चार्जर ढूंढने लगा। लेकिन उसे याद आया कि सुबह तो वह भावना के घर से सीधा अस्पताल गया था। अपने साथ लेकर लौटे लैपटॉप बैग में उसने छान लिया। लेकिन चार्जर वहां भी नहीं मिला।
तभी उसे याद आया कि पिछली रात सोने के समय उसने अपने पलंग के किनारे लगे सॉकेट में अपना चार्जर डाला था। जिससे वह फोन चार्ज कर रहा था। सुबह निकलते समय हड़बड़ी में उसने चार्जर वहीं वैसे का वैसा छोड़ दिया था। अब अगर इस वक्त भावना के घर पहुंच कर वह फोन चार्ज नहीं करता, तो मुश्किल से आधे घंटे में ही उसका फोन बंद हो जाना था। इसलिए फोन को जेब में डालें, वह घर से निकल गया।
घर पर एक बार फिर उसने ताला लटका दिया। वह गेट तक पहुंचा ही था कि उसकी फ्लैट के नीचे रहने वाली आंटी ने उसे आवाज लगा दी।

” क्या हुआ राजी? वापस भावना के घर लौट रहे हो?”

उसने पलट कर हां कह दिया

“तो अब लौटते समय उसे भी साथ ले आना। उसे अकेला मत छोड़ना।”

  राजेंद्र ने हामी भर दी। और अपनी बाइक लिए दूर्वागंज के लिए निकल गया। हालांकि मन ही मन यह भी सोचता जा रहा था कि इन आंटी को कैसे हर बात की खबर लग जाती है। फिर उसे ध्यान आया की भावना की मां को भर्ती करवाते समय और अस्पताल में उनकी देखरेख के समय वह जब घर आया करता था तब आंटी अक्सर भावना और उसके बारे में पूछताछ कर लिया करती थी। ऐसे ही जिस दिन भावना की मां नहीं रही थी, उस दिन वह तो भावना के साथ निकल गया था। लेकिन उसका एक दूसरा दोस्त उसके कुछ कपड़े लेने के लिए उसके रूम पर आया था, और तभी आंटी ने उसके और भावना के लिए पूछताछ करके खबर जान ली थी।

भावना को अपने सीने से लगाए राजेंद्र अपने ख्यालों में गुम था कि तभी दीपक चोरी छिपे उठा और उसी पत्थर को उठाकर उसने राजेंद्र पर वार करने की कोशिश की।

लेकिन राजेंद्र इतना भी बेखबर नहीं था। उसने अपने दूसरे हाथ से दीपक के गले को जोर से पकड़ लिया। दीपक पहले ही लुटा पिटा सा था, आंखों और चेहरे का हाल बेहाल था।
हथेली से खून बह रहा था, और ऐसे में बड़ी मुश्किल से उसने उस पत्थर को उठाकर राजेंद्र पर का निशान लगाया था। जैसे ही राजेंद्र ने उसकी गर्दन को अपनी मजबूत हथेलियां में दबाना शुरू किया, वह बिलबिलाकर रह गया। उसके हाथ से वह पत्थर छूटा और खुद उसी के पैरों पर गिरकर उसके ही पैरों को जख्मी कर गया।

    एक भद्दी सी गाली मुंह से निकाल कर वह राजेंद्र का हाथ पकड़े खुद को छोड़ने की बिनती सी करने लगा। राजेंद्र देखने में दुबला पतला जरूर था, लेकिन उसमें भी हिम्मत कम नहीं थी। एक बार पहले भी जब भावना पर चंद्रा भैया के गुंडो ने हमला किया था तब भी राजेंद्र अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन लोगों से भिड़ गया था। आज फिर वही दिन वापस आ गया था। दीपक अपना हाथ पैर संभाले वहां से निकालकर जाने को हुआ कि राजेंद्र ने भावना को एक तरफ कर दीपक को पीछे से पकड़ लिया।

उसकी कॉलर पर अपना हाथ डाल राजेंद्र ने उसे दो-तीन घूंसे लगाए और उसे खींचता हुआ बाहर ले जाने लगा।

” भावना इस आदमी को पुलिस के हवाले करना होगा।”
भावना ने बिना कुछ बोले हम ही भर दी..

राजेंद्र दीपक को खींचता हुआ बाहर वाले कमरे में ले आया। उसने भावना से रस्सी मंगवाई, और भावना और राजेंद्र ने दीपक को वही एक कुर्सी में बैठा कर उसके हाथ पैरों को जोर से रस्सी से बांध दिया। उसके मुंह में ढेर सारा कपड़ा ठूंसने के बाद एक रुमाल से उसके चेहरे को भी भावना ने कस कर बांध दिया। बांधते समय भावना ने इतनी जोर से गांठ मारी की दूध से जले हुए दीपक को और भी ज्यादा तिलमिलाहट होने लगी।

मन ही मन दोनों को कोसता ,वह अब हालातो से थक चुका था।
राजेंद्र ने फोन निकाल कर पुलिस थाने का नंबर डायल कर दिया। कुछ देर बाद ही अपना सायरन बजाती पुलिस की गाड़ी भावना के घर के सामने खड़ी थी ।

अपने बूट्स खटकाते हुए लंबे लंबे डग भरता,अनिरुद्ध वासुकी भावना के घर के दरवाजे पर पहुंच चुका था…।

उसने दरवाजे के भीतर कदम रखा और तभी बिजली आ गयी..।
पूरा घर रोशन हो गया, बत्तियां जल उठी, उजाला हो गया और गया हुआ पावर वापस चला आया….

भावना के घर के थोड़ा सा आगे ही एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर था। जहां शाम के समय भजन बजा करते थे। वहां भी बिजली चली जाने के कारण बजते हुए भजन जो आधे में रुक गए थे बिजली के वापस आते ही शुरू हो गए।

मेरी चौखट पे चल के
आज चारों धाम आए हैं
बजाओ ढोल स्वागत में
मेरे घर राम आए हैं..

कथा सबरी की जैसे जुड़ गई
मेरी कहानी से
ना रोको आज धोने दो चरण
आँखों के पानी से..

” देख रहे हैं हुजूर आपकी एंट्री पर तो बैकग्राउंड म्यूजिक भी बजने लगता है…।”

” बाबूराव मंदिर में भजन बज रहा है। हमारी एंट्री पर का सॉन्ग नहीं है, लेकिन मौके पे चौका लगता डायलॉग मारा है तुमने..।
वैसे यहाँ से किसने फ़ोन किया था !”

कुर्सी पर बंधे बैठे दीपक पर एक नजर डाल अनिरुद्ध वासुकी ने राजेंद्र की तरफ देखा..

” सर मैं डॉक्टर राजेंद्र हूँ.. मैंने ही आपको कॉल किया था..
ये मेरी पत्नी का घर है, यानी मायका है इनका.. आज ये शाम के वक्त अकेले थी और उसी समय ये आदमी घर में घुस आया और..

राजेंद्र बोलते हुए रुक गया उसने भावना की तरफ देखा और भावना ने आगे की सारी कहानी वासुकी को सुना दी..

“सर हम अकेले थे और यह आदमी हमारे घर में घुस आया। हमसे उल्टी सीधी बातें करते हुए यह हमारी इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश में हमारी तरफ हाथ बढ़ा ही रहा था कि हमने इसे…
अगर डॉक्टर साहब वक्त पर नहीं आ जाते तो शायद हम इसे मार ही डालते..

.”आपने रोक क्यों दिया ?”

पलट कर वासुकी ने राजेंद्र की तरफ देख कर पूछा और फिर हल्का सा मुस्कुरा उठा..

“वैसे आपने अच्छा किया डॉक्टर साहब जो मैडम को रोक लिया.. पिछले कुछ दिनों से हमारे भी हाथ में खुजली हो रही.. कहीं हाथ साफ नहीं किया ना.. क्यों बाबूराव ?”

“हाँ.. जी हुज़ूर !”
.
“तो चलो फिर इसे उठा कर गाड़ी में डालो, थाने ले कर चलते हैं !”

“जी हुज़ूर !”

“आप को भी साथ चलना होगा, एफआईआर करवाने के लिए.. रजिस्टर में दस्तखत करना पड़ता है ना !”

वासुकी ने राजेंद्र की तरफ देख कर कहा और वापस मुड़ कर घर से बाहर निकल गया….

उसके पीछे बाबूराव दीपक को पकड़ कर बाहर ले आया..
राजेंद्र निकलने लगा, फिर रुका और मुड़ कर भावना की तरफ देखने लगा..
.
“तुम भी चलो, वहाँ से ही मेरे घर निकल जायेंगे ! यहाँ जो सामान सहेजना है फटाफट देख लो.. !

भावना ने हामी भरी और थोड़ा बहुत जो साथ लेना था फटाफट लेकर राजेंद्र के साथ हो गयी..

“चाचा जी निकल गए, ये मुझे बताया क्यों नहीं ?”

भावना से राजेंद्र ने पूछा, भावना कोई जवाब नहीं दे पायी…

“मुझे बताना चाहिए था ना… मैंने नहीं सोचा था कि इस गांव में अकेले रहना इतना भी खतरनाक हो सकता है.. अब तुम यहाँ अकेले नहीं रहोगी.. मेरे साथ चलोगी.. !”

भावना ने कुछ नहीं कहा….
रास्ते में राजेंद्र को अँधेरे के कारण दिखाई नहीं दिया, और गड्ढे में गाड़ी जाते जाते बची, उस उछल कूद में भावना अपनी जगह से जरा आगे सरक गयी.. गड्ढे से बचने में जो झटका लगा उसमे भावना का हाथ राजेंद्र के कंधे पर आ लगा..

थोड़ा आगे बढ़ने पर संकोच से भावना ने अपना हाथ हटा लिया.. राजेंद्र ने हल्के से किनारे गर्दन घुमाई और बोल पड़ा..

“रख लो हाथ.. तुम्हारे हाथ रख देने से मैं भस्म नहीं हो जाऊंगा..
वैसे एक बात बोलूं.. ?”

राजेंद्र की बात सुन भावना के चेहरे पर हंसी खेल गयी.. उसकी मीठी सी हंसी की भीनी सी गूंज राजेंद्र के कानो में शहद घोल गयी..

“बोलिये !”

“तुम पर आज काली माता आ गयी थी साक्षात् ! मुझे तो वाकई रणचण्डी नजर आयी, मैं खुद डर गया था एकबारगी, की तुम्हे रोकूँ कैसे ? लेकिन फिर तुम शांत हो गयी धीरे धीरे.. !
अगर मैं आज नहीं आता तो तुमने तो उस लीचड़ को मार ही डालना था ना ?”

“हम्म.. शायद !! पता नहीं कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी मुझमे.. ! वरना मुझसे तो एक मच्छर नहीं मारा जाता !”

“समय सब सीखा देता है.. तुम शालीन हो स्वभाव से और ये तुम्हारे संस्कार है कि तुम सभ्यता से रहती हो..
आज मौका ऐसा पड़ा कि तुम्हे हथियार उठाना पड़ा और आत्मरक्षा में उठाया हथियार हिँसा नहीं होती.. !”

भावना चुप चाप सुनती रही और उसे सहज करने के लिए राजेंद्र आज दुनिया भर की बातें कहता रहा… और दोनों पुलिस स्टेशन की राह में बढ़ते चले गए..

क्रमशः

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Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

समीक्षा लिखी गायब कर दी👿
पर मैं भी ढीढ़, छोड़ो आज जितनी खुश हु सब को माफी ।
💃💃💃🕊️🦚🦚🕊️🥳😈🙈🙈
पिछले भाग में लगा की रेशम जैसा हाल न हों, पर भावना का रणचंडी रूप होगा ये तो सोचा ही न था , क्या धोया है , वाह मजा ही आगया , थोड़ी देर तो लगा , भावना के अंदर मेरी आत्मा घुस गई है और मिर्ची मैने ही डाल दी है dipu की आंखो में, फिर गरम दूध , और फिर चाकू, और लास्ट में सिलबट्टा वाह , माशाअल्लाह , dr साहिबा, 😍🤗🥰😘😘😘😘 लव यू , love you 🤗
राजी ने क्यों पकड़ा, एक दस्ता पड़ने देना चाहिए था , राजी भी हक्का बक्का रह गया , भावना को देख ,
आय हाय, क्या शांत किया है महादेव ने शक्ति को 😍
मैं तो वासुकी का इंतजार कर रही थी पर यह तो भावना ने ही काम रमन कर डाला रे….
राजी का एक हाथ ही काफी है उस दीपु के उपर डॉक्टर साहब को एक नस ही दबानी थी , कोन सी वो तो आप दोनो को ही पता होगी , 😜😜😆
वैसे गरम दूध की जगह तेल होता न तो और मजा आता 😅😅😬
मेरे घर राम आए है , वाह क्या एंट्री दी है, वासुकी ने , 🫡🫡🫡 पहला तो मेरी पत्नी का घर है सुनकर सिटी मारने का मन हुआ , फिर वासुकी ने कहा क्यूं रोका आपने उस बात पर सीटी मारने का मन हुआ ,( यह सीटी का इमोजी नही है नही तो छप देती) 😹😹 फिर मेरे हाथ में भी खुजली हो रही है , एक और सिटी मारी मैने ,🙈🙈🙈 ये फिल्म में थिएटर में देख रही ऐसा लग रहा है ।🙈🙈😅
और लास्ट में बाइक की सवारी वाह मजा आगया , राजी का कहना मुझे छू लोगी तो जल कर भस्म नही हो जाऊंगा , ( क्या पता हो भी जाओगे) 😆😆 तो बाते कर के भावना का ध्यान भटका रहे है जनाब , अच्छा जितना चुप चाप समझे थे , उतने है नही डॉक्टर साहब , छुपे रुस्तम है ।
हाए जल्द ही नेक्स्ट पार्ट भेज दो dr साहिबा , वासुकी का इंतजार है कैसे हाथ साफ करेंगे , 🫡🫡🫡😘😘😘😘
love you Dr साहिबा 😘😘🤗