अपराजिता -89

अपराजिता -89

     पूरी धूम और सती माता के जयकारे के साथ भावना की माँ की अर्थी उठी और अपनी अंतिम यात्रा पर चल पड़ी..।

उनके अंतिम दर्शनों के लिए कुसुम की माँ और भाभी भी पहुँच गयी थी..
कुसुम की माँ सदा से ही ब्राम्हण होने से भावना की माँ का बहुत मान किया करती थी, वो अपने साथ एक लाल चुनरी भी लेती आयी थी..।
दोनों सास बहु ने मिलकर पूरे सम्मान से उस चुनरी को भावना की माँ को ओढ़ा भी दिया था..

अर्थी के निकल जाने के बाद भावना को एकदम से आभास हुआ कि वो कितनी अकेली रह गयी थी..
वो रोते रोते अंदर चली गयी..
कुसुम भी अंदर जाने लगी तो उसकी माँ ने उसे रोक लिया..

“अब तुम भी अपने घर चली जाओ.. जाने वाले के प्रस्थान के बाद नहीं रुकते, अपने अपने घर चले जाते हैं और सुनो घर जाकर बिना किसी को छुए बाल धो कर नहा लेना.. !”

ये सब सुन कुसुम का पारा चढ़ गया..
वो दनदनाती हुई अंदर चली गयी..

जब तक राजेंद्र, चाचाजी लोग वापस नहीं आये कुसुम भावना के साथ बैठी ही रही..।

दोनों चुपचाप बैठी थी..।

बीच बीच में कुछ याद कर भावना रो लेती थी..

सबकी वापसी के बाद चाचाजी खुद भावना के पास चले आये.. उन्होंने कुसुम को देखा और उसी से कहने लगे..

“हम सब के वापस आने तक तुमने भावना का ख्याल रखा, अब तुम भी अपने घर जाओ, संस्कार के बाद सभी का शुद्ध होना भी आवश्यक है.. !”

चाचा जी की बात पर भावना ने भी कुसुम से वापस जाने कहा और सब से आज्ञा लेकर कुसुम निकल गयी.. यज्ञ भी चुपचाप बाहर बैठा उसी का इंतज़ार कर रहा था..।

कुसुम के आते ही उसे साथ लिए वो घर निकल गया..

हमेशा का वाचाल और चंचल यज्ञ आज शांत बैठा था.. मृत्यु की सच्चाई कहीं न कहीं सभी को दहला जाती हैं..
घर पहुँच कर यज्ञ नहा कर नीचे चला गया और कुसुम नहाने के बाद अपने कमरे में ही लेटी रह गयी.. उसका कहीं जाने का मन नहीं था..
उसकी पीड़ा उसकी तकलीफ यज्ञ ने अपनी माँ से कह दी थी, उन्होंने कुसुम का खाना ऊपर ही भेजवा दिया.. हालाँकि दो चार उलटे सीधे कौर डाल कर उसने थाली सरका दी..

खिड़की पर से छन कर धूप आ रही थी.. वहीँ आंखे मीचे बैठी कुसुम को थोड़ी देर में नींद ने अपनी आगोश में ले लिया..

***

रेशम और अथर्व, रेशम के अस्पताल पहुँच गए..
रेशम अपनी केबिन में बैठी काम देखने लगी और अथर्व  घूम घूम कर उसका छोटा सा अस्पताल देखने लगा…

कुछ देर बाद ग्रेसी नर्स भी अपनी जोइनिंग देने चली आयी..
सारी औपचारिकताएं पूर्ण करने के बाद रेशम खड़ी हो गयी.. वो निकल रही थी कि कुछ दो तीन औरतें चली आयी.. लेकिन उन्होने जब रेशम के साथ अथर्व को देखा तो समझ गयी कि ये रेशम का पति हो सकता है.. तीनो साथ में मुस्कुराने लगी..

“मैडम ये आपके डॉक्टर साहब हैं क्या ?”

रेशम ने मुस्कुरा कर सर हिला दिया…

“आइये अप लोगो की दवा लिख कर फिर जाती हूँ.. !”

“अरे नहीं, आप जाइये.. हम सब कल आ जायेंगे.. वैसे पुरानी पर्ची भी लाये हैं तो बिट्टू दवा निकाल देगा.. !”

“हम्म ठीक है.. ग्रेसी सिस्टर आप जरा देख लीजियेगा.. ! कोई इमरजेंसी हो तो मुझे फ़ोन कर लीजियेगा  ! “

रेशम ने नर्स से कहा और और अथर्व के साथ निकल गयी..

दूर्वागंज से थोड़ा दूर एक बड़ा सा झरना था….. उस जलप्रपात के पास टूरिस्ट के आकर्षण के लिए तरह तरह के इंतज़ामात भी थे…

ढेर सारी हरियाली के बीच बड़े-बड़े पत्थर और झरना बहुत सुहाना लग रहा था। झरने से थोड़ा आगे बढ़ने पर ही झील थी, जो झरने के पानी से ही बही चली जा रही थी। लोग उन पत्थरों में बैठे हुए पिकनिक कर रहे थे। कुछ लोग थोड़ा दूरी पर समूह में खाना वगैरह बना रहे थे, रेशम और अथर्व साथ-साथ चल रहे थे।

अथर्व ने रेशम का हाथ कसकर थाम रखा था। रेशम भीड़ भाड़ की तरफ बढ़ रही थी लेकिन अथर्व कोई ऐसा कोना ढूंढ रहा था जहां वह अकेले अपनी रेशम के साथ अपना क्वालिटी टाइम बिता सके।

रेशम वहीं ठहर कर बैठना चाहती थी  लेकिन अथर्व चला जा रहा था।

” और कहां तक जाएंगे, यही तो है झील और झरना।”

” तुम चलो तो साथ मेरे। घबराओ मत, तुम्हें झील में धक्का नहीं दूंगा।”

अथर्व की बात सुनकर रेशम ने घूर कर उसे देखा और अथर्व ने प्यार से उसे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। रेशम के कंधे के इर्द-गिर्द अपनी बाहों का घेरा डालें उसे साथ लिए चल रहा था वो।

कुछ दूर बढ़ने पर एक बड़ा सा काला चौकोर पत्थर अथर्व को नजर आ गया। वह दोनों वहां जाकर बैठ गये। नीचे से ही झील का पानी होकर बह रहा था। अथर्व एक तरफ पैर किए बैठा था, लेकिन रेशम का मन उस पानी में पैर डालने का था।

अपनी जींस जरा ऊपर कर उसने पैरों को पानी में भिगो दिया।
          वहां बैठकर वह धीरे-धीरे अपने पैरों से पानी पर अठखेलियां करने लगी। पानी की कुछ बंदे उसके पैरों पर ठहर जा रही थी तो कुछ बहती चली जा रही थी। रेशम बड़ा मगन होकर पानी से खेल रही थी और अथर्व बड़े ध्यान से उसके पैरों को देख रहा था।

रेशम ने अथर्व को देखा और पूछ लिया,

” क्या हुआ, ऐसे क्या देख रहे हो?”

अथर्व के चेहरे पर शरारती मुस्कान चली आई। उसने रेशम को देखा और हल्का मुस्करा उठा।

” देख रहा हूं तुम्हे, क्योंकि कमरे में तो तुम कुछ देखने देती नहीं हो। यही तुम्हारे चरण देखने मिल गए, तो सोचा देखकर अपनी आंखों की प्यास बुझा लूं।”

रेशम शरमा कर अथर्व के कंधे से लगकर बैठ गई। अथर्व ने उसे अपनी बाहों के घेरे में समेट लिया। दोनों चुपचाप बैठे थे।

   अथर्व ने हीं बोलना शुरू किया।

” रेशम तुमसे कुछ पूछना चाहता हूं।”

रेशम की सांस ऊपर नीचे होने लगी। पता नहीं क्यों अथर्व जब भी यह कहता कि वह कुछ पूछना चाहता है, रेशम घबरा ही जाती थी।

” क्या पूछना चाहते हैं?”

उसने अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए पूछा।

अथर्व ने रेशम की तरफ देखा और उसकी ठोङी पर अपनी उंगलियां रख उसका चेहरा अपनी तरफ घूमा लिया। उसकी आंखों में आंखें डालकर देखते हुए अथर्व ने पूछ लिया।

” क्या कोई ऐसी बात है जो तुम मुझसे छुपा रही हो? कोई ऐसा राज, जो तुमने आज तक मुझे नहीं बताया या बताना चाहती हो, लेकिन बता नहीं पा रही हो।
देखो रेशम एक पति पत्नी का रिश्ता सबसे ज्यादा पारदर्शी होता है। माता-पिता के बाद अगर हम सबसे ज्यादा किसी से खुलकर अपना प्यार निभा पाते हैं, तो वह पति-पत्नी का रिश्ता ही होता है। और अगर उस रिश्ते में पारदर्शित ना हों तो रिश्ता धीरे-धीरे बोझ सा होने लगता है। मैं तुम पर किसी तरह का जोर नहीं डाल रहा हूं। तुम अपना पूरा समय ले सकती हो। लेकिन बस इतना कहना चाहता हूं कि अगर कोई ऐसी बात है जो तुम कहने में संकोच कर रही हो, या नहीं बता पा रही हो, तो उस बात को जानने के लिए मैं भी अपनी तरफ से तुम्हारी पूरी मदद करूंगा।
कभी भी यह मत सोचना कि तुम्हारी किसी भी ऐसी बात को सुनकर मैं अपने मन में तुम्हारे लिए कोई धारणा बना लूंगा।
पति समझकर नहीं तो दोस्त समझ कर ही मुझसे तुम अपने सारे अनुभव बांट सकती हो। मैं तुम्हें अभी सब कुछ कह देने के लिए नहीं कह रहा हूं।
     बस इतना विश्वास दिला रहा हूं कि पति से पहले तुम्हारा दोस्त हूं। और इतना जिगर है मेरे पास कि तुम जो भी कहोगी, मैं उसे पूरी तरह स्वीकार करूंगा।

आखिर तुम्हारे साथ सात फेरे लिए हैं। सात जन्मों के बंधन में बंधे हैं हम। इतना खोखला रिश्ता नहीं कि किसी भी बात के झोंके से हमारा रिश्ता हवा हो जाएगा। तुम समझ रही हो ना मैं क्या कह रहा हूं।”

उसके दिल दिमाग पर इतना गहरा असर था कि उन्हें वापस बताने में भी उसे इस बात का डर था कि वह कहीं फिर उसी गहरे कुएं में ना डूब जाए, जहां से निकलने में उसे सालों लग गए थे।
उस वक्त उसकी उम्र भी कम थी। 18- 19 की उम्र में मिला वह घाव उसने उस वक्त दबाने की कोशिश जरूर की लेकिन वह घाव भरा नहीं था। अंदर ही अंदर नासूर बन गया था।
जाने कितनी रातें उसने जागते हुए काट दी थी। कहीं से भी अखंड शब्द भी सुनाई देता था, तो वह घबरा जाया करती थी। अपने घर वालों के सामने खुद को सामान्य दिखाने के लिए उसने भले ही ऊपरी तौर पर एक मुखौटा ओढ लिया था, लेकिन अंदर ही अंदर उसका डर बढ़ते बढ़ते ज्वालामुखी सा हो गया था। ऐसा ज्वालामुखी जो सुप्त पड़ा था। लेकिन भीतर ही भीतर लावा दहक रहा था। आज भी उसने बोलने की हिम्मत जुटानी चाही, लेकिन कुछ नहीं बोल पाई, और चुप रह गई।
   
    “नहीं ऐसी कोई बात नहीं। सब ठीक है। बस मुझे इन रिलेशंस में थोड़ा डर लगता है। मुझे ऐसा लगता है कि मुझे थोड़ा वक्त चाहिए।”

अथर्व ने गहरी सी सांस भरी और रेशम के चेहरे को अपनी हथेलियां में थाम लिया।

” थोड़ा नहीं पूरा वक्त ले लो। मुझे भी कोई जल्दी नहीं है। आखिर पति हूं तुम्हारा। तुम्हारी पूरी जिंदगी मेरे नाम लिख चुकी हो तुम। तुम्हारा हर दिन और हर रात मेरी ही है। इसलिए पूरा वक्त ले लो, बस इतना कहना चाहता हूं कि मुझसे कुछ छुपाना मत।
क्योंकि अगर तुमसे नहीं किसी और से मुझे कुछ पता चला तो मेरे दिल को बहुत ठेस पहुंचेगी। और फिर शायद मैं इतनी खुशदिली से बांहे फैलाएं तुम्हें अपना ना सकूं।”

रेशम ने अथर्व की तरफ देखा, उसकी आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे।

” अरे, अरे मैं यह थोड़ी कह रहा हूं ।
   बच्चा रोना नहीं, इसलिए तो मैंने ऐसा नहीं कहा मैं तो बस तुमसे उगलवाना चाहता हूं, पागल लड़की।
चलो रिलैक्स हो जाओ, मैं तुम्हें कहीं छोड़कर नहीं जाने वाला। चाहे तुम जिंदगी भर मुझे कुछ न बताओ।
और एक बात सुन लो, चाहे तुम जिंदगी भर मुझे वैसा वाला प्यार ना कर पाओ, फिर भी मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। पति-पत्नी का मतलब सिर्फ शारीरिक मिलन ही नहीं होता, हम दोनों के तो मन मिल चुके हैं।
तो फिर यह सारी बातें बेमानी हो जाती हैं। पर इसका यह मतलब नहीं कि मैं…
   समझ रही हो ना, क्या कह रहा हूं?”

रेशम धीरे से मुस्कुरा उठी।
उसने हां मैं गर्दन हिलाई और उसकी गर्दन को पीछे से थामे अथर्व ने उसके चेहरे को अपने सीने से लगा लिया।

रेशम ने कसकर अथर्व को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।

“आई एम सो सॉरी, मैं खुद भी चाहती हूं कि मैं एक अच्छी पत्नी बनूं, लेकिन मुझे इस सबके लिए थोड़ा वक्त चाहिए।”

” थोड़ा वक्त नहीं, पूरी जिंदगी ले लो मेरी जान।”

अथर्व मुस्करा उठा।
दोनों बहुत देर तक वहां बैठे रहे। कुछ देर बाद एक चाय वाला घूमता हुआ उधर चला आया।
अथर्व ने दोनों के लिए एक-एक कप चाय ले ली।
झील के पानी में पैर डाले बैठे दोनों चाय की चुस्कियां लेने लगे।

अथर्व, रेशम को इतने दिनों से घर में बीते किस्से सुना रहा था।
    कुछ मन की बातें, कुछ अब की बातें और रेशम बड़ी रुचि लेकर सारी बातें सुन रही थी। आरव का रिश्ता कैसे हुआ, किस से हुआ, वह सारी बातें सुनते हुए रेशम अथर्व में खोई हुई थी।
उसे मन ही मन अपने ऊपर नाराजगी भी हो रही थी कि क्यों वह अथर्व को सब कुछ बता कर अपने मन का बोझ खत्म नही कर देती। लेकिन दूसरे ही पल उसका भय इन सब बातों पर हावी होने लगता था।

शाम ढलने लगी थी। अथर्व अपनी जगह से खड़ा हो गया। उसने हाथ दिया और रेशम, अथर्व का हाथ थामे  खड़ी हो गई ।

दोनों वापस लौट गए… ।

अगले दिन अथर्व और रेशम को वापस अपने घर लौटना था रेशम ने अपने बॉस को आवेदन मेल किया और अथर्व के साथ अपने ससुराल चली गई जाते समय वह अपने घर की चाबी गुड्डी को भी देती गई।

यह दो दिन रेशम के बेहद खूबसूरत बीते थे, उसके दिन सोना और रात चांदी हुई जा रही थी। लेकिन कहीं ना कहीं उसके मन में यह बात जरूर रह गई थी कि अथर्व अपनी तरफ से बहुत प्रयास कर रहा है और वह अथर्व के प्रयासों को सिरे से नकारती चली जा रही है।

आखिर रेशम ने तय कर लिया कि वह किसी मनोचिकित्सक से एक बार जाकर मिलेगी और उनसे परामर्श लेगी कि उसे अपने इस काले अतीत से निकलने के लिए क्या प्रयास करने चाहिए?

यह सोचकर उसके मन को थोड़ी सी राहत मिल गई थी।

दोनों जब तक शहर पहुंचे, रात ढल चुकी थी।

वह घर पहुंची और अपने ही ससुराल को देखकर खुश हो गई।

उसे नहीं मालूम था कि एक दिन इस घर पर भी उसे उतना ही प्यार आने लग जाएगा जितना उसका मायका..।

सासू मां के पैर छूकर वह अंदर दाखिल हो गई।

अंदर पहुंचते ही उसने हाथ पैर धोये ही थे कि उसकी सास ने आवाज देकर उसे रसोई में बुला लिया।

रेशम को थोड़ी सी हंसी भी आई, और अपनी हंसी दबाती वह रसोई में चली गई ।

जाहिर था कि यह उसकी मां का घर नहीं था कि वह पैर पसार कर बैठ जाए।

उसने पलट कर देखा, अथर्व सोफे पर फैला पड़ा था। और वह रसोई में अपनी सासू मां का हाथ बटाने चली गई थी।

मुस्कुराते हुए वह सासू मां के बताएं काम करने लगी…

वह खाना गरम करके परोसती जा रही थी और उसकी सास गरमा गरम फुलके सेंकती जा रही थी।

उसी समय कहीं से घूम फिर कर आरव भी घर आ गया। अथर्व को बाहर के कमरे में देखकर ही वह खुशी से झूम उठा और भाभी भाभी आवाज लगाता, रसोई में चला आया।

रेशम को देखकर मुस्कुरा कर उसने रेशम के पैर छू लिये।

“कैसी है भाभी?”

” मैं तो ठीक हूं, आप कैसे हो देवर जी ?”

मैं भी एकदम बढ़िया।”

“हां बढ़िया तो होगे ही सगाई जो होने वाली है। सारी तैयारी हो गई?”

” अरे अभी कहां? कल आपके साथ चलकर शॉपिंग करनी है, उसके बाद ही सगाई होगी ।”

रेशम मुस्कुरा कर वापस मुड़ गई और खाना परोसने लगी।

” यह क्या आप आते ही रसोई में घुस गई? आप भी तो थकी होगी। जाइये आप आराम कीजिए, मैं मम्मी की मदद कर दूंगा।”

” अरे नहीं नहीं, ऐसा भी नहीं थकी कि काम ना कर सकूं। आप चालिए, मैं थाली परोस कर ला रही हूं।”

” मम्मी यह तो तुम्हारी ज्यादती है, भाई तो आते ही बाहर टांगे फैला कर पूरे सोफे को कब्जे में लिए पसर गए।
और भाभी को तुमने रसोई में लगा दिया।”

रेशम नहीं चाह रही थी कि आरव ऐसा कुछ कहे, लेकिन आरव ने कह दिया।

रेशम की सास का मुंह बिगड़ गया।

” तू बड़ा आया तरफदारी करने वाला। जानती हूं अब तेरी शादी हो रही है ना, इसलिए कुछ ज्यादा ही तेरा ध्यान इन बातों पर जा रहा है।
लेकिन सुन ले हम औरते तुम मर्दों से कहीं ज्यादा ताकतवर होती है, समझा।
और मैं कोई चक्की में आटा नहीं पिसवा रही तेरी भाभी से।
सिर्फ खाना परोस रही है। और ना परोसना चाहे तो बाहर जाकर बैठ जाए। इतने दिन से मैं अकेली तो कर रही हूं। और 2 दिन के लिए आई है वह, उसके दो दिन आकर यहां कर देने से मेरा कोई काम का बोझ कम नहीं होने वाला।
काम तो मुझे अकेले ही करना है।”

रेशम को इतने दिन बाद आकर अपनी सासू मां की यह कड़वी बातें अजीब तो लगी, लेकिन कहीं ना कहीं अंदर थोड़ी सी खुशी भी हुई। इतने दिनों से अकेली दूर्वागंज में पड़ी वह इन सभी बातों को शिद्दत से मिस कर रही थी।

जिन बातों पर उसे बुरा लगता था, आज वही बातें उसके दिल को ठंडक दे रही थी। उसे लगा सासू मां को गले से लगा ले और कहे कि सासू मां आपकी इन जली कटी बातों को भी मैंने बहुत मिस किया।

लेकिन उसने कुछ कहा नहीं चुपचाप आरव की तरफ देखकर उसे बाहर जाने का इशारा किया और थाली परोस कर बाहर ससुर जी के लिए थाली लिए चली गई।

क्रमशः

aparna…

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Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

कुसुम कि यही सब से अलग सोच ही उसे सब से अलग कर देती है , अरे उसका शुद्ध होना ज्यादा जरूरी है की , उसकी सहेली को अकेला छोड़ दे ?? मुझे लगा इस दौरान यज्ञ की राजी से कुछ बात चीत होती , पर आगे भी मौके मिलेंगे ।भावना के चाचा है पर जो दिलासा राजी दे पाएगा वो और कोई तो नही दे पाएगा न!! भावना की मां होती तो फिर भी राजी उसकी दूर्वगंज रहने देता पर अब तो कोई चांस ही नही भावना को अकेला छोड़ ने का और उपर से अपनी मारती हुई , सासु मां से वायदा भी तो किया है राजी ने ।

यज्ञ जैसा बड़ा भी शांत हो गया , सच है आखरी विदाई किसी की भी हो , दिल को जकजोर ही देती है , मैं तो उन हॉस्पिटल के डॉक्टर्स का भी सोचती हूं की कैसे हिमत जुटाते है वो लोग हर रोज । कुसुम की सासुमा के लिए 🙏🙏 बोहोत समझती है कुसुम को ।

अरे अथर्व इतना कुछ बोला , इतना विश्वास दिलाया फिर भी रेशम ने नही बताया कुछ , वैसे जिस तरह से अथर्व पूछ रहा था , लगता तो है की कुछ कुछ उसे पता है, बाकी आज जो कुछ भी कहा न अथर्व ने उसके लिए अथर्व को सैल्यूट है 🫡🫡🫡🫡🫡🥰 हर कोई ये नही कर पाता , और रेशम ने ये ठीक फैसला लिया की एक बार मनोचिकित्सक को दिखा आए । रेशम के देवर का तो हो गया , पर हमारे मानव बाबू के बारे में क्या सोचा है , और प्यारे अखंड के बारे में भी ।

रेशम भी अपनी सासू मां की जली कटी सुन कर हंस रही है सब को क्या हो गया है , सारी सासु मां को … वहा कुसुम लड़ना चाहती है तो सासुमा लड़ने का मौका नहीं दे रही , और यह मौका मिल रहा लड़ने का तो रेशम उल्टा खुश हो रही ।मैं तो भूल ही गई की ये सास ,dr साहिबा की है यहां जघड़ा नही होगा 🙈🙈😬😅😅😅 बोहोत ही प्यारा पार्ट था , सबसे ज्यादा आज अथर्व बाजी मार गया 🫡🫡🫡🫡 आगे के इंतज़ार में……